रविवार, 29 अप्रैल 2012

पाखंड और स्वधर्म



‎" न कोई 'कर्म', न कोई 'किस्मत', न कोई 'ऐतिहासिक आदेश'- 'तुम्हारा जीवन तुम पर निर्भर है' | 'उत्तरदायी ठहराने के लिए कोई परमात्मा नहीं', 'सामाजिक पद्धति या सिद्धांत नहीं है' | 'ऐसी स्थिति में तुम इसी क्षण सुख में रह सकते हो या दुख में' |

'स्वर्ग अथवा नरक कोई ऐसे स्थान नहीं हैं जहाँ तुम मरने के बाद पहुँच सको', 'वे अभी इसी क्षण की संभावनाएँ हैं' | 'इस समय कोई व्यक्ति नरक में हो सकता है, अथवा स्वर्ग में' | 'तुम नरक में हो सकते हो और तुम्हारे पड़ोसी स्वर्ग में हो सकते हैं' |

'एक क्षण में तुम नरक में हो सकते हो और दूसरे ही क्षण स्वर्ग में' | 'जरा नजदीक से देखो', 'तुम्हारे चारों ओर का वातावरण परिवर्तित होता रहता है' | 'कभी-कभी यह बहुत बादलों से घिरा होता है' और 'प्रत्येक चीज धूमिल और उदास दिखाई देती है' और 'कभी-कभी धूप खिली होती है तो बहुत सुंदर और आनंदपूर्ण लगता है' |

'दुनिया का कोई भी धर्म, संगठन और व्यक्ति तुम्हें आनंदित नहीं कर सकता' और 'न ही उनके द्वारा तुम मोक्ष प्राप्त कर सकते हो' | 'धर्म का मार्ग पंथहीन है' | 'अधर्म का मार्ग ही पंथ वाला और संगठित होता है' |

'दूसरा कोई आदमी जब भी महावीर होने की कोशिश करेगा तो वह चोर, महावीर हो जाएगा' | 'दूसरा कोई आदमी अगर कृष्ण होने की कोशिश करेगा तो वह चोर, कृष्ण हो जाएगा' |

'कोई आदमी जब भी दूसरा आदमी होने की कोशिश करेगा तो आध्यात्मिक चोरी में पड़ जाएगा' | 'उसने व्यक्तित्व चुराने शुरू कर दिए' | और 'धर्म का हम यही मतलब समझ बैठे है': 'किसी के जैसे हो जाओ', 'अनुयायी बनो', 'अनुकरण करो', 'अनुसरण करो', 'पीछे चलो', 'ओढ़ो', 'खुद मत रहो बस', 'किसी को भी ओढ़ो' |

'इसीलिए कोई जैन है', 'कोई हिंदू है', 'कोई ईसाई है', 'कोई बौद्ध है' | 'ये कोई भी धार्मिक नहीं हैं' | 'ये धर्म के नाम पर गहरी चोरी में पड़ गए हैं' | 'अनुयायी चोर होगा ही आध्यात्मिक अर्थों में', 'उसने किसी दूसरे व्यक्तित्वों को चुरा कर अपने पर ओढ़ना शुरू कर दिया जो वह नहीं है' | 'पाखंड', 'हिपोक्रेसी परिणाम होगा' | "

ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

स्व व परमात्मा के बीच शांति

हेनरी थोरो अमेरिका का एक बहुत बड़ा विचारक हुआ। वह मरने के करीब था। वह कभी चर्च में नहीं गया था। उसे कभी किसी ने प्रार्थना करते नहीं देखा था। मरने का वक्त था,तो उसके गांव का पादरी उससे मिलने गया। उसने सोचा यह मौका अच्छा है,मौत के वक्त आदमी घबड़ा जाता है। मौत के वक्त डर पैदा हो जाता है,क्योंकि अनजाना रास्ता है मृत्यु का। न मालूम क्या होगा? उस वक्त भयभीत आदमी कुछ भी स्वीकार कर सकता है। मौत का शोषण धर्मगुरु बहुत दिनों से करते रहे हैं। इसलिए तो मंदिरों,मस्जिदों में बूढ़े लोग दिखाई पड़ते हैं।

पादरी ने हेनरी थोरो से जाकर कहा,"क्या तुमने अपने और परमात्मा के बीच शांति स्थापित कर ली है? क्या तुम दोनों एक दूसरे के प्रति प्रेम से भर गए हो?"

