मंगलवार, 31 अगस्त 2010

स्थिरता और परिवर्तन

स्थिरता का अनुभव किए बगैर परिवर्तन को समझना कठिन है ।-मनोज भारती

शनिवार, 28 अगस्त 2010

पुस्तकें और ज्ञान

एक जिज्ञासु साधक था । वह ध्यान (झेन) साधना की तीव्र उत्कंठा से भरा हुआ था । वह जगह-जगह घूमा और ध्यान के संबंध में जितनी भी जानकारियाँ हो सकती थी, वे सब इकट्ठी कर ली । वर्षों तक उसने झेन का अध्ययन किया । हजारों किताबे उसके घर में इकट्ठी हो गई । उन किताबों को अनेकों बार वह पढ़ चुका था ।झेन के एक बड़े विद्वान के रूप में उसकी ख्याति भी हो गई । लोग दूर-दूर से उससे ध्यान के संबंध में जानने के लिए आने लगे । वह अनेक साधकों और जिज्ञासुओं के संपर्क में था । निरंतर ध्यान के संबंध में नई-नई विधियाँ ढ़ूँढ़ता और उन्हें आजमाता । अपने अनुभव को लिखता । अंतत: एक दिन उसे परम ज्ञान उपलब्ध हो गया । 

उस दिन उसने सब किताबों को आग लगा दी और घर से दूर कहीं चला गया । 

क्यों ???

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

सत्य और भ्रम

जानने से जो व्यर्थ हो जाए, वह भ्रम है । जानने से जो और भी सार्थक होने लगे, वह सत्य है । -ओशो

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

कूटनीति और सत्य

कूटनीति में सूक्ष्म अपराध छिपा रहता है । कूटनीति और सत्य का परस्पर गठबंधन नहीं हो सकता । जहां कूटनीति है वहां सत्य नहीं हो सकता । - मनोज भारती

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

सुधारना व स्वतंत्रता

दूसरे को सुधारने की कोशिश, उसकी स्वतंत्रता का हनन है । - मनोज भारती

सोमवार, 23 अगस्त 2010

एकाकी जीवन

कुछ व्यक्तियों के भाग्य में एकाकी जीवन लिखा रहता है ; ताकि वे समूह के लिए कुछ चिंतन, मनन कर सकें । -मनोज भारती 

रविवार, 22 अगस्त 2010

गुटबंदी और ख्याति

निकम्मे लोग गुटबंदियों और हेराफेरी से सामयिक ख्याति शीघ्र प्राप्त कर लेते हैं । इसके विपरीत्त बुद्धिजीवी को ख्याति प्राप्त करने के लिए घोर संग्राम करना पड़ता है । - इलाचंद्र जोशी

शनिवार, 21 अगस्त 2010

मौन की साधना








मौन की साधना

कभी आप स्वयं को एक एकांत कमरे में बंद करके चुपचाप बैठ जाइए और अपने अंदर झांकने की कोशिश कीजिए । आप वहां क्या पाते हैं ? एक असंगत विचारों की धारा । कभी आपको अपनी प्रेयसी का ख्याल आता है, तो कभी आप अचानक स्वयं को सफलता के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई पड़ते हैं । आपका मन निरंतर पेंडूलम की तरह एक अति से दूसरी अति पर डोलता दिखाई पड़ेगा । कभी अतीत के झरोखों में तो कभी भविष्य के गर्भ में मन खो जाएगा । क्या इन विचारों की भीड़ में आपको स्वयं का चेहरा कभी दिखाई पड़ता है, जो स्वयं आपका अपना हो ? शायद नहीं । क्या कभी आपने स्वयं को पहचानने की कोशिश की है ? क्या आपके मन में जीवन के प्रश्न उठते हैं ? यदि हाँ, तो संभवत: आपको मौन होने की कला सीखनी चाहिए ।

मौन होने से अभिप्राय:

मौन होने का अर्थ क्या है ? क्या जब आप अपने मुँह से कुछ नहीं बोल रहे होते हैं, तो क्या आप मौन में हैं ? या जब आप एकांत में बैठे हैं, तो क्या आप मौन हैं ? या जब आप दुसरों से मौखिक प्रतिक्रुया नहीं कर रहे, तब क्या आप मौन हैं ? मौन से आशय क्या है ?
मौन से अभिप्राय: मन की उस दशा से है, जब मन में विचारों का कोई प्रवाह नहीं होता । वहाँ एक शांति होती है । उस दशा में मन न तो सुख का अनुभव करता है और न ही दुख का । वह एक निर्वचनीय दशा होती है । वस्तुत: वह दशा आनंद की होती है । उस दशा में आप साक्षीत्व में होते हैं । यह दशा मन की शून्य अवस्था कहलाती है । इस दशा में आपका आपसे साक्षात्कार होता है । आप विशुद्ध रूप से जानते हैं कि आप कौन हैं । वहां आप घटनाओं के साक्षी तो बनते हैं, लेकिन उनसे स्वयं अस्पर्शित रहते हैं । आपकी स्थिति कमलवत हो जाती है । आप घटनाओं से उद्वेलित नहीं होते, क्योंकि आप जानते हैं कि घटनाएँ अलग हैं और आप अलग हैं ।

क्या यह इतना आसान है ?

