गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

अमीर खुसरो की चतुराई


एक बार गर्मियों के दिनों में अमीर खुसरो किसी गाँव की यात्रा पर निकले थे । रास्ते में उन्हें बहुत जोर की प्यास लगी । वे पानी की खोज में एक पनघट पर जा पहुँचे । वहां चार पनिहारिनें पानी भर रही थी । खुसरों ने उनसे पानी पिलाने का अनुरोध किया । उनमें से एक पनिहारिन खुसरो को पहचानती थी । उसने अपनी तीनों सहेलियों को बता दिया कि पहेलियाँ बनाने वाले यही अमीर खुसरों हैं । विदित है कि अमीर खुसरो अपनी पहेलियों,मुकरियों तथा दो-सखुनों के लिए जगत प्रसिद्ध हैं । फिर क्या था ? चारों पनिहारिनों में से एक ने कहा मुझे खीर पर कविता सुनाओ, तब पानी पिलाऊंगी । इसी तरह से दूसरी पनिहारिन ने चरखा, तीसरी ने ढोल और चौथी ने कुत्ते पर कविता सुनाने के लिए कहा । खुसरो बेचारे प्यास से व्याकुल थे । पर खुसरो की चतुराई देखिए कि उन्होंने एक ही छंद में उन सबकी इच्छानुसार कविता गढ़ कर सुना दी -             

खीर पकाई जतन से, चरखा दिया जला ।

आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा ।। 

                                                ला पानी पीला । 

यह सुन कर पनिहारिनों की खुशी का ठीकाना न रहा । उन्होंने खुश होकर खुसरो को न केवल पानी पिलाया, बल्कि अपने घर ले जाकर भोजन भी करवाया ।  

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

पूर्ण उपस्थिति

प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृष्टि से ठीक है

सच्चा भी, झूठा भी, पुण्यात्मा भी, पापी भी, सत्चरित्र भी, कुचरित्र भी, ईमानदार भी, ज्ञानी भी और अज्ञानी भी 

अगर व्यक्ति जहां है, वहां पूरी तरह मौजूद है, उपस्थित है होश के साथ तो उक्त भेद मिट जाते हैं और व्यक्ति आत्मस्वरूप को प्राप्त होता है । 

रविवार, 25 अप्रैल 2010

पढ़ना और समझना

जब मैं कुछ पढ़ता हूँ 
और उससे अर्थ ग्रहण करता हूँ 
और जब आप कुछ पढ़ते हैं
और उसका अर्थ ग्रहण करते हैं
यह जरूरी नहीं कि हमने जो पढ़ा 
और उसका जो अर्थ ग्रहण किया
वह वही है जो कि लेखक का रहा होगा
नहीं, बहुत कम संभावनाएँ हैं 
कि कोई लेखक अपना वास्तविक संदेश 
लोगों तक संप्रेषित कर पाए ।
यही कारण है कि बहुत सी पुस्तकों की 
बहुत सी टीकाएँ की जाती हैं 


व्यक्ति किसी बात से 
वही अर्थ लेता है जो वह समझता है 
और वह वही समझता है जो कि वह जीता है 
उसका जीवन दृष्टिकोण ही चीजों को अर्थ देता है
बहुत से लोग जो वातावरण से प्रदूषित हैं
उनका स्वयं का कोई दृष्टिकोण नहीं होता 
क्योंकि उनका स्वयं का कोई जीवन ही नहीं होता .

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

संसार के पाँच शाश्वत नियम

संसार में पाँच शाश्वत नियम हैं :

  1. स्वार्थ : संसार का पहला नियम ।
  2. धोखा : संसार का दूसरा नियम ।
  3. लालच : संसार का तीसरा नियम ।
  4. संग्रह : संसार का चौथा नियम ।
  5. दुख : संसार का पाँचवाँ नियम ।
पहले चार नियम स्वैच्छिक हैं, पाँचवाँ इनके पीछे स्वत: चला आता है ।

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

जर जोरु और जमीन

एक पुरानी कहावत है कि हर झगड़े की जड़ जर,जोरु और जमीन ही होती है । यह कहावत आदिकाल युग और सामंतवादी युग तथा औद्योगिक युग की अपेक्षा इस उत्तर आधुनिक युग में अधिक सही प्रतीत होती है । आज समाज में नारी की स्थिति एक वस्तु से ज्यादा नहीं है और स्वयं नारी ने अपने रूप और सौंदर्य के बाजार में भाव लगाने शुरु कर दिए हैं । कोई अपने कौमार्य की बोली लगा रही है तो कोई स्वयं की खूबसूरती के जादू को बाजार में बेच रही है ।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

