बुधवार, 21 नवंबर 2012

वह अकेला आदमी ::1 ::

आज वह अपने जीवन की 95वीं वर्ष गाँठ के छोर पर खड़ा अपने जीवन-प्रवाह के अतीत खंड को निहार रहा था।जब से होश सम्हाला था,तब से अब तक की जीवन-यात्रा के दृश्य उसकी आँखों के सामने से चलचित्र की तरह दौड़े जा रहे थे। वह न उनका मूल्यांकन कर रहा था और न ही उसे अपने जीवन के अतीत से कोई लगाव ही रह गया था। बस वह तो निरपेक्ष भाव से उन सब घटनाओं को साक्षी बना देख रहा था।

बचपन के आठ वर्ष एक छोटे से गाँव में बीते। इन आठ सालों में उसके मन पर जो प्रभाव पड़ा...उससे वह आज तक प्रभावित है। उसकी दार्शनिकता उस छोटे से गाँव में ही फलने-फूलने लगी थी, जब उसने अपनी माँ से रात को खेतों में शौच जाते समय,अपने साथ चलते हुए चाँद को देख कर माँ से सवाल पूछ बैठा था कि यह चाँद हमारे साथ-साथ क्यों चल रहा है? 

जीवन के मूल प्रश्न तभी से उसके कोमल मनस-पटल पर उठने लगे थे। जीवन क्या है? मैं इस संसार में क्यों हूँ?  मरने पर क्या होता है? आदमी मर कर कहाँ चला जाता है? सबसे पहले मरते हुए उसने अपने एक पड़ौसी को देखा था। उसका नाम रामजा था। बहुत ही पेटू था वह। लोगों से माँग-माँग कर चवन्नियाँ इकट्ठी किया करता था,और जब कोई उससे पूछता कि इन चवन्नियों का क्या करोगे? तो वह कहता मेले जाऊँगा तो बहुत सी चीजें खरीदूँगा। एक दिन वह चल बसा। उसकी अंतिम क्रिया के समय उसे नहलाते हुए देख कर उसने अपनी माँ से पूछा था, माँ रामजा को क्या हो गया,लोग उसे पकड़ कर क्यों नहला रहे हैं,वह बोलता क्यों नहीं? उसकी आँखें ऐसी फटी-फटी क्यों है? माँ ने उसे कहा, बेटा! रामजा मर गया है।अब वह कभी वापिस नहीं लौटेगा। लोग उसकी अर्थी बना कर श्मसान-भूमि में ले जाकर फूँक आए। तब वह भी गाँव के बाहर बने मरघट पर गया था। मरघट पर खुद उसे जलते हुए देखा, तो उसे जीवन की मृत्यु का पहला अहसास हुआ। और जीवन संबंधी प्रश्न उसके मन में उठने लगे।

उसने गाँव में बहुत से अनुभव किए। उसने प्रकृति के सान्निध्य में अपना बचपन बिताया। नदी के घाट पर घूमा। उफनती नदी को पार करता और उसमें बनने वाले भँवर को निहारता...पाँवों के तले कटती मिट्टी को अनुभव करता। खेतों में फसलों को बौते-काटते देखता। लोगों का श्रमपूर्ण जीवन देखता। कुछ कटु अनुभव भी हुए।                                                                                                                       .... जारी//

बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

नई कहानी

(यशपाल जी ने नई कहानी को परिभाषित करते हुए यह कहानी लिखी थी : प्रस्तुत है यह कहानी आपके समक्ष)

मुफस्सिल की पैसेंजर ट्रेन चल पड़ने की उतावली में फुंकार रही थी. आराम से सेकंड क्लास में जाने के लिए दाम अधिक लगते हैं. दूर तो जाना नहीं था. भीड़ से बचकर,एकांत में नई कहानी के सम्बन्ध में सोच सकने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देख सकने के लिए टिकट सेकंड क्लास का ही ले लिया.

गाड़ी छूट रही थी. सेकंड क्लास के एक छोटे डिब्बे को खाली समझ कर जरा दौड़ कर उसमें चढ़ गए.अनुमान के प्रतिकूल डिब्बा निर्जन नहीं था.एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे. सामने दो ताजे-चिकने खीरे तौलिए पर रखे थे.डिब्बे में हमारे सहसा कूद जाने से सज्जन की आँखों में एकांत चिंतन में विघ्न का असंतोष दिखायी दिया. सोचा,हो सकता है,यह भी कहानी के लिए सूझ की चिंता में हों या खीरे-जैसी अपदार्थ वस्तु का शौक करते देखे जाने के संकोच में हों.

नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया. हमने भी उनके सामने की बर्थ पर बैठ कर आत्म-सम्मान में आँखे चुरा ली.

ठाली बैठे,कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है. नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारण का अनुमान करने लगे.सम्भव है,नवाब साहब ने बिल्कुल अकेले यात्रा कर सकने के अनुमान में किफायत के विचार से सेकंड क्लास का टिकट खरीद लिया हो और अब गवारा न हो कि शहर का कोई सफेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफर करता देखे. ........अकेले सफर का वक्त काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे और अब किसी सफेदपोश के सामने खीरा कैसे खाएं? 

हम कनखियों से नवाब साहब कि और देख रहे थे. नवाब साहब कुछ देर गाड़ी की खिड़की से बाहर देखकर स्थिति पर गौर करते रहे.

ओह! नवाब साहब ने सहसा हमें सम्बोधन किया,आदाब अर्ज ,जनाब,खीरे का शौक फरमाएंगे? 

नवाब साहब का सहसा भाव-परिवर्तन अच्छा नहीं लगा. भांप लिया,आप शराफत का गुमान बनाये रखने के लिए हमें भी मामूली लोगों कि हरकत में लथेड़ लेना चाहते हैं. जवाब दिया,शुक्रिया,क़िबला शौक फरमाएँ.

नवाब साहब ने फिर एक पल खिड़की से बाहर देखकर गौर किया और दृढ़ निश्चय से खीरों के नीचे रखा तौलिया झाड़ कर सामने बिछा लिया.सीट के नीचे से लोटा उठा कर दोनों खीरों को खिड़की से बाहर धोया और तौलिये से पौंछ लिया. जेब से चाकू निकाला. दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें गोद कर झाग निकाला. फिर खीरों को बहुत एहतियात से छीलकर फांकों को करीने से तौलिये पर सजाते गये.

लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले खीरे के इस्तेमाल का तरीका जानते हैं. ग्राहक के लिए जीरा-मिला नमक और पिसी हुई लाल मिर्च की पुड़िया भी हाजिर कर देते हैं.

नवाब साहब ने बहुत करीने से खीरे की फांकों पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुर्खी बुर्क दी. उनकी प्रत्येक भाव भंगिमा और जबड़ों के स्फुरण से स्पष्ट था कि उस प्रक्रिया में उनका मुख खीरे के रसास्वादन की कल्पना से प्लावित हो रहा था.

हम कनाखियों से देख कर सोच रहे थे, मियां रईस बनते हैं,लेकिन लोगों की नजरों से बच सकने के ख्याल में अ‍पनी अ‍सलियत पर उतर आये हैं.

नवाब साहब ने फिर एक बार हमारी ओर देख लिया, वल्लाह,शौक कीजिए, लखनऊ का बालम खीरा है!

नमक-मिर्च छिड़क दिया जाने से ताजे खीरे की पनियाती फांकें देखकर पानी मुंह में जरूर आ रहा था,लेकिन इनकार कर चुके थे. आत्म-सम्मान निबाहना ही उचित समझा,उत्तर दिया,शुक्रिया, इस वक्त तलब महसूस नहीं हो रही,मेदा भी जरा कमजोर है,किबला शौक फरमाएं.

नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फांकों की ओर देखा. खिड़की के बाहर देखकर दीर्घ निश्वास लिया. खीरे की एक फांक उठाकर होंठों तक ले गये. फांक को सूंघा. स्वाद के आनंद में पलकें मूंद गयीं. मुंह में भर आये पानी का घूंट गले से उतर  गया. तब नवाब साहब ने फांक को खिड़की से बाहर छोड़ दिया. नवाब साहब खीरे  की फांकों को नाक के पास ले जाकर, वासना से रसास्वादन कर खिड़की के
बाहर फेंकते  गये.

नवाब साहब ने खीरे की सब फांकों को खिड़की से बाहर  फेंककर तौलिये से हाथ और हौंठ पोंछ लिये और गर्व से गुलाबी आँखों से  हमारी ओर देख लिया,मानों कह रहें हों-- यह है खानदानी रईसों  का तरीका!

नवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थक कर लेट गये. हमें तसलीम में सिर खम कर लेना पड़ा -- यह है खानदानी तहजीब,नफासत और नजाकत !

हम गौर कर रहे थे,खीरा इस्तेमाल करने के इस तरीके को खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से संतुष्ट होने का  सूक्ष्म,नफीस या ऐब्स्ट्रैक्ट तरीका जरूर कहा जा  सकता है परन्तु क्या ऐसे तरीके से उदर की तृप्ति भी हो सकती  है?

नवाब साहब की ओर से  भरे पेट  के ऊँचे डकार का शब्द सुनाई दिया और नवाब साहब ने हमारी ओर देख कर कह दिया,ख़ीरा लजीज होता है लेकिन होता है सकील,नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है.

ज्ञान-चक्षु खुल गए ! पहचाना -- ये हैं  नई  कहानी  के  लेखक!

खीरे  की  सुगंध और स्वाद की कल्पना से पेट भर जाने का  डकार आ सकता है  तो बिना विचार,घटना और पात्रों के,लेखक की इच्छा मात्र से नई कहानी  क्यों नहीं बन  सकती?

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

गुड्डो

(किशोर युवती के मन को संजोती एक प्यारी सी,मासूम सी कहानी--गुड्डो, गुलज़ार की लिखी यह कहानी पढ़ने लायक है) 

कई बार उसे खुद भी ऐसा लगा कि वो अपनी उम्र से ज्यादा बड़ी हो गयी है। जब वो आठवीं में थी दसवीं जमात की लड़कियों की तरह बात करती थी। और नवीं में आने के बाद तो उसे ऐसा लगा जैसे बिल्कुल बड़ी दीदी की तरह कॉलेज में पढ़ने लग गयी है। उन्हीं की तरह उसने अपनी डायरी लिखनी शुरु कर दी थी। उन्हीं की तरह वो भी मूडी हो गयी थी। उन्हीं की तरह घंटों शीशे के सामने बैठी सिंगार करती रहती। गयी बार माँ ने टोका तो उसे बुरा लगा।

"हुँह! दीदी को तो कुछ कह नहीं सकती,मुझे डाँट देती हैं।"
मन ही मन बड़बड़ाकर वो चुप हो गयी।
लेकिन उस दिन वो फूट पड़ी जिस दिन दीदी ने उसके लिए नया फॅराक बनाया।
"मैं नहीं पहनती फॅराक। खुद तो अच्छी अच्छी साड़ियाँ ले आती हैं। मेरे लिए ये फॅराक बना दिया है।"
"गुड्डो-तू बड़ी हो जाए तो..."
"गुड्डो,गुड्डो मत कहा करो मुझे। यह मेरा नाम नहीं है।"
"अच्छा कुसुम जी आप बड़ी हो जाएँगी तो साड़ी भी ला देंगे।"
"मैं अभी छोटी हूँ? नवीं में पढ़ती हूँ।"
दीदी हँस पड़ी और वो पैर पटखती चली गयी।

दीदी,पता नहीं,अपने-आपको किस बात पर बड़ा समझती हैं। वो उनसे ज्यादा अच्छी डायरी लिख लेती है। उनसे ज़्यादा प्यार भरी बातें कह सकती है। देवराज की तो शकल भी अच्छी नहीं है। ऐसी ऊँची नाक है। हाथ से पसीना पोंछता है तो हाथ टकरा जातें हैं। और वो खुद! वो जिसे प्यार करती है वो तो लाखों का चहेता है। सचमुच फि़ल्मों का हीरो। देवराज तो उसके 'मेहबूब' की नकल करता है। वो जैसे बाल बनाता है,देवराज भी वैसे बाल बनाता है। पल-भर को उसे लगा जैसे दीदी भी कुछ नहीं। जैसे देवराज और दीदी तो बस दिलीप कुमार और कुसुम की जूठन हैं। इस ख़याल से उसे बड़ी तसल्ली हुई। ख़यालों ही ख़यालों में दिलीप की आग़ोश में डूब गयी और आसमान पर बिखरे-बिखरे बादलों के टुकड़े जोड़ने लगी।

कितनी बार वो स्कूल से भाग-भाग कर अपने 'मेहबूब' से मिलने गयी थी। सातवीं में थी। सातवीं या आठवीं में जब उसने 'मधुमती' देखी थी। हाय! कितना अच्छा लगता था उसमें दिलीप। पूरी बांहों वाली जर्सी में,बस इसके होंटों से 'सी' निकल गयी। उसका बस चलता तो वहीं भाग कर पर्दे पर उसका हाथ पकड़ लेती। उसने कभी सोचा था,वो दिलीप से मिलेगी,तो जरूर एक पूरी बाँहों वाली जर्सी बुन कर देगी। और फिर 'नया दौर' में जब उसने दिलीप को धोती में देखा तो उसकी रही-सही सुध-बुध भी जाती रही। उस दिन से तो वह उसपर बिल्कुल ही लट्टू हो गयी थी। ताँगे की कमानी पर बैठ कर जब हवा में चाबुक लहराता था तो जैसे जान ही निकाल लेता था। उसे हर वक़्त यही डर लगा रहता था,कहीं गिर न पड़े। कई बार तो टाँगों के धचके के साथ वो खुद भी उछल पड़ी थी। और जब दिलीप दनदनाता हुआ टूटे हुए पुल से गुज़रा था तो उसने पुल के नीचे अपनी दोनों बाँहों का पूरा ज़ोर लगा दिया था। उसे तो तब एहसास हुआ था जब साथ की सीट पर बैठी उसकी सहेली ने 'उई' कह के अपना हाथ छुड़ाया था। लेकिन ये मोटी मद्रासिन वैजयंतीमाला क्यों इसके पीछे पड़ गयी है। यकलख़्त ही वैजयंतीमाला के ख़ेलाफ़ शदीद नफ़रत से भर गयी। धन्नो! आयी बड़ी धन्नो! उसे बड़ी तसल्ली हुई यह सोचकर कि 'गंगा जमुना' के आख़िर में वैजयंती माला मर जाती है।

वो बिस्तर से उठी और जाकर मेज़ के दराज़ से अपनी डायरी निकाली। डायरी में 'गंगा जमुना' की बुकलेट पड़ी थी। बुकलेट के ऊपर दिलीप और वैजयंती की तस्वीर थी। उसने दीदी की अलमारी से कैंची निकाली और वैजयंती की तस्वीर काट कर अलग कर दी। दिलीप की तस्वीर को चूमा। उसके बालों पर हाथ फेरा और फिर तस्वीर को सँभाल कर डायरी में रखा और डायरी पर सर रखके फिर बिखरे-बिखरे बादलों के टुकड़े चुनने लगी।

कब से वो इन बादलों के टुकड़े सी रही थी। लेकिन बादल थे कि बार-बार बिखर जाते थे। न बरसते थे,न सिलने में आते थे। कहाँ तक वो बादलों को जोड़ती जाए,पिरोती जाए,काश! वो एक बार जमके बरस जाएँ ताकि उसका कलेजा ठंडा हो जाए। 

काश!दिलीप एक बार मुझे चिट्ठी लिखें। उसने सोचा। जैसे देवराज दीदी को लिखता है। वो तो कुछ भी नहीं। दिलीप जो लिखेगा,वो तो कोई और लिख भी नहीं सकता। उसने कई बार उसके लिखे हुए ख़त फ़िल्मों में सुने थे। 

उसने डायरी निकाली और दिलीप के नाम एक और ख़त लिखने बैठ गयी। 

नवीं का इम्तेहान दिया ही था कि कुसुम की ज़िन्दगी में एक ऐसी सुबह आयी जिसका वो तसव्वुर भी नहीं कर सकती थी। सुबह उठते ही मालूम हुआ,मामा आये हैं और सब दिलीप की शूटिंग देखने चलेंगे। स्कूल में छुट्टी थी। बस,बात बन गयी। वो भी जाएगी। उसने मामा से कह दिया।

"चलो तुम भी चलो।"
"यह क्या करेगी जाकर?" दीदी ने कहा।
"गुड्डो ऑटोग्राफ़ ले लेगी।"
"इसे गुड्डो मत कहिए मामा जी,वरना नाराज़ हो जाएगी। अब यह बड़ी हो गयी है।"
दीदी हँस रही थी। वो फिर दीदी से चिढ़ गयी। जब दिलीप प्यार भरी नज़रों से उसकी तरफ़ देखेगा,तब पता चलेगा,वो कितनी बड़ी हो गयी है। वो तैयार होने अंदर चली गयी और देर तक सिंगार की मेज़ के सामने बैठी रही।

