शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

ज्ञान-गंगा : 6

मनुष्य के चित्त-विश्लेषण से जो केंद्रिय तत्त्व उपलब्ध होता है, वह है परिग्रह की दौड़ । चाहे यश हो, चाहे धन हो,चाहे ज्ञान हो,लेकिन प्रत्येक स्थिति में मनुष्य किसी न किसी भांति स्वयं को भरना चाहता है और संग्रह करता है । संग्रह न हो तो तो वह स्वयं को स्वत्वहीन अनुभव करता है । और संग्रह हो तो उसे लगता है कि मैं भी कुछ हूँ । संग्रह, शक्ति देता हुआ मालूम पड़ता है । और संग्रह स्व या अहं को भी निर्मित करता है । इसलिए जितना संग्रह उतनी शक्ति और उतना अहंकार । इस दौड़ का क्या मूलभूत कारण है ? इसे बिना समझे जो इस दौड़ के विरोध में दौड़ने लगते हैं, वे ऊपर से भले ही अपरिग्रही दिखाई पड़ें, लेकिन अंतस् में उनके भी परिग्रह ही केंद्र होता है । जो व्यक्ति स्वर्ग के लिए, बैकुण्ठ के लिए या बहिस्त के लिए सम्पत्ति और संग्रह छोड़ देते हैं, उनका छोड़ना (त्याग) कोई वास्तविक छोड़ना नहीं है । क्योंकि जहां भी कुछ पाने की आकांक्षा है, वहां परिग्रह है । फिर चाहे यह आकांक्षा परमात्मा के लिए हो या चाहे मोक्ष के लिए, चाहे निर्वाण के लिए । वासना परिग्रह की आत्मा है । लोभ ही उसका श्वांस-प्रश्वांस है । इस भांति धन को जो धर्म या पुण्य के लिए छोड़ते हैं, वे भी किसी और बड़े धन के पाने की अभिलाषा रखते हैं । यही कारण है कि यदि हम भिन्न-भिन्न धर्मों द्वारा कल्पित स्वर्ग पर विचार करें, तो उसमें हमें मनुष्य के लोभ का ही विस्तार उपलब्ध होगा । कामनाओं और वासनाओं ने ही उसका सृजन किया है । जो सुख और ऐन्द्रिक तृप्ति इस लोक में चाही जाती है, उसकी ही पूर्ति के वहां और भी सुलभ साधन प्रस्तुत किए गए हैं । कामधेनु है या कल्पवृक्ष, चिरयौवन अप्सराएं हैं या हूरें, शराब की नदियां हैं और काम भोग के सभी उपकरण हैं ।
दान-पुण्य और त्याग से यदि यही सब उपलब्ध करना है, तो ऐसे दान - पुण्य, त्याग को आत्म वंचना ही मानना होगा । यह वासना का ही विकृत्त रूप है । और परमात्मा के नाम से परिग्रह की ही तृप्ति है । यह भी हो सकता है कि कोई न स्वर्ग चाहता है, न अन्य तरह की कामनापूर्ति, लेकिन इन सब से मुक्ति चाहता हो । किंतु बहुत गहरे में देखने पर यह भी चाह का आत्यंतिक रूप है । वासनाओं से यदि दुख अनुभव होता है, तो उनसे मुक्ति चाहने में भी सुख की वासना उपस्थित है । वस्तुत: त्याग किसी भी भांति की इच्छा के साथ संभव नहीं है ।
परिग्रह की इतनी गहरी दौड़ क्यों है ?उसे छोड़ते हैं, तो भी वह उपस्थित रहता है । त्याग में भी वह खड़ा है, भोग में भी । तब क्या उससे छुटकारा संभव नहीं ? क्योंकि जो उससे छूटने की कोशिश करते हैं, वे परिवार को तो छोड़ते हुए अनुभव करते हैं, लेकिन खाई में गिरते दिखाई पड़ते हैं । उनका त्याग भोग का ही शीर्षासन करता हुआ रूप मालूम होता है । गृहस्थ और तथाकथित संन्यासी में कोई आधारभूत अंतर नहीं होता । गृहस्थ जिस ओर भागता है, संन्यासी ठीक उसके विपरीत भागता हुआ मालूम होता है । इससे संन्यासी गृहस्थ से भिन्न है, ऐसी भ्रांति पैदा होती है। लेकिन विपरीत्त दिशाओं में भागते हुए भी उनकी मूल तृष्णा में कोई भेद नहीं है । बल्कि तथाकथित त्यागवादी और अधिक काम और लोभ से ग्रसित मालूम होंगे, क्योंकि क्षणिक लौकिक सुख उन्हें तृप्त नहीं कर पाते, उनकी अभीप्सा तो शाश्वत सुख के लिए है । और यदि उस शाश्वत सुख के लिए वे इन क्षणिक सुखों को लात मार देते हों तो न तो यह अलोभ है न त्याग, न अपरिग्रह । यह तो किसी भावी लाभ की आकांक्षा में संपत्ति विनिवेश(इन्वेस्टमेंट) है ।
