रविवार, 31 जनवरी 2010

राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी

आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं । कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं । जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है । आइए हम हिंदी के इन विभिन्न रूपों को विधिवत समझ लें, ताकि हमारे मन-मस्तिष्क में स्पष्टता आ जाए ।

राष्ट्रभाषा से अभिप्राय: है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा । क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है ? यद्यपि हिंदी का व्यवहार संपूर्ण भारतवर्ष में होता है,लेकिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है । चूँकि भारतवर्ष सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई दृष्टि से विविधताओं का देश है । इस राष्ट्र में किसी एक भाषा का बहुमत से सर्वमान्य होना निश्चित नहीं है । इसलिए भारतीय संविधान में देश की चुनिंदा भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा है । शुरु में इनकी संख्या 16 थी , जो आज बढ़ कर 22 हो गई हैं । ये सब भाषाएँ भारत की अधिकृत भाषाएँ हैं, जिनमें भारत देश की सरकारों का काम होता है । भारतीय मुद्रा नोट पर 16 भाषाओं में नोट का मूल्य अंकित रहता है और भारत सरकार इन सभी भाषाओं के विकास के लिए संविधान अनुसार प्रतिबद्ध है ।

राजभाषा शब्द अंग्रेजी के official language के लिए व्यवह्रत होता है । भारतीय संविधान में इसे परिभाषित किया गया है । अनुच्छेद 343 के अनुसार भारतीय संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी होगी और अंकों का स्वरूप भारतीय अंकों का अंतरराष्टीय स्वरूप होगा । ध्यान रहे देवनागरी अन्य भारतीय भाषाओं यथा मराठी,नेपाली आदि की भी लिपि है । इस प्रकार केंद्र सरकार के कार्यालयों,उपक्रमों, निकायों व संस्थाओं की कार्यालयी भाषा हिंदी है । जो राजभाषा के रूप में परिभाषित है ।

कुछ लोग हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में मानते हैं । संपर्क भाषा से अभिप्राय: है लोगों के आपसी संपर्क की भाषा । यह संपर्क जरूरी नहीं कि हिंदी-हिंदी भाषियों के बीच ही हो, बल्कि भारत देश के किसी भी प्रदेश में निवास करने वाले व्यक्ति के साथ संपर्क करने पर उससे संवाद की भाषा के रूप में व्यवह्रत होने वाली भाषा से है । इस रूप में हिंदी धीरे-धीरे जगह बना रही है । इस नाते हिंदी देश को जोड़ने का काम करती है । लेकिन यह निर्विवाद नहीं है । यद्यपि हिंदी संपूर्ण भारत राष्ट्र में बोली जाती है ।

लोगों का एक वर्ग ऐसा भी है जो हिंदी को बोलने वालों की संख्या के आधार पर विश्व की प्रथम भाषा होने का दर्जा देता है । डॉ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल ने इस दिशा में काफी काम किया है । लेकिन अधिकारिक तौर पर हिंदी को यह दर्जा नहीं दिया जा सका है । यद्यपि विभिन्न सर्वेक्षणों में हिंदी विश्व की पाँच सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में स्थान पाती रही है ।

संपर्क भाषा का ही विस्तृत रूप है अंतरराष्ट्रीय भाषा । अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी भाषा एक-दूसरे के संपर्क की भाषा बनकर उभरी है । भाषा के साथ कुछ ओर विशेषण भी लगे हैं ; जैसे राज्य भाषा, क्षेत्रीय भाषा, प्रादेशिक भाषा, प्रांतीय भाषा, जनजातीय भाषा । इन्हें भी हमें समझ लेना चाहिए । राज्य भाषा से अभिप्राय: है भारत के किसी राज्य द्वारा उस राज्य के शासन को चलाने के लिए विधान मंडल द्वारा स्वीकृत की गई भाषा, जिसमें उस राज्य का शासन चलता है । क्षेत्रीय भाषा से अभिप्राय: है किसी क्षेत्र विशेष में बोली जाने वाली भाषा । भारतीय राज्यों का वर्गीकरण क्षेत्रीय भाषाओं के अनुरूप ही किया गया था । प्रादेशिक या प्रांतीय भाषा किसी राज्य में बोली जाने वाली किसी एक बड़ी भाषा की बोलियों या उपबोलियों को समाहित किए हुए है । जैसे उत्तर प्रेदश में ही हिंदी की कितनी बोलियाँ -उपबोलियाँ प्रचलित हैं, जो साहित्य में आंचलिक भाषा के रूप में व्यवह्रत हैं । किसी जनजाति विशेष में व्यवह्रित भाषा उस जनजाति विशेष की बोली या भाषा कहलाती है । जैसे छत्तीसगढ़ी ।