जब शूटिंग पर पहुँचे तो दिलीप और वैजयंती एक 'सीन' की रिहर्सल कर रहे थे। सहमी-सहमी- सी वो एक तरफ़ खड़ी रही दिलीप वैजयंती का हाथ पकड़े कह रहा था--
"लता,अब दुनिया की कोई ताक़त तुम्हें मुझसे छीन नहीं सकती। मैंने हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हें पा लिया है। बताओ,मेरे साथ चलोगी लता?"
और लता ने बड़े प्यार से अपना सिर दिलीप के सीने पर रख दिया।
"बेशरम" कुसुम मन ही मन बुड़बुड़ाई।
शॉट खत्म हुआ तो मामा ने कहा,"गुड्डो,जाओ ले लो ऑटोग्राफ?"
"नहीं नहीं मुझे नहीं लेना ऑटोग्राफ़।" वो रुआँसी हो कर बोली।
"अरे क्या हो गया?"
"कुछ नहीं।" वो कह कर बाहर चली गयी।
जब सब वापस आ गये तो वो सीधी अपने कमरे में पहुँची दराज़ से डायरी निकाली और डायरी से दिलीप के सारे फोटो निकाले और मसल-कुचल कर खिड़की से बाहर फेंक दिए।
"जाओ,जाओ,अपनी धन्नों के पास! तुम भी जाओ।"
और बिस्तर पर गिर कर फूट-फूट कर रोने लगी।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

अहंकार:एक रहस्यवादी कहानी


एक नदी है नाम है उसका मोत्जू। वैसे तो वह भी अन्य नदियों की तरह ही है। परंतु उसमें कुछ खास है तो वह है उसका शीतल जल और उसके किनारों पर सुंदर हरियाली। कहतें हैं यह दिव्य नदी है जो रूप बदल सकने में सक्षम है और कभी भी अपना रूप आकार बदल कर आस-पास के जीवन को प्रभावित कर सकती है।

इसी नदी के एक तट पर रहता है संतसू किसान। यह किसान भी अपने आप में सबसे अलग है क्योंकि  इसकी आवश्यकताएं सीमित हैं और चेहरे पर एक खुशी हर पल छायी रहती है। वह अपनी जरूरत  का सामान मोत्जू नदी के तट से लगते अपने एकमात्र खेत से पूरी कर लेता है। भूख लगती तो खेत के अन्न-फल खा कर तृप्त हो जाता है। प्यास लगती तो मोत्जू का शीतल जल पी कर प्यास बुझा लेता है। इस प्रकार मोत्जू नदी और संतसू का परस्पर गहन संबंध है।

एक बार मोत्जू नदी ने संतसू किसान की परीक्षा लेनी चाही कि देखूं संतसू मुझे कितना प्रेम करता है। गर्मियों के दिन हैं। संतसू अपने खेत में काम कर रहा है। प्यास लगी तो वह मोत्जू के तट पर आया और शीतल जल पीने लगा। तभी मोत्जू नदी ने अपना दिव्य रूप धारण किया और संतसू से पूछा, यदि मैं न होती तो क्या होता?  संतसू ने अपने स्वभावानुसार सहज ही कहा,"यदि तुम न होती तो कुछ न होता। हाँ,शायद मेरा यह खेत यहां न होकर कहीं ओर किसी दूसरी नदी के किनारे होता या फिर मुझे कूआं खोदना पड़ता।" 

यह जवाब देकर संतसू खेत में आ गया है। कुछ समय बाद ही संतसू को पुन: प्यास लगी। वह पानी पीने के लिए मोत्जू नदी के तट पर आया।

किंतु आश्चर्य! नहीं आश्चर्य किस बात का,मोत्जू तो दिव्य नदी है और दिव्य में आश्चर्य कैसा? संतसू ने देखा कि अब मोत्जू नदी के स्थान पर एक सड़ांधयुक्त तालाब है। जिसमें तरह-तरह के सूक्ष्म-लघु-बृहतकाय जीव-जीवाणु हैं। विभिन्न प्रकार के शैवाल हैं। जो सभी दुर्गंध छोड़ रहें हैं। तालाब बनी मोत्जू नदी का जल पूरी तरह दूषित है। जो पीने योग्य नहीं रहा। 

संतसू ने तालाब बनी दिव्य मोत्जू नदी से कहा,"तू बड़ी अहंकारी है। संतसू ने यह कहा और शांत गंभीर मुद्रा में उसी सड़ांधयुक्त दूषित वातावरण में बैठ गया और बस बैठा रहा। समय अबाध गति से चलता रहा और संतसू वहीं बैठा रहा। 

संतसू की फसलें मुर्झाने लगी,मोत्जू के तटों की हरियाली उजड़ने लगी। धीरे-धीरे वहां विरान सन्नाटा छा गया। पशु-पक्षी अन्यत्र चले गए। किंतु संतसू वहीं बैठा है--शांत,गंभीर एवं साक्षीत्व में। 

संतसू अब काफी कमजोर हो चुका है। भूख और प्यास से उसके हृष्ट-पुष्ट शरीर की जगह अब मात्र एक हड्डियों का ढांचा रह गया है। वह लगभग मरने के करीब पहुंच गया है।

तालाब बनी दिव्य मोत्जू से संतसू की यह दशा देखी न गई और वह अपने वर्तमान रूप को छोड़ कर पुन: अपने पूर्व रूप में आ गई। 

संतसू ने यह सब देखा। चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आय़ी किंतु क्षण में यह विदा हो गई। संतसू ने अपने में एक दिव्य बल अनुभव किया। वह उठा और फिर एक क्षण मोत्जू की ओर देखा तथा तत्क्षण वह घनी आबादी की ओर भाग पड़ा। यह सब बड़ी तीव्रता से हुआ और संभवत: इसी उन्मादवश वह पानी भी न पी सका। वह अपनी पूरी ताकत के साथ भाग रहा है और चिल्ला रहा है-"मैंने मोत्जू का अहंकार गिरा दिया...मैंने मोत्जू का अहंकार गिरा दिया।"आबादी के निकट आ कर संतसू गिर पड़ा है। चारों ओर भीड़ इकट्ठी हो गयी है और सभी देख रहें हैं कि संतसू के प्राण-पखेरू उड़ गए हैं। 

मोत्जू को संतसू के देहांत का पता चला और संतसू की स्थिरता पर आश्चर्य हुआ और कहते हैं उस दिन के बाद से मोत्जू ने फिर कभी किसी की परीक्षा न ली। 

लेखक यहां कहानी समाप्त करता है। किंतु फिर भी उसके मनस पटल पर कुछ प्रश्न विचर रहें हैं--
"क्या मोत्जू नदी वास्तव में अहंकारी है?"
"संतसू ने अंत में अपनी प्यास क्यों नहीं बुझायी?" 
"संतसू आबादी की ओर यह कहता हुआ क्यों दौड़ा कि मैंने नदी का अहंकार तोड़ दिया है? 

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

उच्च आत्मा की ओर:ओशो का आह्वाहन

हिंदुस्तान में दो विपरीत ढंग के प्रयोग पचास सालों से चले। (वर्ष 1967). एक प्रयोग गांधी ने किया। एक प्रयोग श्री अरविंद ने। गांधी ने एक-एक मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाने का प्रयोग किया। उसमें गांधी सफल होते हुए दिखाई पड़े,लेकिन बिलकुल असफल हो गए। जिन लोगों को गांधी ने सोचा था कि इनका चरित्र मैंने उठा लिया,वे बिलकुल मिट्टी के पुतले साबित हुए। जरा पानी गिरा और सब रंग-रौगन बह गया। बीस साल में रंग-रौगन बह गया। वह हम सब देख रहे हैं। कहीं कोई रंग-रौगन नहीं है। वह जो गांधी ने पोतपात कर तैयार किया था,वह वर्षा में बह गया। जब तक पद की वर्षा नहीं हुई थी तब तक उनकी शकलें बहुत शानदार मालूम पड़ती थी और उनके खादी के कपड़े बहुत धुले हुए दिखाई पड़ते थे और उनकी टोपियां ऐसी लगती थी कि मुल्क को ऊपर उठा लेंगी। लेकिन आज वे ही टोपियां मुल्क में भ्रष्टाचार की प्रतीक बन गई हैं। गांधी ने एक प्रयोग किया था,जिसमें मालूम हुआ कि वे सफल हो रहे हैं,लेकिन बिलकुल असफल हो गए। गांधी जैसा प्रयोग बहुत बार किया गया और हर बार असफल हो गया। 

श्री अरविंद एक प्रयोग करते थे जिसमें वे सफल होते हुए मालूम पड़े,लेकिन उनकी दिशा बिलकुल ठीक थी। वे यह प्रयोग कर रहे थे कि क्या यह संभव है कि थोड़ी-सी आत्माएं इतने ऊपर उठ जाएं कि उनकी मौजूदगी,दूसरी आत्माओं को ऊपर उठाने लगे और पुकारने लगे और दूसरी आत्माएं ऊपर उठने लगें। क्या यह संभव है कि एक मनुष्य की आत्मा ऊपर उठे और उसके साथ अन्य आत्माओं का स्तर ऊपर उठ जाए। यह न केवल संभव है,बल्कि केवल यही संभव है। दूसरी आज कोई बात सफल नहीं हो सकती। आज तो आदमी इतने नीचे गिर चुका है कि अगर हमने यह फिक्र की कि हम एक-एक आदमी को बदलेंगे तो शायद यह बदलाहट कभी नहीं होगी। बल्कि जो आदमी उनको बदलने जाएगा,उनके सत्संग में उसके खुद के बदल जाने की संभावना ज्यादा है। उसके बदले जाने की संभावना है कि वह भी उनके साथ भ्रष्ट हो जाएगा। आप देखते हैं कि जितने जनता के सेवक,जनता की सेवा करने जाते हैं,थोड़े दिनों में पता चलता है कि वे जनता की जेब काटने वाले सिद्ध होते हैं। वे गए थे सेवा करने,वे गए थे लोगों को सुधारने,थोड़े दिन में पता चलता है कि लोग उनको सुधारने का विचार करते हैं। 

मनुष्य जाति की चेतना का इतिहास यह कहता है कि दुनिया की चेतना किन्हीं कालों में एकदम ऊपर उठ गई थी,शायद आपको इसका अंदाज न हो। 2500 वर्ष पहले,हिंदुस्तान में बुद्ध पैदा हुए, प्रबुद्ध कात्यायन हुआ,मावली गोसाल हुआ,संजय विलाटीपुत्र हुआ। यूनान में सुकरात हुआ,प्लेटो हुआ,अरस्तू हुआ,प्लटनस हुआ। चीन में लाओत्से,कंफ्यूशस हुआ,च्वांगतसे हुआ। 2500 साल पहले सारी दुनिया में कुल दस-पंद्रह लोग इतनी कीमत के हुए कि उन एक सौ वर्षों में दुनिया की चेतना एकदम आकाश छूने लगी। सारी दुनिया का स्वर्ण युग आ गया,ऐसा मालूम हुआ। इतनी प्रखर आत्मा मनुष्य की कभी प्रकट नहीं हुई थी। महावीर के साथ पचास हजार लोग गांव-गांव घूमने लगे। बुद्ध के साथ हजारों भिक्षु खड़े हो गए और उनकी रोशनी और ज्योति गांव-गांव को जागाने लगी। जिस गांव में बुद्ध अपने दस हजार भिक्षुओं को लेकर पहुंच जाते,तीन दिन के भीतर उस गांव की हवा के अणु बदल जाते। जिस गांव में वे दस हजार भिक्षु बैठ जाते,जिस गांव में वे दस हजार भिक्षु प्रार्थना करने लगते उस गांव से जैसे अंधकार मिट जाता,जैसे उस गांव में रोशनी छा जाती,जैसे उस गांव के हृदय में कुछ फूल खिलने लगते,जो कभी नहीं खिले थे। कुछ थोड़े से लोग उठे ऊपर और उनके साथ ही नीचे के लोगों की आंखें ऊपर उठीं। नीचे के लोगों की आंखें तभी ऊपर उठती हैं जब ऊपर देखने जैसा कुछ हो। लेकिन ऊपर देखने जैसा कुछ भी नहीं है,नीचे देखने जैसा बहुत कुछ है। जो आदमी जितना नीचे उतर जाता है,उतनी बड़ी तिजोरी बना लेता है। जो आदमी जितना नीचे उतर जाता है वह उतने कीमती जवाहर खरीद लाता है। नीचे देखने जैसा बहुत कुछ है। दिल्ली बिलकुल गड्ढ़े में बस गई है। बिलकुल नीचे। वहां नीचे देखो,पाताल में दिल्ली है। तो जिसको दिल्ली पहुंचना हो उसको पाताल में उतरना चाहिए। नीचे-नीचे उतरते जाना चाहिए। ऊपर देखने जैसा कुछ नहीं है। किसकी तरफ देखेंगे,कौन है ऊपर? इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि ऊपर देखने जैसी आत्माएं ही नहीं हैं,जिनकी तरफ देखकर प्राण धिक्कारने लगे,अपने को कि यह प्रकाश तो मैं भी हो सकता था,ये फूल तो मेरे भीतर भी खिल सकते थे। यह गीत तो मैं भी गा सकता था। एक बार यह खयाल आ जाए कि मैं भी हो सकता था। यहां लेकिन कोई हो, जिसे देखकर यह खयाल आ जाए तो प्राण ऊपर की यात्रा शुरु कर देते हैं। स्मरण रहे प्राण हमेशा यात्रा करते हैं,अगर ऊपर की नहीं करते हैं तो नीचे की करते हैं। प्राण रुकते कभी नहीं या तो ऊपर जाएंगे या नीचे। रुकना जैसी कोई चीज नहीं है। ठहराव जैसी कोई चीज नहीं है,स्टेशन जैसी कोई जगह चेतना के जगत में नहीं है,जहां आप रुक जाएं और विश्राम कर लें। जीवन प्रति क्षण गतिमान है। ऊपर की तरफ चेतनाएं खड़ी करनी हैं।

मैं सारी दुनिया में एक आंदोलन चाहता हूँ। बहुत ज्यादा लोगों का नहीं,थोड़े से हिम्मतवर लोगों का,जो प्रयोग करने को राजी हों। अगर सौ आदमी हिंदुस्तान में प्रयोग करने को राजी हो और तय कर लें इस बात को कि हम आत्मा को उन ऊँचाइयों तक ले जाएंगे जहां आदमी का जाना संभव है। 20 वर्ष में हिंदुस्तान की शकल बदल सकती है। विवेकानंद ने मरते वक्त कहा था कि मैं पुकारता रहा सौ लोगों को,लेकिन वे सौ लोग नहीं आए और मैं हारा हुआ मर रहा हूँ। सिर्फ सौ लोग आ जाते तो मैं देश को बदल देता। विवेकानंद पुकारते रहे,सौ लोग नहीं आए। मैंने तय किया है कि मैं पुकारुंगा नहीं,गांव-गांव खोजूंगा,आंख-आंख में झांकूंगा कि वह कौन आदमी है। अगर पुकारने से नहीं आएगा तो तो खींचकर लाना पड़ेगा। सौ लोगों को भी लाया जा सके तो यह मैं आप लोगों को विश्वास दिलाता हूं कि उन सौ लोगों की उठती हुई आत्माएं एक एवरेस्ट की तरह,एक गौरीशंकर की तरह खड़ी हो जाएंगी। पूरे मूल्क के प्राण उस यात्रा पर आगे बढ़ सकते हैं।

जिन मित्रों को मेरी चुनौती ठीक लगती हो और जिनको साहस और बल मालूम पड़ता हो उस रास्ते पर जाने का जो बहुत अपरिचित है,उस रास्ते पर,उस समुद्र में,जिसका कोई नक्शा नहीं है हमारे पास। तो उसे समझ लेना चाहिए कि उसमें हिम्मत और साहस सिर्फ इसलिए है कि बहुत गहरे में परमात्मा ने उसको पुकारा होगा,नहीं तो इतना साहस और इतनी हिम्मत नहीं हो सकती थी। मिश्र में कहा जाता था कि जब कोई परमात्मा को पुकारता है तो उसे जान लेना चाहिए कि उससे बहुत पहले परमात्मा ने उसे पुकार लिया होगा अन्यथा पुकार ही पैदा नहीं होती। जिनके भीतर भी पुकार है,उनके ऊपर एक बड़ा दायित्व है। आज तो जगत के कोने-कोने में जाकर कहने की बात है कि कुछ थोड़े से लोग बाहर निकल आवें और सारे जीवन को ऊँचाइयां अनुभव करने के लिए समर्पित कर दें। जीवन के सारे सत्य,जीवन के आज तक के सारे अनुभव असत्य हुए जा रहें हैं। जीवन की आज तक की जितनी ऊँचाइयां थीं,जो छूई गई थीं,वे काल्पनिक हुई जा रही हैं,पुराण कथाएं हुई जा रही हैं। सौ-दो-सौ वर्ष बाद बच्चे इनकार कर देंगे कि बुद्ध और महावीर और क्राइस्ट जैसे लोग हुए थे,ये सब कहानियां हैं। एक आदमी ने तो पश्चिम में एक किताब लिखी है और उसने लिखा है कि क्राइस्ट जैसा आदमी कभी नहीं हुआ है। यह सिर्फ एक पुराना नाटक है। धीरे-धीरे लोग भूल गए कि ड्रामा है और लोग समझने लगे कि इतिहास है। अभी हम रामलीला खेलते हैं। हम समझते हैं कि राम कभी हुए और इसलिए रामलीला खेलते हैं। सौ वर्ष बाद बच्चे कहेंगे कि रामलीला लिखी जाती रही और लोगों में भ्रम पैदा हो गया कि राम कभी हुए। रामलीला एक नाटक रहा होगा। बहुत दिनों से चलता रहा क्योंकि जब हमारे सामने राम और बुद्ध और क्राइस्ट जैसे आदमी दिखाई पड़ने बंद हो जाएंगे तब हम कैसे विश्वास कर लेंगे कि ये लोग कभी हुए।

