शनिवार, 27 मार्च 2010

ओशो की डायरी से




ओशो की डायरी से चुने गए कुछ विचार-बिंदु :
१.सत्य सरल है, शेष सब जटिल है, लेकिन हम सरल नहीं हैं, इसलिए सत्य को पाना कठिन हो जाता है ।
२.मैं दो ही प्रकार के मनुष्यों को जानता हूँ, एक तो वे जो सत्य की ओर पीठ किए हुए हैं और दूसरे वे जिन्होंने सत्य की ओर आंखें उठा ली हैं । इन दो वर्गों के अतिरिक्त और कोई वर्ग नहीं है ।
३. विचार शक्ति है - वैसे ही जैसे, विद्युत या गुरुत्वाकर्षण । विद्युत का उपयोग हम जान गए हैं, लेकिन विचार का उपयोग अभी सभी को ज्ञात नहीं है । फिर जिन्हें ज्ञात है वे उसका उपयोग नहीं कर पाते हैं क्योंकि उस उपयोग के लिए स्वयं के व्यक्तित्व का आमूल परिवर्तन आवश्यक है ।
४. सत्य और स्वयं के मध्य कोई अलंघ्य खाई नहीं है, सिवाय साहस के अभाव के ।
५. मनुष्य भी कैसा अद्भूत है ? उसके भीतर कूड़े कर्कट की गंदगी भी है और स्वर्ग की अमूल्य निधि भी । और हम किसे उपलब्ध होते हैं, यह बिल्कुल ही हमारे हाथ में है
६. प्रभु को भीतर पाते ही सर्वत्र उसी के दर्शन होने लगते हैं । वस्तुत: जो हम में होता है, उसकी ही हमें बाहर अनुभूति होती है । ईश्वर नहीं दिखाई पड़ता है ? तो जानना कि अभी तुमने उसे भीतर नहीं खोजा है ।
७. सत्य का सृजन नहीं करना है । उसका सृजन किया भी नहीं जा सकता और जिसका सृजन हो सके जानना कि वह असत्य है । सत्य का सृजन नहीं, दर्शन होता है । स्वयं के पास उसे ग्रहण करने वाली आंखें भर हों तो सत्य तो सदा ही उपस्थित है ।
८. जो है, उसे जानने के लिए स्वयं को दर्पण बनाना आवश्यक है । विचारों की छाया चित्त को अविकृत नहीं रहने देती । जैसे ही विचार शांत होते हैं और चित्त शून्य वैसे ही भीतर वह दर्पण उपलब्ध हो जाता है, जो कि सत्य के प्रतिफलन में समर्थ होता है
९. जो हुआ है, वह अनहुआ हो सकता है । जो किया है वह अनकिया हो सकता है । मनुष्य कर्म में बंधने में समर्थ है, तो मुक्त होने में भी समर्थ है । उसकी परतंत्रता भी उसकी स्वतंत्रता है ।
१०. स्वतंत्रता आत्मा का स्वरूप है, इसलिए यदि संकल्प हो तो कैसी भी परतंत्रता को क्षण में तोड़ा जा सकता है । संकल्प का अनुपात ही स्वतंत्रता का अनुपात है ।
११. मैं रोज ही मर जाता हूँ । वस्तुत: प्रतिक्षण ही मर जाता हूँ और इसे ही मैंने जीवन का - चिरजीवन का - रहस्य जाना है । जो अतीत को ढोता है, वह मृत को ढोने के कारण मृत ही होता है ।
१२. जीवन की बड़ी से बड़ी यात्रा के लिए एक कदम उठाने का साहस ही काफी है, क्योंकि एक कदम से अधिक तो एक साथ कोई भी नहीं चल सकता है । मित्र, हजारों मील की यात्रा भी एक कदम से प्रारंभ होती है और एक ही कदम से पूरी होती है ।
१३. स्वयं की खोज क्या है ? अपने खोये घर की खोज । संसार में मनुष्य बेघर है
१४. सत्य की परिभाषा पूछते हो ? सत्य की कोई परिभाषा नहीं है क्योंकि स्वयं की स्वयं के द्वारा परिभाषा हो सकती है ? पायलट ने क्राइस्ट से पूछा था : सत्य क्या है ? क्राइस्ट ने पायलट की ओर मात्र देखा भर और चुप रहे । सत्य कोई सिद्धांत नहीं है । सत्य कोई शब्द नहीं है । सत्य तो अनुभूति है - स्वयं की आत्यंतिक गहराई की अनुभूति । जो है, उसके साथ एक हो जाना सत्य है ।