पढ़ने की कला

लोगों में पढ़ने की आदत दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है । इसके कई कारण हैं । शिक्षा का ढ़ाँचा भी बहुत बदल गया है । शिक्षा ज्ञान प्राप्ति के लिए नहीं डिग्री के लिए ली जा रही है । पुस्तक पढ़ने का लोगों के पास समय नहीं है । फिर लोगों के नौकरी-पेशे ऐसे हो गए हैं कि वे उन्हीं में उलझ कर रह जाते हैं । समाज के उच्च वर्ग ने पुस्तकों की जगह अन्य साधन अपना लिए हैं । मध्यम वर्ग के लिए पुस्तकें महंगी हैं । वह पुस्तक खरीद कर पढ़ नहीं पा रहा है । पुस्तकालय जाने का चलन भी बहुत कम हो गया है । पुस्तकालयों में पुस्तके धूल चाट रहीं हैं । दूसरी ओर ज्ञान का विस्फोट भयंकर हुआ है । पिछले २० सालों में ज्ञान में जो वृद्धि हुई है, वह पिछले १००० सालों में नहीं हुई थी । किसी भी व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं रखी जा सकती कि वह संसार का नवीनतम ज्ञान रखता है । विषयों की बहुलता और लगातार बढ़ती पुस्तकों में से अपनी पसंद का विषय व पुस्तकें चुनना तक कठिन हो गया है । इसलिए किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए यह जरूरी है कि वह अपने पेशे से जुड़े विषय के साथ कोई एक अन्य विधा जरूर चुने जैसे साहित्य में कविता,कहानी,उपन्यास,नाटक, रिपोर्ताज, संस्मरण आदि; दर्शन में भारतीय दर्शन या पाश्चात्य दर्शन, मनोविज्ञान में बाल मनोविज्ञान, स्त्री मनोविज्ञान, शिक्षा मनोविज्ञान आदि और उस विषय में अपनी पकड़ मजबूत बनाए । अपनी पसंद के विषय में क्या कुछ नया प्रकाशित हो रहा है, इसकी जानकारी एकत्रित करे और विषय के संबंध में समकालीन लेखकों से परिचय प्राप्त करे । बहुत से विषयों का सतही ज्ञान रखने से बेहतर है एक ही विषय का गहराई से अध्ययन किया जाए और उसके विभिन्न आयामों का अध्ययन किया जाए । अध्ययन के साथ-साथ चिंतन और मनन भी जरूरी है । बिना चिंतन मनन के कोई भी विषय आत्मसात नहीं होता । एक सफल पाठक ही सफल लेखक हो सकता है । यदि आप ब्लॉग लिखते हैं तब तो आपको बहुत जागरुक पाठक बनना पड़ेगा । तो किसी एक विषय को चुनिए और उसका नियमित अध्ययन जारी रखिए ...पढ़े हुए पर चिंतन और मनन कीजिए ताकि वह विषय आपका अपना हो जाए...आपकी रग-रग में रच-बस जाए ।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

कुछ मुक्तक

जिंदगी हमसे इस कदर रुठी है
कि हर साँस का हिसाब माँग बैठी है
मोहब्बत हमसे इस कदर रुठी है
कि हर पल के साथ का हिसाब माँग बैठी है

दिल था हमारा एक छोटा सा
उसमें भी तुम्हारा अक्श था
जो तुम्हारी साँसों से धड़कता था
आज वही तार-तार है बेजान सा


क्यों हमसे इतनी परीक्षा ली जा रही है
हम तो बस वही थे जो तूने बनाया
इसे कोरा बनाए रखना भी क्या गुनाह है
इस अनुभवी लोगों की दुनिया में