फिर आदमी का मन यह मानने को राजी नहीं होता कि उससे ऊँचे आदमी भी हो सकते हैं। आदमी का मन यह मानने को कभी भी राजी नहीं होता कि मुझसे ऊँचा भी कोई है। हमेशा उसके मन में यह मानने की इच्छा होती है कि मैं सबसे ऊँचा आदमी हूँ। अपने से ऊँचे आदमी को तो बहुत मजबूरी में मानता है,नहीं तो कभी मानता ही नहीं है। हजार कोशिश करता है खोजने की कि कोई भूल मिल जाए,कोई खामी मिल जाए,तो बता दूं कि वह आदमी भी नीचा है। तृप्त हो जाऊं कि नहीं यह बात गलत थी। कोई पता चल जाए तो जल्दी से घोषणा कर दूं कि पुरानी मूर्ति खंडित हो गई,वह पुरानी मूर्ति अब मेरे मन में नहीं रही,क्योंकि इस आदमी में यह गलती मिल गई। खोज इसी की चलती थी कि कोई गलती मिल जाए। नहीं मिल पाए तो ईजाद कर लो ताकि तुम निश्चिंत हो जाओ अपनी मूढ़ता में और तुम्हें लगे कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ। 

आदमी धीरे-धीरे सबको इनकार कर देगा। क्योंकि उनके प्रतीक,उनके चिह्न कहीं भी दिखाई नहीं पड़ते। पत्थर की मूर्तियां कब तक बताएंगी कि बुद्ध हुए थे और महावीर हुए थे और कागज पर लिखे गए शब्द कब तक समझाएंगे कि क्राइस्ट हुए थे और कब तक तुम्हारी गीता बता पाएगी कि कृष्ण थे। नहीं,ज्यादा दिन नहीं चलेगा। हमें आदमी चाहिए जीसस जैसे,कृष्ण जैसे,बुद्ध जैसे,महावीर जैसे। अगर हम वैसे आदमी आने वाले पचास वर्षों में पैदा नहीं करते हैं तो मनुष्य जाति एक अत्यंत अंधकारपूर्ण युग में प्रविष्ट होने को है। उसका कोई भविष्य नहीं है। जिन लोगों को भी लगता है कि जीवन के लिए कुछ कर सकते हैं,उनके लिए एक बड़ी चुनौती है और मैं तो गांव-गांव यह चुनौती देते हुए घूंमूंगा और जहां भी मुझे कोई आंखें मिल जाएंगी,लगेगा कि ये प्रकाश बन सकती हैं,इनमें ज्योति जल सकती है तो मैं अपना पूरा श्रम करने को तैयार हूँ। मेरी तरफ से पूरी तैयारी है। देखना है कि मरते वक्त मैं भी यह न कहूँ कि सौ आदमियों को खोजता था,वे मुझे नहीं मिले। 

(ओशो का वर्ष 1967ई. में दिया गया एक प्रवचनांश)  

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

स्त्री की सुंदरता का रहस्य

शायद आपको पता नहीं होगा,स्त्री पुरुषों से ज्यादा सुंदर क्यों दिखाई पड़ती है? शायद आपको खयाल न होगा,स्त्री के व्यक्तित्व में एक राउन्डनेस,एक सुडौलता क्यों दिखाई पड़ती है? वह पुरुष के व्यक्तित्व में क्यों नहीं दिखाई पड़ती? शायद आपको खयाल में न होगा कि स्त्री के व्यक्तित्व में एक संगीत,एक नृत्य,एक इनर डांस,एक भीतरी नृत्य क्यों दिखाई पड़ता है जो पुरुष में नहीं दिखाई पड़ता। 

एक छोटा-सा कारण है। एक छोटा सा,इतना छोटा है कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इतने छोटे-से कारण पर व्यक्तित्व का इतना भेद पैदा हो जाता है। मां के पेट में जो बच्चा निर्मित होता है उसके पहले अणु में चौबीस जीवाणु पुरुष के होते है और चौबीस जीवाणु स्त्री के होते हैं। अगर चौबीस-चौबीस के दोनों जीवाणु मिलते हैं तो अड़तालीस जीवाणुओं का पहला सेल(कोष्ठ)निर्मित होता है। अड़तालीस सेल से जो प्राण पैदा होता है वह स्त्री का शरीर बन जाता है। उसके दोनों बाजू 24-24 सेल के संतुलित होते हैं।

 पुरुष का जो जीवाणु होता है वह सैंतालिस जीवाणुओं का होता है। एक तरफ चौबीस होते हैं,एक तरफ तेइस। बस यहीं संतुलन टूट गया और वहीं से व्यक्तित्व का भी। स्त्री के दोनों पलड़े व्यक्तित्व के बाबत संतुलन के हैं। उससे सारा स्त्री का सौंदर्य,उसकी सुड़ौलता,उसकी कला,उसके व्यक्तित्व का रस,उसके व्यक्तित्व का काव्य पैदा होता है और पुरुष के व्यक्तित्व में जरा सी कमी है। क्योंकि उसका तराजू संतुलित नहीं है,तराजू का एक पलड़ा चौबीस जीवाणुओं से बना है तो दूसरा तेईस का। मां से जो जीवाणु मिलता है वह चौबीस का बना हुआ है और पुरुष से जो मिलता है वह तेईस का बना हुआ है। पुरुष के जीवाणुओं में दो तरह के जीवाणु होते हैं: चौबीस कोष्ठधारी और तेईस कोष्ठधारी। तेईस कोष्ठधारी जीवाणु अगर मां के चौबीस कोष्ठधारी से मिलता है तो पुरुष का जन्म होता है और यदि पुरुष के चौबीस कोष्ठधारी स्त्री के चौबीस कोष्ठधारी से मिलता है तो स्त्री का जन्म होता है। निश्चित ही स्त्री के गर्भ में पल रहा बच्चा स्त्री होगा या पुरुष,इसके लिए जिम्मेवार स्त्री नहीं बल्कि पुरुष है। चूंकि पुरुष की पैदाइश एक असंतुलन से होती है,इसलिए पुरुष में एक बेचैनी जीवन भर बनी रहती है,एक असंतोष बना रहता है। क्या करुं,क्या न करुं,एक चिन्ता,एक बेचैनी,यह कर लूं,वह कर लूं। पुरुष की जो बेचैनी है वह एक छोटी सी घटना से शुरु होती है और वह घटना है कि उसके एक पलड़े पर एक अणु कम है। उसके व्यक्तित्व का संतुलन कम है। स्त्री का संतुलन पूरा है,उसकी लयबद्धता पूरी है। इतनी सी घटना इतना फरक लाती है। इससे स्त्री सुंदर तो हो सकी लेकिन विकासमान नहीं हो सकी; क्योंकि जिस व्यक्तित्व में समता है वह विकास नहीं करता,वह ठहर जाता है।पुरुष का व्यक्तित्व विषम है। विषम होने के कारण वह दौड़ता है,विकास करता है। एवरेस्ट चढ़ता है,पहाड़ पार करता है,चांद पर जाएगा,तारों पर जाएगा,खोजबीन करेगा,सोचेगा,ग्रंथ लिखेगा,धर्म-निर्माण करेगा। स्त्री यह कुछ भी नहीं करेगी। न वह एवरेस्ट पर जाएगी,न वह चांद-तारों पर जाएगी,न वह धर्मों की खोज करेगी,न ग्रंथ लिखेगी,न विज्ञान की शोध करेगी। वह कुछ भी नहीं करेगी। उसके व्यक्तित्व में एक संतुलन उसे पार होने के लिए तीव्रता से नहीं भरता है। पुरुष ने सारी सभ्यता विकसित की। इस एक छोटी सी जैविक परिघटना के कारण। उसमें एक अणु कम है। स्त्री ने सारी सभ्यताएं विकसित नहीं की। उसमें एक अणु पूरा है। इतनी सी जैविक परिघटना व्यक्तित्व का भेद ला देती है।

बुधवार, 4 जुलाई 2012

बुद्ध की संगति का लोभ

ऐसी कथा है कि एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण शिष्य सारिपुत्र बुद्ध से दूर-दूर बैठता था। जबकि स्वभावतः लोग पास-पास बैठने कि कोशिश करते हैं। सारिपुत्र छिप-छिप कर बैठता था, कहीं झाड़ की आड़ में,कहीं भीड़ की आड़ में। और दस हजार शिष्यों में बहुत आसान था छिप- छिप कर बैठ जाना। एक दिन आखिर बुद्ध ने उसे पकड़ ही लिया और कहा कि सारिपुत्र,यह तुम क्या कर रहे हो? सारिपुत्र ने कहा ,मुझे छोड़ दो, मुझे छिपा रहने दो। पर बुद्ध ने कहा,मामला क्या है?

सारिपुत्र ने कहा कि मै बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं होना चाहता। बुद्ध ने कहा,तुम पागल हो गए हो? तुम मेरे पास आए इसलिए थे कि बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाओ। उसने कहा,आया था वह मेरी गलती थी। जाने वाला नहीं हूँ; क्योंकि मै देखता हूँ रोज-रोज जो जो बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाते हैं उनसे आप कहते हैं,जाओ, अब मेरे सन्देश को दूर दूर पहुंचाओ। मै तो रोज-रोज डुबकी लूँगा,मै बुद्धत्व छोड़ सकता हूँ; लेकिन आपमें डुबकी लेना नहीं छोड़ सकता हूँ। अगर वचन देते हों कि मेरे बुद्धत्व के बाद भी मुझे इन चरणों में बैठने का हक़ होगा तो मै छिपना छोड़ दूँ। अन्यथा मै छिपता रहूँगा,अन्यथा मै बचता रहूँगा। मैं बहुत बार बुद्धत्व के किनारे पहुँच गया हूँ और ऐसा भागा हूँ कि मैंने पीछे लौटकर नहीं देखा। मुझे पक्का पता है कि मंदिर कहाँ है। उसी मंदिर की ओर से बच-बच कर चल रहा हूँ। मुझे मत सताओ।


बुद्ध ने तब उसे वचन दिया कि तू फ़िक्र छोड़। तू भी खूब आदमी है। तू मज़े से बैठ,जहाँ तुझे बैठना है। तेरे बुद्धत्व के बाद भी तू मेरे साथ ही चलेगा। तुझे मैं अपनी छाया की तरह साथ रखूँगा। सारिपुत्र ने कहा,आश्वासन? कोई धोखाधड़ी तो नहीं है? लेकिन उसे पक्का विश्वास नहीं आया।

वह बुद्ध के पास बैठने लगा,और एक दिन बुद्धत्व को उपलब्द्ध भी हुआ लेकिन उसने बुद्ध से निवेदन नहीं किया कि मैंने उसे पा लिया है जिसे खोजने निकला था। बुद्ध ने कहा,सारिपुत्र!!! कम से कम कह तो दे। सारिपुत्र ने कहा,मै अपने मुंह से न कहूँगा। मुझे अज्ञानी ही रहने दो।बुद्ध ने कहा,मगर तू अब अज्ञानी नहीं है,तू बुद्ध हो गया है.और वे बातें जो मैंने तुझसे कहीं थीं ,तेरे अज्ञान में कहीं थीं। उसने कहा,देख रहे हैं,मैंने पहले ही कहा था,धोखाधड़ी नहीं चलेगी। मैं मर जाऊं मगर इस जगह को नहीं छोडूंगा।यह डुबकी, इसके बिना बुद्धत्व भी मुझे मीठा नहीं है। 

रविवार, 24 जून 2012

शून्यता

( ध्यानमय जीवन के लिए अब तक हमने पिछली पोस्टों में सरलता,सजगता की बात की है। आज की इस पोस्ट में प्रस्तुत है ध्यानमय जीवन  का तीसरा सूत्र: शून्यता) 

तीसरा सूत्र है: शून्यता। जितना शून्य होंगे उतनी सजगता गहरी होगी। सरलता उत्पन्न होती है सजगता से     और सजगता उत्पन्न होती है शून्यता से। शून्यता चरम बिंदु है। शून्यता साधना का केंद्र बिंदु है। शून्य हो जाएं। शून्य होने का मतलब है जो हो रहा है चारों तरफ, उसके प्रति मरना सीखें।

एक छोटी सी कहानी कहूं तो शायद समझ आ जाए। जापान  में एक संन्यासी हुआ। एक ऐसा दरिद्र भिखारी,जो टोकियो राजधानी में एक नीम के झाड़ के नीचे पड़ा रहता था। वर्ष आए और गए,वह वहीं पड़ा रहा। लाखों हजारों लोग उसे मानते थे और उसे श्रद्धा देते थे। स्वयं बादशाह भी उसे श्रद्धा देता था और उसका आदर करता था। एक दिन बादशाह आया और उसके चरण छुए और कहा कि कृपा करें,मेरे महल में चलें। यहां पड़े रहने से क्या? बरसात भी है,शरीर आपका वृद्ध हो गया है,धूप आती है,तकलीफ होती है,सर्दी आती है। मुझ पर कृपा करें और तुरंत मेरे महल में चलें।

साधु ने अपनी चटाई लपेटी और खड़ा हो गया। राजा बहुत हैरान हुआ। साधु इतनी जल्दी तैयार हो गया! कैसा साधु है,कैसा संन्यासी है? एक दफ़ा भी ऐसा नहीं कहा कि यह संसार सब माया है,महल से क्या लेना-देना है। हमने तो लात मार दी। हम तो झोंपड़े में रहने वाले फकीर है,हम तो मग्न रहते हैं,हमको क्या मतलब? ऐसा कहता तो मालूम पड़ता कि संन्यासी है। और जिन-जिन को संन्यासी मालूम पड़ना हो,उन को ऐसा कहना पड़ता है।

वह संन्यासी तो खड़ा हो गया। उसने कहा,महाराज चलें। वह तो आगे हो गया और बादशाह बहुत चिंतित हुआ। बड़े उत्साह से लेने गया था,लेकिन चित्त एकदम फीका हो गया कि किस आदमी को ले जा रहा हूं। यह भी गलती हो गई। यह तो धोखा हो गया। लेकिन जब खुद ही आमंत्रण दिया था,खुद ही बुलाया था,इसलिए इंकार भी बीच रास्ते में कैसे करे। महल में ले गया,बड़ी अच्छी व्यवस्था की थी। जो व्यवस्था स्वयं राजा की थी,वैसी ही व्यवस्था उसकी थी।

लेकिन राजा का संदेह प्रतिक्षण बढ़ने लगा। जो जो दिया,उसने स्वीकार कर लिया और जो शाही बिस्तरे दिए उन पर सो गया। नौकर-चाकर दिए,उनकी सेवाएं अंगीकार कर ली। राजा तो हैरान हुआ कि यह आदमी कैसा है? यह तो बिलकुल ही गलत आदमी मालूम होता है। क्या यह उसकी प्रतीक्षा में ही बैठा हुआ था? क्या सब ढ़ोंग था,धोखा था? यह सारी फकीरी क्या बरसों से प्रतीक्षा कर रही थी कि राजा कब आमंत्रण दे और मैं चलूं। रात मुश्किल में बीती। संन्यासी तो मजे से सोया पर राजा नहीं सो सका। सुबह होते ही राजा ने कहा कि संत जी,बड़ी शंका मन में उठी है। जब तक निवारण न हो, मैं बड़ी दिक्कत में पड़ गया हूं। एक शंका उठी है,उसे प्रकट करने की आज्ञा दें।

संन्यासी हंसने लगा। उसने कहा-तुम्हें शंका अब प्रकट हुई? मुझे वहीं हो गई थी। जैसे ही मैं खड़ा हुआ, मैं समझा तुमने निमंत्रण वापस ले लिया। फिर तो मजबूरी से यहां तक ले आए हो। पूछ लो,शंका का निवारण कर लो। राजा ने कहा कि रात मैं यही सोचता रहा कि आप कैसे संन्यासी हैं? संन्यासी ने कहा कि थोड़ा एकांत होगा तो सरलता होगी बतलाने में। राजा ने कहा भेद तो जानना ही है। मुझमें और आपमें क्या भेद रहा,इस रात? कल तक तो भेद था। आप नीम के नीचे थे,भिखारी थे, भिखमंगे थे। खाने के बर्तन को सिर के नीचे रखकर सो जाते थे। मैं महल में था तो राजा था,आप भिखमंगे थे कल तक;तो बहुत भेद था। आप संन्यासी थे,मैं भोगी था। लेकिन आज रात कोई भेद मुझे दिखाई नहीं पड़ता। संन्यासी खूब हंसने लगा। और कोई भी संन्यासी हंसेगा,क्योंकि अगर भेद इतना ही है कि एक के पास बहुत बिस्तर हैं और एक के पास बहुत बिस्तर नहीं हैं; एक दरख्त के नीचे सोता है और एक महलों में। अगर भेद इतना ही हो,तो संन्यास और संसार में भेद किस मूल्य का हुआ? कोई भेद है ही नहीं।

