बुधवार, 23 जून 2010

एकाकी जीवन

एकाकी है यह जीवन
चिंतन बहुत
मनन बहुत
पर है सूना बहुत
कोई नहीं जिसे समझा सकूँ
इस मन की पीड़ा को
इस चिंता के विषय को
इस मनन के बिंदु को
बस छटपटा कर रह जाता हूँ
एक अभाव से भर जाता हूँ
कि मैं जैसा हूँ वैसा क्यों हूँ
क्या मैं स्वयं जैसा होने को हूँ अभिशप्त
या है यह स्वयं को समझने की सजा
कि-
चिंतन है
मनन है
विचार है
पर कोई साथी नहीं जिसे समझा सकूँ
ठीक वैसा जैसा मैं हूँ !!!

शनिवार, 19 जून 2010

नियम

आदमी के बनाए नियम कभी आदमी से बड़े नहीं हो सकते । नियमों का सभी लोग पालन करेंगे, यह अपेक्षा करना मूर्खता है । आदमी ही नियम तोड़ता है,क्योंकि कोई नियम स्वयं जीवन से बड़ा नहीं हो सकता । @मनोज भारती

शनिवार, 12 जून 2010

स्वामी रामतीर्थ के विचार

  • कोई चीज़ कितनी भी प्यारी क्यों न हो, अगर वह आत्म साक्षात्कार में बाधक हो तो उसे तुरंत हटा देना चाहिए । 
  • सांसारिक वस्तुओं में सुख की तलाश व्यर्थ है । आनंद का खजाना तुम्हारे भीतर है । 
  • इच्छाओं से ऊपर उठ जाओ, वे पूरी हो जाएंगी ; माँगोगे तो उनकी पूर्ति तुमसे और दूर जा पड़ेगी । 
  • जिस समय सब लोग तुम्हारी प्रशंसा करेंगे, वह समय तुम्हारे रोने का होगा, क्योंकि इसी प्रकार झूठे अवतारों के पिताओं ने उनकी प्रशंसा की थी । 
  • चिंताएँ, परेशानियाँ, दु:ख और तकलीफे परिस्थितियों से लड़ने से दूर नहीं हो सकती, वे दूर होंगी अपनी भीतरी दुर्बलता दूर करने से, जिसके कारण वे पैदा हुई हैं । 
  • हमारे समस्त दुखों का प्रधान कारण यह है कि हम अपने प्रति सच्चे न रहकर दूसरों को खुश करते रहते हैं । 
  • सच्चा पड़ोसी वह नहीं जो तुम्हारे साथ के मकान में रहता है, बल्कि वह है जो तुम्हारे साथ उसी विचार-स्तर पर रहता है । 
  • अपनी प्रत्यक्ष अनुभूति को ही अंतिम प्रमाण मानों । 
  • केवल आत्मज्ञान ही है, जो हमें सब जरूरतों से परे कर सकता है । 
  • दूसरों में दोष न निकालना, दूसरों को उतना उन दोषों से नहीं बचाता, जितना स्वयं को बचाता है । 
  • समस्त भय और चिंता इच्छाओं का परिणाम है । 
  • जो तमाम इच्छाओं से ऊपर उठ गया है,उसके द्वारा भलाई सदा इस तरह अनजाने, सहज और स्वाभाविक तौर से होती रहती है जैसे फूल से खुशबू और सितारों से रोशनी निकलती रहती है । 
  • अपने भीतर की परम निधि पाने के लिए और स्वर्ग के साम्राज्य का ताला खोलने के लिए इसी ऊँचाई की ताली को काम में लाना होगा । 

शनिवार, 5 जून 2010

आवाज़

एक झेन साधक की मृत्यु हुई । उसके आश्रम के निकट ही एक अंधा वृद्ध रहता था । साधक की शोकसभा में उसने कहा –

“मैं जन्म से अंधा हूँ । लोगो के चेहरे नहीं देख सकता । लेकिन उनकी भावनाएँ उनकी आवाज़ से पहचान पाता हूँ । आमतौर पर मैं जब किसी को बधाई देते सुनता हूँ, तो आवाज के पीछे छिपी ईर्ष्या की गूँज भी मुझे सुनाई देती है । जब किसी को सांत्वना देते हुए सुनता हूँ तो छिपी हुई खुशी भी मुझ से बच नहीं पाती, कि चलो यह दु:ख हमें तो नहीं है । पर इस साधक को मैंने जब भी सुना, वह वही था, जो वह कह रहा था । जब यह बधाई देता था तो अंदर से बाहर तक खुश होता था । जब दु:ख जताता था तो सचमुच दु:खी होता था । “

बुधवार, 2 जून 2010

शैले की जीवनोपयोगी उक्तियाँ

अधिकार विनाशकारी प्लेग के समान है; जिसे छूता है नष्ट कर देता है ।


• कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्-गार है ।


• जिस प्रकार एक निराश चोर चोरों को पकड़नेवाला बन जाता है, उसी प्रकार निराश होकर लेखक आलोचक बन जाते हैं ।


• आत्मा का आनंद कर्मशीलता में है ।


• कवि दु:खों से सीखते हैं और गीतों से सिखाते हैं ।


• जितना ही हम अध्ययन करते हैं,उतना ही हमको अपने अज्ञान का आभास होता जाता है ।


• कवि विश्व के अस्वीकृत व्यवस्थापक हैं ।


• जीवन अनंतकाल के श्वेत प्रकाश को रंग-बिरंगे शीशे के गुम्बज के सदृश रंग देता है ।