१५. जीवन हमें तभी मिलता है जब हम अपनी आत्यंतिक गहराई को स्पर्श करते हैं - अन्यथा हम केवल जीते हैं और मात्र जीने और जीवन में उतना ही भेद है जितना कि मृत्यु और जीवन में है ।
१६. धर्म का क्या अर्थ है ? कीचड़ से कमल की ओर जाना । कीचड़ भी वही है, कमल भी वही है - पर कितना भेद है ।
१७. धर्म कोई अमूर्त कल्पना नहीं है । धर्म तो है प्रत्यक्ष व्यवहार । धर्म कोई विचार नहीं । धर्म तो है अनुभूति । जिन बातों से हमें दुख होता है, वे बातें हमसे दूसरों के प्रति न हों, ऐसी चित्त दशा में प्रतिष्ठा ही धर्म है ।
१८. धर्म का अर्थ है मृत्यु - स्वयं की मृत्यु । जिसका स्व नहीं मरता है वह सर्व को कैसे पा सकेगा ? अहं को छोड़ो और अपनी पूजा कम करो । पूजा छोड़ देना ही परमात्मा की पूजा है ।
१९.मैं विचार का स्वतंत्र दीपक जलाने को कहता हूँ । विचार की दृष्टि से किसी के दास मत बनो । सत्य उनका है, जो अपने स्वामी हैं ।
२०. जीवन तो बांसुरी की भांति है - भीतर खाली और रिक्त लेकिन संगीत की अनंत सुप्त संभावनाओं को लिए हुए । जो जितना उसे बजाता है, उतना ही संगीत उससे पैदा होता है ।
२१. मैं दूसरों में विश्वास करने को नहीं कहता हूँ, क्योंकि वह स्वयं में विश्वास के अभाव का परिणाम है ।
२१.एक ऐसी अग्नि भी है, जो दिखती नहीं लेकिन निरंतर स्वयं को जलाती रहती है । वह अग्नि है तृष्णा की । तृष्णा ऐसे ही जलाती है जैसे कोई जलती हुई मशाल को आंधियों के विरोध में लिए खड़ा है और स्वयं ही उससे झुलस जाए ।
२३. एक छोटा सा दिया वर्षों से घिरे अंधकार को नष्ट कर देता है , ऐसे ही आत्मबोध की एक छोटी सी किरण भी जीवन में घिरे जन्मों-जन्मों के अज्ञान को नष्ट कर देती है
२४. सेवा करना चाहते हैं ? लेकिन स्मरण रखना कि सागर में स्वयं ही डूबता हुआ व्यक्ति किसी दूसरे डूबते हुए व्यक्ति को नहीं बचा सकता है ।
२५. मित्र, ईश्वर को जानना है, तो मौन मार्ग है । ईश्वर के संबंध में जो भी कहा जाएगा, वह इसी कारण असत्य हो जाएगा कि कहा गया ।
२६. धर्म को मुंह में मत रखे रहो । उसे पेट में जाने दो और खून बनने दो । रोटी के टुकड़े को मुंह में रखे रहने से पेट नहीं भरता है ।
२७. मनुष्य एक यात्रा है- अनंत के लिए यात्रा । नीत्से ने कहा है : मनुष्य की महत्ता यही है कि वह सेतु है, अंत नहीं ।
२८. मित्र, स्वयं को अनुशासनों में मत बांधो । वास्तविक अनुशासन, अनुशासन के बंधनों में नहीं, वरन् विवेक के जागरण और मुक्ति से आता है ।
२९. शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में जो छिपा हो उसे बाहर लाना है । वह बाह्य आदर्श या आदेश नहीं, किंतु अंतस का आदेश है ।
३०. मैं उस शिक्षा के विरोध में हूँ, जो व्यक्तियों को किन्ही निर्धारित आदर्श के ढ़ांचों में ढालती हो । वैसी शिक्षा से व्यक्तित्व विकसित नहीं, कुंठित ही होते हैं । भय पर आधारित शिक्षा के भी मैं पक्ष में नहीं हूँ, फिर वह भय चाहे दंड का हो या प्रलोभन का । भय से अधिक विषाक्त और क्या हो सकता है ? और आरोपित अनुशासन की भी मैं निंदा करता हूँ, क्योंकि वह दासता के लिए तैयारी से ज्यादा और क्या है ?
31. महानता से सरल और कुछ नहीं, वस्तुत: सरलता ही महानता है ।
32. एक सत्य सदा स्मरण रखना, दूसरों को दिया गया धोखा अंत में स्वयं को ही दिया गया धोखा सिद्ध होता है ।
33. हम जो दूसरों के साथ करते हैं, अंततोगत्वा वह हम पर ही लौट आता है ।
