बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

नई कहानी

(यशपाल जी ने नई कहानी को परिभाषित करते हुए यह कहानी लिखी थी : प्रस्तुत है यह कहानी आपके समक्ष)

मुफस्सिल की पैसेंजर ट्रेन चल पड़ने की उतावली में फुंकार रही थी. आराम से सेकंड क्लास में जाने के लिए दाम अधिक लगते हैं. दूर तो जाना नहीं था. भीड़ से बचकर,एकांत में नई कहानी के सम्बन्ध में सोच सकने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देख सकने के लिए टिकट सेकंड क्लास का ही ले लिया.

गाड़ी छूट रही थी. सेकंड क्लास के एक छोटे डिब्बे को खाली समझ कर जरा दौड़ कर उसमें चढ़ गए.अनुमान के प्रतिकूल डिब्बा निर्जन नहीं था.एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे. सामने दो ताजे-चिकने खीरे तौलिए पर रखे थे.डिब्बे में हमारे सहसा कूद जाने से सज्जन की आँखों में एकांत चिंतन में विघ्न का असंतोष दिखायी दिया. सोचा,हो सकता है,यह भी कहानी के लिए सूझ की चिंता में हों या खीरे-जैसी अपदार्थ वस्तु का शौक करते देखे जाने के संकोच में हों.

नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया. हमने भी उनके सामने की बर्थ पर बैठ कर आत्म-सम्मान में आँखे चुरा ली.

ठाली बैठे,कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है. नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारण का अनुमान करने लगे.सम्भव है,नवाब साहब ने बिल्कुल अकेले यात्रा कर सकने के अनुमान में किफायत के विचार से सेकंड क्लास का टिकट खरीद लिया हो और अब गवारा न हो कि शहर का कोई सफेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफर करता देखे. ........अकेले सफर का वक्त काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे और अब किसी सफेदपोश के सामने खीरा कैसे खाएं? 

हम कनखियों से नवाब साहब कि और देख रहे थे. नवाब साहब कुछ देर गाड़ी की खिड़की से बाहर देखकर स्थिति पर गौर करते रहे.

ओह! नवाब साहब ने सहसा हमें सम्बोधन किया,आदाब अर्ज ,जनाब,खीरे का शौक फरमाएंगे? 

नवाब साहब का सहसा भाव-परिवर्तन अच्छा नहीं लगा. भांप लिया,आप शराफत का गुमान बनाये रखने के लिए हमें भी मामूली लोगों कि हरकत में लथेड़ लेना चाहते हैं. जवाब दिया,शुक्रिया,क़िबला शौक फरमाएँ.

नवाब साहब ने फिर एक पल खिड़की से बाहर देखकर गौर किया और दृढ़ निश्चय से खीरों के नीचे रखा तौलिया झाड़ कर सामने बिछा लिया.सीट के नीचे से लोटा उठा कर दोनों खीरों को खिड़की से बाहर धोया और तौलिये से पौंछ लिया. जेब से चाकू निकाला. दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें गोद कर झाग निकाला. फिर खीरों को बहुत एहतियात से छीलकर फांकों को करीने से तौलिये पर सजाते गये.

लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले खीरे के इस्तेमाल का तरीका जानते हैं. ग्राहक के लिए जीरा-मिला नमक और पिसी हुई लाल मिर्च की पुड़िया भी हाजिर कर देते हैं.

नवाब साहब ने बहुत करीने से खीरे की फांकों पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुर्खी बुर्क दी. उनकी प्रत्येक भाव भंगिमा और जबड़ों के स्फुरण से स्पष्ट था कि उस प्रक्रिया में उनका मुख खीरे के रसास्वादन की कल्पना से प्लावित हो रहा था.

हम कनाखियों से देख कर सोच रहे थे, मियां रईस बनते हैं,लेकिन लोगों की नजरों से बच सकने के ख्याल में अ‍पनी अ‍सलियत पर उतर आये हैं.