संन्यासी बहुत हंसा। उसने कहा कि गांव के बाहर चलें। वे दोनों गांव के बाहर गए। बार-बार थोड़ी-थोड़ी दूर पर राजा पूछने लगा,उत्तर दे दें। अब तो गांव से बाहर आ गए। संन्यासी ने कहा,थोड़ा और आगे,थोड़ा और आगे। दोपहर हो गई। सूरज ऊपर आ गया तो राजा ने कहा-क्या कर रहें हैं! आपको उत्तर देना है कि नहीं? यह और आगे से क्या मतलब होगा? संन्यासी ने कहा,और आगे ही उसका उत्तर है। अब मैं आगे ही जाऊंगा,पीछे नहीं लौटूंगा। आप भी मेरे साथ चलते हैं। राजा ने कहा-मैं कैसे चल सकता हूं? पीछे मेरा महल,मेरा राज्य है। संन्यासी ने कहा-पीछे न मेरा महल है न मेरा राज्य है और इतना ही भेद है। जब रात तुम्हारे भवन में मैं सोया तो मैं बिल्कुल उतना ही शून्य था जितना जब मैं नीम के नीचे सोता था। इतना ही भेद है। इसे स्मरण रखें,इसे हृदय के किसी कोने में बैठ जाने दें। इतना ही भेद है कि जब तुम्हारे महल में सोया उतना शून्य था जितना जब मैं नीम के नीचे सोता था। मेरी शून्यता वही थी,वही भेद है,तुम्हारे भीतर शून्यता नहीं है। जो तुम्हारे पास आता है उसी से तुम भर जाते हो। महल से भरे हुए हो। तुम कहते हो पीछे मेरा महल है,तुम कहते हो पीछे मेरा राज्य है। तुम जब मरोगे तब भी कहोगे कि पीछे मेरा सब कुछ गया। तुम रोते हो कि कहां मुझे लिए जा रहे हो। और मैं जब मरूंगा तो ऐसा ही चला जाऊंगा आगे,क्योंकि मेरे पीछे कुछ भी नहीं है। पीछे वही है जो भीतर हो और जो भीतर न हो वह पीछे भी नहीं है। बाहर भी वही है जो भीतर हो। जो भीतर न हो बाहर भी कुछ नहीं है। जो शून्य हो जाते हैं,उनके लिए संसार मोक्ष हो जाता है। जो शून्य हो जाते हैं उनके लिए संसार परमात्मा हो जाता है। जो शून्य हो जाते हैं उनके लिए यहीं सब कुछ उतर आता है,जिसकी आपको तलाश और खोज है। लेकिन शून्य हो जाना जरूरी है।

क्यों? क्योंकि जब वर्षा का पानी गिरता है और आकाश में मेघ इकट्ठे होते हैं और बूंदे बरसती हैं तो वह पानी की बूंदे टीलों पर या पहाड़ों पर इकट्ठी नहीं होती,गड्ढ़ों में इकट्ठी हो जाती हैं। जो टीले की भांति हैं,जिनका अहंकार उठा हुआ है,उन पर पानी तो गिरेगा लेकिन बहकर नीचे निकल जाएगा,इकट्ठा नहीं होगा। और जो गड्ढ़ों की भांति खाली और शून्य हैं उनमें भर जाएगा। जो शून्य है,वह ग्रहण करता है परमात्मा को और जो भरा है संसार से वह इंकार कर देता है,अस्वीकार कर देता है।

द्वार खोलना है तो शून्य हो जाएं। भीतर बिल्कुल खाली हो जाएं। जैसे वहां कुछ न हो। सामान वहां इकट्ठा न करें। फर्निचर अपने घर में लाएं, पर उसे अपने भीतर न लाएं। चीजें अपने बाहर लाएं लेकिन भीतर न लाएं। बाहर सब होने दें लेकिन भीतर खाली रहने दें। रोज सांझ को जो इकट्ठा किया उसे बाहर कर दें। झाड़ लें अपने को। बिलकुल साफ कर लें अपने को।


शुक्रवार, 8 जून 2012

सजगता से सरलता : साक्षी की साधना

अखंड जीवन ही सरल जीवन है। समग्र-इन्टीग्रेटेड-जीवन ही सरल जीवन है। इसे पहचानने का रास्ता है: सजगता। सजगता का अर्थ है:अवेयरनेस,होश,भान,आत्मभान। जिस व्यक्ति का आत्मभान जितना जागृत होगा वह उतना ही सरल और अखंड हो जाता है। आत्मभान का क्या अर्थ है? होश का क्या अर्थ है? आत्मभान या अमूर्च्छा या अप्रमाद का अर्थ है--जीवन के जितने भी अनुभव हैं उनके साथ एक न हो जाएं;उनसे दूर बनें रहें,उनके द्रष्टा बनें रहें। जैसे मैं इस भवन में बैठा हूं। प्रकाश जला दिया जाए तो भवन में प्रकाश भर जाएगा। प्रकाश मुझे घेर लेगा। दो भूलें मैं कर सकता हूं। यह भूल कर सकता हूं कि मैं समझ लूं कि मैं प्रकाश हूं,क्योंकि प्रकाश कमरे में भरा हुआ है। फिर प्रकाश बुझा दिया जाए तो अंधकार आ जाएगा। फिर मैं यह भूल कर सकता हूं कि मैं अंधकार हूं। यह भूल है। क्यों? क्योंकि प्रकाश आया तब भी मैं यहां था;प्रकाश चला गया तब भी मैं यहां यहां था। अंधकार आया तब भी मैं यहां हूं। अंधकार चला जाए तब भी मैं यहां रहूंगा। तो मेरा जो मैं है,वह न तो प्रकाश है,न अंधकार है। सुख आते हैं,चले जाते हैं। दु:ख आते हैं,चले जाते हैं। सम्मान मिलता है,चला जाता है। अपमान मिलता है,चला जाता है।  जो आता है और चला जाता है,वह मैं नहीं हो सकता। 

तो जीवन के प्रत्येक अनुभव में,घृणा में,अशांति में,शांति में,सुख में,दु:ख में,मान में,सम्मान में--यह स्मरण,यह स्मृति कि जो भी घटित हो रहा है वह मैं नहीं हूं,मैं केवल उसका देखने वाला हूं--मैं देख रहा हूं कि अपमान किया जा रहा है और मैं देख रहा हूं कि सम्मान किया जा रहा है,और मैं देख रहा हूं कि दु:ख आया और मैं देख रहा हूं कि सुख आया और मैं देखता हूं कि रात हुई और मैं देखता हूं कि दिन हुआ। सूरज उगा और सूरज डूबा। मैं केवल देखने वाला हूं। मैं केवल साक्षी हूं। जो हो रहा है उससे मेरा इससे ज्यादा कोई संबंध नहीं कि मैं देख रहा हूं। अगर क्रमश: यह स्मृति और यह भान विकसित होने लगे कि मैं केवल देखने वाला हूं तो धीरे-धीरे आप पाएंगे कि आपकी अखंडता आ रही है और खंडता जा रही है। खंड होना बंद हो जाएगा। खंड-खंड वे होते हैं,जो किसी दृश्य को देखते ही उस के साथ एक हो जाते हैं। इसलिए द्रष्टा यदि दृश्य के साथ एक हो जाए तो जीवन खंड हो जाता है। द्रष्टा दृश्य से अलग हो जाए तो जीवन अखंड हो जाता है। 

सारा योग,सारे धर्म,सारे मार्ग,सारी पद्धतियां जो मनुष्य को परमात्मा तक पहुंचाती हैं,बुनियादी रूप से इस बात पर खड़ी हैं कि मनुष्य अपनी चेतना को साक्षी समझ ले। मनुष्य केवल दर्शक मात्र रह जाए। लेकिन हम तो अजीब पागल लोग हैं। हम तो नाटक देखें या फिल्म देखें वहां भी दृश्य ही रह जाते हैं। वहां भी हम भोक्ता हो जाते हैं। अगर नाटक में कोई दु:ख का दृश्य आता है तो हमारी आंखों से आंसू बहने लगता है। हम द्रष्टा नहीं रह गए,हम भोक्ता बन गए। हम सम्मिलित हो गए नाटक में। हम नाटक के पात्र हो गए। नाटकगृह में बैठकर ऐसे बहुत कम लोग हैं,जो नाटक के पात्र न हो जाएं। कोई रोने लगता है,कोई हंसने लगता है,कोई दुखी और प्रसन्न हो जाता है। वह जो मंच पर हो रहा है या पर्दे पर हो रहा है,जहां कि विद्युत घरों के सिवा और रोशनी के खेल के सिवा कुछ भी नहीं है,वहां भी रोना,दुखी होना और पीड़ित होना आपके भीतर शुरु हो जाता है। आपको आदत पड़ी है कि दृश्य के साथ एक हो जाएं। धर्म कहता है कि जीवन का जो दृश्य है वहां भी एक न रह जाएं और हम ऐसे पागल हैं कि नाटक के जो दृश्य होते हैं वहां भी एक हो जाते हैं। जीवन का जो बृहत्तर नाटक चल रहा है;वह नाटक से ज्यादा नहीं है। क्यों हम उसे कह कह रहें हैं कि नाटक से ज्यादा नहीं है? इसलिए नहीं कि उसके मूल्य को कम करना चाहते हैं,बल्कि इसलिए कि उसका जो ठीक-ठीक मूल्य है वही आंकना चाहते हैं।

सुबह मैं जागता हूं तो जो देखता हूं वह सच मालूम होने लगता है और रात में सोता हूं तो जो सपना होता है वह सच मालूम होने लगता है। सपने में जाते हैं तो संसार झूठा हो जाता है। सब भूल जाता हूं,कुछ याद नहीं रहता। और सपने के बाहर आते हैं, तो संसार सच हो जाता है और सपना झूठा हो जाता है। इसलिए जो जानते हैं, वह इस यात्रा में एक सपने से दूसरे सपने में आते हैं और फिर मृत्यु में सब सपना हो जाता है। अभी पीछे उलटकर देखें अपने जीवन को,तो जो जाना था और देखा था,क्या ठीक-ठीक याद पड़ते हैं कि वह सपने में देख रहा था या सच में देख रहा था? सिवा स्मृति के और क्या निशान रह गए हैं? पीछे लौटकर अगर कोई मृत्यु के कगार पर देखे तो क्या उसे याद पड़ेगा कि जो मैंने जीवन में जाना वह सच था या सपना था;क्योंकि निशान कहां हैं? केवल स्मृति में रह गए हैं। सपना भी स्मृति में निशान छोड़ जाता है और संसार भी,और अगर स्मृति/पहचान न रह जाए तो दोनों मिट जाएंगे।

एक आदमी ट्रेन से गिर पड़ा था। ट्रेन से गिरते ही उसकी स्मृति विलीन हो गई। फिर उसने पहचानना बंद कर दिया था--कोन उसकी पत्नी है,कौन उसका पिता है। मैं उससे मिलने गया तो वह मुझे नहीं पहचान सका। क्या हो गया? स्मृति विलीन हो गई। उसे सपने भी भूल गए,जो उसने पहले देखे थे,और वह जिंदगी भी भूल गई जो उसने देखी थी; जिसकी रेखाएं केवल स्मृति पर रह जाती हैं। और स्मृति के न रहने से जिसका सब मिट जाए उसे सपने से ज्यादा क्या कहेंगे? जो केवल स्मृति में है उसे सपने से ज्यादा और कहने का प्रयोजन क्या है? और मौत सब स्मृति पोंछ देती है और सब जो जाना था,जो जिया था वह सपना हो जाता है। यह जो जगत का बड़ा सपना है,इस सपने के प्रति बोध और सजगता चाहिए।

यह जानना कि जो मैं देख रहा हूं,वह दृश्य है और मैं अलग हूं,मैं पृथक और भिन्न हूं। सुबह से शाम तक,उठते-बैठते,सोते- जागते,बोलते-चुप रहते,खाते-पीते,चलते-फिरते हर वक्त धीमे-धीमे इस स्मरण को गहरा करना होगा कि मैं अलग हूं; जो हो रहा है वह अलग है। धीरे-धीरे वह घड़ी आएगी,जब आप अपने भीतर एक अलग चेतना की ज्योति का अनुभव करेंगे जो सारे अनुभवों से पृथक है और तब जीवन एकदम सरल हो जाएगा। तब आप पाएंगे,आप एकदम सरल हो गए हैं,एकदम इनोसेंट--जैसे छोटे बच्चे। और छोटा बच्चा हुए बिना कोई उपलब्धि नहीं है। बूढ़े जब बच्चे हो जाते हैं तभी वे परमात्मा को पा लेते हैं। इतनी सरलता सजगता से उत्पन्न हो सकती है।

सोमवार, 4 जून 2012

अखंड का बोध

एक भारतीय साधु सारी दुनिया की यात्रा करके वापस लौटा था। वह भारत आया और हिमालय की एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ। उस रियासत के राजा ने साधु के पास जाकर कहा,"मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं। मैंने बहुत से लोगों के प्रवचन सुने हैं,बहुत सी बातें सुनी हैं,सब मुझे बकवास मालूम होती है। मुझे नहीं मालूम होता है कि ईश्वर है और जब भी साधु-संन्यासी मेरे गांव में आते हैं,तब उनके पास जाता हूं और उनसे पूछता हूं। अब मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि ईश्वर के संबंध में मुझे कोई व्याख्यान नहीं सुनने हैं,मैंने काफी सुन लिए हैं। तो आपसे यह पूछने आया हूं कि अगर ईश्वर है,तो मुझे मिला सकते हैं?"

वह संन्यासी बैठा चुपचाप सुन रहा था। वह बोला-"अभी मिलना है या थोड़ी देर ठहर सकते हो?" राजा एकदम अवाक् रह गया। उसको आशा नहीं थी कि कोई आदमी कहेगा कि अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर सकते हैं। राजा ने समझा कि समझने में भूल हो गई होगी। संन्यासी कुछ गलत समझ गया है। राजा ने दोबारा कहा-"शायद आप ने ठीक से नहीं समझा। मैं ईश्वर की बात कर रहा हूं,परमेश्वर की।" संन्यासी ने कहा-मैं तो उसके सिवा किसी की बात ही नहीं करता। अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं?"