34. क्या आपको ज्ञात है कि कभी भी किसी मनुष्य को दूसरों के द्वारा इतना धोखा नहीं दिया गया है जितना कि प्रत्येक स्वयं को ही देता है ।
35. प्रकाश सीधी रेखा में गति करता है । सत्य और धर्म भी सीधी रेखाओं में ही गति करते हैं । आपके जीवन की गति रेखा यदि सीधी न हो तो जानना कि आप अंधकार, अधर्म और असत्य के पथ पर हैं ।
36. धर्म तो मार्ग है, और मार्ग मात्र जानने से नहीं, चलने से तय होता है ।
37. सत्य असत्य का विरोधी नहीं है । असत्य का विरोधी भी असत्य ही होता है । वस्तुत: सभी अतियाँ असत्य हैं । सत्य तो अतियों के मध्य में अर्थात् अतियों के अतीत होता है ।
38. मैं स्वयं के भीतर झांकता हूँ तो क्या पाता हूँ ? पाता हूँ कि मोक्ष तो पृथ्वी से भी अधिक समीप है ।
39. सत्य को स्वयं को खोजने में गुजारा गया समय और व्यय किया गया श्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता, अंतत: तो केवल वही बचाया हुआ समय और सार्थक हुआ श्रम सिद्ध होता है ।
40. असत्य को मैंने फूस के ढेर की भांति जाना । उसमें शक्ति तो है ही नहीं, सत्य की छोटी सी चिनगारी भी उसे भस्म कर देती है ।
41. धर्म के लिए सबसे बड़ा आदर जो हम प्रकट कर सकते हैं वह है कि हम उसका उपयोग करें और उसे जियें । जो मात्र उसका विचार करता है और जीता नहीं, वह स्वयं ही अपने विचार पर अविश्वास प्रकट करता है ।
42. धर्म का लक्ष्य क्या है ? पुरुष में सोये हुए पुरुषोत्तम को जाग्रत करना ।
43. जीवन कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसका कि उसके बाहर कोई हल खोजना है । जीवन का हल तो पूर्णता से जीने में ही मिल जाता है ।
44. सबसे बड़ी मुक्ति है स्वयं को स्वयं से मुक्त करना । साधारणत: हम भूले ही रहते हैं कि स्वयं पर हम स्वयं ही सबसे बड़ा बोझ और बंधन हैं ।
45. मनुष्य को मनुष्यता बनी बनाई प्राप्त नहीं होती । उसे तो स्वयं ही निर्मित करना होता है । यही सौभाग्य भी है और यही दुर्भाग्य । सौभाग्य क्योंकि स्वयं के सृजन की स्वतंत्रता है और दुर्भाग्य क्योंकि स्वयं को बिना निर्मित किए समाप्त हो जाने की संभावना भी है ।
46. स्वयं के मैं को ठीक से जानकर उसकी पूर्णता में उससे मुक्त हो जाना ही प्रकाशित होना है । अहंकार अंधकार की उत्पत्ति है । प्रकाश के आते ही उसका न हो जाना सुनिश्चित है ।
47. मनुष्य को विकास करके ईश्वर नहीं होना है । वह यदि स्वयं को पूरी तरह उघाड़ ले तो अभी और यहीं ईश्वर है । मेरी दृष्टि में स्वयं का संपूर्ण आविष्कार ही एक मात्र विकास है ।
48. मनुष्य का संघर्ष किससे है ? स्वयं के "मैं" से । जो क्रांति करनी है, वह स्वयं के ही अहंकार से करनी है । अहंकार से घिरा होना ही संसार में होना है और जो अहंकार के बाहर है वही परमात्मा में है वस्तुत: वह परमात्मा ही है ।
49. "मैं" से भागने की कोशिश मत करना । उससे भागना हो ही नहीं सकता , क्योंकि भागने में भी वह साथ ही है । उससे भागना नहीं, वरन् समग्र शक्ति से उसमें प्रवेश करना है । स्वयं की अहंता में जो जितना गहरा जाता है, उतना ही पाता है कि अहंता की तो कोई वास्तविक सत्ता ही नहीं है ।
50. परमात्मा का प्रमाण पूछते हो ? क्या चेतना का अस्तित्व पर्याप्त प्रमाण नहीं है ? क्या जल की एक बूँद ही समस्त सागरों को सिद्ध नहीं कर देती है ?

