शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

लकीर का फकीर

एक कवि एक सुंदर बाग के एकांत में सरोवर तट पर एक लंबे घने वृक्ष के नीचे बैठा कविता लिख रहा था। आसपास कोई भी नहीं था। एक कोवा वृक्ष की डाल पर बैठा था।
कवि अपनी पहली कविता कहता है :
सारी दुनिया की संपत्ति का
मैं मालिक
सोलोमन का खजाना भी
मैंने पा लिया
कुबेर का खजाना भी
मैंने पा लिया

ऊपर बैठा कौवा कांव-कांव करता है और कहता है “सो व्हॉट? , इससे क्या हुआ?
कवि बहुत हैरान हुआ। कवि कह रहा है मैं कुबेर हो गया,सारी संपत्ति मेरी हो गई और कौवा कह रहा है सो व्हॉट?
कवि ने क्रोध में ऊपर देखा, और कहा,” ना समझ कौवे तू क्या समझेगा?”
कौवे ने कहा, ठीक कहते हैं आप, धन की बात कोई दूसरा कौवा भी नहीं समझेगा। धन की बात सिवाए आदमी के कोई भी नहीं समझेगा। ना कोई विश्वास करेगा।“
लेकिन तुम समझते हो कि हम धन की बात नहीं समझते, इसलिए ना समझ हैं। तो यह बात नहीं है। सच बात तो ये है कि हम किसी चीज को बिना खोजे विश्वास नहीं करते।
कवि ने कहा , ठीक है, तुम्हें विश्वास नहीं आता तो दूसरी कविता सुनाता हूं :-
सारी पृथ्वी का राज्य मैंने पाया
चक्रवर्ती सम्राट मैं कहलाया
स्वर्ण सिंहासनों पर विराजा मैं
सब कुछ मैं हूं
सब कुछ मेरा है

इतना कहने के बाद कवि फिर आदत के अनुसार कौवे की तरफ़ देखता है। कौवा फिर कहता है सो व्हॉट? इससे क्या हुआ? कवि फिर चौंक गया। उसने सोचा मालूम होता है कि कौवा न धन की बात समझता है, न यश की। शायद कोई संन्यासी कौवा है, इसे संन्यास की कविता सुनाता हूं।
फिर कवि तीसरी कविता कहता है:-
मैंने सब खो दिया
तभी जाना कि मैं परमात्मा हूं
मैं जीवन से हट गया
और मैं मुक्त हो गया
मैं मोक्ष का आनंद भोग रहा हूं

लेकिन कौवा इस बार फिर बोला “ सो व्हॉट? इससे क्या हुआ? कवि तो घबड़ा कर खड़ा हो गया। और कहने लगा,हर चीज़ में कहते हो सो व्हॉट? मैं तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊं।  

कौवा बोला मुझे विश्वास दिलाने की जरूरत नहीं है। मैं तो हर चीज़ पर संदेह करता हूं। हां, अगर यही कविताएं तुम किसी आदमी को सुनाआगे तो वह अवश्य ही विश्वास कर लेगा क्योंकि वह लकीर का फ़कीर है।  

