रविवार, 30 अक्तूबर 2011

पुरुषार्थ

पुरुषार्थ क्या है?
पुरुषार्थ हिंदू सामाजिक व्यवस्था का मनो-सामाजिक आधार है।हिंदू सामाजिक दर्शन के अंतर्गत प्रतिपादित पुरुषार्थ की अवधारणा,जीवन के प्रमुख लक्ष्य की व्याख्या करती है। इसके अंतर्गत चार पुरुषार्थ स्वीकृत हैं,जो मानव के उन चार लक्ष्य-स्तम्भों की ओर संकेत करते हैं,जिनकी प्राप्ति मानव जीवन के लिए अनिवार्य है। भारतीय दर्शन के अनुसार,मानव जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है।अर्थ तथा काम इस लक्ष्य तक पहुंचने के माध्यम हैं। इन माध्यमों का प्रयोग किस प्रकार किया जाय,इसे स्पष्ट करने वाला महानियम धर्म है। इस प्रकार हिंदू दर्शन ने मानव जीवन के लिए धर्म,अर्थ,काम व मोक्ष को स्वीकार किया है।हमारा स्पष्ट मत है कि"पुरुषार्थ व्यक्ति के होने का अर्थ सिद्ध करता है।"काम तो प्रत्येक मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।काम और अन्य जीवन आवश्यकताओं की पूर्ति तथा समाज की जीवन व्यवस्था का साधन है-अर्थ अर्थात धन। धर्म वह महानियम है जिसके नियंत्रण में काम और अर्थ का संयमित उपयोग होने पर जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष सहज ही प्राप्त हो जाता है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार,जिससे इस लोक में मनुष्य की उन्नति हो और परलोक में मुक्ति की प्राप्ति हो,वही धर्म है।धर्म,अर्थ और काम समूह को त्रिवर्ग कहा गया है।धर्म नैतिक आदर्शों को बताता है।अर्थ से भौतिक साधनों की पूर्ति होती है और काम मनुष्य की शारीरिक,मानसिक और प्राणात्मक इच्छाओं को पूरा करता है। अर्थ और काम मनुष्य के सामाजिक पक्ष का बोध कराते हैं,जबकि धर्म नैसर्गिक पक्ष की तरफ संकेत करता है। काम शब्द का संबोधन न्यूनतम स्तर पर वासना(सेक्सुअल ड्राइव) के लिए होता है,जिसे मनुष्य के छ: दुश्मनों में से एक माना जाता है।काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद और मत्सर(ईर्ष्या) मनुष्य के यही छ: रिपु हैं। इस संसार में अर्थ बिना काम नहीं चल सकता। जीवन को बिताने के लिए भौतिक साधनों का होना आवश्यक है। काम भी सृष्टि की वृद्धि के लिए परमआवश्यक है। काम की पूर्ति हेतु विवाह का प्रावधान है।अर्थ और काम धर्म के आधार पर ही अपनाए जाने चाहिए। धर्म सर्वोच्च है और अर्थ को मध्य स्थान पर रखना चाहिए तथा काम को सबसे निम्न स्थान पर रखा जाए।तभी जीवन में संतुलन और मोक्ष की प्राप्ति संभव है। गीता में रजोगुण को काम की उत्पत्ति का स्रोत माना गया है। गीता के अनुसार,"जिस प्रकार धुयें से अग्नि और मन से दर्पण ढक जाता है,उसी प्रकार काम ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।"धर्म पर चलते हुए अर्थ का अर्जन और काम की तुष्टि करना मनुष्य का कर्त्तव्य है। इस त्रिवर्ग के द्वारा मनुष्य अपने जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।इस प्रकार पुरुषार्थ सार्थक जीवन शक्ति का प्रतीक है,जो सांसारिक सुख-भोग के बीच,धर्म पालन के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है।

डॉ. कपाड़िया के अनुसार, "मोक्ष मानव जीवन का चरम लक्ष्य तथा आध्यात्मिक अनुभूति का प्रतीक है।काम मानव की सहज प्रवृत्ति तथा उसकी संतुष्टि की ओर संकेत करता है।अर्थ मानव और सांसारिक क्रिया-कलापों का प्रतिनिधित्व करता है। धर्म पाश्विक तथा दैवी प्रकृति की शृंखला है।इस प्रकार भारतीय विचारधारा के अंतर्गत मानव के चरम लक्ष्यों को चार प्रमुख भागों में विभक्त किया गया है। मानव जीवन के इन चार लक्ष्यों को समन्वित रूप से पुरुषार्थ कहा गया है।"