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

प्रेम

प्रेम से बड़ी इस जगत में दूसरी कोई अनुभूति नहीं है प्रेम की परिपूर्णता में ही व्यक्ति विश्वसत्ता से संबंधित होता है प्रेम की अग्नि में ही स्व और पर के भेद भस्म हो जाते हैं और उसकी अनुभूति होती है, जो कि स्व और पर केअतीत है धर्म की भाषा में इस सत्य की अनुभूति का नाम ही परमात्मा है विचारपूर्वक देखने पर विश्व कीसमस्त सत्ता एक ही प्रतीत होती है उसमें कोई खंड दिखाई नहीं पड़ते भेद और भिन्नता के होते हुए भी सत्ताअखंड है जितनी वस्तुएं हमें दिखाई पड़ती हैं और जितने व्यक्ति वे कोई भी स्वतंत्र नहीं हैं सबकी सत्ता परस्परआश्रित है एक के अभाव में दूसरे का भी अभाव हो जाता है स्वतंत्र सत्ता तो मात्र विश्व की है यह सत्यविस्मरण हो जाए, तो मनुष्य में अहम् का उदय होता है वह स्वयं को शेष सबसे पृथक और स्वतंत्र होने की भूलकर बैठता है जबकि उसका होना किसी भी दृष्टि और विचार से स्वतंत्र नहीं है मनुष्य की देह प्रति-क्षण पंच भूतोंसे निर्मित होती रहती है उनमें से किसी का सहयोग एक पल को भी छूट जाए तो जीवन का अंत हो जाता है यहप्रत्येक को दृश्य है जो अदृश्य है वह इसी भांति सत्य है चेतना के अदृश्य द्वारों से परमात्मा का सहयोग एकक्षण को भी विलीन हो जाए तो भी मनुष्य विसर्जित हो जाता है मनुष्य की यह स्वतंत्र सी भासती सत्ता विश्व कीसमग्र सत्ता से अखंड और एक है इसीलिए अहंकार मूल पाप है यह समझना कि मैं हूँ, इससे बड़ी और कोईनासमझी नहीं है। इस मैं को जो जितना प्रगाढ़ कर लेता है, वह उतना ही परमात्मा से दूर हो जाता है यह दूरी भीवास्तविक नहीं होती इसलिए इसे किसी भी क्षण नष्ट किया जा सकता है यह दूरी वैसी ही काल्पनिक औरमानसिक होती है, जैसे कि स्वप्न में हम जहां वस्तुत: होते हैं , वहां से बहुत दूर निकल जाते हैं और फिर स्वप्नके टूटते ही दूरी ऐसे विलीन हो जाती है, जैसे रही ही हो वस्तुत: परमात्मा से दूर होना असंभव है , क्योंकि वहहमारी आधारभूत सत्ता है