उस राजा ने कभी नहीं सोचा था कि वह ऐसा पूछेगा,तो क्या उत्तर दूंगा? उसने कहा-"आप कहते हैं तो मैं अभी ही मिलना चाहता हूं।" संन्यासी ने कहा,"तो एक काम करें; यह कागज है,इस पर थोड़ा लिख दें कि आप कौन हैं,ताकि परमात्मा तक खबर भेज दूं। क्योंकि यह तो आप मानेंगे ही कि जो आपसे भी कोई मिलने आता है,तो आप पूछ लेते हैं कौन है,क्या है?" राजा ने कहा,"यह तो ठीक है। यह तो नियमबद्ध है।" उसने अपने राज्य और भवन का पता उस संन्यासी को दिया।

वह संन्यासी हंसने लगा और उसने कहा,"दो तीन बातें पूछनी जरूरी हो गई हैं। इस कागज में जो भी आपने लिखा है,वह असत्य है।" तब राजा बोला-"असत्य! आप क्या पागलपन की बात कर रहें हैं! मैं राजा हूं और जो नाम मैंने लिखा है,वही मेरा नाम है।" संन्यासी ने कहा,"मुझे तो बिलकुल ही असत्य मालूम होता है। आप न राजा हैं और न आपने जो नाम लिखा है वह आपका है।" वह राजा बोला-"आप अजीब आदमी मालूम होते हैं। पहले तो आपने कहा कि ईश्वर से अभी मिला दूंगा। वह भी मुझे पागलपन की बात मालूम पड़ी। और दूसरे यह कि अब मैं कह रहा हूं कि मैं इस क्षेत्र का राजा हूं,मेरा यह नाम है,तो उससे इनकार करते हैं।"

संन्यासी ने कहा-"थोड़ा सोचें। अगर आपका नाम दूसरा हो तो क्या फर्क पड़ जाएगा? आपके मां-बाप ने 'आ' नाम दे दिया और यदि मैं 'बा' नाम दे देता,तो क्या फर्क पड़ जाता? आप जो थे,वही रहते कि बदल जाते? आपको अगर हम दूसरा नाम दे दें तो आप बदल जाएंगे?" उस राजा ने कहा-"नाम बदलने से मैं कैसे बदलूंगा?" संन्यासी ने कहा-"जिस नाम के बदलने से आप नहीं बदलते,निश्चित ही नाम कुछ और है,आप कुछ और हैं। आज आप उस नाम से अलग हैं और फिर आप राजा हैं,कल अगर इसी गांव में भिखारी हो जाएं तो बदल जाएंगे? फिर आप-आप नहीं रहेंगे?" राजा बोला-"मैं तो फिर भी रहूंगा। राज्य नहीं रहेगा,धन नहीं रहेगा,राजा नहीं रहेंगे,भिखारी हो जाऊंगा,मेरे पास कुछ नहीं रहेगा,लेकिन मैं तो जो हूं वही रहूंगा।" 

संन्यासी बोला-"फिर राजा होने का कोई मतलब नहीं रहा। फिर आपकी सत्ता से उसका कोई संबंध नहीं। वह तो ऊपरी खोल है,बदल जाए तो भी नहीं बदलेंगे। यह कपड़े मैं पहने हूं तो मैं यह थोड़े कहूंगा कि यह कपड़ा मैं हूं। क्यां नहीं कहूंगा? क्योंकि कपड़े दूसरे पहन लूं तब भी मैं मैं ही बना रहूंगा।" संन्यासी ने फिर कहा,"फिर राजा होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह आपका परिचय नहीं हुआ,क्योंकि जो परिचय आपने दिया है,उसके बदल जाने पर भी आप नहीं बदलते हैं। अत: आपका परिचय कुछ और होना चाहिए,जिसके बदलने पर आप न बदल जाएं,वही आप हो सकते हैं। और जब तक आप वह परिचय न देंगे तो मैं कैसे परमात्मा को कहूं कि कौन मिलने आया है,किसको मिलाऊं? परमात्मा तो मौजूद है,लेकिन मिलाऊँ किसको। मिलने वाला मौजूद नहीं है। क्योंकि मिलने वाला बंटा हुआ है-बहुत से टुकड़ों में खंडों में। वह इकट्ठा नहीं है,वह राजी नहीं है,वह खड़ा नहीं है। कौन है जो मिलना चाहता है? आप ईश्वर को खोजते हैं,लेकिन कौन हैं आप?"

अपने खंडों को इकट्ठा करना होगा। कैसे वे खंड इकट्ठे होंगे,क्योंकि अगर सच में खंड हो गए हैं तो कैसे इकट्ठे होंगे? कितने ही उनको पास लाएं तब भी वे खंड बने रहेंगे। अगर सच में ही आप खंडित हैं तो फिर अखंड नहीं हो सकते। क्योंकि खंडों को कितने ही करीब लाओ उनके बीच फिर भी फासला बना रहेगा। वैज्ञानिक कहते हैं कि दो अंगों को कितने ही करीब लाओ,फिर भी फासला दोनों के बीच बना ही रहेगा। यह ठीक ही कहते हैं,क्योंकि कितने ही करीब लाओ,बीच में फासला होगा ही। यदि फासला न हो तो दोनों एक ही हो जाएंगे। तो खंडों को कितने भी करीब लाओ अखंड नहीं बन सकते हैं,खंडों का जोड़ ही होगा।

इसका अर्थ है कि आप वस्तुत: अखंड हैं। खंड होना आपका भ्रम है। भ्रम टूट सकता है और आप इसी क्षण अखंडता को पा सकते हैं। आप खंडित हो नहीं गए हैं,खंडित मालूम हो रहे हैं। मैं एक पहाड़ पर गया था और वहां एक महल में लोग मुझे ले गए थे। एक बड़ा गुंबज था और उस गुंबज में कांच के छोटे-छोटे लाखों टुकड़े लगे थे। मैं वहां खड़ा हुआ। मुझे लाखों अपनी तस्वीरें दिखाई पड़ने लगी,टुकड़े-टुकड़े में। और फिर हमने वहां दिया जलाया तो लाख दीए जलने लगे-कांच के टुकड़े-टुकड़े में। अब अगर उस दिए को न देखूं जिसको हाथ में लिए हूं और उन कांच पर प्रतिबिंबित हजारों दीयों को देखूंगा तो मैं समझूंगा कि इस भवन में लाखों दीए जल रहे हैं और अगर मैं हाथ के दिए को देखूं तो मैं पाऊंगा कि एक ही दिया जल रहा है। 

जो व्यक्ति अपने अनुभव के दर्पण में,अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के दर्पण में क्षण-क्षण प्रवाही जीवन के दर्पण में अपनी तस्वीर को देखता है,उसे हजार-हजार टुकड़े खुद के मालूम होंते हैं। और अगर वह उनको न देखे,उसको देखे जो पीछे बैठा है,सबके अनुभवों में नहीं बल्कि अनुभोक्ता में;दृश्यों में नहीं बल्कि द्रष्टा में;जो चारों तरफ घटित हो रहा है उसमें नहीं जिसके ऊपर घटित हो रहा है उसमें,तो पाएंगे वह एक है और वहां अखंडता है। चित्त अनेक हैं,चेतना एक है। चित्त प्रतिफलित है,चेतना एक है। जिसका प्रतिफलन है उसे पकड़ना होगा। अगर उसे पकड़ने में हम समर्थ हो जाएं तो जीवन एकदम सरल हो जाएगा।

शुक्रवार, 25 मई 2012

तादात्म्य और चित्त की जटिलता

(पिछली पोस्ट में हमने जाना कि मनुष्य की सरलता खोती है उसके बनाए आदर्शों से,अनुकरण और अनुसरण से,अपने से अलग कुछ और बनने की कोशिश में। इस सरलता के खोने में एक और तत्त्व जिम्मेवार है और वह है तादात्म्य,आइए देखें कि तादात्म्य कैसे हमें जटिल बनाता है और खंडित करता है।)

यह स्मरण रखें कि जीवन में जितना कम द्वंद्व,जितना कम संघर्ष,जितने कम व्यर्थ के तनाव,व्यर्थ के खंड कम हों,उतनी सरलता उत्पन्न होगी। मनुष्य जितना अखंड हो उतनी सरलता उपलब्ध होती है। हम खंड-खंड हैं। और हम अपनी अखंडता को अपने हाथों से तोड़े हुए हैं। हम अपनी अखंडता को कैसे तोड़ देते हैं? 

हम अपनी अखंडता को तादात्म्य से,आइडिन्टटी से तोड़ देते हैं।

होता क्या है? मैं एक घर में पैदा हुआ। उस घर के लोगों ने मुझे एक नाम दे दिया और मैंने समझ लिया कि वह नाम मैं हूं। मैंने एक आइडिन्टटी कर ली। मैंने समझ लिया कि यह नाम मैं हूं। फिर मैं कहीं शिक्षित हुआ। फिर मुझे कोई उपाधि मिल गई। फिर मैंने उन उपाधियों को समझ लिया कि ये उपाधियां मैं हूं। फिर किसी ने मुझे प्रेम किया,तो मैंने समझ लिया कि लोग मुझे प्रेम करते हैं और वह प्रेम की तस्वीर मैंने बना ली और समझा कि यह मैं हूं। फिर किसी ने ग्रहण किया,अपमानित किया,सम्मानित किया तो मैंने वह तस्वीर बना ली। ऐसी बहुत सी तस्वीरें आपके चित्त के अलबम पर आपकी ही लगती चली जाती है और हर तस्वीर को आप समझ लेते हैं मैं हूं। इन तस्वीरों में बड़ा विरोध होता है। ये तस्वीरें बहुत प्रकार की हैं। अनेक रूपों की हैं। इन तस्वीरों को,यह समझ कर कि मैं हूं,आप अनेक रूपों में विभक्त हो जाते हैं।

एक गांव से क्राइस्ट निकले और एक आदमी ने आकर उनका पैर छुआ। उस आदमी ने पूछा--क्या मैं भी ईश्वर को पा सकता हूं? क्राइस्ट ने कहा कि इसके पहले कि तुम ईश्वर को पा सको,मैं तुमसे पूछूं कि तुम्हारा नाम क्या है? उस आदमी ने आंखे नीचे झुका ली और कहा मेरा नाम? क्या बताऊं अपना नाम? मेरे तो हजार नाम हैं। कौन सा नाम बताऊं? मैं तो हजार-हजार आदमी एक ही साथ हूं। जब घृणा करता हूं तो दूसरा आदमी हो जाता हूं। जब प्रेम करता हूं तो बुलकुल दूसरा आदमी हो जाता हूं। जब रोष और क्रोध से भरता हूं तो बिलकुल दूसरा आदमी हो जाता हूं। और जब क्षमा से भरता हूं तो बिलकुल दूसरा आदमी हो जाता हूं। अपने बच्चों में मैं दूसरा आदमी हूं । अपने शत्रुओं में मैं दूसरा आदमी हो जाता हूं। मित्रों में दूसरा हूं। अपरिचितों में दूसरा हूं। मेरे तो हजार नाम हैं। मैं कौन सा नाम बताऊं? 

यह हर आदमी की तस्वीर है। आपके नाम भी ऐसे ही हैं। आपके नाम भी हजार हैं। आप हजार टुकड़ों में बंटें हुए हैं। आप एक आदमी नहीं हैं। और जो एक आदमी नहीं है वह सरल कैसे होगा? उसके भीतर तो भीड़ है। हर आदमी एक क्राउड है। यह भीड़ बाहर नहीं है आपके भीतर है। तो आप में कई आदमी बैठे हुए हैं एक ही साथ। एक ही साथ कई आदमी आपके भीतर बैठे हुए हैं। ख्याल करें,अपने चेहरे को पहचाने। सुबह से उठते हैं तो सांझ तक क्या आपका चेहरा एक ही रहता है? जब आप घर से बाहर निकलते हैं और रास्ते पर एक भिखमंगा भीख मांगता है तब और जब आप बाजार में पहुंचते हैं और कोई आदमी आपको नमस्कार करता है तब,और जब आप दुकान पर बैठते हैं तब,जब आप अपनी पत्नी के पास होते हैं तब,जब आप अपने बच्चों के पास होते हैं तब,क्या आपका चेहरा एक ही है? अगर आपके चेहरे अनेक हैं तो आप सरल नहीं हो सकते,आप जटिलता पैदा कर लेंगे। बहुत जटिल हो जाएंगें। कैसे सरल हो सकते हैं,अगर एक आदमी के अंदर दस-पंद्रह रहते हों? 

हत्यारों ने जिन्होंने बड़ी हत्याएं की हैं,अनेकों ने यह कहा है कि हमें पता नहीं कि हमने हत्या भी की है। पहले तो लोग समझते थे कि ये लोग झूठ बोल रहें हैं,लेकिन अब मनोविज्ञान इस नतीजे पर पहुंचा है कि वे ठीक कह रहें हैं। उनके व्यक्तित्व इतने खंडित हैं कि जिस आदमी ने हत्या की है वह वह आदमी नहीं है,जो अदालत में बयान दे रहा है। वह दूसरा आदमी है। यह बिलकुल दूसरा चेहरा है,उसे याद भी नहीं कि मैंने हत्या की है। इतने खंड हो गए हैं भीतर कि दूसरे खंड ने यह काम किया है,इस खंड को पता ही नहीं। और आपके भीतर भी ऐसे बहुत से खंड हैं। नहीं लगता, क्रोध करने के बाद क्या आप नहीं कहते कि मैंने अपने बावजूद क्रोध किया। अजीब बात है, आपके बावजूद! मतलब--आपके भीतर कोई दूसरा आदमी भी है। आप नहीं चाहते थे कि क्रोध हो और उसने क्रोध करवा दिया। कई बार आप अनुभव करते हैं कि मैं नहीं करना चाहता था,फिर मैंने किया। फिर कौन करवा देता है? जरूर आपके भीतर कई दूसरे लोग हैं। आप नहीं चाहते हैं फिर भी आपसे हो जाता है। हजार बार निर्णय करते हैं कि अब ऐसा नहीं करेंगे,फिर भी कर लेते हैं और पछताते हैं। 

असल में आपके भीतर बहुत से लोग हैं। जिसने निर्णय किया था कि नहीं करेंगे और जिसने किया,उन दोनों को पता नहीं कि बीच में कोई और बातचीत है। उन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं है। सांझ को आप तय करके सोते हैं कि सुबह पांच बजे उठेंगे और सुबह पांच बजे आपके भीतर कोई कहता है कि रहने भी दो। आप सो जाते हैं। सुबह आप पछताते हैं कि मैंने तो तय किया था कि उठना है फिर मैं उठा क्यों नहीं? अगर आपने ही तय किया था कि उठना है और आप एक व्यक्ति होते, तो सुबह पांच बजे कौन कह सकता था कि मत उठो? लेकिन आपके भीतर और व्यक्ति बैठे हुए हैं और वे कहते हैं--रहने दो,चलने दो। 

महावीर ने कहा है कि मनुष्य बहुचित्तवान है। एक चित्त नहीं,आपके भीतर बहुचित्त हैं। और जिसके भीतर बहुचित्त हैं वह कभी सरल होगा? सरल हो ही नहीं सकता। आपके भीतर कई आवाजें हैं। एक आवाज कुछ कहती है,दूसरी आवाज कुछ कहती है। कभी सोचें आप, अपने भीतर की आवाजों को सुनें। आपको बहुत आवाजें सुनाई पडेंगी। आपको लगेगा,आप बहुत आदमियों से घिरे हुए हैं। सरलता के लिए जरूरी है एक चित्तता आ जाए,बहुचित्तता न हो। एक चित्तता कैसे आएगी? आप जिन तादात्म्य को बना लेते हैं,उनको तोड़ने से एक चित्तता आएगी।                                                                                                                    
 ...जारी
                                                                                                                                            --ओशो

रविवार, 20 मई 2012

सरलता

ओशो ने चित्त की शांति के लिए तीन सूत्रों की बात बार-बार की है। ये सूत्र हैं:सरलता,सजगता और शून्यता। आज  की इस पोस्ट में हम जानेंगे कि सरलता क्या है? सरलता क्या नहीं है? सरलता के मार्ग क्या हैं?सरलता कैसे आए?

जो भी बाहर से ओढ़ा जाता है वह हमें जटिल बनाता है। बाहर से ओढ़ी गई सादगी,सरलता,विनम्रता मनुष्य को जटिल बनाती है और जो लोग भीतर जटिल होते हैं अक्सर बाहर सादगी,सरलता और विनम्रता का वेश बना लेते हैं;केवल इसलिए नहीं कि दुनिया को धोखा दे सकें बल्कि स्वयं को भी धोखा दे सकें। दुनिया में जटिल लोग सरल होने का अभ्यास कर लेते हैं। इस ओढ़ी हुई सरलता का कोई मूल्य नहीं। कोई अत्यंत विनम्रता प्रदर्शित करे,उससे वह सरल नहीं हो जाता है। क्योंकि विनम्रता के पीछे अक्सर अहंकार खड़ा रहता है और विनम्र आदमी हाथ जोड़कर सिर तो झुकाता है,लेकिन अहंकार नहीं झुकता है और विनम्र आदमी को यह भाव बना रहता है कि मुझसे ज्यादा और कोई भी विनम्र नहीं है और उसको यह भी आकांक्षा होती है कि मेरी विनम्रता और मेरी सरलता स्वीकृत की जाए और वह सम्मानित हो। सरलता को इस प्रकार अभ्यास से ऊपर से साधना आसान है,लेकिन उसका कोई मूल्य नहीं। वह मनुष्य को जटिल ही बना रही है। सरलता के संबंध में पहली बात यह स्मरणीय है कि सरलता बाहर से थोपी हुई नहीं हो सकती,उसे भीतर फैलाना होता है,उसे भीतर गहराना है। अगर मनुष्य को छोड़कर हम चारों ओर देखें तो पाएंगे पशु सरल हैं,पौधे सरल हैं,पक्षी सरल हैं; मनुष्य मात्र जटिल प्राणी है।

क्राइस्ट ने एक गांव से निकलते हुए अपने मित्रों से कहा,लिली के फूलों की तरफ देखो। वे किस शांति से और शान से खड़ें हैं;बादशाह सोलोमन भी अपनी पूरी गरीमा और गौरव में इतना सुंदर नहीं था। लेकिन फूल कितने सरल हैं,फल सरल हैं,पौधे सरल हैं। आदमी भर जटिल है। आदमी क्यों जटिल है? इस प्रश्न पर विचार किया जाना चाहिए।