पुरुषार्थ जीवन का संतुलित पक्ष बनाते हैं और सामाजिक-व्यवस्था में लोक मानस के मनो-सामाजिक आधार बनते हैं।इन्हीं के आधार पर आश्रम-व्यवस्था बनी है।

रविवार, 23 अक्तूबर 2011

गोत्र या प्रवर की वैज्ञानिकता

सगोत्र और सप्रवर निषेध में समाजशास्त्री कोई वैज्ञानिकता नहीं देखते। वे इसे सामाजिक विकास का एक प्रारूप मात्र स्वीकार करते हैं।उनके अनुसार यह कोई सनातन परम्परा नहीं है,क्योंकि यज्ञ के लिए चुने गए ऋषि स्वेच्छिक हैं,न कि यह उनके साथ कोई रक्त संबंध का द्योतक है और कोई भी व्यक्ति स्पष्टत: अपने गोत्र या प्रवर का दावा नहीं कर सकता। फलत: समाज शास्त्रियों के लिए गोत्र और प्रवर प्रत्यय केवल धर्मशास्त्रीय शब्द मात्र हैं।

लेकिन हमारा मत है कि हिंदू धर्म इस बात को समझता रहा है कि विवाह के लिए  संबंधों में रक्त निकटता नहीं होनी चाहिए। इससे अनेक आनुवंशिक विसंगतियां पैदा होती हैं। इसलिए उन्होंने विवाह के लिए गोत्र व प्रवर का  प्रावधान किया। यदि सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत इसका अनुपालन किया जाए तो बेहतर संतति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

ओशो का कथन है कि स्त्री-पुरुष जितनी अधिक दूरी पर विवाह करते हैं उनकी संतान उतनी ही अधिक प्रतिभाशाली और गुणी होती है। उनमें आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं कम से कम होती हैं। उनके गुणसूत्र बहुत मजबूत होते हैं और वे जीवन-संघर्ष में परिस्थितियों का दृढ़ता के साथ मुकाबला करते हैं।

इस संबंध में आप क्या कहते हैं? आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।


सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

हिंदू विवाह के निषेध

हिंदुओं में विवाह के कुछ निषेध निश्चित हैं। हिंदू अपने ही गोत्र और प्रवर में विवाह नहीं करते। आइए इस पोस्ट में यह जाने कि गोत्र और प्रवर क्या हैं? और अपने ही गोत्र और प्रवर में विवाह वर्जित क्यों माना गया है।

गोत्र : गोत्र के संबंध में धर्मशास्त्रों,सूत्रों में विभिन्न विचार मिलते हैं।सत्यपाठ हिरण्यकेशी श्रौतसूत के अनुसार-विश्वामित्र,जमदग्नि,भारद्वाज,गौतम,अत्रि,वशिष्ठ,कश्यप और अगस्त नामक आठ ऋषियों की संतान गोत्र कहलाती है।वैदिक साहित्य में गोत्र शब्द का प्रयोग गौओं की रक्षा के लिए बनाए गए बाड़े के रूप में किया गया है। मैक्समूलर भी इस धारणा को मानते हैं कि जिन लोगों की गायें एक ही स्थान(बाड़े में)पर बंधती थी,वे उस स्थान पर रहने वाले एक ही पूर्वज ऋषि की संतान समझे जाते थे,बाद में यह लोग एक ही गोत्र के सदस्य समझे जाने लगे। 

पाणिनि ने अपने एक सूत्र में पोते तक की संतान को गोत्र कहा है।

पतंजलि के महाभाष्य में कहा गया है कि ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले 80 हजार ऋषि हुए,किंतु उनमें से केवल आठ ऋषियों की संतान का प्रसार हो पाया। इसलिए इन्हीं आठ ऋषियों की संतान ही गोत्र कहलाती है।

मनुस्मृति के सबसे बड़े टीकाकार मेघातिथि ने लिखा है कि गोत्र का अर्थ यह नहीं है कि वे किसी विशेष समय में उत्पन्न हुए ऋषि की संतान हैं,बल्कि जैसे परम्परा के अनुसार कुछ को ब्राह्मण माना जाता है,वैसे ही गोत्र भी परम्परागत वंश का नाम है। 

विज्ञानेश्वर के अनुसार - वंश परम्परा प्रसिद्ध गोत्रम् अर्थात परम्परा में जो नाम प्रसिद्ध होता है,वह उस वंश का गोत्र कहलाता है। 

बोधायन ने गोत्र की संख्या करोड़ों में बताई है। मिताक्षरान्याय के अनुसार,गोत्र का अर्थ रक्त की निकटता है।