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

बढ़ते शहर घटती कृषि योग्य जमीन





जब मैं छोटा बच्चा था और अपने गाँव से चंडीगढ़ आना होता था, तो सड़कों के दोनों ओर कितना मनोहारी दृश्य होता था । सड़क के दोनों ओर से प्रकृति की सुंदर छटाएँ देखने को मिलती थी । रबी की फसलें जब अपने यौवन पर होती थी, तब दूर-दूर तक सरसों के पीले फूलों से पीली हुई धरती यूं लगती थी मानो धरती ने पीले वस्त्र ओढ़ लिए हों । लेकिन आज जब इन्हीं सड़कों से यात्रा करता हूँ तो खेत-खलिहान की जगह मुझे दिखाई देती हैं बड़ी-बड़ी सिमेंट कंकरीट की गगनचुंबी इमारतें । दिल्ली से चंडीगढ़ की जी.टी.रोड पर अब वो प्रकृति के नजारे कहाँ नजर आते हैं । जहां खेत होते थे वहाँ आबाद हो गए हैं शहर और शहरों में खो गए वो खेत और खलिहान । कई बार सोचता हूँ कि पंजाब और हरियाणा देश के दो बड़े अन्न उत्पादक राज्य हैं, यहीं उत्तम किस्म का चावल पैदा होता है और गेहूँ तो सारे देश को ये राज्य देते ही हैं । इन उपजाऊ भूमि वाले प्रदेशों पर कंकरीट के ये जंगल यूँ ही बढ़ते रहे तो आने वाले वर्षों में देश को अनाज कौन पैदा करके देगा । क्या हमारी सरकार के पास इस दिशा में सोचने और नीति बनाने की कोई योजना है ? जो इन राज्यों में बढ़ते शहरीकरण को रोक सके । इन प्रदेशों के कितने ही किसान अपनी उपजाऊ भूमि को शहरीकरण हेतु बेच चुके हैं और अंधाधुन आए पैसे से पगला गए हैं । क्या सरकार नए शहरों को बसाने के लिए ऐसे क्षेत्रों का चयन नहीं कर सकती, जो बंजर हैं और जहाँ कृषि नहीं हो सकती ? क्या ऐसी उपजाऊ भूमि पर कंकरीट के माल्स और बड़ी-बड़ी बहुमंजिला इमारतें खड़ी करके हम देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे ? क्या हमारी सरकारें इस ओर ध्यान देंगी ?

हमें भविष्य के लिए अभी से सचेत होना होगा । हमारी सरकारें, हमारे डैवल्पर्स और बिल्डर देश के भविष्य के लिए सोचें और देश की उपजाऊ भूमि पर यूँ कंकरीट के जंगल न खड़ा करें । शहर बसाने के लिए उन इलाकों का इस्तेमाल किया जा सकता है जहाँ कि भूमि बंजर है और जहां कृषि नहीं हो सकती ।

रविवार, 11 अप्रैल 2010

सुनना, करना और समझना

सत्य की अनुभूति होती है किसी ज्ञानी जन से इसके संबंध में सुनने मात्र से प्राण परितृप्त नहीं होते इसके संबंध में शास्त्र पढ़ लेने पर भी सत्य की प्यास नहीं बुझती इस सत्य की प्यास तब तक नहीं मिटती जब तक कि यथार्थ में उसकी अनुभूति नहीं होती सुनने और सोचने से यह नहीं मिल सकता ठीक उसी प्रकार जैसे कि किसी मरुभूमि में यात्रा कर रहे यात्री के पास किसी जलाशय का सारा विवरण, नक्शा मौजूद हो लेकिन जब तक वह उस जलाशय तक की यात्रा तय नहीं कर लेता, तब तक उसकी प्यास नहीं मिट सकती बेशक कोई व्यक्ति जो उस दिशा से रहा है, प्यासे व्यक्ति को रास्ते का संकेत कर सकता है कि कुछ दूर जाइए, वहाँ तुम्हें दो पगडंडियाँ मिलेंगी एक दाहिनी ओर जाती है और दूसरी बाईं ओर जाती है तुम दाहिनी ओर जाना कुछ दूर जाने पर तुम्हें जलाशय मिलेगा और वहीं प्राणों को परितृप्त करनेवाला अमृत-तुल्य शीतल जल और छाँह भी क्या जलाशय और छाँह के वर्णन मात्र से प्यासा यात्री परितृप्त हो गया होगा ? नहीं, उसे शांति तो तभी मिली होगी जब उसने जलाशय तक की यात्रा कर यथार्थ रूप से जल का पान किया होगा इसी प्रकार आत्मा और सत्य के ज्ञान की बाते सुनने और उनके संबंध में सोचने से बुद्धि को शब्द ज्ञान तो हो जाता है; लेकिन यथार्थ अनुभूति नहीं हो पाती यथार्थ अनुभूति केवल बुद्धि से समझ लेना भर नहीं है इसके लिए जरूरी है ध्यान करना इसलिए जब कभी सुनो या पढ़ो तो करने के लिए सुनना या पढ़ना सुनने या पढ़ने से यह मत समझ लेना कि समझ गए नहीं प्यास तब तक बनी रहेगी, प्राण तब तक छटपटाते रहेंगे जब तक कि सत्य स्वयं अनुभूत नहीं हो जाता मंजिले चल कर ही पहुँची जाती हैं सब समझ लेने से भी प्राण परितृप्त नहीं होंगे ध्यान की यात्रा करनी ही होगी यह ध्यान समझने की चीज नहीं है यह करने के लिए है ध्यान में जब कर्ता छूट जाए और मात्र कर्म रह जाए तो ध्यान पूरा हुआ