साधारणत: परिग्रह को छोड़ना कठिन है । जब तक कि उसके उद्भव के मूल कारण को न जाना जा सके । मूल कारण है, स्वयं से अपरिचित होना । इस अपरिचय और अज्ञान से आत्म अविश्वास उत्पन्न होता है । आत्म अविश्वास से असुरक्षा अनुभव होती है । असुरक्षा की भावना से बचने के लिए, परिग्रह की दौड़ आरंभ होती है । स्वयं का बोध न हो, तो संपत्ति और संग्रह से सुरक्षित होने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह जाता । स्वयं का होना है अज्ञात । वस्तुएं हैं ज्ञात । जो ज्ञात है, वह उपलब्ध करना सरल है । उसे जीतना आसान है । और उसके द्वारा जो अभाव भीतर काटता है, उससे भ्रांति ही सही, लेकिन छुटकारा मिलता हुआ अनुभव होता है । स्वयं के भीतर देखें तो वहां कुछ नहीं मालूम होता है, वहां तो एक शून्य है । गहन रिक्तता है । यह रिक्तता भरे बिना चैन नहीं । किसी न किसी भांति इसे भरना ही है । अभाव के साथ जिया नहीं जा सकता । रिक्तता घबड़ाती है और मृत्यु मालूम होती है । उससे बचने के लिए ही परिग्रह की शरण लेनी पड़ती है । संपत्ति, पद,यश,प्रतिष्ठा इन सबमें उस अभाव से पलायन ही हम खोजते हैं । लेकिन अभाव है आंतरिक और संपत्ति,पद,यश,प्रतिष्ठा सब बाह्य हैं । संपत्ति कितनी ही इकट्ठी करते चले जाएं, अभाव उससे नष्ट नहीं होता । भीतर का अभाव भीतर के भाव से ही नष्ट होगा । बाहर की कोई भी उपलब्धि उसे भरने में केवल इस कारण ही असमर्थ है कि वह बाहर की है । यही कारण है कि परिग्रह की दौड़ किसी और के पागलपन से पीड़ित रहती है । जो मिल जाता है, वह काम करता हुआ मालूम नहीं होता । अभाव वैसे का ही वैसा मालूम होता है । कितना ही अभाव को भोजन दें, उसका पेट भरता नहीं । वह मुंह बाए ही खड़ा रहता है । स्वभावत: बुद्धि कहती है और दो, इतने से नहीं हुआ, तो और करो और इस भांति एक अंतहीन चक्कर चलता रहता है । जिसमें हर पड़ाव पर लिखा होता है : और आगे । और ऐसा कोई पड़ाव नहीं है जहां यह न लिखा हो ।
परिग्रह की वृत्ति स्वयं की रिक्तता से पैदा होती है , तो उचित है कि हम इस रिक्तता को जानें और पहचाने । रिक्तता के ज्ञान के लिए रिक्तता में जीना जरूरी है । न तो उसे भरें और न उससे भागें । वरन् उसमें कूद जाएं । ताकि उसका पूरा अनुभव हो सके । यही है योग । रिक्तता में छलांग समाधि है, शून्य में जीना साधना है । जो व्यक्ति स्वयं की इस शून्यता में प्रवेश का साहस करता है, वह प्रविष्ट होकर पाता है कि जो रिक्तता अनुभव होती थी, वही आत्मा है और दूर से जो शून्य जैसा भासता था, वही परम सत्ता है । यह अनुभव अभाव से मुक्त कर देता है । परमात्मा उपलब्ध हो, परम सत्ता का साक्षात्कार हो, तो परिग्रह की वृत्ति सहज ही विलीन हो जाती है । जैसे जाग जाने पर स्वप्न विलीन हो जाते हैं, वैसे ही स्वयं में आने पर बाहर बाहर की कोई दौड़ शेष नहीं रह जाती । जीवन की दो दिशाएं हैं : परिग्रह या परमात्मा । स्वयं का अभाव है दोनों दिशाओं का प्रारंभ बिंदु। उससे भागिए तो परिग्रह की गति शुरु होती है, उसमें डूबिए तो परमात्मा उपलब्ध होता है ।