उपर्युक्त विचारों से निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि गोत्र शब्द का प्रयोग एक घेरे में रहने वाले तथा एक विशेष समूह के व्यक्तियों के लिए किया जाता है,जिनके वंशज एक ही थे। इस धारणा के अनुसार एक ही गोत्र में विवाह अर्थात सगोत्र विवाह वर्जित है,क्योंकि वस्तुत: वे एक ही वंश की संतान है। जो बाद में बहिर्विवाह की प्रथा का हेतु बन गया। इसलिए हिंदुओं में सगोत्र कन्या से विवाह का निषेध है। 

प्रवर : प्रवर शब्द वृञ वरणो से अथवा वृ धातु से बना है। वर का अर्थ है चुन लेना, प्र का अर्थ है विशेष रूप से; इस प्रकार प्रवर शब्द का अर्थ हुआ : विशेष रूप से (यज्ञ) के लिए चुन लिया गया। डॉ. पांडुरंग वामन काणे का कथन है कि यज्ञ करते समय पुरोहित कुछ प्रसिद्ध एवं यशस्वी ऋषियों को चुनकर उनके नाम से यज्ञ में आहुति देता था और प्रार्थना करता था कि मैं अग्नि में वैसे ही आहुति देता हूं जैसे भृगु ने दी थी, जैसे अंगिरा ने दी थी, अत्रि ने दी थी। इस प्रकार चुने गए प्राचीन ऋषि प्रवर कहलाने लगे। इस प्रकार प्रवर ऋषियों की संख्या निश्चित कर दी गई और यह संख्या 49 है।

वैदिक इंडेक्स के अनुसार प्रवर का अर्थ है: आह्वाह्न करना। 

डॉ. प्रभु के अनुसार, इंडो आर्यन लोगों में अग्नि-पूजा और हवन करने का प्रचलन था। हवन करते समय पुरोहित अपने प्रमुख और श्रेष्ठ,ऋषि पूर्वज का नाम लेते थे। इस प्रकार प्रवर के अंतर्गत एक व्यक्ति के उन पूर्वजों का समावेश है जो अग्नि का आह्वाह्न करते हैं। बाद में इसके साथ सामाजिक धारणा भी जुड़ गई और इन पूर्वज ऋषियों का महत्त्व अनेक अन्य घरेलू और सामाजिक संस्कारों में भी हो गया,जिनमें विवाह संस्कार प्रमुख है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वे सभी व्यक्ति जो स्वयं को एक ही सामान्य ऋषि की संतान मानते हैं सप्रवर हैं; जिनके परस्पर विवाह वर्जित हैं। 

वस्तुत: प्रवर भी प्राचीन ऋषियों के नाम हैं। विज्ञानेश्वर के अनुसार केवल ब्राह्मणों के ही वास्तविक गोत्र व प्रवर होते हैं। क्षत्रिय और वैश्यों के गोत्र और प्रवर उनके पुरोहितों पर आश्रित होते हैं। शूद्रों के कोई प्रवर या गोत्र नहीं होते। पांडुरंग वामन काणे ने गोत्र और प्रवर का अंतर बतलाते हुए कहा है कि गोत्र उन ऋषियों के नाम हैं जो परम्परा द्वारा अनेक पीढ़ियों से किसी वंश या व्यक्ति के पूर्वज माने जाते हैं; परंतु प्रवर वे अत्यंत प्राचीन ऋषि हैं जो गोत्र चलाने वाले ऋषियों के पूर्वज थे। 

सगोत्र और सप्रवर विवाह हिंदु विचारधारा के अनुसार असामाजिक माना जाता है। हिंदू शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों से सगोत्र और सप्रवर विवाह वर्जित माने गए हैं। गौतम,वशिष्ठ और शंख धर्मसूत्रों का कथन है कि एक ही प्रवर के वर-कन्या का विवाह उचित नहीं। विष्णु,मनु तथा याज्ञवल्क्य स्मृतियों के अनुसार समान प्रवर के अतिरिक्त समान गोत्र रखने वाली कन्या से विवाह निषेध है। बोधायन के अनुसार, सगोत्र कन्या से विवाह करने पर चन्द्रायण नामक प्रायश्चित करना चाहिए। अपरार्क के अनुसार जानबूझ कर सगोत्र विवाह करने से व्यक्ति जातिच्युत हो जाता है और उसकी संतान चांडाल होती है। 

करन्दीकर के अनुसार, आर्यों ने इस प्रथा को अनार्य जातियों से ग्रहण किया; जो अपने टोटम से बाहर विवाह नहीं करते थे। अधिकांश लोगों का यह विचार है कि एक गोत्र और प्रवर में रक्त की निकटता होती है; इसलिए इसके दुष्परिणामों से बचने के लिए सगोत्र और सप्रवर विवाह वर्जित हैं।