हेनरी थोरो मरने के करीब था। उसने आंखें खोली और कहा,"महाशय,मुझे याद नहीं पड़ता है कि मैं उससे कभी लड़ा भी हूं। मेरा उससे कभी झगड़ा नहीं हुआ तो उसके साथ शांति स्थापित करने का सवाल कहां? जाओ,तुम शांति स्थापित करो,क्योंकि जिंदगी में तुम उससे लड़ते रहे हो। मुझे तो उसकी प्रार्थना करने की जरूरत नहीं है। मेरी जिंदगी ही प्रार्थना थी।"

कोई मरता हुआ आदमी ऐसा कहेगा,इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन बड़ी सच्ची बात हेनरी थोरो ने यह कही कि अगर मैं उससे लड़ा होता,अगर एक पल को भी मेरे और उसके बीच कोई शत्रुता खड़ी हुई होती तो फिर मैं शांति स्थापित करने की कोशिश करता। लेकिन नहीं,वह तो कभी हुआ नहीं है।किसके बीच,कैसी शांति स्थापित करूं?

रविवार, 22 अप्रैल 2012

स्व का मालिक या शव का मालिक

स्वामी रामतीर्थ टोकियो गए थे। वहां एक बड़े भवन में आग लग गई थी। उस भवन के बाहर हजारों लोग इकट्ठे थे। रामतीर्थ भी खड़े होकर देखने लगे। भवन का मालिक खड़ा था। उसकी आंखें पथरा गई थी। वह देख रहा था,लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। जिंदगी भर जो बनाया था,वह जल रहा था। नौकर-चाकर,आसपास के पड़ोस के मित्र सामान लेकर बाहर आ रहे थे। तिजोरियां निकाली जा रही थी। हीरे-जवाहरात निकाले जा रहे थे। कीमती वस्त्र निकाले जा रहे थे। अमूल्य चीजें थी,उस धनपति के पास। वे सब बाहर निकाली जा रही थी। फिर लोगों ने मालिक से कहा कि एक बार भीतर जाया जा सकता है। अगर कोई जरूरी चीजें रह गई हों,तो हम भीतर से ले आएं। उस आदमी ने कहा-"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या हो रहा है,क्या आ गया है,क्या छूट गया है? मुझे कुछ भी पता नहीं है। तुम ऐसे ही जा कर देख लो,जो दिखाई पड़े,ले आओ। जिसका सब जल रहा हो उसे क्या दिखाई पड़ सकता है? जिसका सब जल रहा हो,वह क्या हिसाब किताब रख सकता है कि क्या छूट गया,क्या बच गया? ये सब फुरसत की बातें हैं,आराम की बाते हैं। सब जलता हो तो ये सब हिसाब-किताब काम नहीं पड़ते।"

वे लोग भीतर वापिस गए और छाती पीटते हुए बाहर आए। हर बार तो वे खुशी से आते थे कि वे कुछ लेकर आए हैं।  इस बार भी वे कुछ लेकर आए थे,लेकिन रोते हुए। सारी भीड़ इकट्ठी हो गई और पूछने लगी कि रोते क्यों हो? उन्होंने कहा-"बड़ी भूल हो गई। हमारे मालिक का एक ही बेटा था। उस बेटे को हम बचाना भूल गए। वह भीतर सो रहा था। वह जल गया,चल बसा। हम सामान बचाते रहे। सामान तो बच गया,लेकिन मकान का मालिक,होने वाला मालिक जल गया।"

स्वामी रामतीर्थ ने उस दिन अपनी डायरी में लिखा-"यही तो सारी दुनिया में होता है। आदमी मर गया है और सामान बचाया जा रहा है। असली मालिक खो गया है और सामान बच गया । सामान बहुत है,बहुत ढेर है। अम्बार है उसका,लेकिन सामान में खोजने जाओ तो सामान के मालिक का कोई पता नहीं मिलता। मालिक कहां है?"

बैंक-बैलेंस है बहुत,लेकिन किसका है? उसका कोई पता नहीं चलता कि वह कौन है भीतर! जिसकी यह शक्ति है,वह कहां है?
उसका पता शांति में ही चलता है।
उसका पता अशांति में कभी नहीं चलता।
और इस शांति को खोजना है तो भीतर की यात्रा जरुरी है;जहां व्यक्ति का अंतस्तल है;जहां कोई विक्षोभ नहीं।

