रविवार, 26 जून 2011

ओशो की डायरी से:5:

  • यह सत्य है कि मनुष्य अब पशु नहीं है;लेकिन क्या यह भी सत्य है कि मनुष्य,मनुष्य हो गया है? पशु होना अतीत की घटना हो गई है पर मनुष्य होना अभी भी भविष्य की संभावना है।शायद हम मध्य में हैं और यही हमारी पीड़ा है,यही हमारा तनाव है,यही हमारा संताप है। जो प्रयास करते हैं और स्वयं के इस पीड़ा-अस्तित्व से असंतुष्ट होते हैं,वे ही मनुष्य हो पाते हैं।मनुष्यता मिली हुई नहीं है,उसे हमें स्वयं ही स्वयं में जन्म देना होता है। लेकिन मनुष्य होने के लिए यह आवश्यक है कि हम पशु न होने को ही मनुष्य होना न समझ लें और जो हैं उससे तुष्ट न हो जावें। स्वयं से गहरा और तीव्र असंतोष ही विकास बनता है।
  • मैं तथाकथित शिक्षा से कितना पीड़ित हुआ हूं,कैसे बताऊं? सिखाया हुआ ज्ञान,विचार की शक्ति को तो नष्ट ही कर देता है। विचारों की भीड़ में विचार की शक्ति तो दब ही जाती है। स्मृति प्रशिक्षित हो जाती है और ज्ञान के स्रोत अविकसित ही रह जाते हैं। फिर यह प्रशिक्षित स्मृति ही ज्ञान का भ्रम देने लगती है। इस तथाकथित शिक्षा में शिक्षित व्यक्ति को नए सिरे से ही विचार करना सीखना होता है। उसे फिर से अशिक्षित होना पड़ता है। यही मुझे भी करना पड़ा और यह कार्य अति कठिन था। वस्त्र उतार कर रखने जैसा नहीं,वरन् स्वयं की चमड़ी उतार कर रखने जैसी कठिनाई थी। पर यह जरूरी था। उसके बिना कोई राह ही नहीं थी। अपने ही ढ़ंग से जीवन को देखने के लिए आवश्यक था कि जो भी मैं सीखा हूँ और सिखाया गया हूं,उसे भूल जाऊं। अपनी ही दृष्टि पाने के लिए दूसरों की दृष्टियां विस्मृत करनी आवश्यक थी। स्वयं के विचार को पाने के लिए औरों के विचार से मुक्त हो जाना जरूरी है। जिसे अपने पैरों से चलना सीखना हो,उसे दूसरों के कंधे का सहारा छोड़ ही देना चाहिए। स्वयं की आंखें तभी खुलती हैं,जब हम दूसरों की आंखों से देखना बंद कर देते हैं। और स्मरण रहे कि दूसरों की आंखों से देखने वाला व्यक्ति अंधे व्यक्ति से भी ज्यादा अंधा होता है।
  • जीवन में जो भी गति है,जो विकास है,जो भी ऊंचाइयों का स्पर्श है, वह सब दु:साहस से आता है। दु:साहस का अर्थ है :असुरक्षा को आमंत्रण,अपरिचित और अज्ञात से प्रेम,जोखिम का आनंद। खतरे उठाने की और खतरों को प्रेम करने की जिसकी तैयारी नहीं है,वह जीता है लेकिन जीवन को नहीं पाता है। और सबसे बड़ा दु:साहस क्या है? परमात्मा की खोज। सबसे बड़ा दु:साहस है,क्योंकि परमात्मा की दिशा से अधिक असुरक्षित और कौन सी दिशा है? क्योंकि, परमात्मा से अधिक अपरिचित,अज्ञात और अज्ञेय और क्या है? क्योंकि,परमात्मा की खोज से बड़ा दांव,जुआ और जोखिम कौन सा है? इससे मैं कहता हुं कि दु:साहस सबसे बड़ा धार्मिक गुण है। जिसमें दु:साहस नहीं है,वह धर्म के लिए नहीं है,धर्म उसके लिए नहीं है।
  • सत्यानुभूति न तो विचार है,न भावना है। वह तो समस्त प्राणों का- तुम्हारी समस्त सत्ता का आंदोलित और स्पंदित हो उठना है। वह तुममें नहीं होती,वरन् तुम ही उसमें होते हो। वह तो तुम्हारा स्वरूप है। वह अनुभव ही नहीं,स्वयं तुम ही हो। और मात्र तुम ही नहीं हो,तुम से भी ज्यादा वह है,क्योंकि उसमें सर्व की सत्ता भी समाहित है।