आदमी जटिल है क्योंकि वह अपने सामने होने के आदर्श,आइडियल खड़ा कर लेता है और उसके होने के पीछे लग जाता है। व्यक्ति की स्वयं में आस्था खो गई है। बुद्ध,महावीर,कृष्ण की सरलता और शांति को देखकर मन में उन जैसा बनने का लोभ उठता है और एक आदर्श खड़ा होता है और फिर उस आदर्श के मुताबिक ढ़ांचे खड़े कर लिए जाते हैं; जिस से जटिलता पैदा होती है। या कोई किसी हिरो या हिरोइन को अपना आदर्श बना कर उन जैसा बनने की कोशिश करने लगता है। और जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के जैसा होने का अभ्यास शुरु करता है तो वह अपनी असलियत को दबाता है और आदर्श व्यक्तित्व को ओढ़ने लगता है,तब भीतर दो आदमी पैदा हो जाते हैं। एक जो वह वस्तुत: है और दूसरा वह जो वह होना चाहता है। इन दोनों के भीतर अंतर्द्वंद्व शुरु हो जाता है। भीतर चौबीस घंटे तनाव,संघर्ष होता है।व्यक्तित्व खंडों में बंट जाता है।प्रत्येक व्यक्ति के भीतर जो उसकी निजी क्षमता है,वह विकसित हो;यह तो समझ में आता है। लेकिन एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति जैसा होने की चेष्टा में लग जाए,यह बिलकुल समझ में आने जैसी बात नहीं। लेकिन मनुष्य फिर भी यह करता है। इसलिए जटिल है।

हर आदमी अलग है। हर आदमी अद्वितीय है,हर आदमी की अपनी गौरव-गरिमा है। हर आदमी के भीतर परमात्मा का अपना वैभव है। अपनी-अपनी निज की वृत्ति के भीतर बैठी हुई आत्मा है। उसकी अपनी क्षमता है,अद्वितीय क्षमता है। कोई मनुष्य न किसी दूसरे से ऊपर है,न नीचे है। न कोई साधारण है न कोई असाधारण है। सबके भीतर एक ही परमात्मा अनेक रूपों में प्रकट हो रहा है।

अनुकरण जटिलता पैदा करता है। किसी दूसरे का अनुकरण हमेशा जटिलता पैदा करता है। वह ऐसे ही है कि एक सांचा हम पहले बना लें और फिर उस सांचे के अनुसार अपने को ढ़ालना शुरु करें। आदमी कोई जड़ वस्तु नहीं है कि उसे सांचों में ढ़ाला जा सके। वह जीवंत और अद्वितीय है। उसके जैसा कोई दूसरा नहीं हो सकता।

सरलता के लिए जरूरी है कि सारे ढ़ांचे,सांचे तोड़ दिए जाएं। उन्हें अलग रख दिया जाए और स्वयं की निजता की खोज की जाए। बजाय इसके कि किसी के व्यक्तित्व को पकड़ के उस जैसा बनने की कोशिश करें। क्योंकि जो हम बनना चाहते हैं वह हम बन नहीं पाते और जो हम हैं उसकी हम फिक्र छोड़ देते हैं। इसलिए जटिलता है,तकलीफ है,बेचैनी है,अंतर्द्वंद्व,पीड़ा है,परेशानी है। स्मरण रखें कि जो आप हैं,अपनी वास्तविक सत्ता में,उससे अन्यथा आप कभी नहीं हो सकते हैं। कितनी भी चेष्टा करें तो भी केवल एक एक्टिंग,एक अभिनय भर कर पाएंगे,इससे ज्यादा कुछ नहीं। और अभिनय का क्या मूल्य है?

तो सरलता के लिए जरूरी है कि किसी का अनुगमन न करें और कोई ढ़ांचा व आदर्श न बनाएं। फिर क्या करें? सारे ढ़ांचे अलग कर दें। वह जो भीतर मूर्च्छित सोया हुआ मनुष्य पड़ा है,उसे जगाएं,उसे पहचानें,उसे समझें,उससे संबंधित हों,उसे खड़ा करें,उसे होश में भरें और तब आप पाएंगे कि सारी जटिलता क्षीण होने लगी है और सरलता का,सहजता का जन्म शुरु हो गया है।
...जारी

गुरुवार, 17 मई 2012

चित्त की झील में तूफान

सुबह-सुबह एक झील के किनारे से नौका छूटी। कुछ लोग उस पर सवार थे। नौका ने झील में थोड़ा ही प्रवेश किया होगा कि जोर का तूफान आ गया और बादल घिर आए। नौका डगमगाने लगी। आज की नौका नहीं थी,दो हजार वर्ष पहले की थी। उसके डूबने का डर पैदा हो गया। जितने लोग उस नौका पर थे,सारे लोग घबरा गए। प्राणों का संकट खड़ा हो गया। लेकिन उस समय भी उस नौका पर एक आदमी शांत सोया हुआ था। उन सारे लोगों ने जाकर उस आदमी को जगाया और कहा कि क्या सो रहे हो और कैसे शांत बने हो!!!प्राण संकट में हैं,मृत्यु निकट है और नौका बचने की कोई उम्मीद नहीं है। तूफान बड़ा है और दोनों किनारे दूर हैं। 

उस शांत सोए हुए व्यक्ति ने आंखें खोली और कहा--कितने कम विश्वास के तुम लोग हो,कितनी कम श्रद्धा है तुममें। कहो झील से कि शांत हो जाए। वे लोग हैरान हुए कि झील किसी के कहने से शांत होती है! यह कैसी पागलपन की बात है! लेकिन वह शांत सोया हुआ आदमी उठा और झील के पास गया और उसने जाकर झील से कहा,झील! शांत हो जाओ! और आश्चर्यों का आश्चर्य कि झील शांत हो गई। 

यह आदमी जीसस क्राइस्ट था और झील गैलीली झील थी और उनके साथ दस-बारह मित्र थे। यह कहानी एकदम सच है। आज हर आदमी झील पर सवार है, हर आदमी नौका पर सवार है और कोई आदमी जब तक जीवन में है कभी जमीन पर नहीं है,हमेशा झील में है। एक भी दिन ऐसा नहीं है जब आंधी नहीं आती है,तूफान नहीं आता है। हम रोज ही तूफान में घिरे हैं। लेकिन अगर हममें श्रद्धा हो,आत्म-श्रद्धा,और हम झील से कह सकें कि शांत हो जाओ,तो झील निश्चिंत शांत हो जाती है।

कैसे हम उस झील को कहें जो अशांत बन गई? तूफान और आंधियों से पूर्ण उस चित्त की झील में कैसे शांति ला सकते हैं?

आपमें वह क्षमता आ सकती है कि आप आंख उठाकर झील की तरफ देख लें तो झील शांत हो जाएगी। यह कहने की भी जरूरत न पड़ेगी कि झील,शांत हो जाओ। क्योंकि तूफान हमारा ही पैदा किया हुआ है और आंधी हमारी पैदा की हुई है। जिस अशांति में हम खड़े हैं हुए हैं उसको जानने वाला कोई और नहीं,हम हैं। जिस अशांति को मैंने बनाया है,मैं चाहूं तो उसे इसी क्षण मिटा सकता हूं। और जिस अंधकार को मैंने निर्मित किया है उसको मिटाने की पूरी सामर्थ्य और शक्ति मुझमें है। मनुष्य कितना ही पाप करे और कितना ही अशांत हो और कितना ही दुख में हो और कितना ही पीड़ा में हो,एक सत्य स्मरण रख लेने जैसा है कि सब उसका अपना बनाया हुआ है। और इसी लिए इस सत्य में से एक आशा की किरण भी निकल आती है कि जो खुद का बनाया हुआ हो,उसे खुद मिटाने के हमेशा हकदार होते हैं।

शांति की आंख सत्य के दर्शन देने में समर्थ बनाती है। जब भीतर शांति होती है और भीतर के चित्त की झील पर कोई लहर नहीं होती है,कोई आंधी नहीं होती,तो हम दर्पण बन जाते हैं और परमात्मा का प्रतिबिम्ब हममें प्रतिफलित होने लगता है। तब हमारी अंतरात्मा अपनी गहराइयों में उस सत्य को प्रतिबिंबित करने लगती है,जो चारों तरफ व्याप्त है। लेकिन वह हमें दिखलाई नहीं पड़ता है। हम अशांत हैं इसलिए सुन नहीं पाते उस आवाज को जो चारों तरफ मौजूद है और हम इतने व्यस्त और उलझे हुए हैं कि देख नहीं पाते उस सत्य को जो चारों तरफ खड़ा है। काश,हम शांत हो जाएं,हमारा चित्त शांत हो जाए तो जो जानने-जैसा है वह जान लिया जाएगा और वह जो पाने जैसा है वह पा लिया जाएगा।

रविवार, 13 मई 2012

अनजाना जीवन

हमारे चित्त की पूरी व्यवस्था ऐसी है कि वह कहता है कि कहीं चलो। पूरा चित्त ही इस तनाव से बना है कि कहीं चलो-वहां जहां कहीं दूर मंजिल है। मन जीवित रहता है तनाव में। यह तनाव गहरे में कहीं पहुंचने का तनाव है-चाहे धन हो,चाहे यश हो,चाहे मोक्ष।

मन उस वक्त मर जाता है जिस वक्त आपने कहा--कहीं नहीं जाना है।

जहां हम खड़े हैं यदि वहीं हम अपनी सारी डिजायर को,सारे विचार को,सारी कामना को रोक लें तो हम जो हैं वह हमें पता चल जाएगा।

मजे की बात है कि मंजिल यहीं मौजूद है,अभी इसी वक्त। कहीं जाना नहीं है खोजने,सिर्फ ठहर जाना है।...असल में मजा यह है कि रास्ता मात्र बाहर जाने का होता है,क्योंकि अंदर तो हम हैं। लेकिन विचार बाहर कि यात्रा करता है।विचार में आप यहीं होते हुए भी कलकत्ता में हो सकते हैं। इसलिए भीतर जाने का सवाल नहीं है। हम बाहर किन-किन रास्तों से चले गए हैं,उन रास्तों को छोड़ देने का सवाल है असल में।

विचार चला गया है वासना के वाहन पर बैठ कर और हम वहीं हैं यानी यह आधारभूत सत्य खयाल में आ जाना चाहिए कि हम वहीं हैं,वासना के वाहन पर बैठ कर विचार चला गया है।विचार न जाए तो आप फौरन पाएंगे कि हम भीतर हैं।सिर्फ आप दिवा-स्वप्न में खो गए थे। यह बुनियादी सत्य है कि हम कभी अपने से बाहर गए ही नहीं।

एक बात अगर ठीक से खयाल में आ जाए तो सवाल सिर्फ इतना है कि हम जो विचार की किरण बाहर भेजते हैं वह वापस लौट आए और वापस लौटने के लिए भी कुछ होना नहीं है,सच में लौटने की बात नहीं है। सिर्फ कल्पना में हम बाहर चले गए हैं,जो लोभ पर सवार हो गई है। फिर मोक्ष,स्वर्ग,मुक्ति सब लोभ पर सवार हो गए हैं और इसी लोभ का शोषण कर रहा है गुरुॱ । गुरु लोभ का शोषण कर रहा है। इसलिए जिनको धन की तृप्ति हो जाएगी वह धर्म के लोभ में पड़ जाएंगे। वह कहेंगें धन तो मिल गया,ठीक है,अब मोक्ष भी चाहिए। इस लोभ का शोषण कर रहा है गुरुॱ। वह कह रहा है कि हम तुम्हें जो चीज चाहिए दिलवा देंगे। इसलिए सब गुरुडम भ्रांत है,खतरनाक है।

ठहरना अनरिपीटेबल एक्सपीरियंस है। क्योंकि हम कुछ करते नहीं हैं जिसको हम रिपीट कर सकें। कुछ करते तो रिपीट हो सकता था। हम कुछ करते नहीं हैं,हम सिर्फ होते हैं--तो एक रिजर्वायर हो जाता है माइंड पर--कहीं नहीं जा रहा है बाहर,कहीं नहीं जा रहा है,ठहर गया है। चारों तरफ बांध है,झरना एक झील बन गया है,कहीं जा नहीं रहा है,कहीं जाने की कोई बात ही नहीं,सब अनंत झील है,एक लहर भी नहीं है,तो सारी शक्ति,सारी ताजगी,सारा युवापन उस स्थिति में पैदा हो जाएगा। वह युवापन,वह शक्ति,वह डायनमिक फोर्स, वह रिपीट करेगी आटोमेटिक-जैसे वृक्ष से फूल आ रहा है,वैसे आपसे भी चीजें आएंगी। लेकिन आप फिर उनको कर नहीं रहे हैं,वह हो रहीं हैं और जब हो रहीं हैं तब आपके मन पर का बोझ गया। आपके मन पर कोई बोझ नहीं है,कोई भार नहीं है। ऐसी स्थिति में जो अनुभव होगा,वह अनुभव तो मुक्ति का है,निर्भार होने का है।

तो मूल प्रश्न माइंड को विदा करने का है और माइंड हमेशा सुरक्षा चाहता है। पर संन्यासी कहता है हम कोई सुरक्षा नहीं मानते,हम असुरक्षा में जीते हैं,हम नहीं कहते कि कल कुछ मिलेगा,कल सुबह देखेंगे। वह आदमी बुरा है या भला,हम क्यों सोचें? यदि वह बिस्तर से उठाकर ले जाएगा,तो ले जाएगा। यह मैं क्यों निर्णय लूं कि यह आदमी कैसा है? हम कुछ सोचते नहीं,हम जीते हैं चुपचाप एक-एक क्षण में। इतनी असुरक्षा में जो जीता है उसके माइंड में एक्सप्लोजन हो सकता है;क्योंकि माइंड फिर जी नहीं सकता,माइंड को मरना पड़ेगा।

जितनी सुरक्षा उतना मरा आदमी है। और मजा यह है कि भगवान के मामले में भी जोखिम लेने की तैयारी न हो,वहां भी हम पक्का करके ही चलें सब,तो फिर बहुत मुश्किल है। भगवान का मतलब यह है कि अनजान वह जो सागर है,उसमें हमें कूदना पड़ेगा,किनारे को छोड़ कर।

लेकिन जो परम खतरे में उतरने की तैयारी करता है,वह खतरे में उतरने की तैयारी ही उसके भीतर ट्रांसफर्मेशन बन जाती है क्योंकि इस खतरे में जाना बदल जाना है। सब व्यवस्था छोड़कर,सब सुरक्षा छोड़कर जो उतर जाता है अनजान में,यह उतरने की तैयारी ही,यह साहस ही उसके भीतर संकेत-चिह्न बनता है और उसके भीतर परिवर्तन हो जाता है।जितनी बड़ी असुरक्षा में हम जाने को तैयार हैं उतने ही हम वस्तुत: सुरक्षित हो जाते हैं--क्योंकि कोई भय न रहा,फिर कोई डर न रहा।

कुछ है जो निरंतर अनजाना है और वही परमात्मा है। वही जीवन है जो अनजाना है। जो मृत है कल उसके बाबत हम सुरक्षित हो सकते हैं;जो जीवित है वह कल कहां होगा,कुछ भी कहना मुश्किल है। जीवंत के साथ बड़ी कठिनाई है और हम सब व्यवस्था बनाकर उसको मार देते हैं। मजे की बात यह है कि जो भी सिस्टम बनाई जाए वह झूठी हो जाती है। झूठी इसलिए हो जाती है कि उसमें विरोध बरदास्त नहीं किए जा सकते। उसमें विरोध अलग कर देने पड़ते हैं।लेकिन जिंदगी पूरे विरोध से मिलकर बनी है। सब चीजें विरोधी हैं। इसलिए जो पूरी जिंदगी को समझने जाएगा वह सब तरफ के विरोधों को स्वीकार करेगा।

अनुभूति सीढ़ी चढ़ने जैसी नहीं है। अनुभूति छत से कूदने जैसी है। उसमें कोई सीढ़ियां नहीं होती। लेकिन हमारा मन चढ़ना चाहता है। और अहंकार चढ़ने में रस लेता है,उतरने में रस नहीं लेता और अहंकार निरंतर कहता है चढ़ो कहीं ऊपर--और एक सीढ़ी, और एक सीढ़ी,और एक सीढ़ी। फिर सीढ़ियां किसी भी चीज़ की हों। इसलिए अहंकार मार्ग पकड़ता है,टेकनीक पकड़ता है,गुरु पकड़ता है,शास्त्र पकड़ता है,सब पकड़ता है। और धर्म कहता है कूद जाओ,चढ़ने का यहां कहीं उपाय नहीं है,बिल्कुल उतर जाओ,जहां तक उतर सकते हो और उतरना भी हो सकता था अगर सीढ़ियां होती। सीढ़ियां हैं ही नहीं,कूद ही सकते हो। छलांग लगा सकते हो। यह जो छलांग लगाने की हिम्मत नहीं जुटती है,तो हम कहते हैं कि यह ज्यादा हो गया,इसे थोड़ा सिम्पल करो,सरल करो.टेकनिक से,व्यवस्था से ताकि हम उसको टुकड़े-टुकड़े में पा लें। किंतु वह किस्तों में नहीं मिलता।

गुरुवार, 10 मई 2012

अतीत की मृत्यु और शून्यता

एक संन्यासी ने अपने शिष्य को एक दिन कहा कि तू बहुत दिन मेरे पास रहा है। अब मैं तुझे कहीं और भेजता हूं। ताकि मैंने तुझसे जो कहा है वह और ठीक से समझ ले। तो उसको एक दूसरे संन्यासी के पास भेजा कि तू जा और उसके पास रह और उसकी जीवन चर्या को देख।