आप संभवत: कभी खाली नहीं रहे । आप अपने घर (मन) के मालिक कभी नहीं बने । आपने दूसरों के विचारों से अपने घर (मन) को सजाया है । इसलिए आप अपने घर को ही नहीं जानते । इसलिए पहली नजर में संभवत: आपको लगे कि मौन होना केवल साधु, संन्नयासियों व तपस्वियों का काम है । संसार में रहते हुए ऐसा संभव नहीं । लेकिन यह विचार भी आपके मन की एक तरंग से ज्यादा नहीं है । कल्पना कीजिए एक ऐसे घर की जिसके मालिक ने अपने घर को सजाने के लिए इतना अधिक सामान एकत्रित कर लिया है कि उसके स्वयं के रहने के लिए घर में कोई जगह ही न बची हो । संभवत: हमने भी अपने मन को इसी प्रकार विचारों से भर लिया है और उसमें स्वयं हमारे लिए कोई जगह नहीं बची है और उनसे परे हम स्वयं को विचारों से रहित देखने की कल्पना भी नहीं कर सकते । क्या आप अपने घर में ऐसी वस्तु को रखना पसंद करेंगे, जिसे आप अपनी इच्छा से घर में प्रवेश तो दे सकें लेकिन अपनी इच्छा से उसे घर से बाहर न निकाल सकें । संभवत: नहीं ।

नहीं, यह कठिन नहीं है । लेकिन बाहर के प्रवाह के विपरीत्त अवश्य है । यदि आप वास्तव में ही अपने घर के स्वामी बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको अपने घर के अंदर आना होगा और वहां अपने रहने के लिए जगह खाली करनी होगी । नि:संदेह उधार के किरायेदार को घर से निकालना थोड़ा कठिन अवश्य होगा पर असंभव नहीं ।

तब आप क्या करें ?

आप चीजों को जाने अनजाने पसंद करते हैं । आपकी पसंद आपके मन में एक विशेष तरह का राग रखती है, यह राग ही संसार का बंधन बनता है । आपकी पसंद के कारण ही आपके विश्वास बनते हैं । कुछ विश्वास आप समाज, शिक्षा, संस्कृति से सीखते हैं । लेकिन यह सब आप नहीं हैं । आप इनके परे कुछ हैं जो इन सबको घटित होते हुए देखता है । यह देखने वाला तत्व ही महत्वपूर्ण है । वस्तुत: आपको इसे पाने के लिए कुछ करना नहीं है । बल्कि तटस्थ होकर यह देखना है कि आप क्या हैं और क्या नहीं हैं ? जो आप नहीं हैं उन चीजों को अपने से अलग हटा कर रख देना है । लेकिन पूरी ईमानदारी के साथ । इस प्रक्रिया में अगर आप बाहर मौन रहते हैं व अंदर तटस्थ रहते हैं तो धीरे-धीरे आप अपने अंदर अवकाश बनाने में सफल हो जाएंगे । आरंभ में आपको कुछ खालीपन लगेगा, लेकिन इस खालीपन से घबरा कर साधना मत छोड़े । आपका अपने तथाकथित विचारों से तादात्म्य टूटेगा । कई बार आप अपने को नितांत अकेला अनुभव करेंगे । बहुत बार आपको लगेगा कि आप लोगों की नजरों में पागल हो गए हैं, लेकिन वस्तुत: आप पागलपन से दूर की यात्रा पर होंगे । यदि आप निरंतर चीजों को बिना किसी हस्तक्षेप के देखते रहे, बिना किसी पक्षपात के, कि वे अच्छी हैं या बुरी तो एक दिन अवश्य ही मौन में चले जाएंगे । 