गुरुवार, 30 जुलाई 2009

ज्ञान-गंगा : 5

मनुष्य स्वरूपत: शुभ है या अशुभ ? जो उसे स्वरूपत: अशुभ मान लेते हैं, उनकी दृष्टि अत्यंत निराशाजनक और भ्रांत है । क्योंकि जो स्वरूपत: अशुभ हो, उसके शुभ की संभावना समाप्त हो जाती है । स्वरूप का अर्थ ही यही है कि उसे छोड़ा नहीं जा सकता है । जो सदा अनिवार्य रूप से साथ है वही स्वरूप है । यदि मनुष्य स्वरूप से ही अशुभ हो, तब तो उसे शुभ का विचार भी नहीं उठ सकता । इसलिए हम मनुष्य को स्वरूपत: शुभ मानते हैं । अशुभ आच्छादन है । यह दुर्घटना -मात्र है । जैसे सूर्य अपने ही द्वारा पैदा की हुई बदलियों में छिप जाता है । वैसे ही मनुष्य की चेतना में जो शुभ है, वह उसकी अंतर्निहित स्वतंत्रता के दुरुपयोग से आच्छादित हो जाता है । चेतना स्वरूपत: शुभ और स्वतंत्र है । स्वतंत्रता के कारण ही अशुभ भी चुना जा सकता है । तब एक क्षण को अशुभ आच्छादित कर लेता है । जिस क्षण अशुभ हो रहा है, उसी क्षण वह आच्छादन रहता है । उसके बाद आच्छादन तो नहीं, मात्र स्मृति रह जाती है । शुद्ध वर्तमान में स्मृति शून्य चेतना सदा ही शुभ में प्रतिष्ठित है । अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति अपनी शुद्ध वर्तमान सत्ता में शुभ और निर्दोष है । जो व्यक्ति सोचता है कि मुझसे पाप हुआ,उसे भी समझना आवश्यक है कि पाप उसकी अतीत स्मृति है ।क्योंकि जो हो गया है उसका ही सिंहावलोकन चित्त कर पाता है । जो है, यदि चित्त उसके प्रति सजग और जागरुक हो तो चित्त मिट जाता है और मात्र चेतना रह जाती है । यह चेतना नित्य शुभ है । स्मृति और कामना, अतीत और भविष्य यही चेतना के बंधन हैं । इनसे जो मुक्त है, वही स्वरूप में पहुंच जाता है । स्वरूप सदा निर्दोष है ।
यह स्मरणीय है कि मैं स्वरूपत: शुभ हूँ । यह प्रतीत और प्रत्यय कि मैं सदा निर्दोष हूँ, शुभ और निर्दोष जीवन के लिए मुख्य आधार हैं । कोई यह न सोचे कि इस भांति तो अहंता प्रगाढ़ होगी, क्योंकि इस प्रत्यय में मेरी ही नहीं समस्त चेतनाओं की निर्दोषता समाविष्ट है । प्रत्येक चेतना ही अपनी निज सत्ता में शुभ है । यह बोध स्वयं तथा सर्व के लिए सद्भाव उत्पन्न करता है । स्वयं को पापी मानना पाप करने से ज्यादा बुरी बात है । क्योंकि जो निरंतर यह भाव करता है कि मैं पापी हूँ, वह अपने ही भाव में सम्मोहित हो जाता है । कूए ने बड़े ही वैज्ञानिक आधारों पर यह सुप्रतिष्ठित कर दिया है कि हम जो भाव निरंतर करते हैं, क्रमश: हम वैसे ही होते जाते हैं ।बुद्ध ने तो कहा ही है कि विचार ही व्यक्तित्व बन जाता है । विचार और भाव में जो तरंगें उठती हैं, वे ही धीरे-धीरे हमारा व्यवहार बन जाती है । जो स्वयं के पाप,पतित और अपराधी होने के भाव करता रहता है, वह उन्हीं में जकड़ जाता है । फिर जो स्वयं को पापी समझता है, वह शेष लोगों को भी पापी ही समझता है । उसके सोचने के मापदंड वे ही हो जाते हैं। यदि पाप एक सत्य दिखाई पड़ने लगे तो क्रमश: परमात्मा एक असत्य दिखाई पड़ने लगता है । पाप से ऊपर उठने की संभावना ही परमात्मा के होने का प्रमाण है । उस संभावना से ही जीवन के अंधकार में आलोक की किरण फूटती है ।
यह भी स्मरणीय है कि पाप के ऊपर हम तभी उठ सकते हैं कि हमारे भीतर निरंतर ही पाप के ऊपर कुछ हो । अर्थात यदि हमारी चेतना में पाप से अस्पर्शित कुछ भी नहीं है,फिर तो पाप से बाहर जाने का कोई उपाय ही नहीं रह जाता । फिर तो पाप के ऊपर जाना वैसे ही असंभव है, जैसे स्वयं के जूते के बंधों को पकड़ कर स्वयं को उठाने का प्रयास । और यदि चेतना सर्वांशत: पाप हो जाए, तो उसे पाप का बोध भी नहीं रह जाएगा । जिसे पाप का बोध होता है, वह निरंतर पाप के बाहर है । वह बोध ही हमारी शक्ति, सुरक्षा और परमात्मा तक पहुँचने का आश्वासन है । पाप आते हैं और चले जाते हैं । पुण्य भी आते हैं और चले जाते हैं । पाप भी कम हैं, पुण्य भी कम हैं । किंतु जिस पर वे आते हैं, वह निरंतर ही बना रहता है । वह यदि पाप से ग्रसित हो जाए तो फिर पुण्य नहीं आ सकता, और यदि पुण्य से ग्रसित हो जाए तो पाप नहीं आ सकता । वह किसी से भी ग्रसित नहीं होता । वह सदैव अस्पर्शित है । इस साक्षी का, इस आत्मा का संकल्पपूर्वक स्मरण समस्त कर्मों के बीच उसका भान, सब कुछ करते हुए,सोते,उठते,बैठते, व्यक्ति को अपने स्वरूपत: निर्दोष और शुभ होने का अवबोध करा देता है । इस बोध की दशा में ही प्रकृति का अतिक्रमण और परमात्मा का अनुभव होता है ।