भारतीय संविधान में जिस राजभाषा की परिकल्पना की गई है, वह वह हिंदी है जो भारत की विभिन्न संस्कृतियों, बोलियों, उपबोलियों से शब्द-ग्रहण करते हुए विकसित हो । संविधान का अनुच्छेद 351 कहता है : "संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे, ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी के और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं के प्रयुक्त रूप,शैली और पदों को आत्मसात् करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यत: संस्कृत से और गौणत: अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे ।" ( यहाँ हिंदुस्तानी से अभिप्राय: भारत में बोली जाने वाली खड़ी बोली से है,जिसमें हिंदी और उर्दू के शब्दों का बहुतायत प्रयोग होता है और जो सारे भारतवर्ष में समझी जा सकती है .)


गुरुवार, 28 जनवरी 2010

प्रेम की पातियाँ

प्रेम मुक्त करता है, बांधता नहीं ।
प्रेम मुक्त गगन का पक्षी है, जो मानव ह्रदय में उड़ान भरता है ।
प्रेम बरसता है, गरजता नहीं ।
प्रेम खिलना जानता है,सिकुड़ना नहीं ।
प्रेम दो ह्रदयों के बीच एक अहसास है ।
प्रेम मांगना नहीं देना जानता है ।
प्रेम आँखों में चमकता है, मुँह से झरता है ।
प्रेम वह सुगंध है, जिसे सुंघने के लिए नाक की जरूरत नहीं ।
प्रेम वह ध्वनि है, जिसे सुनने के लिए कानों की जरूरत नहीं ।
प्रेम निर्भय बनाता है, भयभीत नहीं करता ।
प्रेम में हुआ जाता है, किया नहीं जाता ।
प्रेम की अनुभूति होती है, प्रदर्शनी नहीं ।
प्रेम हंसना जानता है, रोना नहीं ।
प्रेम त्याग जानता है, अधिकार नहीं ।
प्रेम सोचता नहीं, स्वीकारता है ।
प्रेम अस्तित्व का रस है और संसार का राग ।
प्रेम धैर्य देता है और इंतज़ार करता है ।
प्रेम दिल से संबंधित है, दिमाग से नहीं ।
प्रेम क्रिया नहीं, अक्रिया है ।
प्रेम शरीर नहीं, आत्मा का आत्मा से संवाद चाहता है ।
प्रेम अनंत की अनुभूति देता है ।
प्रेम सीमाओं के पार असीम की अनुभूति है ।
प्रेम शांति देता है, अशांति नहीं ।
प्रेम वह सागर है जो कभी रिक्त नहीं होता ।
प्रेम में अभाव नहीं, भाव होता है ।
प्रेम गिराना नहीं, उठाना सिखाता है ।
प्रेम में तुलना नहीं, जुड़ना होता है ।
प्रेम झुकता है, झुकाता नहीं ।
प्रेम दर्पण है जिसमें तुम अपना वास्तविक चेहरा देख सकते हो ।
प्रेम संबंधों का आइना है ।
प्रेम वह अमरबेल है जो कभी कुम्हलाती नहीं ।
प्रेम कोमल अहसास है, जिसे नन्हें बच्चे की तरह सम्हालना होता है ।
प्रेम दिन की छाया है, जो रातों में दिखाई देती है ।
प्रेम की काया नहीं है, इसलिए यह माया है ।
प्रेम रहस्य है, समस्या नहीं ।
प्रेम परम समाधान है, इसमें डूबिए ।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