नवाब साहब ने फिर एक बार हमारी ओर देख लिया, वल्लाह,शौक कीजिए, लखनऊ का बालम खीरा है!

नमक-मिर्च छिड़क दिया जाने से ताजे खीरे की पनियाती फांकें देखकर पानी मुंह में जरूर आ रहा था,लेकिन इनकार कर चुके थे. आत्म-सम्मान निबाहना ही उचित समझा,उत्तर दिया,शुक्रिया, इस वक्त तलब महसूस नहीं हो रही,मेदा भी जरा कमजोर है,किबला शौक फरमाएं.

नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फांकों की ओर देखा. खिड़की के बाहर देखकर दीर्घ निश्वास लिया. खीरे की एक फांक उठाकर होंठों तक ले गये. फांक को सूंघा. स्वाद के आनंद में पलकें मूंद गयीं. मुंह में भर आये पानी का घूंट गले से उतर  गया. तब नवाब साहब ने फांक को खिड़की से बाहर छोड़ दिया. नवाब साहब खीरे  की फांकों को नाक के पास ले जाकर, वासना से रसास्वादन कर खिड़की के
बाहर फेंकते  गये.

नवाब साहब ने खीरे की सब फांकों को खिड़की से बाहर  फेंककर तौलिये से हाथ और हौंठ पोंछ लिये और गर्व से गुलाबी आँखों से  हमारी ओर देख लिया,मानों कह रहें हों-- यह है खानदानी रईसों  का तरीका!

नवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थक कर लेट गये. हमें तसलीम में सिर खम कर लेना पड़ा -- यह है खानदानी तहजीब,नफासत और नजाकत !

हम गौर कर रहे थे,खीरा इस्तेमाल करने के इस तरीके को खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से संतुष्ट होने का  सूक्ष्म,नफीस या ऐब्स्ट्रैक्ट तरीका जरूर कहा जा  सकता है परन्तु क्या ऐसे तरीके से उदर की तृप्ति भी हो सकती  है?

नवाब साहब की ओर से  भरे पेट  के ऊँचे डकार का शब्द सुनाई दिया और नवाब साहब ने हमारी ओर देख कर कह दिया,ख़ीरा लजीज होता है लेकिन होता है सकील,नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है.

ज्ञान-चक्षु खुल गए ! पहचाना -- ये हैं  नई  कहानी  के  लेखक!

खीरे  की  सुगंध और स्वाद की कल्पना से पेट भर जाने का  डकार आ सकता है  तो बिना विचार,घटना और पात्रों के,लेखक की इच्छा मात्र से नई कहानी  क्यों नहीं बन  सकती?

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

गुड्डो

(किशोर युवती के मन को संजोती एक प्यारी सी,मासूम सी कहानी--गुड्डो, गुलज़ार की लिखी यह कहानी पढ़ने लायक है) 

कई बार उसे खुद भी ऐसा लगा कि वो अपनी उम्र से ज्यादा बड़ी हो गयी है। जब वो आठवीं में थी दसवीं जमात की लड़कियों की तरह बात करती थी। और नवीं में आने के बाद तो उसे ऐसा लगा जैसे बिल्कुल बड़ी दीदी की तरह कॉलेज में पढ़ने लग गयी है। उन्हीं की तरह उसने अपनी डायरी लिखनी शुरु कर दी थी। उन्हीं की तरह वो भी मूडी हो गयी थी। उन्हीं की तरह घंटों शीशे के सामने बैठी सिंगार करती रहती। गयी बार माँ ने टोका तो उसे बुरा लगा।