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

ज्ञान गंगा : 4


मनुष्य के व्यक्तित्व में सबसे बड़ा अंतर्द्वन्द्व इस मान्यता से पैदा होता है कि उसका शरीर और उसकी आत्मा विरोधी सत्य हैं । यह स्वीकृति आधारभूत रूप से मनुष्य को विभाजित कर देती है । फिर स्वभावत: इन दोनों विभाजित खेमों में संघर्ष और कलह प्रारंभ हो जाता है । यह फिर न केवल मनुष्य के व्यक्तित्व में बल्कि समाज के व्यक्तित्व में भी प्रतिफलित होता है । इसी के आधार पर अब तक की सारी संस्कृतियां खंड संस्कृतियां हैं । अखंड और समग्र जीवन को समाविष्ट करने वाली संस्कृति का अभी जन्म नहीं हुआ है । जब तक शरीर और आत्मा, पदार्थ और परमात्मा, संसार और मोक्ष के बीच विरोध की जगह सामंजस्य और समस्वरता स्थापित नहीं होती, तब तक यह हो भी नहीं सकता । अब तक या तो ऐसी विचार-दृष्टियाँ रही हैं, जो आत्मा के निषेध पर शरीर -मात्र को ही स्वीकार करती हैं या फिर ऐसी परम्पराएं रही हैं जो शरीर के निषेध पर मात्र आत्मा की सत्ता को स्वीकार करती हैं । एक विचार वर्ग परमात्मा को असत्य मानता है और दूसरा संसार को माया और भ्रम । ये दोनों विचारधाराएँ ही पूर्ण मनुष्य को स्वीकार करने में भय खाती हैं । वे उसी अंश को स्वीकार करते हैं, जिसे पहले से ही स्वीकार करने की उन्होंने धारणा बना रखी है । जैसे कोई वस्त्र पहले बना ले और फिर मनुष्य को काट-छांट कर वस्त्र पहनाने की चेष्टा करे । ऐसी ही चेष्टा उनकी है । धारणाएं पहले तय कर ली जाती हैं, और फिर बाद में उन्हें मनुष्य को पहना दिया जाता है । जबकि विवेकपूर्ण यही होगा कि हम पहले मनुष्य को उसकी समग्रता में विचार करें और फिर कोई जीवन-दर्शन बनाएं । विचार संख्या या विचारधाराएं महत्वपूर्ण नहीं - महत्वपूर्ण मनुष्य की यथार्थता है । धार्मिक और भौतिकवादी दोनों ही पूर्व पक्षों को छोड़ कर यदि मनुष्य को देखा जाए, तो न तो वह मात्र शरीर ही है और न मात्र आत्मा ही । वह तो अद्वय इकाई है । शरीर और आत्मा हमारे विचार के विभाजन हैं । मनुष्य तो अखंड है । वस्तुत: शरीर और आत्मा का जहां मिलन है, वहीं मनुष्य की उत्पत्ति है । वे आत्माएं जो किसी अशरीरी मोक्ष में हैं, उन्हें हम मनुष्य नहीं कह सकते और न ही उन शरीरों को को जो आत्म रहित हैं । मनुष्य आत्मा और शरीर का संगम है । इसलिए उसके संबंध में किसी भी पक्ष को दूसरे के निषेध पर स्वीकार कर लेना घातक ही सिद्ध होता है और ऐसी स्वीकृति से बनी हुई संस्कृति अधूरी, पंगु एवं एकांगी है । या तो सामान्य दैहिक वासनाओं का जीवन ही उसके लिए सब कुछ हो जाता है या फिर काम ही उसके लिए केंद्र हो जाता है । फिर उसके लिए और किसी चीज़ की सत्ता नहीं होती । स्वभावत: ऐसी दृष्टि शांति, सत्य और ऊर्ध्वगमन की सब संभावनाएं छीन लेती है । मनुष्य एक डबरे में बंद हो जाता है और सागर तक पहुँचने की गति, आकर्षण और अभीप्सा सभी खो जाते हैं । दूसरी ओर जो पदार्थ को अस्वीकार कर देते हैं, वे भी शक्तिहीन हो जाते हैं और भूमि से उनकी जड़ें टूट जाती हैं । उनका होना न होने की भांति हो जाता है । इस तरह से दोनों विकल्प अनुभव किए गए हैं, और उनकी दोषपूर्ण स्थिति भी प्रत्यक्ष हो गई है ।
जिन संस्कृतियों ने जड़ को सब कुछ माना उनके पास संपदा आई, शक्ति आई लेकिन साथ ही अशांति और विनाश भी । और जिन्होंने जड़ को कुछ भी न माना वे संपदाशून्य, शक्तिरिक्त, दास और दरिद्र होते देखे गए । समय आ गया है कि इस भूल के प्रति हम सचेत हों और जड़तावादी या ब्रह्मवादी की अतियों से बचें । अति सदा वर्जित है और अनिवार्य रूप से अति का अनुगमन असत्य में होता है । सत्य सदा मध्य में है, क्योंकि सत्य सदा संतुलन और संगति में है ।
शरीर और आत्मा में किसी एक को नहीं चुनना है । पदार्थ और परमात्मा में से किसी एक पक्ष में खड़ा नहीं होना है । क्योंकि जो जानते हैं, वे विश्व सत्ता में दो का अनुभव ही नहीं करते । जो जड़ की भांति प्रतीत हो रहा है, वह भी मूलत: और अंतत: वही है जो चैतन्य की तरह अनुभव में आता है । विश्वसत्ता एक ही है । उसकी अभिव्यक्तियां ही अलग हैं। जो दृश्य परमात्मा है, वही संसार है और जो अदृश्य संसार है वही परमात्मा है । यदि हम जड़ सत्ता का आत्यंतिक अनुसंधान करें, तो वह अदृश्य में विलीन हो जाता है । विज्ञान ने यह किया और परमाणु के विभाजन के बाद वह जिन सत्ता-कणों पर पहुँचा है, वे पदार्थ नहीं हैं, न ही वे दृश्य हैं, बल्कि अदृश्य ऊर्जा मात्र में परिणत हो गए । ऐसे ही जिन्होंने चेतना का आत्यंतिक अनुसंधान किया है, उन्होंने पाया है कि चेतना ही दृश्य हो जाती है अर्थात् अदृश्य आत्मशक्ति का भी साक्षात्कार हो जाता है । और यह साक्षात्कार इतना प्रगाढ़ होता है, कि उसके समक्ष पदार्थ ही असत्तावान मालूम होने लगता है । इस सत्य को ध्यान में रखें तो ज्ञात होगा कि जो दृश्य है, वह अदृश्य ही है और जो अदृश्य है वह भी दृश्य है । संसार और मोक्ष भिन्न नहीं हैं , अभिन्न हैं । अज्ञान में जो संसार मालूम होता है, ज्ञान में वही मोक्ष हो जाता है । अंधरे में जो पदार्थ मालूम होता है, आलोक में वही परमात्मा में परिणत हो जाता है । दोनों के बीच एकता है । और इस एकता का अनुभव केवल वही कर पाते हैं, जो दोनों के बीच अतिवादी द्वंद्व से नहीं बल्कि दोनों के मध्य संतुलन से प्रारंभ करते हैं ।
हमने अतियों में जीकर देख लिया है । वह प्रयोग किसी भी दिशा में सफल नहीं हुआ है । अब अन-अति का प्रयोग करने का समय है । मनुष्य को उसकी पूर्णता को स्वीकार कर संस्कृति का निर्माण करना है ।
( यह लेख ओशो देशना पर आधारित है । )