बहुमूल्य चीज

क्या कभी आपने गौर किया कि बहुमूल्य चीज़ अपने आरम्भिक दौर में कोड़ियों के भाव बिकी हैं या उनका मूल्य पहचाना नहीं गया, लेकिन जब उनका मूल्य पहचाना गया तो वे अनमोल हो गई । आपकी प्रतिभा भी ऐसी ही चीज़ है । यदि आप इसे पहचान लेते हैं, तो शीघ्र ही इसे संसार भी पहचान लेगा ।

रविवार, 24 जनवरी 2010

भाव-उद्वेग

भाव-उद्वेग में चुप रहना सबसे बड़ा संयम है । भाव-उद्वेग की स्थिति में विवेक मनुष्य का साथ छोड़ देता है और मनुष्य अनुचित कर्म कर बैठता है । गुस्सा भाव-उद्वेग का ज्वलंत रूप है । गुस्से में जो मौन को साध कर अंतस-चित्त का अध्ययन करता है, वह शांत होना सीख जाता है ।

शनिवार, 16 जनवरी 2010

जिंदगी की ए बी सी

जिंदगी की ए बी सी अर्थात जिंदगी का आधार क्या है ? सार्थक जिंदगी क्या है ? जीवन को कैसे जिया जाए कि जीवन में आनंद घटित हो । अंग्रेजी के पाँच शब्दों से हम इसे समझने की कोशिश करते हैं ।

जीवन की ए अवेयरनेस (awareness) अर्थात सजगता है । व्यक्ति की सजगता उसके जीवन को बनाने में अहम भूमिका निभाती है । यह सजगता ही है जो व्यक्ति की रुचियाँ निर्मित करती है । जहाँ व्यक्ति सहज रूप में सजग होता है, वही उसका मूल रुचि का विषय होता है । व्यक्ति अपनी सजगता,जागरुकता का दायरा बढ़ा कर विभिन्न विषयों में रुचि पैदा कर सकता है । व्यक्ति की सजगता जितने अधिक विषयों में होगी, उतनी ही उसकी बुद्धि प्रखर होगी । जहाँ व्यक्ति में सजगता का अभाव होगा, वहाँ वह कुछ खो देगा । लेकिन जहाँ कहीं वह सजग होगा, वहाँ जरूर वह कुछ न कुछ अपनी रुचि का ढ़ूढ़ लेगा । उचित होगा यदि हम कहें कि सजगता ज्ञान की कुंजी है । सजगता के दायरे को बढ़ा कर हम अधिकतम ज्ञान अर्जित कर सकते हैं ।

जीवन की बी बिलीफ़ ( belief) अर्थात विश्वास या धारणा है । व्यक्ति के विश्वास या धारणाएँ कैसी हैं ? यह उसके जीवन के प्रति दृष्टिकोण को निर्धारित करते हैं । हर व्यक्ति के अपने विश्वास होते हैं । उन विश्वासों के सहारे ही वह आगे बढ़ता है और दिन प्रति-दिन विश्वास बढ़ते जाते हैं । प्राय: व्यक्ति अपने विश्वासों या धारणाओं को ही जीवन मानता है । कुछ विश्वास समय के साथ और नए अनुभव आने पर बदल जाते हैं, जबकि कुछ विश्वास व्यक्ति कभी नहीं बदलता । विश्वास का निर्माण विभिन्न माध्यमों से होता है । कोई भी ज्ञान एक विश्वास ही है । विज्ञान भी एक विश्वास है । विज्ञान में पुराने तथ्य तब तक स्वीकृत रहते हैं, जब तक कि उन्हें नए आविष्कारों/अनुसंधानों से नकार न दिया जाए । जीवन में आपके विश्वास क्या हैं उन्हीं के अनुरूप आप है । आज आप जो हैं, आपके अब तक के विचारों (विश्वासों) के कारण हैं और आगे जो होंगे वे भी अपने विचारों के अनुरूप ही होगें । कहने का अभिप्राय: यह है कि आप अपने विचारो(विश्वासो) पर सवार हैं , जैसे आपके विचार होंगे वैसे ही आप होंगे , आपका जीवन होगा ।