अल्तेकर ने यह मत प्रकट किया है कि सगोत्र विवाह 600 ई.पू. नहीं मिलते हैं। वैदिक काल में गोत्र शब्द का प्रयोग दूसरे अर्थ में होता था। श्रीपाद डांगे ने तो यह सिद्ध किया है कि आर्य अपने गोत्र अथवा अग्नि से बाहर विवाह करने की बात ही नहीं सोच सकते थे। 

कुछ भी हो, आज विवाह में इन वर्जनाओं का उतना चलन नहीं रह गया है।

रविवार, 9 अक्तूबर 2011

हिंदू विवाह के प्रकार

हिंदू धर्मसूत्रों,शास्त्रों और स्मृतियों में विभिन्न प्रकार के विवाह बताए गए हैं। मनु ने विवाह के आठ भेद किए हैं परंतु वशिष्ठ ने छ: प्रकार के विवाह माने हैं। मनु स्मृति में कहा गया है-
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्ष प्राजापत्यस्तथासुर:।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चष्टमोधम:॥
इस प्रकार मनु ने ब्रह्म,दैव,आर्ष,प्राजापत्य,आसुर,गांधर्व,राक्षस और पैशाच आठ प्रकार के विवाह माने हैं।वशिष्ठ ने ब्राह्म,दैव,आर्ष,गांधर्व,क्षात्र(राक्षस) और मानुष(आसुर) विवाह के छ: प्रकार माने हैं।ब्राह्म विवाह, दैव विवाह,आर्ष विवाह और प्राजापत्य विवाहों को धर्म विवाह कहा गया है और ये समाज द्वारा स्वीकृत विवाह होने के कारण उत्तम विवाह कहे गए।अन्य चार विवाहों को अधर्म विवाह कहा गया है और इसीलिए ये समाज द्वारा अस्वीकृत कहे गए हैं।

1) ब्राह्म विवाह :मनुस्मृति में ब्राह्म विवाह के संबंध में लिखा है-
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुति शीलवते स्वयम्।
आहुय दानं कन्याय ब्राह्मो धर्म: प्रकीर्तित:॥
अर्थात कन्या को वस्त्र,अलंकार आदि से सुसज्जित करके विद्वान,शीलवान वर को आमंत्रित करके कन्यादान करने का नाम ब्रह्म विवाह है। यह विवाह वस्तुत: ब्रह्म-विद्या में संलग्न विद्वान पुरुष के लिए है। इसमें विवाह के तीन पक्ष स्पष्ट हैं- विद्वान व्यक्ति द्वारा विवाह की स्वीकृति,विवाह संस्कार का होना तथा दहेज न लिया जाना।इस विवाह में श्रेष्ठ कन्या को ब्रह्म विद्या में संलग्न विद्वान पुरुष को केवल एक वस्त्र से अलंकृत कर उसका दान किया जाता है।

2) दैव विवाह ::दैव विवाह को परिभाषित करते हुए मनु ने लिखा है-
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते।
अलंकृत्य सुतादानं दैव धर्म प्रचक्षते॥
अर्थात दैव विवाह में वस्त्रों और अलंकारों से सुसज्जित कन्या का दान उस यज्ञकर्ता ऋत्विक(पुरोहित) को किया जाता है,जो किसी यज्ञशाला में यज्ञ कार्य को उचित रूप से पूरा करता है। इस प्रकार का विवाह देवताओं (प्राकृतिक शक्तियों का आह्वाहन)की स्तुति के समय संपन्न होता था,इसलिए इसे दैव विवाह कहा गया।बाद में इस विवाह में तड़क-भड़क और दहेज भी समाविष्ट हो गया।

3)आर्ष विवाह:: मनु के शब्दों में -
एकं गोमिथुने द्वेवा वारदशेय धर्मत:।
कन्या प्रदानं विधिवरार्षो धर्म स उच्चते॥
अर्थात पवित्र धर्म के निर्वाह के उद्देश्य से एक गाय और बैल अथवा दो जोड़े बैल लेकर कन्या के माता-पिता उसे ऋषि की पत्नी के रूप में सौंप देते हैं।ये वस्तुएं कन्या-मूल्य नहीं थी,बल्कि ऋषि के गृहस्थ जीवन बिताने के निश्चय की सूचक थी। आर्ष शब्द का अर्थ ही ऋषि है,इस प्रकार किसी सुपात्र कन्या का ऋषि से पाणिग्रहण ही आर्ष विवाह कहलाता है।

