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March, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ओशो की डायरी से

ओशो की डायरी से चुने गए कुछ विचार-बिंदु : १.सत्य सरल है, शेष सब जटिल है, लेकिन हम सरल नहीं हैं, इसलिए सत्य को पाना कठिनहो जाता है । २.मैं दो ही प्रकार के मनुष्यों को जानता हूँ, एक तो वे जो सत्य की ओर पीठ किएहुए हैं और दूसरे वे जिन्होंने सत्य की ओर आंखें उठा ली हैं । इन दो वर्गों केअतिरिक्त और कोई वर्ग नहीं है । ३. विचार शक्ति है - वैसे ही जैसे, विद्युत या गुरुत्वाकर्षण । विद्युत का उपयोगहम जान गए हैं, लेकिन विचार का उपयोग अभी सभी को ज्ञात नहीं है । फिर जिन्हें ज्ञातहै वे उसका उपयोग नहीं कर पाते हैं क्योंकि उस उपयोग के लिए स्वयं के व्यक्तित्व काआमूल परिवर्तन आवश्यक है । ४. सत्य और स्वयं के मध्य कोई अलंघ्य खाई नहीं है, सिवाय साहस के अभाव के । ५. मनुष्य भी कैसा अद्भूत है ? उसके भीतर कूड़े कर्कट की गंदगी भी है और स्वर्गकी अमूल्य निधि भी । और हम किसे उपलब्ध होते हैं, यह बिल्कुल ही हमारे हाथ में है। ६. प्रभु को भीतर पाते ही सर्वत्र उसी के दर्शन होने लगते हैं । वस्तुत: जो हममें होता है, उसकी ही हमें बाहर अनुभूति होती है । ईश्वर नहीं दिखाई पड़ता है ? तोजानना कि अभी तुमने उसे भीतर नहीं खोजा है । ७. स…

प्रेम

प्रेमसेबड़ीइसजगतमेंदूसरीकोईअनुभूतिनहींहै।प्रेमकीपरिपूर्णतामेंहीव्यक्तिविश्वसत्तासेसंबंधितहोताहै।प्रेमकीअग्निमेंहीस्वऔरपरकेभेदभस्महोजातेहैंऔरउसकीअनुभूतिहोतीहै, जोकिस्वऔरपरकेअतीतहै।धर्मकीभाषामेंइससत्यकीअनुभूतिकानामहीपरमात्माहै।विचारपूर्वकदेखनेपरविश्वकीसमस्तसत्ताएकहीप्रतीतहोतीहै।उसमेंकोईखंडदिखाईनहींपड़ते।भेदऔरभिन्नताकेहोतेहुएभीसत्ताअखंडहै।जितनीवस्तुएंहमेंदिखाईपड़तीहैंऔरजितनेव्यक्तिवेकोईभीस्वतंत्रनहींहैं।सबकीसत्तापरस्परआश्रितहै।एककेअभावमेंदूसरेकाभीअभावहोजाताहै।स्वतंत्रसत्तातोमात्रविश्वकीहै।यहसत्यविस्मरणहोजाए, तोमनुष्यमेंअहम्काउदयहोताहै।वहस्वयंकोशेषसबसेपृथकऔरस्वतंत्रहोनेकीभूलकरबैठताहै।जबकिउसकाहोनाकिसीभीदृष्टिऔरविचारसेस्वतंत्रनहींहै।मनुष्यकीदेहप्रति-क्षणपंचभूतोंसेनिर्मितहोतीरहतीहै।उनमेंसेकिसीकासहयोगएकपलकोभीछूटजाएतोजीवनकाअंतहोजाताहै।यहप्रत्येककोदृश्यहै।जोअदृश्यहैवहइसीभांतिसत्यहै।चेतनाकेअदृश्यद्वारोंसेपरमात्माकासहयोगएकक्षणकोभीविलीनहोजाएतोभीमनुष्यविसर्जितहोजाताहै।मनुष्यकीयहस्वतंत्रसीभासतीसत्ताविश्वकीसमग्रसत्तासेअखंडऔरएकहै।इसीलिएअहंकारमूलपापहै।यहसमझनाकिमैंहूँ, इससेबड़ीऔरकोईनासमझीनहींहै।इस मैंकोजोज…

ओशो और पतंजलि

ओशो हमारे युग के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले,सुने जाने वाले प्रबुद्ध रहस्यदर्शियों में से हैं, जिन्होंने सत्य को यथा संभव हर तरह से कहने की कोशिश की है । पतंजलि पर ओशो को पढ़ना स्वयं की खोज की दिशा में एक सही कदम उन लोगों के लिए हो सकता है, जिनकी यात्रा योग के पथ से स्वयं के साक्षात्कार की ओर है । योग क्या है ? योग तंत्र से किस प्रकार भिन्न है ? योग और ताओ में क्या फर्क है ? योग और झेन में परस्पर क्या संबंध है ? लाओत्से पतंजलि से किस प्रकार भिन्न हैं ? योग की यात्रा किन लोगों के लिए है ? इन तमाम प्रश्नों का जवाब आपको ओशो की पुस्तक पतंजलि योग सूत्र में मिलेगा । ओशो द्वारा पतंजलि पर कुल 100 प्रवचनों में बोला गया है, जिनमें से 50 प्रवचन प्रश्नोत्तर रूप में और 50 प्रवचन पतंजलि के योग -दर्शन की व्याख्या पर केंद्रित हैं । ओशो के प्रवचन इस रूप में दिए गए हैं कि साधकों के प्रश्नों का निदान,समाधान साथ-साथ मिलता जाए । इसलिए प्रवचनों का क्रम इस प्रकार है कि एक अध्याय में व्याख्या सूत्र लिए गए हैं तो अगले अध्याय में प्रश्नोत्तर हैं, जिनमें साधकों की जिज्ञासाओं का समाधान है ।पतंजलि के बहाने …

आध्यात्म

सपने टूटे
दिल चटखा
सब कुछ बिखरा
एक अटूट रिश्ता
बांधे रहा मुझे उससे
जो अदृश्य था
लेकिन मजबूत था इतना
कि जो बिखर जाना चाहिए था
उसे आरोह के शिखर तक पहुँचा कर
अंशों में स्वयं का रूप
दिखा गया
मैं अभिभूत हूँ उस शक्ति से
जो सदा मुझे अंशों में
उस अनंत का रूप दिखा देती है
और यात्रा को कभी समाप्त नहीं होने देती
सब कुछ सूत्रबद्ध सा बंधा है
टूटन में मुक्ति है ।

कुछ विचार

जब व्यक्ति किसी ओर के कहने में हो, तो उसे समझाने की भूल न करें ।

जो व्यक्ति दूसरों के बहकावे में आ जाते हैं, उनमें आत्म विश्वास की कमी और निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती ।

स्वीकार-भाव विधायक है; जो होता है वह रास्ते का रोड़ा नहीं बल्कि तुमसे सर्वश्रेष्ठ निकालने का एक माध्यम भर होता है ।