जीवन की सी चायस (Choice) अर्थात चुनाव या चुनना है । हर व्यक्ति की अपनी पसंद या नापसंद होती है । यह आपके चुनाव पर निर्भर करता है । बचपन से ही आप कुछ न कुछ चुनते आए हैं । कहते हैं कि व्यक्ति अपने माँ-बाप के अतिरिक्त सब कुछ चुनता है । उसके दोस्त कौन हों, वह कपड़े कैसे पहने, वह क्या पढ़े, वह कौन सा टी.वी. कार्यक्रम देखे ... यह सब वह चुनता है । उसके इस चुनाव में वह अपना जीवन या चरित्र निर्माण कर रहा है । व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके चुनाव पर निर्भर है । जैसा उसने समाज, दुनिया में से चुना वैसा ही उसने अपना व्यक्तित्व पाया है । तो व्यक्ति का चुनाव उसे बनाता है । इसलिए आपका आज का चुनाव सजग होना चाहिए, क्योंकि वही आपका भविष्य होने वाला है ।

अधिकांश लोगों के जीवन की ए बी सी उनकी सजगता के दायरे, उनके विश्वास और उनके चुनने के ढ़ँग तक ही सीमित रहती है । लेकिन कुछ लोग हैं जो इन तीनों से पार जाने की हिम्मत करते हैं और जीवन के चौथे पड़ाव को लाँघते हैं । यह चौथा पड़ाव निर्णायक है । जीवन का यह चौथा अक्षर डी अर्थात डिटैचमेन्ट (detachment)
अर्थात अनासक्ति है । व्यक्ति अपने जीवन में सचेतन जीता हुआ जब कोई विश्वास नहीं बनाता ,कुछ चुनाव नहीं करता.. वह मात्र जीवन को जीता है वर्तमान में अनासक्त भाव से । ऐसा व्यक्ति ही वस्ततुत: जीवन के आनंद को जानता है । जिस तरह से बच्चा बड़ा होने पर खिलौनों से खेलना छोड़ देता है , उसी प्रकार अनासक्त हुए व्यक्ति से जीवन के विषय छूट जाते हैं । गीता में इस स्थिति को स्थितप्रज्ञा कहा गया है ।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

दु:ख

देखा है जिंदगी को
कुछ इतने करीब से कि
दुख के सिवाय
सब बेगाने लगने लगे हैं

जीवन में जब सुख आता है तो वह बँटना चाहता है । लेकिन जब दुख आता है तो मनुष्य संकुचित हो जाता है । स्वयं में सिमट जाना चाहता है । वस्तुत: दुख सुख की जड़ है । जिस आदमी के जीवन में दुख नहीं वह जड़ विहीन वृक्ष की तरह है, जो शीघ्र ही कुम्हला जाएगा ।

दुख व्यक्ति के सर्वाधिक निकट है । जो व्यक्ति दुख की गहराइयों में नहीं प्रवेश करता ,वह सुख की ऊँचाइयाँ भी नहीं छू सकता । जो दुख कि गहराइयों में प्रवेश करता है, उसके सुख की ऊँचाइयाँ इतनी बुलंद होंगी की उसकी सघन छाया में सारा संसार विश्राम करता है ।

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

झूठ

कुछ झूठ समाज में स्थापित मूल्य बनकर सत्य के सिंहासन पर आरुढ़ होने का दावा करते हैं ।

दूसरे दिन:

पुनश्च : आपके मन में उक्त उक्ति से जो भी भाव आया, कृपया उसे टिप्पणी के रूप में देकर अनुगृहीत करें ।


बुधवार, 13 जनवरी 2010

हमारा मीडिया किस ओर जा रहा है ?

हमारा मीडिया किस दिशा में जा रहा है ? क्या आप थोड़ी देर मेरे साथ विचार करने को तैयार होंगे ? मीडिया चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या दृश्य-श्रव्य मीडिया । क्या वह अपने उद्देश्यों पर खरा उतर रहा है ? क्या वह जनतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है ?