4)प्राजापात्य विवाह:: मनु ने मनुस्मृति में इस विवाह के संबंध में लिखा है-
सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचानु भाष्य च:।
कन्या प्रदानमभ्यर्त्थ प्राजापत्यो विधि: स्मृत:॥
अर्थात तुम दोनों मिलकर गृहस्थ धर्म का आचरण करना,यह कहकर विधिवत वर की पूजा करके कन्यादान करना प्राजापात्य विवाह है। स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार वर और वधू दोनों का विवाह धर्म की वृद्धि के लिए हो,यह कामना ही प्रजापत्य विवाह का आधार है।

वस्तुत: यह विवाह प्रजा अर्थात संतति-उत्पत्ति की दृष्टि से सर्व-साधारण का विवाह है। इस विवाह में स्त्री या पुरुष का कोई धार्मिक गुण या विशेषता नहीं देखी जाती थी। यह विवाह बहुत बाद में प्रचलित हुआ लगता है क्योंकि वशिष्ठ और आपस्तम्ब दोनों ने ही इस विवाह के संबंध में कुछ नहीं लिखा है। संभवत: इस विवाह को बाद में उस वर्ग का ध्यान रखते हुए जोड़ा गया जो ब्रह्म-ज्ञान में उत्सुक नहीं है,लेकिन प्रजा की दृष्टि से धर्म का पालन कर सकता है।इस प्रकार से संतति के उद्देश्य से कन्या को घर लाने को प्राजापात्य विवाह कहा गया।

5)आसुर विवाह:: मनु ने इस विवाह को इस प्रकार परिभाषित किया है-
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्वा कन्याये चैव शक्तित:।
कन्या प्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म स उच्यते॥
अर्थात् आसुर विवाह उसे कहते हैं जब विवाह के लिए इच्छुक व्यक्ति अपनी इच्छा से कन्या के परिवार वालों को धन देकर विवाह करता है। महाभारत काल में पांडु का माद्री के साथ इसी प्रकार का विवाह हुआ था। यह विवाह समाज में स्वीकृत नहीं रहा।

6)गांधर्व विवाह::मनुस्मृति में गांधर्व विवाह के संबंध में कहा गया है कि-
इच्छामान्योन्य संयोग: कन्यायाश्च वरस्य च:।
गंधर्व: सतु विज्ञेयो मैथुन्य: काम: संभव: ॥
अर्थात गंधर्व विवाह उसे कहते हैं जो कन्या और वर के परस्पर प्रेम के फलस्वरूप होता है। इसमें वैवाहिक संस्कार कार्य संभोग के बाद पूर्ण किये जाते हैं। इसका उदाहरण दुष्यंत और शकुंतला का विवाह है।

इस प्रकार के विवाह में पुरुष और स्त्री दोनों अपनी इच्छा के अनुसार पति और पत्नी चुन लेते हैं और विवाह पूर्व ही पति-पत्नी के रूप में रहने लगते हैं और बाद में अपने परिवार और समाज से उसकी स्वीकृति लेते हैं।

कामसूत्र के रचयिता वात्स्यायन ने गंधर्व विवाह को आदर्श माना है। बौधायन का कहना है कि कुछ लोग    गांधर्व विवाह की इसलिए प्रशंसा करते हैं क्योंकि यह स्त्री-पुरुष की इच्छा से होता है,इसलिए यह आदर्श है। तैत्तरीय संहिता में कहा गया है कि "स्त्री कामा वै गंधर्वा" अर्थात स्त्री की कामना गांधर्व लोगों की विशेषता है।वस्तुत: प्राचीन काल में गांधर्व नाम की एक जाति थी जो अत्यंत कामुक थी। यह उन्हीं के लिए कहा गया है।इसी कारण कामवासना पर आश्रित इस प्रकार के विवाह को स्मृतिकारों ने गांधर्व विवाह की संज्ञा दी।

सत्यार्थ प्रकाश में महर्षि दयानंद सरस्वती ने कहा है कि अनियम,असमय इत्यादि किसी कारण से दोनों की प्राचीन इच्छा से वर-कन्या का परस्पर संयोग होना गंधर्व विवाह है।

7)राक्षस विवाह:: राक्षस विवाह उस काल की प्रथा है जबकि स्त्रियां युद्ध का पारितोषिक मानी जाती थी। मनु ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है-
हत्वा,छित्वा च भित्वा च क्रोशन्ति रूदन्ती गृहातौ।
प्रसाह्य कन्या हरणं राक्षसो विधिरुच्यते॥
अर्थात् राक्षस विवाह में विजेता कन्या पक्ष के लोगों को मार-काट कर उनका घर तोड़कर विलाप करती हुई कन्या को उसके घर से उठा लाता है। श्री कृष्ण से रुक्मणी का ऐसा ही विवाह हुआ था। इस विवाह को क्षत्रीय विवाह भी कहा गया क्योंकि क्षत्रिय लोग ही युद्ध करते थे और विजयी होने पर शत्रु की कन्याओं को पारितोषिक रूप से उठा लाते थे।