  • क्या तुम इतने दरिद्र हो कि धर्म भी तुम्हारे पास नहीं है? धन की दरिद्रता बहुत बड़ी बात नहीं है। असली दरिद्रता तो धर्म की दरिद्रता है। धन रहते भी लोग दरिद्र बने रहते हैं,लेकिन जिसके पास धर्म की संपदा होती है,उसकी दरिद्रता सदा-सदा के लिए नष्ट हो जाती है। मनुष्य के जीवन में - पूरी मनुष्यता के जीवन में भी सबसे बड़ी घटना उसकी भौतिक सफलताएं या साम्राज्यों का निर्माण नहीं है,बल्कि इस संपदा की खोज और उपलब्धि है; जो कि उसके ही भीतर छिपी है। उस संपदा को ही मैं धर्म कहता हूं। जो संपदा बाहर है,वह धन है और जो संपदा भीतर है वह धर्म है। धन को चुनने वाले अंतत: दरिद्रता को,और धर्म को चुनने वाले अंतत: वास्तविक धन को चुनने वाले सिद्ध होते हैं।
  • एक घर में गया था। वहां वीणा रखी थी। मैंने कहा: मनुष्य का मन भी वीणा की भांति है। वह तो साधन है। उसमें संगीत और विसंगीत दोनों ही पैदा हो सकते हैं। और जो भी हम उसमें पैदा करेंगे,उसकी जिम्मेवारी हमारे अतिरिक्त और किसी पर नहीं होगी। अपने मन को संगीत का साधन बनाएं और सत्य का। उसे स्वतंत्र रखें और सच्चा। और अंहकार से मुक्त रखें,क्योंकि अहंकार से अधिक विसंगति पैदा करने वाला और कोई तत्व नहीं है। सत्य के निकट वही पहुंच पाता है जो स्वयं के भीतर संगीतपूर्ण होता है। मात्र बुद्धिमान नहीं,बल्कि समग्र रूपेण जिनका व्यक्तित्व संगीतपूर्ण है, वे ही सत्य के सर्वाधिक निकट पहुंचते हैं।
  • मैं तुम्हें मंत्रों को दुहराते देखता हूं,कंठस्थ शब्दों और शास्त्रों की पुनरुक्ति करते देखता हूं,तो मेरा हृदय दया और सहानुभुति से भर जाता है। यह तुम क्या कर रहे हो? क्या अपने को भुलाने और विस्मरण करने और आत्मसम्मोहन के द्वारा निद्रा में जाने को ही तुमने धर्म और साधना समझा हुआ है? निश्चय ही मंत्रों का उच्चार और शब्दों का जप चित्त को सुखद निद्रा में सुलाने में समर्थ है, लेकिन निद्रा को समाधि मत समझ लेना। मित्र, सुषुप्ति और समाधि में बहुत भेद है। आत्म सम्मोहन जनित सुषुप्ति में अनुभव भी घटित होते हैं,लेकिन वे सब स्वप्नों से ज्यादा नहीं हैं और उन्हें हमारा मन ही प्रक्षिप्त करता है। फिर ये स्वप्न चाहे कितने ही सुखद और संतुष्टिदायी हो,सुख और संतोष के कारण सत्य नहीं हो जाते हैं। पर साधारणत: हम सत्य को नहीं,संतोष को ही खोजते हैं और इसलिए किसी भी भ्रम में हमारा उलझ जाना बहुत आसान है। संतोष को खोजने वाला मन किसी भी रूप में पैदा हुई मादकता से तृप्त हो सकता है- किसी भी भांति का आत्म-विस्मरण उसे तृप्ति दे सकता है और तथाकथित मंत्र-जप और एकाग्रताओं के द्वारा आत्म-विस्मरण संभव हो जाता है। किसी भी भांति की सतत पुनरुक्ति चेतना को मूर्च्छित करती है,जबकि धर्म का संबंध मूर्च्छा से नहीं, अमूर्च्छा से है।
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रविवार, 19 जून 2011

