सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

June, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एकाकी जीवन

एकाकी है यह जीवन चिंतन बहुत मनन बहुत पर है सूना बहुत कोई नहीं जिसे समझा सकूँ इस मन की पीड़ा को इस चिंता के विषय को इस मनन के बिंदु को बस छटपटा कर रह जाता हूँ एक अभाव से भर जाता हूँ कि मैं जैसा हूँ वैसा क्यों हूँ क्या मैं स्वयं जैसा होने को हूँ अभिशप्त या है यह स्वयं को समझने की सजा कि- चिंतन है मनन है विचार है पर कोई साथी नहीं जिसे समझा सकूँ ठीक वैसा जैसा मैं हूँ !!!

नियम

आदमी के बनाए नियम कभी आदमी से बड़े नहीं हो सकते । नियमों का सभी लोग पालन करेंगे, यह अपेक्षा करना मूर्खता है । आदमी ही नियम तोड़ता है,क्योंकि कोई नियम स्वयं जीवन से बड़ा नहीं हो सकता । @मनोज भारती

स्वामी रामतीर्थ के विचार

कोई चीज़ कितनी भी प्यारी क्यों न हो, अगर वह आत्म साक्षात्कार में बाधक हो तो उसे तुरंत हटा देना चाहिए । सांसारिक वस्तुओं में सुख की तलाश व्यर्थ है । आनंद का खजाना तुम्हारे भीतर है । इच्छाओं से ऊपर उठ जाओ, वे पूरी हो जाएंगी ; माँगोगे तो उनकी पूर्ति तुमसे और दूर जा पड़ेगी । जिस समय सब लोग तुम्हारी प्रशंसा करेंगे, वह समय तुम्हारे रोने का होगा, क्योंकि इसी प्रकार झूठे अवतारों के पिताओं ने उनकी प्रशंसा की थी । चिंताएँ, परेशानियाँ, दु:ख और तकलीफे परिस्थितियों से लड़ने से दूर नहीं हो सकती, वे दूर होंगी अपनी भीतरी दुर्बलता दूर करने से, जिसके कारण वे पैदा हुई हैं । हमारे समस्त दुखों का प्रधान कारण यह है कि हम अपने प्रति सच्चे न रहकर दूसरों को खुश करते रहते हैं । सच्चा पड़ोसी वह नहीं जो तुम्हारे साथ के मकान में रहता है, बल्कि वह है जो तुम्हारे साथ उसी विचार-स्तर पर रहता है । अपनी प्रत्यक्ष अनुभूति को ही अंतिम प्रमाण मानों । केवल आत्मज्ञान ही है, जो हमें सब जरूरतों से परे कर सकता है । दूसरों में दोष न निकालना, दूसरों को उतना उन दोषों से नहीं बचाता, जितना स्वयं को बचाता है । समस्त भय और चिंता इच्छ…

आवाज़

एक झेन साधक की मृत्यु हुई । उसके आश्रम के निकट ही एक अंधा वृद्ध रहता था । साधक की शोकसभा में उसने कहा –
“मैं जन्म से अंधा हूँ । लोगो के चेहरे नहीं देख सकता । लेकिन उनकी भावनाएँ उनकी आवाज़ से पहचान पाता हूँ । आमतौर पर मैं जब किसी को बधाई देते सुनता हूँ, तो आवाज के पीछे छिपी ईर्ष्या की गूँज भी मुझे सुनाई देती है । जब किसी को सांत्वना देते हुए सुनता हूँ तो छिपी हुई खुशी भी मुझ से बच नहीं पाती, कि चलो यह दु:ख हमें तो नहीं है । पर इस साधक को मैंने जब भी सुना, वह वही था, जो वह कह रहा था । जब यह बधाई देता था तो अंदर से बाहर तक खुश होता था । जब दु:ख जताता था तो सचमुच दु:खी होता था । “

शैले की जीवनोपयोगी उक्तियाँ

• अधिकार विनाशकारी प्लेग के समान है; जिसे छूता है नष्ट कर देता है ।


• कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्-गार है ।


• जिस प्रकार एक निराश चोर चोरों को पकड़नेवाला बन जाता है, उसी प्रकार निराश होकर लेखक आलोचक बन जाते हैं ।


• आत्मा का आनंद कर्मशीलता में है ।


• कवि दु:खों से सीखते हैं और गीतों से सिखाते हैं ।


• जितना ही हम अध्ययन करते हैं,उतना ही हमको अपने अज्ञान का आभास होता जाता है ।


• कवि विश्व के अस्वीकृत व्यवस्थापक हैं ।


• जीवन अनंतकाल के श्वेत प्रकाश को रंग-बिरंगे शीशे के गुम्बज के सदृश रंग देता है ।

दमन

आज फिर हम ओशो के एक प्रवचन से चुनी हुई कहानी को प्रस्तुत कर रहें हैं । यह कहानी दमन और संयम के सही अर्थ खोलती है ।
दमन एक संध्या दो भिक्षु किसी पहाड़ी नदी को पार करते थे । एक था वृद्ध संन्यासी, दूसरा युवा । वृद्ध आगे था, युवा पीछे । नदी तट पर एक युवती खड़ी थी । वह भी नदी पार करना चाहती थी । किंतु अपरिचित पहाड़ी नदी थी और तीव्र उसका प्रवाह था । युवती उतरने का साहस नहीं कर पा रही थी । वृद्ध संन्यासी उसके निकट आया तो उसकी दुविधा देख उसने सोचा कि उसे हाथ का सहारा दे दूँ । लेकिन यह क्या ? हाथ का सहारा देने के विचार के आते ही, जैसे कोई सोया सर्प अचानक फन उठा ले ऐसे ही काम-वासना उसके रोयें-रोयें में कांप गई । शरीर वृद्ध था, पर वासना अभी भी युवा थी । विकारों को दबाया था, पर वे मौजूद थे । दमन के अनेक वर्ष एकदम विलीन हो गए । बहुत तप संघर्ष किया था, उसकी कोई रेखा भी शेष न रही ।
यह क्या हुआ ? क्या सब श्रम जल पर रेखाएँ खींचने जैसा ही व्यर्थ नहीं हो गया था ? वह अपने से ही भयभीत वृद्ध आंखें नीचे झुकाकर नदी पार करने लगा । पर आंखे झुकाने या बंद करने से तो कुछ होता नहीं है । स्त्री या पुरुष बाहर नहीं हैं,…