8) पैशाच विवाह::मनु ने पैशाच विवाह के संबंध में लिखा है-
सुप्तां मत्तां प्रमतां वा रहो यमोपगच्छत।
स पापिष्ठो विवाहनां पैशाचाष्टमोधम:॥
अर्थात सोई हुई,शराब पीने से उन्मत्त हुई स्त्री से एकांत में विवाह(बलात्कार) करना ही पैशाच विवाह है।इस प्रकार बलात्कारी द्वारा विधिपूर्वक विवाह संस्कार कर लेने पर समाज की स्वीकृति मिल जाती थी,जिसमें शारीरिक संयोग की पवित्रता और सामाजिक व्यवस्था बनी रहे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदू समाज में विवाह के अनेक रूप रहे हैं। विवाह के प्राचीन रूपों में कुछ का आज भी अस्तित्व दिखाई देता है। पहले  विवाह का आधार व्यक्ति का वर्ण था। मनु के अनुसार  ब्राह्मणों के लिए दैव,आर्ष और प्राजापत्य, क्षत्रियों के लिए राक्षस और वैश्यों तथा शूद्रों के लिए आसुर विवाह उचित हैं।आज भी उच्च वर्ग के लोगों में प्राजापत्य विवाह और निम्न वर्ग के लोगों में आसुर विवाह प्रचलित हैं।

आज सर्वाधिक प्रचलित विवाह प्रेम-विवाह बन गया है। इसके कारणों में पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव, औद्योगिकरण,शहरीकरण,आधुनिक शिक्षा और व्यक्तिवादी विचारधारा का विकास, नारी सशक्तिकरण आदि को माना जा रहा है। संयुक्त परिवार का ह्तास भी इसका एक कारण हो सकता है।

इधर विवाह का एक अलग ही चलन देखने में आया है- लिव इन रिलेशनशिप, इस विवाह में युवा लड़का-लड़की बिना विवाह के एक साथ तब तक रहते हैं जब तक कि उनके बीच में किसी बात विशेष को लेकर मतभेद पैदा न हो। इस प्रकार के रिलेशनशिप महानगरों में बहुत दिखाई पड़ते हैं। इसके बहुत से कारण हैं। जिसके बारे में हम आगे किसी पोस्ट में चर्चा करेंगे। 

सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

विवाह के उद्देश्य


धर्म
पिछली पोस्ट में हमने जाना कि हिंदू दर्शन में विवाह एक संस्कार है।भारतीय दर्शन में धर्म का बहुत महत्त्व है।विवाह के प्रमुख उद्देश्य में भी धर्म सर्वोपरि है।स्त्री-पुरुष के मिलन से समाज की जो इकाई बनती है,वह परिवार कहलाता है।दाम्पत्य जीवन के बिना पारिवारिक जीवन दुष्कर ही नहीं वरन असंभव है। परिवार के जन्म के साथ ही मनुष्य में कर्त्तव्य-भाव का विकास दिखाई देता है। हिंदु-दर्शन के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के कुछ निश्चित कर्त्तव्य हैं और विवाह इन कर्त्तव्यों को उचित ढ़ंग से निष्पादित करने में सहायक है। हिंदु-धर्म के अनुसार मनुष्य जीवन के पंच महायज्ञ स्वीकार किए गए हैं। ये पांच महायज्ञ हैं: ब्रह्म यज्ञ, पितृ यज्ञ, देव यज्ञ, भूत यज्ञ और नृ यज्ञ। इन पांचों यज्ञों को पूरा करने के लिए पत्नी का सहयोग परम आवश्यक है।
ब्रह्म यज्ञ :: ब्रह्म यज्ञ से अभिप्राय: है :इस सृष्टि और ब्रह्मांड के रहस्य को समझना। इस ब्रह्मांड में निरंतर सृजन और विनाश जारी है। विवाह सृजन में सहायक है। विवाह से ही सृष्टि का क्रम निरंतर बना रहता है। व्यक्ति को निरंतर अपने ज्ञान-चक्षुओं को खुला रखना ही ब्रह्म-यज्ञ है। प्राचीन समय में ज्ञान को वेद कहा गया,इसलिए वेदों के अध्ययन को ब्रह्म-ज्ञान का प्रमुख स्रोत कहा गया।

