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April, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पाखंड और स्वधर्म

‎" न कोई 'कर्म', न कोई 'किस्मत', न कोई 'ऐतिहासिक आदेश'- 'तुम्हारा जीवन तुम पर निर्भर है' | 'उत्तरदायी ठहराने के लिए कोई परमात्मा नहीं', 'सामाजिक पद्धति या सिद्धांत नहीं है' | 'ऐसी स्थिति में तुम इसी क्षण सुख में रह सकते हो या दुख में' |
'स्वर्ग अथवा नरक कोई ऐसे स्थान नहीं हैं जहाँ तुम मरने के बाद पहुँच सको', 'वे अभी इसी क्षण की संभावनाएँ हैं' | 'इस समय कोई व्यक्ति नरक में हो सकता है, अथवा स्वर्ग में' | 'तुम नरक में हो सकते हो और तुम्हारे पड़ोसी स्वर्ग में हो सकते हैं' |
'एक क्षण में तुम नरक में हो सकते हो और दूसरे ही क्षण स्वर्ग में' | 'जरा नजदीक से देखो', 'तुम्हारे चारों ओर का वातावरण परिवर्तित होता रहता है' | 'कभी-कभी यह बहुत बादलों से घिरा होता है' और 'प्रत्येक चीज धूमिल और उदास दिखाई देती है' और 'कभी-कभी धूप खिली होती है तो बहुत सुंदर और आनंदपूर्ण लगता है' |
'दुनिया का कोई भी धर्म, संगठन और व्यक्ति तुम्हें आनंदित नहीं कर सकता' और …

स्व व परमात्मा के बीच शांति

हेनरी थोरो अमेरिका का एक बहुत बड़ा विचारक हुआ। वह मरने के करीब था। वह कभी चर्च में नहीं गया था। उसे कभी किसी ने प्रार्थना करते नहीं देखा था। मरने का वक्त था,तो उसके गांव का पादरी उससे मिलने गया। उसने सोचा यह मौका अच्छा है,मौत के वक्त आदमी घबड़ा जाता है। मौत के वक्त डर पैदा हो जाता है,क्योंकि अनजाना रास्ता है मृत्यु का। न मालूम क्या होगा? उस वक्त भयभीत आदमी कुछ भी स्वीकार कर सकता है। मौत का शोषण धर्मगुरु बहुत दिनों से करते रहे हैं। इसलिए तो मंदिरों,मस्जिदों में बूढ़े लोग दिखाई पड़ते हैं।
पादरी ने हेनरी थोरो से जाकर कहा,"क्या तुमने अपने और परमात्मा के बीच शांति स्थापित कर ली है? क्या तुम दोनों एक दूसरे के प्रति प्रेम से भर गए हो?"
हेनरी थोरो मरने के करीब था। उसने आंखें खोली और कहा,"महाशय,मुझे याद नहीं पड़ता है कि मैं उससे कभी लड़ा भी हूं। मेरा उससे कभी झगड़ा नहीं हुआ तो उसके साथ शांति स्थापित करने का सवाल कहां? जाओ,तुम शांति स्थापित करो,क्योंकि जिंदगी में तुम उससे लड़ते रहे हो। मुझे तो उसकी प्रार्थना करने की जरूरत नहीं है। मेरी जिंदगी ही प्रार्थना थी।"
कोई मरता हुआ …

स्व का मालिक या शव का मालिक

स्वामी रामतीर्थ टोकियो गए थे। वहां एक बड़े भवन में आग लग गई थी। उस भवन के बाहर हजारों लोग इकट्ठे थे। रामतीर्थ भी खड़े होकर देखने लगे। भवन का मालिक खड़ा था। उसकी आंखें पथरा गई थी। वह देख रहा था,लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। जिंदगी भर जो बनाया था,वह जल रहा था। नौकर-चाकर,आसपास के पड़ोस के मित्र सामान लेकर बाहर आ रहे थे। तिजोरियां निकाली जा रही थी। हीरे-जवाहरात निकाले जा रहे थे। कीमती वस्त्र निकाले जा रहे थे। अमूल्य चीजें थी,उस धनपति के पास। वे सब बाहर निकाली जा रही थी। फिर लोगों ने मालिक से कहा कि एक बार भीतर जाया जा सकता है। अगर कोई जरूरी चीजें रह गई हों,तो हम भीतर से ले आएं। उस आदमी ने कहा-"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या हो रहा है,क्या आ गया है,क्या छूट गया है? मुझे कुछ भी पता नहीं है। तुम ऐसे ही जा कर देख लो,जो दिखाई पड़े,ले आओ। जिसका सब जल रहा हो उसे क्या दिखाई पड़ सकता है? जिसका सब जल रहा हो,वह क्या हिसाब किताब रख सकता है कि क्या छूट गया,क्या बच गया? ये सब फुरसत की बातें हैं,आराम की बाते हैं। सब जलता हो तो ये सब हिसाब-किताब काम नहीं पड़ते।"
वे लोग भीतर वापिस गए और…

जीवन-वीणा का संगीत

बुद्ध का एक शिष्य था-श्रोण। वह बड़ा राजकुमार था। वह संन्यासी हो गया। उसने बहुत भोग भोगा था। उसके पास बड़े महल थे। फिर जब वह संन्यासी हो गया,तब बुद्ध के भिक्षु पूछने लगे कि जिसके पास सब था,उसने सब क्यों छोड़ दिया? बुद्ध ने कहा-"तुमको पता नहीं है जिंदगी उलटी है। जिसके पास सब होता है,वे छोड़ने को उत्सुक हो जाते हैं। गरीब,अमीर होना चाहता है और अमीर,अमीर होने के बाद समझ पाता है कि गरीब होने का मजा कुछ और ही है। धनवान,धन से भागने लगते हैं और निर्धन,धन पाने की यात्रा करते हैं। अज्ञानी सोचते हैं कि ज्ञान मिल जाएगा तो न मालूम क्या मिल जाएगा और जो ज्ञानी हैं,वे ज्ञान छोड़कर अज्ञानी हो जाते हैं और कहते हैं-हम कुछ भी नहीं जानते! इस आदमी के पास बहुत था,इसलिए सब छोड़कर वह भाग रहा है।" बुद्ध के भिक्षु कहने लगे- "लेकिन हमने सुना है कि यह तो फूलों के रास्तों पर चलता था और अब नंगे पैर कांटों के रास्ते पर चलना बहुत दुखद होगा।" बुद्ध ने कहा- "तुमको कुछ भी पता नहीं। तुम तो कांटों से बचते हो,वह तो कांटों की तलाश करेगा।" और यही हुआ। वह जो बहुत सुंदर राजकुमार था,वस्त्र भी छोड़ …