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

नैतिक साहस

ओशो उन दिनों जबलपुर सागर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक थे । एक दिन वे नीतिशास्त्र पढ़ा रहे थे । ऐसा कभी नहीं होता था कि ओशो कक्षा में व्याख्यान दे रहे हों और कोई छात्र किसी दूसरे छात्र से बातों में लगा हो । लेकिन उस दिन सामने की बैंच पर बैठी दो छात्राएँ आपस में बाते कर रही थी । ओशो का ध्यान जब इन छात्राओं की ओर गया तो ओशो ने व्याख्यान बीच में रोक कर कहा कि अब हम विराम लेते हैं और सामने बैठी छात्राओं की बातें सुनते हैं ; क्योंकि मेरे व्याख्यान से भी अधिक महत्वपूर्ण इनकी बातें हैं, हमें इन्हें सुनना चाहिए ।

तब ओशो ने छात्राओं को इंगित कर कहा कि जिस विषय पर तुम बात कर रही हो, वह हम सबके साथ बाँटों । ताकि हम भी उससे लाभान्वित हों । लेकिन ओशो की बात सुन कर छात्राएँ चुप बैठी रही ।

तब ओशो ने छात्राओं को कहा कि नीतिशास्त्र पढ़ती हो और इतना भी नैतिक साहस नहीं जुटा पा रही कि कुछ देर पहले जो बात तुम कर रही थी, उसे सभी के सामने कहने का साहस कर सको ।

इस घटना के बाद उन छात्राओं ने कक्षा में कभी व्याख्यान के समय आपस में बात न की ।

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

पशु और बुद्धत्व

एक झेन कथा : 

शोदाई एरो जो ध्यान की शिक्षा ग्रहण करना चाहता था, ध्यान सीखना चाहता था । इस प्रयोजन हेतु वह बासो के पास आया ।

बासो ने एरो से पूछा, "तुम्हारा आना किस लिए हुआ है ?"
एरो ने कहा, "मुझे ज्ञान चाहिए, मैं ध्यान सीखना चाहता हूँ और बुद्धत्व की प्राप्ति चाहता हूँ ।"
"बुद्धत्व की प्राप्ति असंभव है । ऐसे ज्ञान का संबंध शैतान से है । " बासो का जवाब था ।

एरो बासो की बात नहीं समझा । तब बासो ने उसे सेकितो नाम के एक अन्य झेन गुरु के पास भेज दिया ।

एरो ने सेकितो के पास जाकर पूछा, " बुद्धत्व क्या है ? "
सेकितो ने कहा, "तुममें बुद्धत्व के लक्षण नहीं हैं । "
एरो ने पूछा, "क्या पशु बुद्ध हो सकते हैं ?"
सेकितो ने कहा,"हाँ, वे हैं ।"
एरो ने स्वाभाविक जिज्ञासा से प्रश्न किया - "फिर मैं बुद्ध क्यों नहीं हो सकता ?"
सेकितो ने जवाब दिया,"क्योंकि तुम पूछते हो "

झेन गुरु सेकितो के उक्त कथन से एरो की उलझन मिट गई और उसे ज्ञान हो गया ।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

सरलता

बहुचित्तता से जटिलता आती है । एक चित्तता से सरलता आती है । बहुचित्तता चीजों के साथ तादात्म्यता है । चीजों के साथ तादात्म्यता काट देने से एक चित्तता आएगी । व्यक्ति सरल होगा । बच्चे की सरलता स्वाभाविक है । व्यक्ति की सरलता एक अर्जित गुण है... जिसे बहुचित्तता के बाद...तादात्म्य को काट कर पाना है । जटिल होकर फिर से बच्चे जैसी सरलता पाना ही बुद्धत्व है ।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

क्या तटस्थ होना बुरा है ?