पितृ यज्ञ :: साधारणतया इसे मृत पितरों से संबंधित तर्पण आदि से जोड़ दिया गया है। जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति पर पितरों का ऋण होता है और इस ऋण से उऋण होने के लिए पुत्र प्राप्त करना जरूरी समझा गया। जिसके लिए विवाह आवश्यक हो जाता है। लेकिन पितृ यज्ञ का गहरा अर्थ यह है कि सृष्टि के चक्कर को बनाए रखा जाए। पति पत्नी के गर्भ से संतति को जन्म दे।वह पिता बने और पत्नी मां। पिता बनने पर ही व्यक्ति अपने पितृ यज्ञ को पूरा कर सकता है। भारतीय संस्कृति में इसी लिए पितामह होने पर व्यक्ति को जो खुशी मिलती है,उसका कोई पारावार नहीं। हिंदु धर्म में विश्व एक निरंतरता है। इस निरंतरता में विवाह एक सेतु है। जो वर्तमान पीढ़ी को उसकी भूत और भविष्य पीढ़ी से जोड़ती है। पितरों को तर्पण करना भी इस महत श्रृंखला का द्योतक है।

देव यज्ञ :: देव कौन हैं? जो भी इस ब्रह्मांड की सृष्टि में सहायक शक्तियां हैं वे देव हैं। मनुष्य का धर्म है कि वह इन शक्तियों को पहचाने व इनके संरक्षण में सहायक बने। पृथ्वी,वायु,आकाश,जल,अग्नि जैसे तत्वों से मनुष्य के शरीर का निर्माण हुआ है। इस दृष्टि से ये देव हैं।पति और पत्नी इन तत्वों के संरक्षण में सहायक बन सकते हैं। इसी लिए किसी भी यज्ञ को पत्नी के बिना पूरा नहीं किया जा सकता। जब मनुष्य में अपने वातावरण में मौजूद हर जीवित,अजीवित वस्तु के प्रति प्रेम भाव उमगता है; तो वह देव यज्ञ में सहभागी हो रहा होता है। स्त्री से प्रेम व्यक्ति के जीवन में संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रति प्रेम भाव जागृत करने में सहायक है। 

भूत यज्ञ :: चौथा यज्ञ भूत यज्ञ है; जिसे स्मृतिकारों ने बलिवैश्वदेव भी कहा है। इस यज्ञ का तात्पर्य यह है कि कि मनुष्य प्राणि-मात्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों को समझे। जो भूत हो चुके हैं अर्थात अब देह में नहीं हैं, जो निराधार हैं या किन्हीं कारणवश अपने उदर की पूर्ति नहीं कर सकते उन्हें भोजन आदि देकर सहायता करें। शायद इसी कारण से व्यक्ति से यह अपेक्षा की गई कि वह स्वयं भोजन करने से पूर्व वह अपने भोजन में से कुछ कुत्ते,पतित,पापी,श्वपच,रोगी,वायस,कृमि आदि को दे। इस यज्ञ के द्वारा मनुष्य अन्यों के प्रति अपने कर्त्तव्यों का निर्वहण करता है। 

नृ यज्ञ :: पांचवां नृयज्ञ कहा गया। इसे अतिथि यज्ञ भी कहते हैं। मनुष्य अतिथि की सेवा करे तो नृ यज्ञ संपन्न होता है। नृ यानी मानव की सेवा मात्र इस यज्ञ का हेतु है। 