"हुँह! दीदी को तो कुछ कह नहीं सकती,मुझे डाँट देती हैं।"
मन ही मन बड़बड़ाकर वो चुप हो गयी।
लेकिन उस दिन वो फूट पड़ी जिस दिन दीदी ने उसके लिए नया फॅराक बनाया।
"मैं नहीं पहनती फॅराक। खुद तो अच्छी अच्छी साड़ियाँ ले आती हैं। मेरे लिए ये फॅराक बना दिया है।"
"गुड्डो-तू बड़ी हो जाए तो..."
"गुड्डो,गुड्डो मत कहा करो मुझे। यह मेरा नाम नहीं है।"
"अच्छा कुसुम जी आप बड़ी हो जाएँगी तो साड़ी भी ला देंगे।"
"मैं अभी छोटी हूँ? नवीं में पढ़ती हूँ।"
दीदी हँस पड़ी और वो पैर पटखती चली गयी।

दीदी,पता नहीं,अपने-आपको किस बात पर बड़ा समझती हैं। वो उनसे ज्यादा अच्छी डायरी लिख लेती है। उनसे ज़्यादा प्यार भरी बातें कह सकती है। देवराज की तो शकल भी अच्छी नहीं है। ऐसी ऊँची नाक है। हाथ से पसीना पोंछता है तो हाथ टकरा जातें हैं। और वो खुद! वो जिसे प्यार करती है वो तो लाखों का चहेता है। सचमुच फि़ल्मों का हीरो। देवराज तो उसके 'मेहबूब' की नकल करता है। वो जैसे बाल बनाता है,देवराज भी वैसे बाल बनाता है। पल-भर को उसे लगा जैसे दीदी भी कुछ नहीं। जैसे देवराज और दीदी तो बस दिलीप कुमार और कुसुम की जूठन हैं। इस ख़याल से उसे बड़ी तसल्ली हुई। ख़यालों ही ख़यालों में दिलीप की आग़ोश में डूब गयी और आसमान पर बिखरे-बिखरे बादलों के टुकड़े जोड़ने लगी।

कितनी बार वो स्कूल से भाग-भाग कर अपने 'मेहबूब' से मिलने गयी थी। सातवीं में थी। सातवीं या आठवीं में जब उसने 'मधुमती' देखी थी। हाय! कितना अच्छा लगता था उसमें दिलीप। पूरी बांहों वाली जर्सी में,बस इसके होंटों से 'सी' निकल गयी। उसका बस चलता तो वहीं भाग कर पर्दे पर उसका हाथ पकड़ लेती। उसने कभी सोचा था,वो दिलीप से मिलेगी,तो जरूर एक पूरी बाँहों वाली जर्सी बुन कर देगी। और फिर 'नया दौर' में जब उसने दिलीप को धोती में देखा तो उसकी रही-सही सुध-बुध भी जाती रही। उस दिन से तो वह उसपर बिल्कुल ही लट्टू हो गयी थी। ताँगे की कमानी पर बैठ कर जब हवा में चाबुक लहराता था तो जैसे जान ही निकाल लेता था। उसे हर वक़्त यही डर लगा रहता था,कहीं गिर न पड़े। कई बार तो टाँगों के धचके के साथ वो खुद भी उछल पड़ी थी। और जब दिलीप दनदनाता हुआ टूटे हुए पुल से गुज़रा था तो उसने पुल के नीचे अपनी दोनों बाँहों का पूरा ज़ोर लगा दिया था। उसे तो तब एहसास हुआ था जब साथ की सीट पर बैठी उसकी सहेली ने 'उई' कह के अपना हाथ छुड़ाया था। लेकिन ये मोटी मद्रासिन वैजयंतीमाला क्यों इसके पीछे पड़ गयी है। यकलख़्त ही वैजयंतीमाला के ख़ेलाफ़ शदीद नफ़रत से भर गयी। धन्नो! आयी बड़ी धन्नो! उसे बड़ी तसल्ली हुई यह सोचकर कि 'गंगा जमुना' के आख़िर में वैजयंती माला मर जाती है।