लेकिन विचार में हम उससे दूर हो सकते हैं विचार स्वप्न का ही एक प्रकार है जोजितने ज्यादा विचारों में है, वह उतने ज्यादा स्वप्न में है और जो जितने अधिक स्वप्न में होता है, वह उतना हीअहम् केंद्रित हो जाता है प्रगाढ़ स्वप्न शून्य निद्रा में चूँकि कोई विचार नहीं रह जाते इसलिए अहम-बोध भीनहीं रह जाता सत्ता तो तब भी होती है, लेकिन विश्वसत्ता से एक होती है मैं का भाव उसे तोड़ता और खंडित नहींकरता लेकिन गहन निद्रा में यह मिलन प्राकृतिक है और इससे विश्राम तो मिलता है, परंतु परम विश्राम नहीं परमात्मा के सान्निध्य में पहुँच जाना ही विश्राम है और मैं के सान्निध्य में जाना ही विकलता तनाव है मैं यदि पूर्ण शून्य हो जाए, तो परम विश्राम उपलब्ध हो जाता है परम विश्राम का ही नाम मोक्ष है सुषुप्ति में एकप्राकृतिक आवश्यकता के निमित्त अहंकार भाव से अल्पकाल के लिए मुक्ति मिलती है जीवन के लिए यहअपरिहार्य आवश्यकता है , क्योंकि किसी भी दशा की अशांत, उत्तेजनापूर्ण स्थिति को बहुत देर तक नहीं रखा जासकता यही इस बात का प्रमाण है कि जो दशा सदा रह सके वह स्वाभाविक नहीं है वह आती है और जाती है जो स्वभाव है,वह सदा बना रहता है वह आता और जाता नहीं है अधिक से अधिक वह आवृत हो सकता है अर्थात् जब हम अहम् से भरे होते हैं, तब हमारा ब्रह्म भाव नष्ट नहीं हो जाता है, अपितु मात्र ढक जाता है जैसे ही मैंका तनाव और अशांति सीमा को लांघ जाता है, वैसे ही उस ब्रह्म भाव में पुन: अनिवार्य रूपेण हमें विश्रांति लेनी होतीहै यह विश्रांति बलात् और अनिवार्य है इसे हम स्वेच्छा से नहीं लेते हैं यदि हम स्वेच्छा से मैं भाव से विश्रांतिले सकें तो अभुतपूर्व क्रांति घटित हो जाती है मैं भाव से स्वेच्छा से विश्रांति लेने का सूत्र प्रेम है क्योंकि प्रेम कीदशा अकेली दशा है, जब हमारी सत्ता तो होती है, किंतु उस सत्ता पर मैं भाव आरोपित नहीं होता सुषुप्ति बलात्विश्राम है, प्रेम स्वेच्छित इसीलिए प्रेम समाधि बन जाता है
( ओशो के विचारों पर केंद्रित)