सोमवार, 27 जुलाई 2009

ज्ञान-गंगा : 3

महर्षि रमण से किसी ने पूछा कि सत्य को जानने के लिए मैं क्या सीखूं ? श्री रमण ने कहा जो जानते हो उसे भूल जाओ । यह उत्तर बहुत अर्थपूर्ण है । मनुष्य का मन बाहर से संस्कार और शिक्षाएं लेकर एक कारागृह बन जाता है। बाह्य प्रभावों की धूल में दबकर उसकी स्वयं की दर्पण जैसी निर्मलता ढक जाती है । जैसे किसी झील पर कोई आवृत्त हो जाए और सूर्य या चंद्रमा का प्रतिबिम्ब उसमें न बन सके । ऐसे ही मन भी बाहर के सीखे गए ज्ञान से इतना आवृत्त हो जाता है कि सत्य का प्रतिफलन उसमें नहीं हो पाता । ऐसे मन के द्वार और झरोखे बंद हो जाते हैं । वह अपनी ही क्षुद्रता में सीमित हो जाता है , और विराट के संपर्क से वंचित । इस भांति बंद मन ही बंधन है । सत्य के सागर में जिन्हें संचरण करना है, उन्हें मन को सीखे हुए किसी भी खूंटे से बांधने का कोई उपाय नहीं है । तट से बंधे होना और साथ ही सागर में प्रवेश कैसे संभव है ?
एक पुरानी कथा है - एक संन्यासी सूर्य निकलने के पूर्व ही नदी में स्नान करने उतरा, अभी अंधियारा था और भोर के अंतिम तारे डूबते थे । एक व्यक्ति नाव पर बैठकर पतवार चलाता था, किंतु नाव आगे नहीं बढ़ती थी । अंधरे के कारण उसे वह सांकल नहीं दिखती थी, जिससे नाव बंधी हुई थी । उसने चिल्ला कर संन्यासी से पूछा कि स्वामी जी इस नाव को क्या हो गया है। उस संन्नयासी ने कहा, मित्र पहले खूंटे से बंधी उसकी सांकल को तो खोलो । मनुष्य जो भी बाहर से सीख लेता है, वह सीखा हुआ ज्ञान ही खूंटों की भांति उसके चित्त की नाव को अपने से बांध लेता है और आत्मा के सागर में उसका प्रवेश संभव नहीं हो पाता । जिसे परमात्मा के ज्ञान को पाना हो उसे बाहर से सीखे गए अपने ज्ञान को छोड़ देना होगा । इस अवस्था को दिव्य अज्ञान कह सकते हैं । इसे साध लेने से बड़ी और कोई साधना नहीं है ।
कुछ भी जानने का भाव अहंकार को पुष्ट करता है । इसीलिए उपनिषद् के ऋषियों ने कहा है कि जो कहे कि मैं जानता हूँ, तो जानना कि, वह नहीं जानता । जो जानते हैं, उनका तो मैं खो जाता है । बाहर से आया हुआ ज्ञान मैं को भरता है; भीतर से जगा हुआ ज्ञान उसे बहा ले जाता है । ज्ञान को पाने की विधि है कि सब ज्ञान को छोड़ दो । मैं को शून्य होने दो और चित्त को मौन । उस मौन और शून्यता में ही उसके दर्शन होते हैं जो कि सत्य है ।
ज्ञान नहीं विचार सीखे जा सकते हैं । विचारों के संग्रह से ही ज्ञान का भ्रम पैदा हो जाता है । विचार कम हो सकते हैं; विचार ज्यादा भी हो सकते हैं । ज्ञान न तो कम होता है और न ज्यादा होता है । या तो ज्ञान होता है या अज्ञान होता है । यह भी स्मरण रहे कि विचार अज्ञान का अंग है । केवल अज्ञानी ही विचार करता है । ज्ञानी विचारता नहीं देखता है । जिसके आंख है, उसे दिखाई पड़ता है । वह सोचता नहीं कि द्वार कहां है, वह तो द्वार को देखता है। जिसके पास आंख नहीं, वह सोचता है और टटोलता है, विचार टटोलना मात्र है । वह आंख का नहीं अंधे होने का प्रमाण है । बुद्ध, महावीर या ईसा विचारक नहीं हैं । हमने सदा ही उन्हें द्रष्टा कहा है । वे जो भी जानते हैं, वह उनके चिंतन का परिणाम नहीं, उनके दर्शन की प्रतीति है । वे जो भी करते हैं, वह भी विचार का फल नहीं है । उनकी अंतर्दृष्टि की सहज निष्पत्ति है । इस सत्य को समझना बहुत आवश्यक है ।