इस प्रकार इन पांच यज्ञों से मनुष्य-जीवन के सभी कर्त्तव्यों को जोड़ दिया गया है। मनु ने लिखा है कि स्त्रियों की सृष्टि माता बनने के लिए और पुरुषों की सृष्टि पिता बनने के लिए की गई। धार्मिक कार्य पुरुषों को अपनी स्त्रियों के साथ ही करना चाहिए। यही कारण है कि विवाह को हिंदु विचारधारा के अनुसार एक संस्कार अथवा शरीर संस्कार माना जाता है; जिससे शरीर शुद्धि होती है।
ऋग्वेद के अनुसार विवाह का आदर्श गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर देवताओं के लिए यज्ञ करना और संतान उत्पन्न करना है। 
आपस्तम्ब धर्म सूत्र के अनुसार विवाह द्वारा ही मनुष्य धार्मिक अनुष्ठानों को करने के योग्य बनता है,क्योंकि अविवाहित पुरुष अपूर्ण रहता है।
विवाह के द्वारा ही मनुष्य को पुत्र की प्राप्ति हो सकती है, जो उसे नरक से बचाता है। मनु का मत है कि संतान धारण,धार्मिक आचारों का पालन,सेवा, श्रेष्ठ आनंद और स्वर्ग प्राप्ति स्त्री के बिना संभव नहीं। अत: धर्म के पालन के लिए विवाह आवश्यक है। 
प्रजा 
हिंदू विवाह का दूसरा उद्देश्य संतति उत्पन्न करना है। पुत्र उत्पन्न करना हिंदू विचारधारा के अनुसार अति आवश्यक है। मनु संहिता और महाभारत में दी गई व्याख्या के अनुसार पुत्र का अर्थ है: नरक(पुम) में जाने से पिता की रक्षा करने वाला। पुत्र प्राप्ति को और प्रजनन क्रिया को यौन संतुष्टि का परिणाम न मानकर उसे धर्म साधन कहा गया है। वास्तव में विवाह का मुख्य आदर्श है- धर्म पालन,क्योंकि प्रजा और रति भी धर्म पालन के अंग हैं।
मनु के अनुसार पुत्र प्राप्ति इस संसार और अगले संसार दोनों में सुख का साधन समझा गया है। मनु ने लिखा है- केवल वह व्यक्ति ही पूर्ण कहलाने योग्य है,जिसके पास पत्नी और बच्चे हैं। अत: प्रत्येक हिंदू के लिए विवाह करना अनिवार्य माना जाता है। विवाह अपने पूर्वजों के प्रति एक कर्त्तव्य है।
महा भारत में एक कथा है जिसके अनुसार एक स्त्री बिना विवाह ही तपस्या करने लगी, परंतु नारद जी ने उससे कहा कि विवाह द्वारा शुद्ध हुए बिना उसे मोक्ष नहीं मिलेगा। तब उसने अपने तप का आधा फल देकर श्रृंग्वान से विवाह किया और फिर कहीं स्वर्ग को जा सकी। पुत्र का उत्पन्न होना आवश्यक है क्योंकि बिना पुत्र के अनेक धर्म नहीं हो सकते- जैसे तर्पण, पिंडदान तथा पितरों की शांति। ऐसा कहा जाता है कि जरकाल उग्र तपस्वी ऋषि थे, किंतु अपने पितरों की दयनीय दशा देककर विवाह किया और पुत्र उत्पन्न किया। 
रति
हिंदू विवाह का तीसरा उद्देश्य रति अर्थात यौनिक आनंद प्राप्ति है। रति का स्थान हिंदू विवाह में सबसे गौण रखा गया है और यौन क्रिया का सामाजीकरण ही विवाह का मुख्य आधार माना गया है। केवल यौन संतुष्टि ही विवाह का एकमात्र उद्देश्य नहीं है। विवाह में रति के गौण स्थान को सिद्ध करने के लिए कहा गया है कि नीच पुरुष ही इंद्रिय सुख के लिए विवाह करता है, जो सांसारिक और दहिक सुखों को ही सब कुछ समझता है...ऐसे पुरुष के जीवन में कोई उच्च आदर्श नहीं होता। 
हिंदु विवाह को पवित्र माना गया है और यह अविच्छेद्य होता है। हिंदु-धर्म में तलाक का कोई स्थान नहीं है। यहां तक कि पति-पत्नी मृत्योपरांत भी विवाह-बंधन में बंधे रहते हैं। इसी कारण हिंदुओं में विधवा विवाह का विधान नहीं रहा। विवाह जन्म-जनमांतर का संबंध माना गया। हिंदुओं में दाम्पत्य जीवन में संघर्ष की भावना को कोई स्थान नहीं दिया गया है। पत्नी अर्धांग्नी समझी जाती है और उनमें व्यक्तिगत स्वार्थों को कोई महत्व नहीं दिया गया। इसी भावना के कारण भारत में संयुक्त परिवार को बल मिला। पत्नी का पति से परे कोई अस्तित्व नहीं होता। सती और पतिव्रता की धारणाओं से यह सिद्ध होता है कि पत्नी पति का एक रूप मानी जाती है, उसका अपना अलग कोई स्थान नहीं। 
अत: हिंदू विवाह एक धार्मिक गठबंधन है। जिसमें पति पत्नी मृत्योपरांत भी एक बंधन में बंधे रहते हैं। विवाह एक समझौता मात्र नहीं है,बल्कि एक धार्मिक संस्कार है। इसे बिना धार्मिक कृत्यों के संपन्न नहीं किया जा सकता। इसे पुरोहित द्वारा अग्नि को साक्षी मान सम्पन्न कराया जाता है। इसमें धर्म का स्थान सर्वोपरि है। यह मानव जीवन के पुरुषार्थों को पूर्ण करने का साधन है।