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

जीवन-वीणा का संगीत

बुद्ध का एक शिष्य था-श्रोण। वह बड़ा राजकुमार था। वह संन्यासी हो गया। उसने बहुत भोग भोगा था। उसके पास बड़े महल थे। फिर जब वह संन्यासी हो गया,तब बुद्ध के भिक्षु पूछने लगे कि जिसके पास सब था,उसने सब क्यों छोड़ दिया? बुद्ध ने कहा-"तुमको पता नहीं है जिंदगी उलटी है। जिसके पास सब होता है,वे छोड़ने को उत्सुक हो जाते हैं। गरीब,अमीर होना चाहता है और अमीर,अमीर होने के बाद समझ पाता है कि गरीब होने का मजा कुछ और ही है। धनवान,धन से भागने लगते हैं और निर्धन,धन पाने की यात्रा करते हैं। अज्ञानी सोचते हैं कि ज्ञान मिल जाएगा तो न मालूम क्या मिल जाएगा और जो ज्ञानी हैं,वे ज्ञान छोड़कर अज्ञानी हो जाते हैं और कहते हैं-हम कुछ भी नहीं जानते! इस आदमी के पास बहुत था,इसलिए सब छोड़कर वह भाग रहा है।"
बुद्ध के भिक्षु कहने लगे- "लेकिन हमने सुना है कि यह तो फूलों के रास्तों पर चलता था और अब नंगे पैर कांटों के रास्ते पर चलना बहुत दुखद होगा।"
बुद्ध ने कहा- "तुमको कुछ भी पता नहीं। तुम तो कांटों से बचते हो,वह तो कांटों की तलाश करेगा।" और यही हुआ। वह जो बहुत सुंदर राजकुमार था,वस्त्र भी छोड़ दिए उसने। वह नंगा ही रहने लगा। दूसरे भिक्षु राजपथों पर चलते थे,वह पगडंडियों पर चलता,जिन पर कांटे और पत्थर होते। तीन महीने के भीतर उसके पैर पर घाव बन गए। दूसरे भिक्षु छाया में बैठते,श्रोण धूप में खड़ा रहता। दूसरे भिक्षु रोज भोजन करते,श्रोण दो-दो,तीन-तीन दिन बाद भोजन करता। दूसरे भिक्षु रात भर सोते,श्रोण ने सोना भी छोड़ दिया। उसकी सुंदर देह कुंभला गई। उसकी फूल-सी आंखें मुर्झा गई। उसके शरीर को पहचानना मुश्किल हो गया।
छह महीने बाद बुद्ध,श्रोण के पास आए। उन्होंने श्रोण को कहा- "जब तुम राजकुमार थे,तब वीणा बजाने में बहुत कुशल थे। तेरी वीणा की बड़ी कीर्ती थी। दूर-दूर के लोग तेरी वीणा सुनने के लिए बाहर खड़े रहते थे। दीवाल के पास भीड़ खड़ी रहती थी। एक बार मैं भी तेरी वीणा के स्वर सुनकर दो क्षण रुक गया था।" 
श्रोण ने कहा, "हां,याद आता है। पर किसलिए मेरी स्मृति को छेड़ते हैं?"
बुद्ध ने कहा-"मैं यह पूछने आया हूं कि वीणा के तार अगर बहुत ढ़ीले हों,तो क्या संगीत पैदा होता है?"
श्रोण हंसने लगा- "कैसी बात करते हैं आप! तार ढ़ीले होंगे तो संगीत कैसे पैदा होगा? ढ़ीले तार से कहीं संगीत पैदा हुआ है? संगीत पैदा कर लेना तो बहुत आसान है। लेकिन तार को उस जगह ले आना चाहिए,जहां से संगीत पैदा होता है। उस्ताद और कला-गुरु ही उसे जानते हैं। वीणा को उस हालत में ला देना,जहां से वीणा बजती है,बड़ी कला की बात है। तार ढ़ीले नहीं होने चाहिए।"
बुद्ध ने कहा- "अगर तार बहुत कसे हों तब?"
श्रोण कहने लगा- "तब तार टूट जाते हैं। तब संगीत पैदा नहीं होता।"
तो बुद्ध ने कहा- "तो तार कैसे होने चाहिए?"
श्रोण ने कहा- "उलझन में डाल दिया आपने। बड़ी कठिन बात है,उसे कहना मुश्किल है। तार ऐसे होने चाहिए- जो न कसे हों,न ढ़ीले हों। तारों की एक व्यवस्था है-न जब वे कसे होते हैं और न ढ़ीले होते हैं,बीच में होते हैं। उस बीच को साध लेना ही कला है।"
बुद्ध ने कहा- "मैं चला। मैं कहने आया था कि जिस तरह वीणा के मध्य में संगीत पैदा होता है,उसी तरह जीवन की वीणा के तार वैसे होने चाहिए, जो न बहुत कसे हों,न ढ़ीले। बहुत ढ़ीले तार थे तेरी जीवन वीणा के। अब तूने अपनी जीवन-वीणा के तार बहुत कस लिए। त्याग ही तेरा लक्ष्य हो गया है। जीवन-वीणा के तार ऐसे होने चाहिए कि न ढ़ीले हों,न कसे। बीच में तारों की एक अवस्था है। वहीं से जीवन का संगीत पैदा होता है। जीवन की कला का एक ही सूत्र है। दो विरोधों के बीच में अविरोध। दो तनावों के बीच में तनाव मुक्ति। दो अतियों के बीच में संतुलन।"
-ओशो