वह वहां गया। सुबह से शाम तक उसने दिनचर्या को देखा। उसमें कुछ भी नहीं था। वह संन्यासी एक छोटी-सी सराय का रखवाला था। वह संन्यासी भी नहीं था। साधारण कपड़े पहनता था। लेकिन उसके गुरु ने उसे वहां भेजा,तो गया। वह सुबह से शाम तक देखता रहा,वहां तो कुछ भी नहीं था। वह आदमी है,रखवाला है,रखवाली करता है। सराय साफ करता है। मेहमान ठहरते हैं,उनके कमरे साफ करता है। मेहमान जाते हैं,उनके कमरे साफ करता है। उसने दो-चार दिन देखा तो ऊब गया। वहां तो कोई बात ही नहीं थी,चर्या की कोई बात ही नहीं थी। चलते वक्त उसने कहा,सब देख लिया,जिसके लिए मेरे गुरु ने भेजा था। सिर्फ दो बातें मैं नहीं देख पाया हूं: रात को सोते समय आप क्या करते हैं,वह मुझे पता नहीं है और सुबह उठते वक्त आप क्या करते हैं,वह मुझे पता नहीं। यह मुझे बता दें। मैं वापस लौट जाऊं।

संन्यासी ने कहा,कुछ नहीं करता। दिन भर मैं सराय के जो बरतन गंदे हो जाते हैं,रात में उनको साफ करके रख देता हूं और सुबह जब उठता हूं तो रात भर उनपर थोड़ी बहुत धूल जम जाती है, तो उन्हें मैं फिर पोंछ देता हूं। बस इससे ज्यादा कुछ नहीं करता।

शिष्य ने वापस लौटकर गुरु से कहा,कहां तुमने मुझे भेज दिया। एक साधारण सराय के रखवाले के पास! उस नासमझ से मैंने पूछा,तो न तो वह प्रार्थना करता है,न ध्यान,न कुछ। वह मुझसे बोला,रात बरतन साफ कर देता हूं,जो दिन भर गंदे हो जाते हैं। और सुबह थोड़ी धूल जम जाती है तो फिर उसे पोंछ देता हूं।

उसके गुरु ने कहा--कह दिया उसने। जो कहने-जैसा था,उसने वह कह दिया। सारा ध्यान,सारी समाधि,सब कह दिया। तू समझा नहीं। दिन भर बरतन गंदे हो जाते हैं,सांझ को उन्हें पोंछ कर साफ कर दो। रात भर में सपनों की थोड़ी धूल जम जाएगी,सुबह में फिर पोंछ डालो और खाली हो जाओ।मरते जाएं,रोज-रोज धूल इकट्ठी न करें। रोज मर जाएं,सांझ को मर जाएं। जो हो गया उसके प्रति मर जाएं। वह जो बीत गया उसको मन में जगह न दें,उसे पोंछ दें,उसके प्रति मर जाएं। उसे छोड़ दें। वह स्मृति से ज्यादा कुछ भी नहीं। उस कचरे को अलग करें। शांत हो जाएं,चुप हो जाएं,शून्य हो जाएं। सुबह उठें जैसे कोई शून्य उठा हो,जिसका कोई आगा-पीछा नहीं है। दिन भर ऐसे जिएं जैसे सब शून्य है। बाहर सब हो रहा है,भीतर शून्य है। अगर सतत इस शून्य का भीतर स्मरण हो तो धीरे-धीरे वह गड्ढ़ा तैयार हो जाता है,जिसमें परमात्मा का अवतरण होता है और अमृत की वर्षा होती है। खाली हो जाएं-परमात्मा आपको भर देगा। इसके सिवा और कोई महत्त्वपूर्ण बात नहीं है। खाली हो जाएं--परमात्मा आपको भर देगा। भर जाएं--परमात्मा आपको खाली कर देगा।

रविवार, 6 मई 2012

बचें हर चार सेकंड में डिमेंशिया की दस्तक से

इस समय विश्व में महामारी के स्तर पर एक रोग उभर रहा है जिसके दस प्रतिशत से अधिक शिकार भारत में हैं। रोग का नाम है डिमेंशिया। यह एक सिंड्रोम है जिसके विकास में मस्तिष्क के बहुत से विकार सहायक होते हैं। इस सिंड्रोम के चलते धीरे-धीरे या कभी बहुत तेजी से मस्तिष्क का क्षय होने लगता है और अंतत: व्यक्ति को समय और स्थान का बोध समाप्त होने लगता है,भाषा कभी समझ आती है और कभी नहीं,लोगों को पहचानने की शक्ति कम या बिल्कुल समाप्त हो जाती है,दैनिक क्रिया-कलापों को करना लगभग असंभव हो जाता है।

इस समय पूरे विश्व में लगभग साढ़े तीन करोड़ लोग डिमेंशिया से ग्रस्त हैं,जिनमें से सैंतीस लाख लोग भारत में हैं। वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार सत्तर लाख लोग हर साल डिमेंशिया के शिकार हो रहे हैं,अर्थात हर चार सैकिंड में विश्व में कहीं न कहीं कोई इसकी चपेट में आ रहा है।

डब्लू एच ओ की इस नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार सन्2030 तक छह करोड़ और 2050 तक कोई पंद्रह करोड़ लोग विश्व में डिमेंशिया से ग्रस्त होंगे। सबसे अधिक क्षति भारत,चीन और ब्राज़ील की होगी क्योंकि अपवाद छोड़कर यह रोग 60 वर्ष की आयु के ऊपर ज्यादा संभावित होता है और शीघ्र ही ये देश संसार में वृद्धों की सबसे बड़ी जनसंख्या लिए होंगे।

जन्म के पहले क्षण से लेकर मनुष्य के अंतिम क्षण तक मस्तिष्क क्रियाशील रहता है,हमारे शरीर और मन में होने वाली एक-एक क्रिया को संचालित भी करता है और उनसे प्रभावित भी होता है। इस सतत क्रियाशील यंत्र को अन्य किसी भी यंत्र की तरह सुचारू रूप से चलते रहने के लिए समुचित व्यायाम और विश्राम की जरूरत है। इस यंत्र का विश्राम है अपनी स्वाभाविक स्थिति में केवल शारीरिक क्रियाओं का संचालन करना,और व्यायाम है-अनजान परिस्थितियों का सामना,खोज,अन्वेषण,सृजन। व्यर्थ की मानसिक उहापोह इसका व्यायाम नहीं,इस पर अतिरिक्त बोझ हैं। और आधुनिक जीवन शैली में तो ये बोझ अतिरिक्त ही नहीं अतिशय हो चलें है- चैनल दर चैनल टीवी के कार्यक्रम,विज्ञापन,खबरें,सोशल नेटवर्किंग साइट्स...। न मस्तिष्क को विश्राम है,और मजे की बात कि समुचित व्यायाम भी नहीं।

ओशो कहते हैं,कोई जरूरत नहीं है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ मस्तिष्क की क्षमता कम होती जाए। मस्तिष्क अंतिम क्षण तक युवा और तरोताजा रह सकता है, यदि हम मन को मौन करने की कला सीख जाएं। दिन में कम से कम कुछ क्षण ऐसे हों जब आप मौन में डूबें। जैसे-जैसे यह कला गहराती जाएगी,आप पाएंगे कि दिन में कई क्षण आते हैं जब आपका मन नहीं चल रहा,आप पूरी तरह से मौन में हैं। ये क्षण मस्तिष्क के लिए विश्राम के होंगे। विश्राम के बाद मस्तिष्क और स्पष्ट होकर,और शुद्ध होकर,और ऊर्जा से भरकर आपका सहयोगी होगा।

कनाडा में डिमेंशिया पर एक लंबी क्लिनिकल शोध के बाद यह पाया गया कि अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त जो लोग किसी दूसरी भाषा का भी उपयोग करते हैं,उनमें डिमेंशिया की संभावना एकभाषी लोगों की तुलना में कुछ कम होती है। इस निष्कर्ष का विश्लेषण करते हुए यह कहा गया कि दूसरी भाषा का उपयोग करते हुए हमारे मस्तिष्क में विश्राम और व्यायाम की एक लय चलती है। उस समय मस्तिष्क में अनुवाद की सतत प्रक्रिया एक व्यायाम होती है और बीच के गैप में एक विश्राम।

हो सकता है यह शोध उन लोगों के संबंध में बहुत सच हो जो किसी अन्य भाषा को नया-नया सीख रहें हों या उसमें कभी भी पूरी तरह पारंगत न हो पाए हों। लेकिन पूरी तरह पारंगत हो गए लोगों में यह गतिविधि बहुत कम होगी।

आइए इसी मनोशारीरिक तथ्य के परिप्रेक्ष्य में जिबरिश की बात करें। जो कि ओशो ने हमें एक ध्यानविधि की तरह दी है। यह मन के लिए एक संपूर्ण विश्राम है। जिबरिश करते समय,ओशो कहते हैं हम अनर्गल शब्द बोलें जिनका कोई अर्थ न हो। वे कहते हैं इसका उपयोग हम रेचन की तरह न करें। बल्कि ऐसे करें जैसे कि एक ऐसी भाषा बोल रहें हैं जो हम नहीं जानते। ऐसी भाषा बोलते हुए निश्चित ही सोचने की प्रक्रिया रुक जाएगी और मस्तिष्क को विश्राम मिलेगा। आप को जब पता ही नहीं कि आप क्या बोल रहे हैं,तो उसके साथ कोई भाव भी नहीं जुड़े होंगे। आप केवल एक बच्चे की तरह उस बोलने का आनंद लेंगे। यह क्रिया मस्तिष्क के लिए ऐसी ही है जैसे कि शरीर के लिए स्विमिंग या जॉगिंग-स्वास्थ्यकारी।

उसके बाद,ओशो कहते हैं कि हम शरीर को बिलकुल लेट गो में छोड़कर लेट जाएं-जैसे स्विमिंग के बाद बीच पर लेटे हुए नर्म धूप का आनंद।

आइए मौन हों,आनंदित हों और बचें हर चार सेकंड में डिमेंशिया की दस्तक से।

-संजय भारती
संपादक,यैस ओशो,
मई-2012माह के अंक का संपादकीय

शुक्रवार, 4 मई 2012

मजनू की आंख

मजनू को उसके गांव के राजा ने पकड़वा लिया था। गांव भर में चर्चा थी कि वह पागल हो गया है लैला के लिए। उसने बार-बार लैला को देखने की कोशिश की। बड़ी मुश्किल में पड़ा। लैला बहुत साधारण लड़की थी। फिर भी मजनू पागल हो गया।

राजा ने मजनू को बुलाया और कहा,"तू पागल तो नहीं है! लैला बड़ी साधारण लड़की है। मैंने बहुत सुंदर लड़कियां तेरे लिए बुला कर रखी हैं,उनको देख और जो तुझे पसंद हो उसके साथ तेरा विवाह कर दें।लेकिन लैला को भूल जा। लैला बड़ी साधारण लड़की है।"

मजनू हंसने लगा। उसने राजा से कहा कि शायद आपको पता नहीं,लैला को देखने के लिए मजनू की आंख चाहिए। मेरी आंख है आपके पास?

राजा ने कहा,"तेरी आंख मेरे पास कैसे हो सकती है!!!"

तो मजनू ने कहा,"फिर छोड़िए खयाल,आप लैला को न देख पाएंगे। लैला को मजनू देख सकता है। मजनू की आंख ही लैला को देख सकती है।" 
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मंगलवार, 1 मई 2012

चित्त की शांति और युद्ध

एक मुसलमान खलीफा था-उमर। सात वर्षों से एक दुश्मन के साथ उसकी लड़ाई चलती रही। यह संघर्ष बहुत भयंकर हो गया था। किसी के जीतने की कोई उम्मीद नहीं मालूम पड़ती थी। ऐसा नहीं लगता था कि कोई निर्णायक फैसला हो सकेगा। लेकिन सातवें वर्ष में निर्णायक फैसला होने के करीब आ गया। हाथ में आ गया वह क्षण जब निर्णय हो सकता था। उमर ने दुश्मन को गिरा दिया युद्ध के मैदान में और उसकी छाती पर सवार हो गया। वह कंधे में बंधे हुए भाले को निकाल कर दुश्मन की छाती पर भोंकने को है कि नीचे पड़े दुश्मन ने उमर के मुंह पर थूक दिया। मरता भी तो कुछ कर सकता है। आखरी अपमान तो वह कर ही सकता था।

उमर एक क्षण रुक गया और अपने भाले को वापिस रख लिया और रूमाल से मुंह पोंछ लिया। उसने नीचे पड़े दुश्मन से कहा-"दोस्त,अब लड़ाई कल सुबह फिर शुरू होगी।" लेकिन नीचे पड़ा दुश्मन कहने लगा-"पागल हो गए हो? इस मौके की तलाश में तुम सात वर्षों से थे,आज तुम्हारे पैरों के नीचे पड़ा हूं। तुम छाती पर सवार हो,मैं निहत्था हूं। मेरा हथियार छूट गया है। मेरा घोड़ा मर गया है। इस मौके को मत छोड़ो। यह मौका दुबारा आएगा,इसकी कोई उम्मीद न करो। भाले को उठा लो और मेरी छाती में भोंक दो। तुमने तो भाला उठा लिया था,फिर रोक क्यों लिया? तुम तो मारने के करीब थे।"

उमर ने कहा-"मेरी जिंदगी में हमेशा एक खयाल रहा -लड़ूंगा जरूर,लेकिन अशांत होकर नहीं। तुमने थूका और मैं अशांत हो गया। सात वर्षों से लड़ाई शांति से चल रही थी। मैं शांत था। लड़ाई बाहर की थी,भीतर की नहीं थी। एक क्षण को भी तुम्हारे प्रति मेरे मन में क्रोध न था। लड़ना एक सिद्धांत का था। लड़ाई एक तल पर थी,लेकिन मैं लड़ाई के बाहर था। लड़ रहा था सात वर्षों से युद्ध के मैदान में,लेकिन मैं युद्ध के मैदान में होते हुए भी युद्ध के बाहर था। मुंह पर थूक कर तुमने युद्ध के बीच मुझे खींच लिया है। मेरी भीतर की शांति डवांडोल हो गई,मेरा निर्णय चूक गया। नहीं,अब मैं भाला नहीं उठा सकता। कल सुबह मैं शांत होकर आ सकूंगा।"

लेकिन फिर दूसरे दिन लड़ाई नहीं हुई। क्योंकि ऐसे आदमी से लड़ना मुश्किल है। दुश्मन उमर के पैरों पर गिर पड़ा। उसने कहा- "मुझको भी तुम्हारी आंखों को देखकर ऐसा लगता था कि तुम लड़ते जरूर थे,लेकिन तुम्हारी आंखें कहती हैं कि कोई लड़ाई नहीं है। हां,परीक्षा के लिए थूक कर देखा था कि आज तुम्हारी आंखें बदलती हैं या नहीं। और तुम्हारे भाले पर रुक जाना याद दिला गया कि ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो युद्ध के मैदान में हों और युद्ध में न हों।"

रविवार, 29 अप्रैल 2012

पाखंड और स्वधर्म



‎" न कोई 'कर्म', न कोई 'किस्मत', न कोई 'ऐतिहासिक आदेश'- 'तुम्हारा जीवन तुम पर निर्भर है' | 'उत्तरदायी ठहराने के लिए कोई परमात्मा नहीं', 'सामाजिक पद्धति या सिद्धांत नहीं है' | 'ऐसी स्थिति में तुम इसी क्षण सुख में रह सकते हो या दुख में' |

'स्वर्ग अथवा नरक कोई ऐसे स्थान नहीं हैं जहाँ तुम मरने के बाद पहुँच सको', 'वे अभी इसी क्षण की संभावनाएँ हैं' | 'इस समय कोई व्यक्ति नरक में हो सकता है, अथवा स्वर्ग में' | 'तुम नरक में हो सकते हो और तुम्हारे पड़ोसी स्वर्ग में हो सकते हैं' |

'एक क्षण में तुम नरक में हो सकते हो और दूसरे ही क्षण स्वर्ग में' | 'जरा नजदीक से देखो', 'तुम्हारे चारों ओर का वातावरण परिवर्तित होता रहता है' | 'कभी-कभी यह बहुत बादलों से घिरा होता है' और 'प्रत्येक चीज धूमिल और उदास दिखाई देती है' और 'कभी-कभी धूप खिली होती है तो बहुत सुंदर और आनंदपूर्ण लगता है' |

'दुनिया का कोई भी धर्म, संगठन और व्यक्ति तुम्हें आनंदित नहीं कर सकता' और 'न ही उनके द्वारा तुम मोक्ष प्राप्त कर सकते हो' | 'धर्म का मार्ग पंथहीन है' | 'अधर्म का मार्ग ही पंथ वाला और संगठित होता है' |

'दूसरा कोई आदमी जब भी महावीर होने की कोशिश करेगा तो वह चोर, महावीर हो जाएगा' | 'दूसरा कोई आदमी अगर कृष्ण होने की कोशिश करेगा तो वह चोर, कृष्ण हो जाएगा' |

'कोई आदमी जब भी दूसरा आदमी होने की कोशिश करेगा तो आध्यात्मिक चोरी में पड़ जाएगा' | 'उसने व्यक्तित्व चुराने शुरू कर दिए' | और 'धर्म का हम यही मतलब समझ बैठे है': 'किसी के जैसे हो जाओ', 'अनुयायी बनो', 'अनुकरण करो', 'अनुसरण करो', 'पीछे चलो', 'ओढ़ो', 'खुद मत रहो बस', 'किसी को भी ओढ़ो' |

'इसीलिए कोई जैन है', 'कोई हिंदू है', 'कोई ईसाई है', 'कोई बौद्ध है' | 'ये कोई भी धार्मिक नहीं हैं' | 'ये धर्म के नाम पर गहरी चोरी में पड़ गए हैं' | 'अनुयायी चोर होगा ही आध्यात्मिक अर्थों में', 'उसने किसी दूसरे व्यक्तित्वों को चुरा कर अपने पर ओढ़ना शुरू कर दिया जो वह नहीं है' | 'पाखंड', 'हिपोक्रेसी परिणाम होगा' | "

ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

स्व व परमात्मा के बीच शांति

हेनरी थोरो अमेरिका का एक बहुत बड़ा विचारक हुआ। वह मरने के करीब था। वह कभी चर्च में नहीं गया था। उसे कभी किसी ने प्रार्थना करते नहीं देखा था। मरने का वक्त था,तो उसके गांव का पादरी उससे मिलने गया। उसने सोचा यह मौका अच्छा है,मौत के वक्त आदमी घबड़ा जाता है। मौत के वक्त डर पैदा हो जाता है,क्योंकि अनजाना रास्ता है मृत्यु का। न मालूम क्या होगा? उस वक्त भयभीत आदमी कुछ भी स्वीकार कर सकता है। मौत का शोषण धर्मगुरु बहुत दिनों से करते रहे हैं। इसलिए तो मंदिरों,मस्जिदों में बूढ़े लोग दिखाई पड़ते हैं।

पादरी ने हेनरी थोरो से जाकर कहा,"क्या तुमने अपने और परमात्मा के बीच शांति स्थापित कर ली है? क्या तुम दोनों एक दूसरे के प्रति प्रेम से भर गए हो?"