विचारों का संग्रह कहीं भी नहीं ले जाता । सभी प्रकार के संग्रह दरिद्रता को मिटाते नहीं, दबाते हैं । इसी लिए जो सर्वाधिक दरिद्र होते हैं, संग्रह की इच्छा भी उनकी सर्वाधिक होती है । डायोजनीज ने सिकंदर को कहा था, मैं इतना समृद्ध हूँ कि मैं कुछ भी संग्रह नहीं करता । और तेरी दरिद्रता का अंत नहीं, क्योंकि इस पूरी पृथ्वी के साम्राज्य को पा लेने पर भी तुम संग्रह करोगे । इसी लिए जब सम्राटों को संग्रह में छिपी दरिद्रता के दर्शन हुए हैं, तो उन्होंने दरिद्रता में छिपे साम्राज्य को स्वीकार कर लिया । क्या मनुष्य का इतिहास ऐसे भिखारियों से परिचित नहीं, जिनसे सम्राट बड़े कभी नहीं होते । जो धन संग्रह के संबंध में सत्य है, वह सभी प्रकार के संग्रहों के लिए भी सत्य है । विचार संग्रह भी उसका अपवाद नहीं । बाह्य संपत्ति के संग्रह से जो धनी है; वह यदि दरिद्र है, तो शास्त्रों के शब्दों से जो ज्ञानी है, वह भी अज्ञानी ही है ।शास्त्र से नहीं, जब स्वयं से और जब शब्द से नहीं बल्कि अंतस से आलोक मिलता है, तभी ज्ञान का आविर्भाव होता है ।
ज्ञान का जन्म ध्यान से होता है । ध्यान का अर्थ है : विचार छोड़कर चेतना में प्रतिष्ठित हो जाना । विचारों के प्रवाह का नाम मन है । जो इन विचारों के प्रवाह को देखता है, उसका नाम चेतना है । विचार विषय है और चेतना विषयी । विचार दृश्य है, चेतना द्रष्टा । विचार जाने जाते हैं, चेतना जानती है । विचार बाहर से आते हैं, चेतना भीतर है । विचार पर है, चेतना स्व है । विचारों को छोड़ना है और चेतना में ठहरना है । सब धर्मों की साधना का सार यही है ।
विचार प्रवाह के सम्यक् निरीक्षण से तथा तटस्थ साक्षी भाव से मात्र उन्हें देखने से वे धीरे-धीरे क्षीण हो जाते हैं । जैसे कोई बिल्ली चूहे को पकड़ती हो तो पकड़ने के पूर्व उसकी तैयारी पर ध्यान दें । कितनी सजग और कितनी शांत, कितनी शिथिल और तैयार ! ऐसे ही स्वयं के भीतर विचार को पकड़ने के लिए होना पड़ता है । जैसे ही कोई विचार उठे, बिल्ली की भांति झपटें और उसे पकड़ लें । उसे उलटें-पलटें और उसका निरीक्षण करें । किंतु उसे सोचे नहीं, मात्र देंखें । और तब पाया जाता है कि वह देखते ही देखते वाष्पीभूत हो गया है। हाथ खाली और विचार विलीन हो जाता है । फिर शांत और सजग रहें । दूसरा विचार आएगा, उसके साथ भी यही करना । तीसरा आएगा, उसके साथ भी यही । इस प्रकार ध्यान का अभ्यास करना । जैसे-जैसे अभ्यास गहरा होता है, वैसे-वैसे बिल्ली बैठी रह जाती है और चूहे विलीन हो जाते हैं । चूहे जैसे बिल्ली से डरते हैं, विचार वैसे ही ध्यान से डरते हैं । बिल्ली जैसे चूहों की मृत्यु है, ध्यान वैसे ही विचारों की मृत्यु है ।
विचार की मृत्यु पर सत्य का दर्शन होता है । तब मात्र वही शेष रह जाता है- जो है । वह सत्य है । वही परमात्मा है । उसे जानने में ही मुक्ति है और दुख व अंधकार का अतिक्रमण है ।
( यह लेख ओशो देशना पर आधारित है ।)