ओशो की डायरी से :4:


  • समाधि में क्या जाना जाता है? कुछ भी नहीं। जहां तक जानने को कुछ भी शेष है,वहां समाधि नहीं है। समाधि सत्ता के साथ एकता है- जानने जितनी भी दूरी वहां नहीं है।
  • संसार में संसार के होकर न रहना संन्यास है। पर बहुत बार संन्यास का अर्थ उन तीन बंदरों की भांति लगा लिया जाता है जो कि बुरे दृश्यों से बचने के लिए आंख बंद किए हैं और बुरी ध्वनियों से बचने के लिए कान और बुरी वाणी से बचने के लिए मुख। बंदरों के लिए तो यह क्षम्य है लेकिन मनुष्यों के लिए अत्यंत हास्यास्पद। भय के कारण संसार से पलायन मुक्ति नहीं वरन् एक अत्यंत सूक्ष्म और गहरा बंधन है। संसार से भागना नहीं,स्वयं के प्रति जागना है। भागने में भय है, जागने में अभय की उपलब्धि। ज्ञान से प्राप्त अभय के अतिरिक्त और कुछ भी मुक्त नहीं करता। 
  • क्या निर्वाण और मोक्ष भी चाहा जा सकता है? निर्वाण को चाहने से अधिक असंगत बात और कोई नहीं है, क्योंकि जहां कोई चाह नहीं है, वहीं निर्वाण है। चाह ही अमुक्ति है तो मोक्ष कैसे चाहा जा सकता है? किंतु मोक्ष को चाहने वाले व्यक्ति भी हैं और तब स्वाभाविक ही है कि उनका तथाकथित संन्यास भी बंधन का एक रूप हो और संसार का ही एक अंग। निर्वाण तो उस समय सहज ही,अनचाहा ही,अनपेक्षित ही उपलब्ध होता है,जबकि चाह की व्यर्थता को उसके दु:ख स्वरूप और बंधन को, उनके समस्त सूक्ष्म रूपों में जान और पहचान लिया जाता है। चाह की व्यर्थ दौड़ के दर्शन होते ही वह दौड़ चली जाती है। उसका संपूर्ण ज्ञान ही उससे मुक्ति है और तब जो शेष रह जाता है वही निर्वाण है। 
  • हम दु:खी हैं, हमारा युग दु:खी है। कारण क्या है? कारण है कि हम जानते तो बहुत हैं,लेकिन अनुभव कुछ भी नहीं करते हैं। मनुष्य में मस्तिष्क ही मस्तिष्क रह गया है और हृदय विलीन हो गया है। जबकि वास्तविक ज्ञान मात्र जानने में नहीं वरन् अनुभव करने में प्राप्त होता है और वे आंखें जो कि जीवन पथ को आलोकित करती हैं,मस्तिष्क की नहीं हृदय की होती हैं। हृदय अंधा हो तो जीवन में अंधकार बिलकुल ही स्वाभाविक है। 
  • बुद्धि में अर्थ हो सकता है,अनुभूति नहीं। अनुभूति तो प्राणों के प्राण हृदय में होती है और अनुभूति शून्य अर्थ मृत्यु होता है। ऐसे मृत अर्थ और शब्द ही हमारे मस्तिष्कों में गूंज रहे हैं और उनके बोझ से हम पीड़ित हैं। वे हमें मुक्त नहीं करते,वरन् वे ही हमारे बंधन हैं। निर्भार और मुक्त होने के लिए तो हृदय की अनुभूति चाहिए। इसलिए मैं कहता हूँ कि सत्य का अर्थ और सत्य की व्याख्या मत खोजो। खोजो सत्य की अनुभुति और जीवन। सत्य में डूबो और स्मरण रखो कि जो अशेष भाव से सत्य में डूबते हैं,वे ही असत्य से उबर पाते हैं। बुद्धि ऊपर-ऊपर तैरती है, लेकिन हृदय तो पूरा ही डुबा देता है। बुद्धि नहीं,हृदय ही मार्ग है। 
  • सत्य के अनुभव और सत्य के संबंध में दिए गए वक्तव्यों में बहुत भेद है। वक्तव्य में हम वक्तव्य से बाहर होते हैं, लेकिन अनुभव में अनुभव के भीतर और अनुभव से एक। इसीलिए जिन्हें अनुभव है,उन्हें वक्तव्य देना असंभव ही हो जाता है। वक्तव्य की संभावना अनुभव के अभाव की द्योतक है। लोग मुझसे पूछते हैं: सत्य क्या है? मौन रह जाने के सिवाय मैं और क्या कह सकता हूँ? 
  • ज्ञान रहस्य की समाप्ति नहीं है। वस्तुत: ज्ञान के साथ ही रहस्य का संपूर्ण उद्-घाटन होता है और फिर तो सिर्फ रहस्य ही रहस्य रह जाता है। ज्ञान है रहस्य का बोध। रहस्य की स्वीकृति,रहस्य से मिलन,रहस्य के साथ आनंद-मंगल जीवन; रहस्य से, रहस्य में और हृदय द्वारा। जहां स्व तो मिट जाता है और मात्र रहस्य ही रह जाता है, जानना कि परमात्मा की पवित्र भूमि में प्रवेश हो गया है। और यह भी जानना कि स्व के मिट जाने से बड़ा कोई रहस्य नहीं है, क्योंकि स्व तो मिट जाता है लेकिन साथ ही स्वयं की सत्ता अपनी परिपूर्ण गरिमा में प्रकट भी हो जाती है। 