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

ओशो और पतंजलि

ओशो हमारे युग के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले,सुने जाने वाले प्रबुद्ध रहस्यदर्शियों में से हैं, जिन्होंने सत्य को यथा संभव हर तरह से कहने की कोशिश की है । पतंजलि पर ओशो को पढ़ना स्वयं की खोज की दिशा में एक सही कदम उन लोगों के लिए हो सकता है, जिनकी यात्रा योग के पथ से स्वयं के साक्षात्कार की ओर है । योग क्या है ? योग तंत्र से किस प्रकार भिन्न है ? योग और ताओ में क्या फर्क है ? योग और झेन में परस्पर क्या संबंध है ? लाओत्से पतंजलि से किस प्रकार भिन्न हैं ? योग की यात्रा किन लोगों के लिए है ? इन तमाम प्रश्नों का जवाब आपको ओशो की पुस्तक पतंजलि योग सूत्र में मिलेगा । ओशो द्वारा पतंजलि पर कुल 100 प्रवचनों में बोला गया है, जिनमें से 50 प्रवचन प्रश्नोत्तर रूप में और 50 प्रवचन पतंजलि के योग -दर्शन की व्याख्या पर केंद्रित हैं । ओशो के प्रवचन इस रूप में दिए गए हैं कि साधकों के प्रश्नों का निदान,समाधान साथ-साथ मिलता जाए । इसलिए प्रवचनों का क्रम इस प्रकार है कि एक अध्याय में व्याख्या सूत्र लिए गए हैं तो अगले अध्याय में प्रश्नोत्तर हैं, जिनमें साधकों की जिज्ञासाओं का समाधान है ।

पतंजलि के बहाने ओशो ने योग दर्शन की गहराइयों का संस्पर्श किया है । इन प्रवचनों को पढ़ना योग की गहराइयों में जाने के लिए द्वार हैं । यह पुस्तक पाँच भागों में प्रकाशित हुई है । हर भाग में 20 प्रवचन दिए गए हैं । योग दर्शन के समाधि, साधना,विभूति और कैवल्य पाद के सभी 194 सूत्रों की ओशो द्वारा व्यापक,विशद और गहन व्याख्या की गई है । इन प्रवचनों में योग के चारों पादों का जिस गहराई से वर्णन हुआ है और साधकों में योग को लेकर जो भ्रांतियाँ हैं, उनको दूर किया गया है, वह अनूपम कार्य है । इससे पूर्व ऐसा कार्य नहीं हुआ।

पतंजलि को आज के युग के अनुकूल बना कर प्रस्तुत करने के लिए ओशो का आभार किन शब्दों में किया जाए । हम चाहेंगे कि ओशो द्वारा पतंजलि पर बोले गए इन प्रवचनों का अधिक से अधिक पठन-पाठन हो, आप चाहें तो इन्हें सुन भी सकते हैं ? लेकिन ध्यान रहे कि पतंजलि पर ओशो ने अंग्रेजी में बोला है, और यह पुस्तक मूल रूप से सर्वप्रथम अंग्रेजी में "फ्राम अल्फ़ा टू ओमेगा" नाम से आई थी, जिसका सुन्दर अनुवाद मा योग निरूपम द्वारा किया गया है ।

इस पुस्तक को डायमन्ड समूह के प्रकाशक फ्यूज़न द्वारा अभी हाल ही में पेपर-बैक और हार्ड बाउन्ड में भी प्रकाशित किया गया है । इससे पूर्व इसके तीन राज संस्करण ओशो कम्यून द्वारा भी प्रकाशित हो चुके है ।

बुधवार, 3 मार्च 2010

आध्यात्म

सपने टूटे
दिल चटखा
सब कुछ बिखरा
एक अटूट रिश्ता
बांधे रहा मुझे उससे
जो अदृश्य था
लेकिन मजबूत था इतना
कि जो बिखर जाना चाहिए था
उसे आरोह के शिखर तक पहुँचा कर
अंशों में स्वयं का रूप
दिखा गया
मैं अभिभूत हूँ उस शक्ति से
जो सदा मुझे अंशों में
उस अनंत का रूप दिखा देती है
और यात्रा को कभी समाप्त नहीं होने देती
सब कुछ सूत्रबद्ध सा बंधा है
टूटन में मुक्ति है ।

मंगलवार, 2 मार्च 2010

कुछ विचार

जब व्यक्ति किसी ओर के कहने में हो, तो उसे समझाने की भूल न करें ।

जो व्यक्ति दूसरों के बहकावे में आ जाते हैं, उनमें आत्म विश्वास की कमी और निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती ।

स्वीकार-भाव विधायक है; जो होता है वह रास्ते का रोड़ा नहीं बल्कि तुमसे सर्वश्रेष्ठ निकालने का एक माध्यम भर होता है ।