इन्हीं सवालों के जवाब खोजने के लिए मैं आपसे संवाद स्थापित करना चाहता हूँ । हमारे मीडिया का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य मेरी नजर में है : लोगों को शिक्षित करना । उसका दूसरा उद्देश्य है लोगों को सूचना उपलब्ध कराना । मीडिया का तीसरा उद्देश्य है लोगो को उनके अधिकारों से अवगत कराना । मीडिया का चौथा उद्देश्य है सरकार की गलत नीतियों को जनता के समक्ष लाना और सबसे बढ़कर सरकार, न्याय और सत्ता के गलियारों की खोजबीन करना ताकि आम नागरिक के पैसों और अधिकार का दुरुपयोग न हो सके ... देश और देश की जनता के समक्ष सच को उजागर करना ।

मेरे देखे मीडिया आज इन कामों में से किसी को भी अंजाम नहीं दे रहा है । ऐसा प्रतीत होता है कि मीडिया स्वयं आज बीक चुका है, जो चंद लोगों के हितों का ध्यान रखता है । वह न तो लोगों शिक्षित कर रहा है । न ही सही सूचना ही लोगों तक पहुँचा रहा है । लोगों के अधिकारों से अवगत कराने वाले कार्यक्रमों का तो सर्वथा अभाव है । सरकार की , न्याय प्रणाली संबंधी खोजपरक पत्रकारिता तो कहीं दिखाई नहीं देती । मीडिया आज चंद लोगों के हाथों की कठपुतली बन कर रह गया है । वह विज्ञापनदाताओं के हितों के अनुसार कार्यक्रम बनाता है, उनका प्रसारण करता है और मीडिया-कर्मी स्वयं मीडिया की शक्ति का दुरुपयोग कर रहें हैं ।

मीडिया गरीबी की बात करता है, लेकिन गरीबों की बात नहीं करता ? वह गरीबी रेखा की बात करता है, लेकिन लोगों को यह नहीं बताता कि गरीबी रेखा क्या है ? वह महँगाई की बात करता है, लेकिन मँहगाई क्यों है, मुद्रास्फिति क्या है, इनके बारे में लोगों को जानकारी नहीं देता । एक तरह से मीडिया लोगों के मन को ब्लैक-मेल करने का काम कर रहा है । लोगों को परिस्थियों में उलझाने और किस्मत पर रोने के सिवाय वह क्या दे रहा है ।

