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November, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वह अकेला आदमी ::1 ::

आज वह अपने जीवन की 95वीं वर्ष गाँठ के छोर पर खड़ा अपने जीवन-प्रवाह के अतीत खंड को निहार रहा था।जब से होश सम्हाला था,तब से अब तक की जीवन-यात्रा के दृश्य उसकी आँखों के सामने से चलचित्र की तरह दौड़े जा रहे थे। वह न उनका मूल्यांकन कर रहा था और न ही उसे अपने जीवन के अतीत से कोई लगाव ही रह गया था। बस वह तो निरपेक्ष भाव से उन सब घटनाओं को साक्षी बना देख रहा था।
बचपन के आठ वर्ष एक छोटे से गाँव में बीते। इन आठ सालों में उसके मन पर जो प्रभाव पड़ा...उससे वह आज तक प्रभावित है। उसकी दार्शनिकता उस छोटे से गाँव में ही फलने-फूलने लगी थी, जब उसने अपनी माँ से रात को खेतों में शौच जाते समय,अपने साथ चलते हुए चाँद को देख कर माँ से सवाल पूछ बैठा था कि यह चाँद हमारे साथ-साथ क्यों चल रहा है? 
जीवन के मूल प्रश्न तभी से उसके कोमल मनस-पटल पर उठने लगे थे। जीवन क्या है? मैं इस संसार में क्यों हूँ?  मरने पर क्या होता है? आदमी मर कर कहाँ चला जाता है? सबसे पहले मरते हुए उसने अपने एक पड़ौसी को देखा था। उसका नाम रामजा था। बहुत ही पेटू था वह। लोगों से माँग-माँग कर चवन्नियाँ इकट्ठी किया करता था,और जब कोई उससे पूछता कि …