क्या तटस्थ होना बुरा है ? तटस्थता क्या है ? मनुष्य तटस्थ क्यों होता है ? आइए आज इन्हीं विषयों पर चर्चा करें
तटस्थता का मतलब त्याग, संन्यास या वैराग्य नहीं है तटस्थता का मतलब अतिवादी होना भी नहीं है

तटस्थता का मतलब किसी विचार के पक्ष या विपक्ष में खड़े होना भी नहीं है तटस्थता का अर्थ मध्यम मार्ग भी नहीं है तटस्थ होने का अर्थ है मन की एक ऐसी अवस्था जब व्यक्ति विचार और व्यवहार में एकरूपता नहीं देखता दोनों के बीच एक गहरी खाई देखता है इस वैचारिक द्वंद्व के चलते व्यक्ति के पास विश्लेषण तो होता है, लेकिन यथार्थ की भूमि नहीं होती यह अवस्था साक्षी भाव की ओर ले जाने वाली द्वंद्वात्मक स्थिति है यानि इस स्थिति में व्यक्ति स्वयं के भीतर झांकता है और चीजों को देखता है लेकिन उस संबंध में निर्णय देने की स्थिति में नहीं होता

इस स्थिति से उबरना तभी संभव है जब व्यक्ति वैचारिक स्तर और व्यवहारिक स्तर पर कोई संतुलित सत्य को देख पाता है और विचार और व्यवहार की असंतुलित खाई को पाटने की कोशिश करता है यह स्वयं की आलोचना भी नहीं है यह एक तरह से आत्मावलोकन है ; जिसकी साधना हमें आत्म साक्षात्कार की ओर ले जाती है

जो मनुष्य परिस्थितियों के भावनात्मक बंधनों से मुक्ति पा लेता है वह वह तटस्थ रह सकता है इसमें भूत से मुक्ति और भविष्य की स्थितियों हेतु स्वयं को तैयार करने में मदद मिलती है इसमें मनुष्य की सांसारिक छवि, जो झूठी और स्वयं व्यक्ति द्वारा निर्मित है, टूटती है और मनुष्य अपने सच्चे स्वरूप के साक्षात्कार की ओर बढ़ता है यह आत्मावलोकन की आदर्श स्थिति है

वह तटस्थता जो व्यक्ति को विवेकशून्य करे और पलायनवादी बनाए, तटस्थता नहीं बल्कि जड़ता है जो उसे परिवर्तनशील नहीं होने देती निंदा और चुगली सांसारिक स्वार्थ सिद्धि के योग हैं इनसे व्यक्ति दूसरों से क्षणिक संतुष्टि पा सकता है, लेकिन आत्मतुष्टि नहीं जिम्मेवारी से जो बचता है, वह तटस्थ नहीं हो सकता कर्म करते हुए तटस्थ हुआ जा सकता है तटस्थ हुआ व्यक्ति स्वयं के कार्य के प्रति अधिक समर्पित होता है उसके कार्य की गुणवत्ता बढ़ जाती है उसके कार्यों से अशुद्धियाँ मिट जाती हैं

विचार के तल पर और व्यवहार के तल पर जो दूरी है; जिसके कारण व्यक्ति निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता, यह द्वंद्वात्मक स्थिति ही तटस्थता को जन्म देती है तटस्थ व्यक्ति में विशेष अवलोकन शक्ति जाती है वह दूर की सोचता है निष्कर्ष तो जीवन यात्रा में एक पड़ाव से अधिक कुछ नहीं हैं आगे बढ़ने पर शायद तुम इन्हें भूल ही जाओ लेकिन तटस्थता चीजों के मूल स्वरूप को दिखाने वाली एक कला है इसकी साधना से विचार और व्यवहार में संतुलन साधा जा सकता है

दूरदर्शिता

दूरदर्शिता व्यवहारिक हो सकती है, लेकिन व्यवहारिकता कभी दूरदर्शी नहीं हो सकती ।