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

निष्फल प्रेम

निष्फल प्रेम जिंदगी में जितना कुछ दे जाता है, उतना सफल प्रेम नहीं । - मनोज भारती

सोमवार, 16 अगस्त 2010

विद्वान,पंडित और पुरोहित

विद्वान : विद्वान वह है जो द्वैत के भेद का ज्ञान रखता है । जो चीजों को टूकड़ों में तोड़-तोड़ कर समझता है और समझाता है । वह द्वैत का विज्ञानी होता है। बिरले ही विद्वान होते हैं जो अद्वैत का अनुभव रखते हैं । 

पंडित : पंडित शास्त्र का जानकार होता है लेकिन स्वयं का अनुभव रखे यह जरूरी नहीं । उसका ज्ञान उधार का ज्ञान होता है । 

पुरोहित : पुरोहित शास्त्र सम्मत विधि द्वारा  और  पूर्वजों के दिखाए मार्ग पर चलते हुए नागरिकों के हित के लिए यज्ञ आदि अनुष्ठान संपन्न करता है । पुरोहित को परम्परा निर्वाह में ही ज्ञान दिखाई पड़ता है । 

रविवार, 15 अगस्त 2010

परिवार व एकता

जब एक ही परिवार में चारों वर्णों  के व्यक्ति पैदा हो जाएं, तो उस परिवार की एकता खतरे में पड़ जाती है । - मनोज भारती

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

स्त्री

पुरुष जितना स्त्री से सीख सकता है,उतना किसी और से नहीं । - मनोज भारती

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

दोस्ती

जब दो व्यक्तियों के बीच दो का भाव अस्त होता है, तो दोस्ती का उदय होता है । - मनोज भारती

रविवार, 8 अगस्त 2010

भारत दुर्दशा

भारत गाँवों में बसता है । यह तथ्य आज भी उतना ही सही है जितना कि आजादी से पहले । अभी राजस्थान के कुछ गाँवों और एक दो छोटे शहरों में जाना हुआ । तो पाया कि शहरी और ग्रामीण जीवन में बहुत असमानताएँ हैं । भारत के बड़े शहरों में जन जीवन की सामान्य सुविधाएँ सरलता से उपलब्ध हैं । लेकिन गाँवों व छोटे कस्बों में जन जीवन को सामान्य सुविधाओं के लिए बड़ा श्रम करना पड़ता है । मैंने देखा कि गाँवों में पीने के पानी की समस्या आम है । खेतड़ी (ताँबे की खानों के लिए प्रसिद्ध) सिंघाना, नारनौल जैसे छोटे शहर में पानी की किल्लत है । घर के सदस्यों विशेषत: गृहणियों व बच्चों को सुबह-सुबह घर के बाहर पानी के लिए घंटों श्रम करना पड़ता है । सुबह-सुबह का यह नजारा हर घर को पनघट में बदल देता है । पानी बहुत कम समय के लिए आता है और वह भी अनियमित । छोटे बच्चे स्कूल जाने के बजाय पानी भरते नजर आते हैं । गाँवों में भी स्थिति ऐसी ही है । पानी की सप्लाई या तो बंद है या बहुत कम समय के लिए । पानी टैंकरों से मोल खरीदा जा रहा है ।

स्कूलों के लिए बने भवनों की हालत जर्जर है ,वहीं कुछ स्कूल खुले में भी चल रहें हैं । अध्यापकों की कमी तो स्कूलों की आम समस्या है । स्कूलों में बच्चों व अध्यापकों का ध्यान पढ़ाई की ओर कम और दोपहर के भोजन की तैयारी की ओर अधिक रहता है ।

हमारे कल के भविष्य, गाँवों में बसने वाले बच्चों का भविष्य अंधकारमय लगता है । बहुत कम बच्चे हैं जो इन ग्रामीण परिस्थितियों का सामना करते हुए मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर पाते हैं । उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले ग्रामीण लोगों का प्रतिशत तो बहुत ही कम है । फिर इनकी शिक्षा हिंदी माध्यम से होने के कारण, ये शहरी कान्वेन्ट स्कूलों में पढ़े बच्चों के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में पिछड़ जाते हैं और रोजगार की तलाश में भटकते-भटकते ओवर-एज़ हो जाते हैं ।

हमारा वास्तविक भारत जो गाँवों में बसता है, उसकी परवाह किसे हैं ? क्या गाँव व छोटे शहरों की इन समस्याओं की ओर प्रशासन व सरकार का ध्यान नहीं है ? या फिर हमारा ग्रामीण नागरिक इन समस्याओं से झूझने के लिए यूं ही मजबूर बना रहेगा । सचमुच भारत के गाँवों में लोग जिन हालातों में रह रहें हैं वह बहुत ही सोचनीय है और भारत की दुर्दशा को ब्यां कर रहा है ।