वो बिस्तर से उठी और जाकर मेज़ के दराज़ से अपनी डायरी निकाली। डायरी में 'गंगा जमुना' की बुकलेट पड़ी थी। बुकलेट के ऊपर दिलीप और वैजयंती की तस्वीर थी। उसने दीदी की अलमारी से कैंची निकाली और वैजयंती की तस्वीर काट कर अलग कर दी। दिलीप की तस्वीर को चूमा। उसके बालों पर हाथ फेरा और फिर तस्वीर को सँभाल कर डायरी में रखा और डायरी पर सर रखके फिर बिखरे-बिखरे बादलों के टुकड़े चुनने लगी।

कब से वो इन बादलों के टुकड़े सी रही थी। लेकिन बादल थे कि बार-बार बिखर जाते थे। न बरसते थे,न सिलने में आते थे। कहाँ तक वो बादलों को जोड़ती जाए,पिरोती जाए,काश! वो एक बार जमके बरस जाएँ ताकि उसका कलेजा ठंडा हो जाए। 

काश!दिलीप एक बार मुझे चिट्ठी लिखें। उसने सोचा। जैसे देवराज दीदी को लिखता है। वो तो कुछ भी नहीं। दिलीप जो लिखेगा,वो तो कोई और लिख भी नहीं सकता। उसने कई बार उसके लिखे हुए ख़त फ़िल्मों में सुने थे। 

उसने डायरी निकाली और दिलीप के नाम एक और ख़त लिखने बैठ गयी। 

नवीं का इम्तेहान दिया ही था कि कुसुम की ज़िन्दगी में एक ऐसी सुबह आयी जिसका वो तसव्वुर भी नहीं कर सकती थी। सुबह उठते ही मालूम हुआ,मामा आये हैं और सब दिलीप की शूटिंग देखने चलेंगे। स्कूल में छुट्टी थी। बस,बात बन गयी। वो भी जाएगी। उसने मामा से कह दिया।

"चलो तुम भी चलो।"
"यह क्या करेगी जाकर?" दीदी ने कहा।
"गुड्डो ऑटोग्राफ़ ले लेगी।"
"इसे गुड्डो मत कहिए मामा जी,वरना नाराज़ हो जाएगी। अब यह बड़ी हो गयी है।"
दीदी हँस रही थी। वो फिर दीदी से चिढ़ गयी। जब दिलीप प्यार भरी नज़रों से उसकी तरफ़ देखेगा,तब पता चलेगा,वो कितनी बड़ी हो गयी है। वो तैयार होने अंदर चली गयी और देर तक सिंगार की मेज़ के सामने बैठी रही।

जब शूटिंग पर पहुँचे तो दिलीप और वैजयंती एक 'सीन' की रिहर्सल कर रहे थे। सहमी-सहमी- सी वो एक तरफ़ खड़ी रही दिलीप वैजयंती का हाथ पकड़े कह रहा था--
"लता,अब दुनिया की कोई ताक़त तुम्हें मुझसे छीन नहीं सकती। मैंने हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हें पा लिया है। बताओ,मेरे साथ चलोगी लता?"
और लता ने बड़े प्यार से अपना सिर दिलीप के सीने पर रख दिया।
"बेशरम" कुसुम मन ही मन बुड़बुड़ाई।
शॉट खत्म हुआ तो मामा ने कहा,"गुड्डो,जाओ ले लो ऑटोग्राफ?"
"नहीं नहीं मुझे नहीं लेना ऑटोग्राफ़।" वो रुआँसी हो कर बोली।
"अरे क्या हो गया?"
"कुछ नहीं।" वो कह कर बाहर चली गयी।
जब सब वापस आ गये तो वो सीधी अपने कमरे में पहुँची दराज़ से डायरी निकाली और डायरी से दिलीप के सारे फोटो निकाले और मसल-कुचल कर खिड़की से बाहर फेंक दिए।
"जाओ,जाओ,अपनी धन्नों के पास! तुम भी जाओ।"
और बिस्तर पर गिर कर फूट-फूट कर रोने लगी।