हेनरी थोरो मरने के करीब था। उसने आंखें खोली और कहा,"महाशय,मुझे याद नहीं पड़ता है कि मैं उससे कभी लड़ा भी हूं। मेरा उससे कभी झगड़ा नहीं हुआ तो उसके साथ शांति स्थापित करने का सवाल कहां? जाओ,तुम शांति स्थापित करो,क्योंकि जिंदगी में तुम उससे लड़ते रहे हो। मुझे तो उसकी प्रार्थना करने की जरूरत नहीं है। मेरी जिंदगी ही प्रार्थना थी।"

कोई मरता हुआ आदमी ऐसा कहेगा,इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन बड़ी सच्ची बात हेनरी थोरो ने यह कही कि अगर मैं उससे लड़ा होता,अगर एक पल को भी मेरे और उसके बीच कोई शत्रुता खड़ी हुई होती तो फिर मैं शांति स्थापित करने की कोशिश करता। लेकिन नहीं,वह तो कभी हुआ नहीं है।किसके बीच,कैसी शांति स्थापित करूं?

रविवार, 22 अप्रैल 2012

स्व का मालिक या शव का मालिक

स्वामी रामतीर्थ टोकियो गए थे। वहां एक बड़े भवन में आग लग गई थी। उस भवन के बाहर हजारों लोग इकट्ठे थे। रामतीर्थ भी खड़े होकर देखने लगे। भवन का मालिक खड़ा था। उसकी आंखें पथरा गई थी। वह देख रहा था,लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। जिंदगी भर जो बनाया था,वह जल रहा था। नौकर-चाकर,आसपास के पड़ोस के मित्र सामान लेकर बाहर आ रहे थे। तिजोरियां निकाली जा रही थी। हीरे-जवाहरात निकाले जा रहे थे। कीमती वस्त्र निकाले जा रहे थे। अमूल्य चीजें थी,उस धनपति के पास। वे सब बाहर निकाली जा रही थी। फिर लोगों ने मालिक से कहा कि एक बार भीतर जाया जा सकता है। अगर कोई जरूरी चीजें रह गई हों,तो हम भीतर से ले आएं। उस आदमी ने कहा-"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या हो रहा है,क्या आ गया है,क्या छूट गया है? मुझे कुछ भी पता नहीं है। तुम ऐसे ही जा कर देख लो,जो दिखाई पड़े,ले आओ। जिसका सब जल रहा हो उसे क्या दिखाई पड़ सकता है? जिसका सब जल रहा हो,वह क्या हिसाब किताब रख सकता है कि क्या छूट गया,क्या बच गया? ये सब फुरसत की बातें हैं,आराम की बाते हैं। सब जलता हो तो ये सब हिसाब-किताब काम नहीं पड़ते।"

वे लोग भीतर वापिस गए और छाती पीटते हुए बाहर आए। हर बार तो वे खुशी से आते थे कि वे कुछ लेकर आए हैं।  इस बार भी वे कुछ लेकर आए थे,लेकिन रोते हुए। सारी भीड़ इकट्ठी हो गई और पूछने लगी कि रोते क्यों हो? उन्होंने कहा-"बड़ी भूल हो गई। हमारे मालिक का एक ही बेटा था। उस बेटे को हम बचाना भूल गए। वह भीतर सो रहा था। वह जल गया,चल बसा। हम सामान बचाते रहे। सामान तो बच गया,लेकिन मकान का मालिक,होने वाला मालिक जल गया।"

स्वामी रामतीर्थ ने उस दिन अपनी डायरी में लिखा-"यही तो सारी दुनिया में होता है। आदमी मर गया है और सामान बचाया जा रहा है। असली मालिक खो गया है और सामान बच गया । सामान बहुत है,बहुत ढेर है। अम्बार है उसका,लेकिन सामान में खोजने जाओ तो सामान के मालिक का कोई पता नहीं मिलता। मालिक कहां है?"

बैंक-बैलेंस है बहुत,लेकिन किसका है? उसका कोई पता नहीं चलता कि वह कौन है भीतर! जिसकी यह शक्ति है,वह कहां है?
उसका पता शांति में ही चलता है।
उसका पता अशांति में कभी नहीं चलता।
और इस शांति को खोजना है तो भीतर की यात्रा जरुरी है;जहां व्यक्ति का अंतस्तल है;जहां कोई विक्षोभ नहीं।

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

जीवन-वीणा का संगीत

बुद्ध का एक शिष्य था-श्रोण। वह बड़ा राजकुमार था। वह संन्यासी हो गया। उसने बहुत भोग भोगा था। उसके पास बड़े महल थे। फिर जब वह संन्यासी हो गया,तब बुद्ध के भिक्षु पूछने लगे कि जिसके पास सब था,उसने सब क्यों छोड़ दिया? बुद्ध ने कहा-"तुमको पता नहीं है जिंदगी उलटी है। जिसके पास सब होता है,वे छोड़ने को उत्सुक हो जाते हैं। गरीब,अमीर होना चाहता है और अमीर,अमीर होने के बाद समझ पाता है कि गरीब होने का मजा कुछ और ही है। धनवान,धन से भागने लगते हैं और निर्धन,धन पाने की यात्रा करते हैं। अज्ञानी सोचते हैं कि ज्ञान मिल जाएगा तो न मालूम क्या मिल जाएगा और जो ज्ञानी हैं,वे ज्ञान छोड़कर अज्ञानी हो जाते हैं और कहते हैं-हम कुछ भी नहीं जानते! इस आदमी के पास बहुत था,इसलिए सब छोड़कर वह भाग रहा है।"
बुद्ध के भिक्षु कहने लगे- "लेकिन हमने सुना है कि यह तो फूलों के रास्तों पर चलता था और अब नंगे पैर कांटों के रास्ते पर चलना बहुत दुखद होगा।"
बुद्ध ने कहा- "तुमको कुछ भी पता नहीं। तुम तो कांटों से बचते हो,वह तो कांटों की तलाश करेगा।" और यही हुआ। वह जो बहुत सुंदर राजकुमार था,वस्त्र भी छोड़ दिए उसने। वह नंगा ही रहने लगा। दूसरे भिक्षु राजपथों पर चलते थे,वह पगडंडियों पर चलता,जिन पर कांटे और पत्थर होते। तीन महीने के भीतर उसके पैर पर घाव बन गए। दूसरे भिक्षु छाया में बैठते,श्रोण धूप में खड़ा रहता। दूसरे भिक्षु रोज भोजन करते,श्रोण दो-दो,तीन-तीन दिन बाद भोजन करता। दूसरे भिक्षु रात भर सोते,श्रोण ने सोना भी छोड़ दिया। उसकी सुंदर देह कुंभला गई। उसकी फूल-सी आंखें मुर्झा गई। उसके शरीर को पहचानना मुश्किल हो गया।
छह महीने बाद बुद्ध,श्रोण के पास आए। उन्होंने श्रोण को कहा- "जब तुम राजकुमार थे,तब वीणा बजाने में बहुत कुशल थे। तेरी वीणा की बड़ी कीर्ती थी। दूर-दूर के लोग तेरी वीणा सुनने के लिए बाहर खड़े रहते थे। दीवाल के पास भीड़ खड़ी रहती थी। एक बार मैं भी तेरी वीणा के स्वर सुनकर दो क्षण रुक गया था।" 
श्रोण ने कहा, "हां,याद आता है। पर किसलिए मेरी स्मृति को छेड़ते हैं?"
बुद्ध ने कहा-"मैं यह पूछने आया हूं कि वीणा के तार अगर बहुत ढ़ीले हों,तो क्या संगीत पैदा होता है?"
श्रोण हंसने लगा- "कैसी बात करते हैं आप! तार ढ़ीले होंगे तो संगीत कैसे पैदा होगा? ढ़ीले तार से कहीं संगीत पैदा हुआ है? संगीत पैदा कर लेना तो बहुत आसान है। लेकिन तार को उस जगह ले आना चाहिए,जहां से संगीत पैदा होता है। उस्ताद और कला-गुरु ही उसे जानते हैं। वीणा को उस हालत में ला देना,जहां से वीणा बजती है,बड़ी कला की बात है। तार ढ़ीले नहीं होने चाहिए।"
बुद्ध ने कहा- "अगर तार बहुत कसे हों तब?"
श्रोण कहने लगा- "तब तार टूट जाते हैं। तब संगीत पैदा नहीं होता।"
तो बुद्ध ने कहा- "तो तार कैसे होने चाहिए?"
श्रोण ने कहा- "उलझन में डाल दिया आपने। बड़ी कठिन बात है,उसे कहना मुश्किल है। तार ऐसे होने चाहिए- जो न कसे हों,न ढ़ीले हों। तारों की एक व्यवस्था है-न जब वे कसे होते हैं और न ढ़ीले होते हैं,बीच में होते हैं। उस बीच को साध लेना ही कला है।"
बुद्ध ने कहा- "मैं चला। मैं कहने आया था कि जिस तरह वीणा के मध्य में संगीत पैदा होता है,उसी तरह जीवन की वीणा के तार वैसे होने चाहिए, जो न बहुत कसे हों,न ढ़ीले। बहुत ढ़ीले तार थे तेरी जीवन वीणा के। अब तूने अपनी जीवन-वीणा के तार बहुत कस लिए। त्याग ही तेरा लक्ष्य हो गया है। जीवन-वीणा के तार ऐसे होने चाहिए कि न ढ़ीले हों,न कसे। बीच में तारों की एक अवस्था है। वहीं से जीवन का संगीत पैदा होता है। जीवन की कला का एक ही सूत्र है। दो विरोधों के बीच में अविरोध। दो तनावों के बीच में तनाव मुक्ति। दो अतियों के बीच में संतुलन।"
-ओशो

शनिवार, 31 मार्च 2012

अज्ञात की यात्रा का साहस

एक सूफी बोध-कथा मुझे स्मरण आती है। एक छोटी सी नदी सागर से मिलने को चली है। नदी छोटी हो या बड़ी,सागर से मिलने की प्यास तो बराबर ही होती है,छोटी नदी में भी और बड़ी नदी में भी। छोटा-सा झरना भी सागर से मिलने को उतना ही आतुर होता है,जितनी कोई बड़ी गंगा हो। नदी के अस्तित्व का अर्थ ही सागर से मिलन है।

नदी भाग रही है सागर से मिलने को,लेकिन एक रेगिस्तान में भटक गई,एक मरुस्थल में भटक गई। सागर तक पहुचने की कोशिश व्यर्थ मालूम होने लगी, और नदी के प्राण संकट में पड़ गए। रेत नदी को पीने लगी। दो-चार कदम चलती है,और नदी खोती जाती है,और सिर्फ गीली रेत ही रह जाती है। 

नदी बहुत घबड़ा गई। सागर तक पहुंचने के सपने का क्या होगा? नदी ने रुककर, चीख कर रेगिस्तान की रेत से पूछा कि क्या मैं सागर तक कभी भी नहीं पहुंच पाऊंगी? क्योंकि रेगिस्तान अनंत मालूम पड़ता है, और चार कदम मैं चलती नहीं हूं कि रेत में मेरा पानी खो जाता है,मेरा जीवन सूख जाता है!!!मैं सागर तक पहुंच पाऊंगी या नहीं? 

रेत ने कहा कि सागर तक पहुंचने का एक उपाय है। ऊपर देख, हवाओं के बवंडर जोर से उड़े चले जा रहे हैं। रेत ने कहा कि अगर तू भी हवाओं की तरह हो जा,तो सागर तक पहुंच जाएगी। लेकिन अगर नदी की तरह ही तूने सागर तक पहुंचने की कोशिश की,तो रेगिस्तान बहुत बड़ा है,यह तुझे पी जाएगा। और हजारों-हजारों साल की कोशिश के बाद भी तू एक दलदल से ज्यादा नहीं हो पाएगी,सागर तक पहुंचना मुश्किल है। तू हवा की यात्रा पर निकल।

उस नदी ने कहा कि रेत!!! तू पागल तो नहीं है? मैं नदी हूं,मैं आकाश में उड़ नहीं सकती। रेत ने कहा कि तू अगर मिटने को राजी हो,तो आकाश में उड़ने का उपाय है। अगर तू तप जाए,वाष्पीभूत हो जाए,तो तू हवाओं पर सवार हो सकती है; हवाएं तेरी वाहन बन जाएंगी और तुझे सागर तक पहुंचा देंगी।

उस नदी ने कहा,मिट कर नहीं! मैं स्वयं को मिटाए बिना ही सागर से मिलने की आकांक्षा रखती हूं, स्वयं को मिटा कर नहीं। मिटकर मिलने का मजा ही क्या? अगर मैं मिट गई और सागर से मिलना भी हो गया,तो उसका सार क्या है? मैं बचते हुए,स्वयं रहते हुए सागर से मिलना चाहती हूं।

नदी की बात सुनकर रेत ने कहा,तब फिर कोई उपाय नहीं है। आज तक सागर से मिलने जो भी चला है,मिटे बिना नहीं पहुंच पाया है और जिसने स्वयं को बचाने की कोशिश की है,वह मरुस्थल में खो गया है। मैंने और बहुत सी नदियों को मरुस्थल में खोते देखा है और  कुछ नदियों को आकाश पर चढ़कर सागर तक पहुंचते भी देखा है। तू मिटने को राजी हो जा। तुझे अभी पता नहीं कि मिटकर ही तू वस्तुत: सागर हो पाएगी। 

लेकिन नदी को भरोसा कैसे आए!!! नदी ने कहा, यह मेरा अनुभव नहीं है। मिटने की हिम्मत नहीं जुटती। और फिर अगर मैं सागर से मिल भी गई मिटकर,तो सागर में मेरा होना रहेगा! मैं बचूंगी! क्या भरोसा? कैसे श्रद्धा करुं? जो मेरा अनुभव नहीं है,उसे कैसे मानूं? 

तब उस मरुस्थल की रेत ने कहा, दो ही उपाय हैं--या तो अनुभव हो,तो मानना आ जाता है; और या मानना हो तो अनुभव की यात्रा शुरु हो जाती है। अनुभव तुझे नहीं है, और बिना यह माने कि मिटकर भी तू बचेगी,तुझे अनुभव भी कभी नहीं होगा। इसे तू श्रद्धा से स्वीकार कर ले। 

परम वचन का अर्थ है,जो हमारा अनुभव नहीं है,लेकिन जिसकी हमें प्यास है। जिससे हमारा परिचय नहीं है,लेकिन जिसकी हमारे हृदय में आकांक्षा है। जिसे हमने जाना नहीं है,लेकिन जिसे खोजना है। ऐसी जिसकी अभीप्सा है,उसे कहीं न कहीं,किसी न किसी क्षण ऐसा कदम उठाना पड़ेगा, जो अज्ञात में है,अननोन में है।

- ओशो
गीता दर्शन भाग पांच,प्रवचन 1 से संकलित