रविवार, 12 जून 2011

ओशो की डायरी से :3:


  • मैं खोजता था तो मौन से बड़ा कोई शास्त्र नहीं पा सका। और शास्त्र खोजे तो पाया कि शास्त्र व्यर्थ हैं, और मौन ही सार्थक है।
  • कहां जा रहे हो? जिसे खोजते हो,वह दूर नहीं निकट है।और जो निकट है,उसे पाने को यदि यात्रा की तो उसके पास नहीं,उसके दूर ही निकल जाओगे। ठहरो और देखो। निकट को पाने के लिए ठहरकर देखना ही पर्याप्त है। 
  • मुक्ति न तो प्रार्थना से पाई जाती है,न पूजा से, न धर्म-सिद्धांतों में विश्वास से। मुक्ति तो पाई जाती है अमूर्च्छित जीवन से। इसलिए मैं कहता हूँ कि प्रत्येक विचार और प्रत्येक कर्म में अमूर्च्छित होना ही प्रार्थना है,पूजा है और साधना है।
  • उसे सोचो जिसे कि तुम सोच ही नहीं सकते हो और तुम सोचने के बाहर हो जाओगे।सोचने के बाहर हो जाना ही स्वयं में आ जाना है।
  • जीवन के विरोध में निर्वाण मत खोजो।वरन जीवन को ही निर्वाण बनाने में लग जाओ। जो जानते हैं वे यही करते हैं। डो-झेन के प्यारे शब्द हैं- "मोक्ष के लिए कर्म मत करो,बल्कि समस्त कर्मों को ही मौका दो कि वे मुक्तिदायी बन जाएं।" यह हो जाता है, ऐसा मैं अपने अनुभव से कहता हूँ। और जिस दिन यह संभव होता है,उस दिन जीवन एक पूरे खिले हुए फूल की भांति सुंदर हो जाता है और सुवास से भर जाता है। 
  • क्या तुम ध्यान करना चाहते हो? तो ध्यान रखना कि ध्यान में न तो तुम्हारे सामने कुछ हो,न पीछे कुछ हो। अतीत को मिट जाने दो और भविष्य को भी। स्मृति और कल्पना- दोनों को शून्य होने दो। फिर न तो समय होगा और न आकाश होगा। उस क्षण जब कुछ भी नहीं होता है,तभी जानना कि तुम ध्यान में हो। महामृत्यु का यह क्षण ही नित्य जीवन का क्षण भी है।
  • ध्यान के लिए पूछते हो कि क्या करें? कुछ भी न करो- बस शांति से श्वास-प्रश्वास के प्रति जागो। होशपूर्वक श्वास पथ को देखो। श्वास के आने-जाने के साक्षी रहो। यह कोई श्रमपूर्ण चेष्टा न हो वरन् शांत और शिथिल- विश्रामपूर्ण बोधमात्र हो। और फिर तुम्हारे अनजाने ही, सहज और स्वाभाविक रूप से, एक अत्यंत प्रसादपूर्ण स्थिति में तुम्हारा प्रवेश होगा।इसका भी पता नहीं चलेगा कि कब तुम प्रविष्ट हो गए हो। अचानक ही तुम अनुभव करोगे कि तुम वहां हो जहां कि कभी नहीं थे।
  • मैं जो सीखा था,उसे भूला,तब उसे पा सका जो कि अकेला ही सीखने योग्य है, लेकिन सीखा नहीं जा सकता है। क्या सत्य को पाने के लिए सत्य के संबंध में जो सीखा है,उसे भुलने की तुम्हारी तैयारी है? यदि हाँ तो आओ सत्य के द्वार तुम्हारे लिए खुले हुए हैं। 
  • सत्य जाना तो जा सकता है,लेकिन न तो समझा जा सकता है और न समझाया ही जा सकता है। 
  • सत्य आकाश की भांति है- अनादि और अनंत और असीम। क्या आकाश में प्रवेश का कोई द्वार है? तब सत्य में भी कैसे हो सकता है? पर यदि हमारी आँखें ही बंद हों तो आकाश नहीं है और ऐसा ही सत्य के संबंध में भी है। आँखों का खुला होना ही द्वार है और आँखों का बंद होना ही द्वार का बंद होना है।