दमन

आज फिर हम ओशो के एक प्रवचन से चुनी हुई कहानी को प्रस्तुत कर रहें हैं । यह कहानी दमन और संयम के सही अर्थ खोलती है ।

दमन
एक संध्या दो भिक्षु किसी पहाड़ी नदी को पार करते थे । एक था वृद्ध संन्यासी, दूसरा युवा । वृद्ध आगे था, युवा पीछे । नदी तट पर एक युवती खड़ी थी । वह भी नदी पार करना चाहती थी । किंतु अपरिचित पहाड़ी नदी थी और तीव्र उसका प्रवाह था । युवती उतरने का साहस नहीं कर पा रही थी । वृद्ध संन्यासी उसके निकट आया तो उसकी दुविधा देख उसने सोचा कि उसे हाथ का सहारा दे दूँ । लेकिन यह क्या ? हाथ का सहारा देने के विचार के आते ही, जैसे कोई सोया सर्प अचानक फन उठा ले ऐसे ही काम-वासना उसके रोयें-रोयें में कांप गई । शरीर वृद्ध था, पर वासना अभी भी युवा थी । विकारों को दबाया था, पर वे मौजूद थे । दमन के अनेक वर्ष एकदम विलीन हो गए । बहुत तप संघर्ष किया था, उसकी कोई रेखा भी शेष न रही ।

यह क्या हुआ ? क्या सब श्रम जल पर रेखाएँ खींचने जैसा ही व्यर्थ नहीं हो गया था ? वह अपने से ही भयभीत वृद्ध आंखें नीचे झुकाकर नदी पार करने लगा । पर आंखे झुकाने या बंद करने से तो कुछ होता नहीं है । स्त्री या पुरुष बाहर नहीं हैं, वे तो भीतर ही छिपे हैं । काश ! विकार बाहर होते तो उन्हें छोड़कर भागा जा सकता था , लेकिन वे तो भीतर हैं, भागने वाले के साथ हैं । उन्हें छोड़कर भागने का उपाय नहीं । उन्हें दमन करने का भी उपाय नहीं , क्योंकि दमन से वे आप में और भी गहरे प्रविष्ट हो जाते हैं और आपके चित्त-भवन के और भी अंधरे, अज्ञात और अचेतन प्रकोष्ठों में उनका निवास हो जाता है । वे चेतन (कॉन्सस) से हट जाते हैं, पर अचेतन (अन्कान्सस) के अतिथि हो जाते हैं ।

उस वृद्ध ने नदी पार की । उसने पीछे नहीं देखा, किंतु उसका मन पीछे की ओर ही भाग रहा था । वह युवती तो उसके शरीर के पीछे थी,किंतु मन में युवती आगे थी । उसके मन में अनेक विकल्प उठे । सोचता था, सहारा दे ही क्यों न दिया ? लेकिन एक वासनाग्रस्त लिप्सा भी उसके मन में व्याप्त होती चली गई । वह बहुत घबड़ा गया और ग्लानि से भर गया । उसने भगवान का स्मरण किया और कहा, मुझे क्षमा करें । बड़ी भूल हुई है । यह मैंने क्या कर दिया है ? यूं ऊपर से उसने कुछ भी नहीं किया था, पर असली करना तो सब भीतर घटित होता है । बाहर तो केवल उसकी प्रतिछायाएँ ही आती हैं । विचार ही असली कर्म है । बंधन और मोक्ष वही है । वे विचार फिर वस्तुत: कर्म में आते हैं या नहीं इसमें बहुत भेद नहीं पड़ता ।

वह वृद्ध संन्यासी जब नदी के उस पार पहुंचा, तो उसे याद आया कि उसके पीछे उसका युवा साथी भी आ रहा है । वह चिंतित हुआ कि कहीं वह भी उस पाप-चिंतना में न पड़ जावे, जिससे वह स्वयं पीड़ित और पतित हुआ है । उसने लौटकर देखा – और वह आंखें फाड़े देखता ही रह गया ? उसे अपनी आंखों पर विश्वास करना मुश्किल था । वह युवक उस युवती को कंधे पर लिए नदी पार हो रहा था । उसे आग लग गई । और वह उत्तप्त और अशांत हो गया । उसका स्वयं का काम क्रोध में परिणत हो गया ।

फिर वे बड़ी देर तक आश्रम की ओर चुपचाप चलते रहे । वृद्ध इतना क्रुद्ध था कि कुछ भी बोल नहीं सका । अंतत: जब वे आश्रम में प्रवेश करने लगे, तो उसका बांध टूट ही गया । वह बोला, आज तुमने बहुत पाप किया है । विकारों के उस ढ़ेर को तुमने कंधे पर क्यों लिया था ? उस युवती को स्पर्श क्यों किया ? अब मैं इस पाप के संबंध में गुरु को बिना बताए कैसे रह सकता हूँ ? तुमने संन्यास का और शिल का नियम भंग किया है । उस युवक ने यह सुना और उत्तर में कहा, क्षमा करें । उस युवती को मैं नदी तट पर ही छोड़ आया हूँ, लेकिन प्रतीत होता है कि आप उसे अभी भी अपने कंधे पर लिए हुए हैं ।