रविवार, 26 जुलाई 2009

ज्ञान गंगा :2

प्रेम क्या है ? प्रेम उस भाव-दशा का नाम है, जब विश्व सत्ता से पृथकत्व का भाव तिरोहित हो जाता है । समग्र की सत्ता में स्वयं की सत्ता का मिलन ही प्रेम है । यह सत्य है,क्योंकि वस्तुत: सत्ता एक ही है और जो भी है उसमें ही है । यह प्रेम प्रत्येक में सहज ही स्फूर्त होता है, लेकिन अज्ञान के कारण हम उसे राग में परिणत कर लेते हैं । प्रेम की स्फुर्णा को अहंकार पकड़ लेता है और वह स्वयं और समग्र की सत्ता के बीच सम्मिलन न होकर दो व्यक्तियों के बीच सीमित संबंध हो जाता है । असीम होकर जो प्रेम है, सीमित होकर वही राग है । राग बंधन बन जाता है, जबकि प्रेम मुक्ति है । असल में जहां सीमा है, वहीं बंधन है । राग का बुरा होना उसमें निहित प्रेम के कारण नहीं वरन् उस पर आरोपित सीमा के कारण है । राग असीम हो जाए तो वह प्रेम बन जाता है, विराग हो जाता है । ध्यान रखने की बात यही है कि प्रेम तो हो पर उसमें कोई सीमा न हो । जहां सीमा आने लगे वहीं सचेत हो जाना आवश्यक है । वही सीमा संसार है । इस भांति क्रमश: सीमाओं को तोड़ते हुए प्रेम की ऊर्जा का विस्तार ही साधना है । जिस घड़ी उस जगह पर पहुँचना हो जाता है, जहां सीमा नहीं है, तो जानना चाहिए कि परमात्मा पर पहुँचना हो गया । इसके विपरीत्त यदि प्रेम सीमित होता चला जाए और अंतत: अहम् अणु पर ही केद्रित हो जाए, तो जानना चाहिए कि परमात्मा से जितनी ज्यादा पृथकता हो सकती है, वह हो चुकी है । यह अवस्था राग की चरम अवस्था है, जो कि अत्यंत दुख, परतंत्रता और संताप को उत्पन्न करती है । इसके विपरीत्त प्रेम के असीम होने की चित्त दशा है, जो जीवन को अनंत आलोक और आनंद से परिपूरित कर देती है।
( यह लेख ओशो देशना पर आधारित है।)

