बुधवार, 21 नवंबर 2012

वह अकेला आदमी ::1 ::

आज वह अपने जीवन की 95वीं वर्ष गाँठ के छोर पर खड़ा अपने जीवन-प्रवाह के अतीत खंड को निहार रहा था।जब से होश सम्हाला था,तब से अब तक की जीवन-यात्रा के दृश्य उसकी आँखों के सामने से चलचित्र की तरह दौड़े जा रहे थे। वह न उनका मूल्यांकन कर रहा था और न ही उसे अपने जीवन के अतीत से कोई लगाव ही रह गया था। बस वह तो निरपेक्ष भाव से उन सब घटनाओं को साक्षी बना देख रहा था।

बचपन के आठ वर्ष एक छोटे से गाँव में बीते। इन आठ सालों में उसके मन पर जो प्रभाव पड़ा...उससे वह आज तक प्रभावित है। उसकी दार्शनिकता उस छोटे से गाँव में ही फलने-फूलने लगी थी, जब उसने अपनी माँ से रात को खेतों में शौच जाते समय,अपने साथ चलते हुए चाँद को देख कर माँ से सवाल पूछ बैठा था कि यह चाँद हमारे साथ-साथ क्यों चल रहा है? 

जीवन के मूल प्रश्न तभी से उसके कोमल मनस-पटल पर उठने लगे थे। जीवन क्या है? मैं इस संसार में क्यों हूँ?  मरने पर क्या होता है? आदमी मर कर कहाँ चला जाता है? सबसे पहले मरते हुए उसने अपने एक पड़ौसी को देखा था। उसका नाम रामजा था। बहुत ही पेटू था वह। लोगों से माँग-माँग कर चवन्नियाँ इकट्ठी किया करता था,और जब कोई उससे पूछता कि इन चवन्नियों का क्या करोगे? तो वह कहता मेले जाऊँगा तो बहुत सी चीजें खरीदूँगा। एक दिन वह चल बसा। उसकी अंतिम क्रिया के समय उसे नहलाते हुए देख कर उसने अपनी माँ से पूछा था, माँ रामजा को क्या हो गया,लोग उसे पकड़ कर क्यों नहला रहे हैं,वह बोलता क्यों नहीं? उसकी आँखें ऐसी फटी-फटी क्यों है? माँ ने उसे कहा, बेटा! रामजा मर गया है।अब वह कभी वापिस नहीं लौटेगा। लोग उसकी अर्थी बना कर श्मसान-भूमि में ले जाकर फूँक आए। तब वह भी गाँव के बाहर बने मरघट पर गया था। मरघट पर खुद उसे जलते हुए देखा, तो उसे जीवन की मृत्यु का पहला अहसास हुआ। और जीवन संबंधी प्रश्न उसके मन में उठने लगे।

उसने गाँव में बहुत से अनुभव किए। उसने प्रकृति के सान्निध्य में अपना बचपन बिताया। नदी के घाट पर घूमा। उफनती नदी को पार करता और उसमें बनने वाले भँवर को निहारता...पाँवों के तले कटती मिट्टी को अनुभव करता। खेतों में फसलों को बौते-काटते देखता। लोगों का श्रमपूर्ण जीवन देखता। कुछ कटु अनुभव भी हुए।                                                                                                                       .... जारी//