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हँसता हुआ बुद्ध

जब से भारत में चॉईनीज़ बाजार का जोर पकड़ा है, भारत में चॉईनीज़ वास्तु, फेंग्सुई, विंड चॉईम के साथ-साथ हँसते हुए बुद्ध यानी लॉफिंग बुद्धा भी बहुत प्रचारित हो गए हैं । हँसते हुए मुख, थुलथुल शरीर और पीठ पर बड़ी सी पोटली को लटकाए इस लॉफ़िंग बुद्धा की मूर्ति आजकल भारत के हर तीसरे घर और बाजार में गिफ्ट शॉपस पर दिखाई पड़ जाती है । जो समृद्धि व खुशहाली का प्रतीक है । 
बहुत कम लोग जानते हैं कि लॉफिंग बुद्धा वास्तव में कौन हैं । वस्तुत: वह एक झेन साधक था । जिसका जन्म चीन के ताँग साम्राज्य में हुआ  और जिसका वास्तविक नाम होतेई था । लेकिन उसमें गुरु होने की जरा भी इच्छा न थी । वह नहीं चाहता था कि वह किसी आश्रम में रहे और चेले बनाए । वह तो एक बड़ी सी पोटली पीठ पर लादे, गलियों में यायावर की तरह घूमता रहता । उसकी इस पोटली में सूखे-मेवे, टॉफियाँ, फल आदि भरे रहते थे । वह इन्हें उपहार स्वरूप उन बच्चों में बाँटता रहता था, जो खेल-खेल में उसके चारों ओर इकट्ठा हो जाते थे । यह कृत्य कुछ-कुछ सैंटा से मिलता-जुलता है ।
होतेई जब भी किसी झेन साधक से मिलता, तो अपना हाथ पसार कर एक पेनी देने का अनुरोध करता । एक बार हो…

अनाड़ी हाथ

झेन आश्रमों में चाय बनाना और उसे पीना भी ध्यान की एक विशेष विधि है । वस्तुत: यह" कार्य करते हुए ध्यान" का एक अनूठा प्रयोग है । साधक एक-एक चीज़ होशपूर्ण ढंग से करता है । चुल्हे का जलाना, उस पर चाय की केतली रखना, उसमें पानी डालना, उसे उबलते हुए देखना, उसमें विशेष मात्रा में चाय की पत्तियाँ उँडेलना, दूध डालना और फिर चाय की महक को महसूस करना और फिर विशेष ढंग से बने नाजुक प्यालों में चाय को डालना और फिर उसकी धीरे-धीरे करके चुस्कियाँ लेना । इस पूरे उपक्रम में साधक घंटों व्यतीत करते हैं । यह उनका चाय ध्यान होता है । 
एक बार ऐसे ही चाय-ध्यान के अवसर पर  एक वरिष्ठ साधक एक नवीन साधक के साथ था । चाय  के नाजुक प्याले को पकड़ते हुए, उसने वरिष्ठ साधक से पूछा, "ये चाय के प्याले इतने नाजुक क्यों बनाए जाते हैं कि जरा-सी चूक होते ही टूट जाएँ ।" 
वरिष्ठ साधक ने कहा," प्याले नाजुक नहीं होते, जिन हाथों में प्याले टूटते हैं, वे अनाड़ी होते हैं ।"

ज्ञान की बत्ती

"तेन्दई" बौद्ध-दर्शन की एक दार्शनिक विचारधारा है । इसी विचारधारा का एक दार्शनिक झेन का ज्ञान हासिल करना चाहता था । वह इस उद्देश्य से झेन-गुरु "गासन" के आश्रम में आ कर ठहरा । कुछ वर्ष आश्रम में रहकर उसने झेन का अध्ययन किया । झेन पद्धति के संबंध में तथ्यों को एकत्रित किया । जब वह आश्रम से लौटने लगा तो गासन ने उसे सचेत किया, "सत्य की दार्शनिक विवेचना संबंधी सामग्री इकट्ठा करना एक उपयोगी कार्य हो सकता है, लेकिन याद रखना, अगर तुमने नियमित रूप से ध्यान नहीं किया तो तुम्हारे दार्शनिक-ज्ञान की बत्ती कभी भी गुल हो सकती है ।"