सोमवार, 11 जनवरी 2010

भाषा की क्लिष्टता

अक्सर लोग भाषा की क्लिष्टता की बात करते हैं । वस्तुत: भाषा क्लिष्ट नहीं होती । किसी भी भाषा में प्रयुक्त होने वाले शब्द परिचित या अपरिचित होते हैं । यदि हमें किसी भाषा के किसी शब्द का अर्थ मालूम नहीं है , तो हमें उस शब्द से परिचय प्राप्त करना चाहिए । शब्दों का परिचय विभिन्न स्रोतों से लिया जा सकता है; उदाहरणार्थ - शब्दकोश, समांतरकोश (थिजारस) आदि । शब्दों की उत्पत्ति होती है और शब्द मर भी जाते हैं । किसी शब्द की व्युत्पत्ति का अध्ययन इटायमोलॉजी में किया जाता है । शब्द तब तक जिंदा रहता है, जब तक वह व्यवहार में लाया जाता रहता है । आज शहरों में बहुत से देशज शब्द विलुप्त प्राय: हो गए हैं; क्योंकि उनका शहरों में प्रचलन बंद सा हो गया है ; जैसे कान्वेन्ट स्कूलों में पढ़े बच्चों को खाट, जुगाली, कुदाली, रैन्दा आदि शब्दों से अनभिज्ञता देखने को मिलेगी । क्योंकि शहरों में खाट (चारपाई)का प्रयोग लगभग बंद सा हो गया है, इसकी जगह अंग्रेजी का बैड या कॉट शब्द व्यवह्रत हो रहा है । शहरों में पढ़े बच्चों ने चौपायों के व्यवहार को भी नहीं देखा है, कि किस तरह से चौपाया पशु पहले बिना चबाए चारा खा जाते हैं और फिर बाद में बैठ कर दाँतों को चबाते रहते हैं, जिसे जुगाली कहते हैं; पशु इस तरह से अपने भोजन को पचाते हैं । इसी प्रकार जिन बच्चों ने कुदाली और रैन्दे के प्रयोग को कभी होते हुए नहीं देखा, या उनमें अपने आस-पास की चीजों को क्या कहते हैं, उनको जानने समझने की कोशिश नहीं की, वे उन शब्दों से अपरिचित रह जाते हैं । इसे एक अन्य उदाहरण से समझते हैं : अब हम ब्लॉगिंग करते हैं और हम ब्लॉग शब्द से परिचित हैं; लेकिन जिस दिन आपने ब्लॉग शब्द सबसे पहले सुना था, उस दिन इसकी संकल्पना से परिचित नहीं थे । धीरे-धीरे आपका इससे परिचय हुआ । आज हम पुरे विश्व से जुड़े हुए हैं । विभिन्न संस्कृतियाँ एक दूसरे के सम्पर्क में आ रही हैं । ऐसे में जाहिर है कि विभिन्न संस्कृतियों के खान -पान और रहन सहन में प्रयुक्त होने वाली चीजे एक दूसरे देशों तक आसानी से पहुँच रहीं हैं । अब भारत में भी पिज्जा खूब पसंद किया जा रहा है । लेकिन भारत में ऐसा कोई व्यंजन नहीं है, जिसकी तुलना पिज्जे से की जा सके । इसलिए इसे भारत में पिज्जा ही कहा जाए तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है और इसी प्रकार तकनीकी शब्दों के लिए अटपटे और हास्यास्पद शब्द गढ़ने का क्या तुक है । जैसे ई-मेल शब्द से हम सब परिचित हैं तो इसके लिए अणु-डाक जैसे शब्दों का प्रयोग करना या नेक-टाई शब्द के लिए कंठ-लंगोट या रेलगाड़ी के लिए लोहपथगामिनी शब्द या मोबाइल शब्द के लिए घुमंतु दूरभाष या कानाफूसी यंत्र जैसे शब्द गढ़ने की आवश्यकता नहीं है । सरल समाज में जब जरुरतें सीमित थी और तकनीक का विकास नहीं हुआ था, तब चीजों की तुलना करनी आसान थी और प्राय: हर संस्कृति/भाषा के शब्द दूसरी संस्कृति में मिल जाते थे । लेकिन आज ऐसा नहीं है । जो नई तकनीक आ रही है, उसका आज संपूर्ण विश्व में एक सा रूप होने के कारण उसे एक ही नाम से पहचाना और स्वीकार किया जाना चाहिए । लेकिन जो चीजें हम रोज देखते हैं और जिनके लिए हमारी भाषा में स्वयं का सुंदर और स्टीक शब्द है, उसके लिए अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग उचित नहीं । जो लोग ऐसा करते हैं, वे वस्तुत: भाषा का स्वरूप बिगाड़ते हैं । आज सुबह सैर करते हुए मैंने सुना, एक माँ अपने नन्हें बच्चे को कह रही थी- बेटा, ग्रास पर मत चलो, वह डर्टी है । यहाँ माँ बच्चे से यह कह सकती थी कि बेटा, घास पर मत चलो, वह गंदी है ।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि कोई भी शब्द क्लिष्ट नहीं होता । वह परिचित या अपरिचित होता है । अच्छा हो यदि हम व्यवहार में हमारी भाषा के उन सभी शब्दों का प्रयोग करते रहें जो हमारे अपने और सुपरिचित हैं ।

शनिवार, 9 जनवरी 2010

वर्ष २००९ में प्रसिद्ध हस्तियों ने क्या पढ़ा ?

