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August, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पुस्तकें और ज्ञान

एक जिज्ञासु साधक था । वह ध्यान (झेन) साधना की तीव्र उत्कंठा से भरा हुआ था । वह जगह-जगह घूमा और ध्यान के संबंध में जितनी भी जानकारियाँ हो सकती थी, वे सब इकट्ठी कर ली । वर्षों तक उसने झेन का अध्ययन किया । हजारों किताबे उसके घर में इकट्ठी हो गई । उन किताबों को अनेकों बार वह पढ़ चुका था ।झेन के एक बड़े विद्वान के रूप में उसकी ख्याति भी हो गई । लोग दूर-दूर से उससे ध्यान के संबंध में जानने के लिए आने लगे । वह अनेक साधकों और जिज्ञासुओं के संपर्क में था । निरंतर ध्यान के संबंध में नई-नई विधियाँ ढ़ूँढ़ता और उन्हें आजमाता । अपने अनुभव को लिखता । अंतत: एक दिन उसे परम ज्ञान उपलब्ध हो गया । 
उस दिन उसने सब किताबों को आग लगा दी और घर से दूर कहीं चला गया । 
क्यों ???

कूटनीति और सत्य

कूटनीति में सूक्ष्म अपराध छिपा रहता है । कूटनीति और सत्य का परस्पर गठबंधन नहीं हो सकता । जहां कूटनीति है वहां सत्य नहीं हो सकता । - मनोज भारती

एकाकी जीवन

कुछ व्यक्तियों के भाग्य में एकाकी जीवन लिखा रहता है ; ताकि वे समूह के लिए कुछ चिंतन, मनन कर सकें । -मनोज भारती

गुटबंदी और ख्याति

निकम्मे लोग गुटबंदियों और हेराफेरी से सामयिक ख्याति शीघ्र प्राप्त कर लेते हैं । इसके विपरीत्त बुद्धिजीवी को ख्याति प्राप्त करने के लिए घोर संग्राम करना पड़ता है । - इलाचंद्र जोशी

मौन की साधना

मौन की साधना
कभी आप स्वयं को एक एकांत कमरे में बंद करके चुपचाप बैठ जाइए और अपने अंदर झांकने की कोशिश कीजिए । आप वहां क्या पाते हैं ? एक असंगत विचारों की धारा । कभी आपको अपनी प्रेयसी का ख्याल आता है, तो कभी आप अचानक स्वयं को सफलता के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई पड़ते हैं । आपका मन निरंतर पेंडूलम की तरह एक अति से दूसरी अति पर डोलता दिखाई पड़ेगा । कभी अतीत के झरोखों में तो कभी भविष्य के गर्भ में मन खो जाएगा । क्या इन विचारों की भीड़ में आपको स्वयं का चेहरा कभी दिखाई पड़ता है, जो स्वयं आपका अपना हो ? शायद नहीं । क्या कभी आपने स्वयं को पहचानने की कोशिश की है ? क्या आपके मन में जीवन के प्रश्न उठते हैं ? यदि हाँ, तो संभवत: आपको मौन होने की कला सीखनी चाहिए ।
मौन होने से अभिप्राय:

मौन होने का अर्थ क्या है ? क्या जब आप अपने मुँह से कुछ नहीं बोल रहे होते हैं, तो क्या आप मौन में हैं ? या जब आप एकांत में बैठे हैं, तो क्या आप मौन हैं ? या जब आप दुसरों से मौखिक प्रतिक्रुया नहीं कर रहे, तब क्या आप मौन हैं ? मौन से आशय क्या है ? मौन से अभिप्राय: मन की उस दशा से है, जब मन में विचारों का कोई प्रवाह नहीं ह…

विद्वान,पंडित और पुरोहित

विद्वान : विद्वान वह है जो द्वैत के भेद का ज्ञान रखता है । जो चीजों को टूकड़ों में तोड़-तोड़ कर समझता है और समझाता है । वह द्वैत का विज्ञानी होता है। बिरले ही विद्वान होते हैं जो अद्वैत का अनुभव रखते हैं । 
पंडित : पंडित शास्त्र का जानकार होता है लेकिन स्वयं का अनुभव रखे यह जरूरी नहीं । उसका ज्ञान उधार का ज्ञान होता है । 
पुरोहित : पुरोहित शास्त्र सम्मत विधि द्वारा  और  पूर्वजों के दिखाए मार्ग पर चलते हुए नागरिकों के हित के लिए यज्ञ आदि अनुष्ठान संपन्न करता है । पुरोहित को परम्परा निर्वाह में ही ज्ञान दिखाई पड़ता है ।

परिवार व एकता

जब एक ही परिवार में चारों वर्णों  के व्यक्ति पैदा हो जाएं, तो उस परिवार की एकता खतरे में पड़ जाती है । - मनोज भारती

भारत दुर्दशा

भारत गाँवों में बसता है । यह तथ्य आज भी उतना ही सही है जितना कि आजादी से पहले । अभी राजस्थान के कुछ गाँवों और एक दो छोटे शहरों में जाना हुआ । तो पाया कि शहरी और ग्रामीण जीवन में बहुत असमानताएँ हैं । भारत के बड़े शहरों में जन जीवन की सामान्य सुविधाएँ सरलता से उपलब्ध हैं । लेकिन गाँवों व छोटे कस्बों में जन जीवन को सामान्य सुविधाओं के लिए बड़ा श्रम करना पड़ता है । मैंने देखा कि गाँवों में पीने के पानी की समस्या आम है । खेतड़ी (ताँबे की खानों के लिए प्रसिद्ध) सिंघाना, नारनौल जैसे छोटे शहर में पानी की किल्लत है । घर के सदस्यों विशेषत: गृहणियों व बच्चों को सुबह-सुबह घर के बाहर पानी के लिए घंटों श्रम करना पड़ता है । सुबह-सुबह का यह नजारा हर घर को पनघट में बदल देता है । पानी बहुत कम समय के लिए आता है और वह भी अनियमित । छोटे बच्चे स्कूल जाने के बजाय पानी भरते नजर आते हैं । गाँवों में भी स्थिति ऐसी ही है । पानी की सप्लाई या तो बंद है या बहुत कम समय के लिए । पानी टैंकरों से मोल खरीदा जा रहा है ।
स्कूलों के लिए बने भवनों की हालत जर्जर है ,वहीं कुछ स्कूल खुले में भी चल रहें हैं । अध्यापकों की कमी त…