शनिवार, 25 जुलाई 2009

ज्ञान-गंगा :1

प्रेम से बड़ी इस जगत में दूसरी कोई अनुभूति नहीं है । प्रेम की परिपूर्णता में ही व्यक्ति विश्वसत्ता से संबंधित होता है । प्रेम की अग्नि में ही स्व और पर के भेद भस्म हो जाते हैं और उसकी अनुभूति होती है, जो कि स्व और पर के अतीत है । धर्म की भाषा में इस सत्य की अनुभूति का नाम ही परमात्मा है । विचारपूर्वक देखने पर विश्व की समस्त सत्ता एक ही प्रतीत होती है । उसमें कोई खंड दिखाई नहीं पड़ते । भेद और भिन्नता के होते हुए भी सत्ता अखंड है । जितनी वस्तुएं हमें दिखाई पड़ती हैं और जितने व्यक्ति वे कोई भी स्वतंत्र नहीं हैं । सबकी सत्ता परस्पर आश्रित है । एक के अभाव में दूसरे का भी अभाव हो जाता है । स्वतंत्र सत्ता तो मात्र विश्व की है । यह सत्य विस्मरण हो जाए, तो मनुष्य में अहम् का उदय होता है । वह स्वयं को शेष सबसे पृथक और स्वतंत्र होने की भूल कर बैठता है । जबकि उसका होना किसी भी दृष्टि और विचार से स्वतंत्र नहीं है । मनुष्य की देह प्रति-क्षण पंच भूतों से निर्मित होती रहती है । उनमें से किसी का सहयोग एक पल को भी छूट जाए तो जीवन का अंत हो जाता है । यह प्रत्येक को दृश्य है । जो अदृश्य है वह इसी भांति सत्य है । चेतना के अदृश्य द्वारों से परमात्मा का सहयोग एक क्षण को भी विलीन हो जाए तो भी मनुष्य विसर्जित हो जाता है । मनुष्य की यह स्वतंत्र सी भासती सत्ता विश्व की समग्र सत्ता से अखंड और एक है । इसीलिए अहंकार मूल पाप है । यह समझना कि मैं हूँ, इससे बड़ी और कोई नासमझी नहीं है। इस मैं को जो जितना प्रगाढ़ कर लेता है, वह उतना ही परमात्मा से दूर हो जाता है । यह दूरी भी वास्तविक नहीं होती । इसलिए इसे किसी भी क्षण नष्ट किया जा सकता है । यह दूरी वैसी ही काल्पनिक और मानसिक होती है, जैसे कि स्वप्न में हम जहां वस्तुत: होते हैं , वहां से बहुत दूर निकल जाते हैं । और फिर स्वप्न के टूटते ही दूरी ऐसे विलीन हो जाती है, जैसे रही ही न हो । वस्तुत: परमात्मा से दूर होना असंभव है , क्योंकि वह हमारी आधारभूत सत्ता है । लेकिन विचार में हम उससे दूर हो सकते हैं । विचार स्वप्न का ही एक प्रकार है । जो जितने ज्यादा विचारों में है, वह उतने ज्यादा स्वप्न में है । और जो जितने अधिक स्वप्न में होता है, वह उतना ही अहम् केंद्रित हो जाता है । प्रगाढ़ स्वप्न शून्य निद्रा में चूँकि कोई विचार नहीं रह जाते । इसलिए अहम-बोध भी नहीं रह जाता । सत्ता तो तब भी होती है, लेकिन विश्वसत्ता से एक होती है । मैं का भाव उसे तोड़ता और खंडित नहीं करता । लेकिन गहन निद्रा में यह मिलन प्राकृतिक है । और इससे विश्राम तो मिलता है, परंतु परम विश्राम नहीं । परमात्मा के सान्निध्य में पहुँच जाना ही विश्राम है । और मैं के सान्निध्य में आ जाना ही विकलता व तनाव है । मैं यदि पूर्ण शून्य हो जाए, तो परम विश्राम उपलब्ध हो जाता है । परम विश्राम का ही नाम मोक्ष है । सुषुप्ति में एक प्राकृतिक आवश्यकता के निमित्त अहंकार भाव से अल्पकाल के लिए मुक्ति मिलती है । जीवन के लिए यह अपरिहार्य आवश्यकता है , क्योंकि किसी भी दशा की अशांत, उत्तेजनापूर्ण स्थिति को बहुत देर तक नहीं रखा जा सकता । यही इस बात का प्रमाण है कि जो दशा सदा न रह सके वह स्वाभाविक नहीं है । वह आती है और जाती है । जो स्वभाव है,वह सदा बना रहता है । वह आता और जाता नहीं है । अधिक से अधिक वह आवृत हो सकता है । अर्थात् जब हम अहम् से भरे होते हैं, तब हमारा ब्रह्म भाव नष्ट नहीं हो जाता है, अपितु मात्र ढक जाता है । जैसे ही मैं का तनाव और अशांति सीमा को लांघ जाता है, वैसे ही उस ब्रह्म भाव में पुन: अनिवार्य रूपेण हमें विश्रांति लेनी होती है । यह विश्रांति बलात् और अनिवार्य है । इसे हम स्वेच्छा से नहीं लेते हैं । यदि हम स्वेच्छा से मैं भाव से विश्रांति ले सकें तो अभुतपूर्व क्रांति घटित हो जाती है । मैं भाव से स्वेच्छा से विश्रांति लेने का सूत्र प्रेम है । क्योंकि प्रेम की दशा अकेली दशा है, जब हमारी सत्ता तो होती है, किंतु उस सत्ता पर मैं भाव आरोपित नहीं होता । सुषुप्ति बलात् विश्राम है, प्रेम स्वेच्छित । इसीलिए प्रेम समाधि बन जाता है ।