हर वर्ष कुछ अच्छा लिखा जा रहा है । कुछ पुराना नए कलेवर और साज़-सज्जा के साथ पुन: प्रकाशित होता है । वर्ष २००९ में प्रसिद्ध हस्तियों ने इनमें से क्या पढ़ा, जो उन्हें पसंद आया ... इस पोस्ट में विभिन्न माध्यमों से संकलित सामग्री दे रहा हूँ... शायद आप भी कोई रचना पढ़ें और इनका आनंद ले सकें : -

कवयित्री अनामिका और अर्चना वर्मा ने पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक "अकथ कहानी प्रेम की" को बेहतरीन पाया । अनामिका की दृष्टि में कथ्य और भंगिमा की दृष्टि से यह उम्दा किताब है । निधि और संवेद अनुभव में लिखी यह पुस्तक कोमल कोलाहल मन से शांति की बात करती है । हालांकि आलोचना की पुस्तक एकेडमिक भाषा में लिखी जाती है, लेकिन लेखक ने इसमें अपनी ही शैली को तोड़ा है ।
अर्चना वर्मा कवयित्री और आलोचक इस पुस्तक के बारे में कहती हैं : यह हिंदी समीक्षा और मध्यकालीन समीक्षा एवं समकालीन समीक्षा के भीतरी परिवर्तन को दिखाने वाली किताब है । यहां हिंदी में उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिकोण दिखाई देता है । यह पुस्तक पश्चिमी दर्शन से लोहा लेते हुए भारतीय दर्शन को दर्शाती है कि हमें खुद की पहचान करनी चाहिए । इससे स्पष्ट झलकता है कि लेखक ने विषय आधारित काफी अध्ययन किया है ।

कैलाश वाजपेयी (कवि और निबंधकार) ने हिमांशु शेखर के संपादन में "प्रतिनिधि अप्रवासी हिंदी कहानियाँ पुस्तक को उल्लेखनीय पाया । इसमें भारत में नहीं रहने वाले भारतीयों के दर्द और समस्या के साथ पारिवारिक दुर्व्यवस्था को समझने का अवसर मिलता है । इसमें उनकी सूक्ष्म पीड़ा दिखाई देती है । कीर्ति चौधरी की कहानी जहांआरा, दिव्या माथुर की फिर कभी सही, नार्वे में रहने वाले अमित जोशी की वीजा विशेष रूप से उन्हें पसंद आई । इनमें जो घुटन है, वह भारत में रहकर महसूस नहीं की जा सकती । हिमांशु शेखर का चुनाव भारतीय परिवेश के बाहर का है । लेकिन यह वहां के समाज की पेंचदार सहमतियां और असहमतियां दर्शाता है । ये हिंदी साहित्य के नए क्षितिज की कहानियाँ हैं ।

सुधीश पचौरी (मीडिया-समीक्षक) ने नंदकिशोर आचार्य का कविता संकलन "उड़ना संभव करता आकाश" को प्रशंसनीय पाया । इसमें छोटी-छोटी नए ढ़ंग से लिखी गई कविताएँ हैं, जिनमें कोई चीख-पुकार नहीं है , जैसा प्राय: आजकल की कविताओं में देखने को मिलता है । सहज अनुभवों को समेटता यह कविता संकलन अच्छा लगा । इसमें स्थितयों की विद्रुपताओं और विडम्बनाओं का चित्रण है ।

उदय प्रकाश (कवि और कथाकार) ने जहांआरा बेगम की जीवनी पढ़ी, जिसका हाल ही में अंग्रेजी अनुवाद आया है । इस किताब में मुगलकाल की स्थितियों को काफी सही तरीके से दर्शाया गया है । इसमें दारा शिकोह और औरंगजेब की स्थिति को बताया गया है । औरंगजेब कितना क्रूर औ चालबाज था । जहांआरा बेगम दाराशिकोह को ही दिल्ली सल्तनत पर बैठा हुआ देखना चाहती थी । वह राजस्थान के एक राजपूत से प्रेम करती थी । अगर दाराशिकोह सुल्तान बनता तो उनकी यह आरजू शायद पूरी हो जाती ।


आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने दो किताबों को चर्चा के योग्य समझा । पहली तो कृष्णा सोबती की पुस्तक "मित्रो मरजानी " है जो अब नए कलेवर में आई है । नरेन्द्र श्रीवास्तव ने इसे टाइपोग्राफिकल व्याख्या के साथ छापा है । इसमें जो टेक्स्ट दिया गया है, उसके दूसरी तरफ उसके चित्र दिए गए हैं । हिंदी में संभवत: यह पहला प्रयोग है । दूसरी पुस्तक राकेश रंजन का कविता संग्रह "चांद पर अटकी पतंग "है । यह बेहतरीन पुस्तक है । इसमें देशज और भदेश शब्दों से सजी एकदम नए ढ़ंग की कविताएँ हैं । कविताओं में शब्दों का जीवन सुरक्षित है । लेखक में राजनीतिक और आंचलिक समझ है ।

जावेद अख्तर (गीतकार) ने कई किताबे पढ़ी । लेकिन जो सबसे अधिक पसंद आई या जिसकी चर्चा वे करना चाहते हैं, वह किताब है -रिचर्ड डाकिंस की "गॉड डिल्यूजन" । लेखक ने इतिहास,विज्ञान और अन्य तथ्यों से जानकारियाँ जुटाकर यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि ईश्वर नहीं है जबकि बहुत से लोगों का विश्वास है कि ईश्वर है । ईश्वर इंसान का भ्रम है । यह पुस्तक भगवान की अवधारणा को खंडित करती है ।

शोभना नारायण (नृत्यंगना ) ने साल के अंत में सुजाता विश्वनाथन की पुस्तक "द कोकोनट वाटर "पढ़ी । इस पुस्तक में एक सामाजिक समस्या को दर्शाती हुई साधारण कहानी है । इसमें एक प्रवासी भारतीय की कहानी है , लेकिन अंतत: एक मानव द्वारा परेशानियों से झूझते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करना अच्छा लगा । यह उपन्यास सीख देता है कि आप में दृढ़-इच्छा शक्ति है तो आप अवश्य सफलता प्राप्त करेंगे ।

मंगेश डबराल (कवि)ने विरेन डंगवाल का संग्रह " स्याही ताल" पढ़ा । इसे कुंवर नारायण के संग्रह "हाशिए का गवाह "के बाद पढ़ना उनके लिए सुखद अनुभव रहा । इससे वीरेन एक समर्थ कवि के रूप में सामने आते हैं । इसमें उनकी काव्यात्मक ऊंचाई दिखाई देती है । इस संसग्रह को पढ़ते हुए लगता है कि कविता कहीं से शुरु हो सकती । अनुभव का कोई टुकड़ा कविता बन सकता है । यह संग्रह नए तथ्य और नए विन्यास के लिए जाना जाएगा । इसमें छोटे-छोटे अनुभव को बड़े यथार्थ से चीड़-फाड़ करते हुए दिखाई देते हैं ।

मैनेजर पांडे (आलोचक) ने "ग्लोबल गाँव के देवता " पढ़ी जिसके लेखक रणेन्द्र हैं ।

राजेन्द्र यादव (कथाकार, विचारक) ने लता शर्मा के उपन्यास "उसकी नाप के कपड़े" उल्लेखनीय माना ।

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

दफ्तर की ज़िन्दगी

दफ़्तर की जिंदगी कितनी निरस और उबाऊ होती है, इसका अहसास होने लगा है । दफ्तर में व्यक्ति का व्यक्तित्व खोने लगता है । उसकी आत्मा मरने लगती है । वह व्यक्ति नहीं बल्कि वस्तु अधिक होता है ; जिसका अधिकारी मनचाहा प्रयोग करते हैं । उसकी निजी स्वतंत्रता दफ़्तरी तंत्र में खो जाती है । एक तर्कसंगत और बुद्धिपूर्ण बात आप अपने से बड़े अधिकारी से मात्र इसलिए नहीं कह सकते कि वह आप से ऊँची कुर्सी पर बैठा है । यदि कहो तो यह बुद्धिहीनता और अनुभवहीनता को बताने वाली होती है । क्योंकि ऊँची कुर्सी पर बैठा अधिकारी चाटुकारिता का आदि है और उसकी नज़र में वह दुनिया का सबसे बड़ा समझदार व्यक्ति है । एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए दफ़्तर नरक साबित होता है ।

(८ फरवरी १९९९, सोमवार को लिखी डायरी का अंश )