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

सिटनालटा

एक बार विद्वान लोगों के एक समूह ने ओशो को बोलने के लिए आमंत्रित किया। ओशो ने आमंत्रण सहर्ष स्वीकार किया और नियत दिन सभा को संबोधित करने पहुंचे। ओशो ने इस समूह के साथ चर्चा का जो विषय चुना वह था : "सिटनालटा- एक अनोखा समाज"। उन्होंने उस समाज के संबंध में बोलते हुआ कहा कि हमारे शरीर में सात चक्र नहीं,बल्कि सत्रह चक्र होते हैं। सिटनालटा समाज ने यह खोज निकाला था। यह पुरातन विद्या अब लुप्त हो गई है। लेकिन निर्वाणप्राप्त 'सिटनालटा' के इस इस गुप्त,गुह्य रहस्य को जानने वालों की एक गुप्त संस्था आज भी सक्रिय है। इन लोगों को जीवन के सभी रहस्यों का पता है। उनके पास ऐसी-ऐसी शक्तियां हैं,जिनकी सामान्य लोग कल्पना भी नहीं कर सकते।
सभा के अंत में सभापति ओशो से बोले कि उन्हें सिटनालटा के बारे में पता है। एक और व्यक्ति आकर कहने लगा कि वह सिटनालटा का सदस्य है। फिर उनके पास पत्र आने लगे उन लोगों के जो दावा करते थे कि वे भी उस रहस्यमयी संस्था के सदस्य हैं।
ओशो मन ही मन हंसे,क्योंकि सत्य तो यह था कि भाषण से पहले ओशो एटलांटिस नामक महाद्विप के बारे में पढ़ रहे थे। ऐसा माना जाता है कि यह महाद्विप कहीं लुप्त हो गया है। ओशो को शरारत सूझी,और उन्होंने एटलांटिस के अंग्रेजी शब्द-विन्यास को उल्टा करके 'सिटनालटा' बना दिया, और उसके संबंध में विद्वान लोगों के सम्मुख विवेचन करने लगे और लोग उन पर मोहित हो गए।
ओशो इस संदर्भ को लेते हुए कहते हैं कि ऐसा होता है विश्वास। विश्वास हमें आश्वासन देता है और बात जितनी विचित्र होती है, लोग उतना ही उसे मानने को तत्पर हो जाते हैं। लोग कुछ भी मानने को तैयार हो जाते हैं,यदि उन्हें आश्वासन मिले।े

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

वह अकेला आदमी ::3::

राम आश्रय सुरेश का बड़ा भाई गांव से एक कोस दूर दूसरे गांव में पढ़ने जाता था। बीच में एक अहिरों का खेत था। खेत में कूंआ था। कूएं के पास ही उनका घर था। एक दिन राम आश्रय ने स्कूल जाते हुए उनके वहां एक सुंदर कुत्ता देखा। जो बहुत बड़ा नहीं था। अहिरों ने उसे खेत और घर की सुरक्षा के लिए पाला था। कुत्ता सफेद रंग का था, जिस पर काले रंग की धारियां उसे और भी आकर्षक बना रही थी। राम आश्रय को वह कुत्ता बहुत आकर्षक लगा। उसने उस कुत्ते को वहां से उठा लेने की योजना बना ली। एक दिन स्कूल से घर लौटते हुए वह उस कुत्ते को वहां से उठा लाया।
जब वह गांव में कुत्ते के साथ अपने घर जा रहा था, तो उसको मनु ने देख लिया। उसने राम आश्रय से पूछा, "चच्चा, यह कुत्ता तो बहुत सुंदर है। कहां से लाए?"
राम आश्रय ने कहा, "स्कूल के पास मिला। अच्छा कोई अनजान आदमी इसके बारे में पूछे तो कहना तुम्हें कुछ नहीं मालूम। मैं इसे पालूंगा।"
"क्या तुम इसे किसी के घर से उठा लाए हो?" मनु ने पूछा।
"नहीं, नहीं, ...मुझे तो यह आवारा मिला। पर हो सकता है किसी का हो और वह इसे ढ़ूंढते हुए यहां आए और इसके बारे में पूछे तो उससे कहना तुम्हें उसके बारे में कुछ नहीं मालूम।"
" चच्चा, यदि यह किसी का  है और वह इसे लेने आएगा तो यह तुम्हें उसे लौटा देना चाहिए।" मनु ने कहा।
"तुम्हें जो कहा, उतना मानों। आगे मैं देख लूंगा।"
"लेकिन चच्चा इतना सुंदर कुत्ता आवारा नहीं हो सकता। जरूर किसी का होगा। वह इसे खोजते हुए जरूर आएगा। और किसी की चीज़ बिना उसकी अनुमति के अपने पास रखना अच्छी बात नहीं है।"

"लेकिन अगर तुमने बताया कि यह कुत्ता हमारे घर है तो मैं तुम्हें अच्छाई का सबक ज़रूर सिखाऊंगा।"
ऐसा कह कर राम आश्रय कुत्ते को लेकर अपने घर चला गया।
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अगले दिन राम आश्रय स्कूल से घर लौटा तो कुछ डरा हुआ था। ऐसा लग रहा था किसी ने उसको खूब लताड़ा है। मनु ने उसको देख कर पूछा, "क्यों चच्चा, कुत्ते के बारे में किसी ने तुमसे पूछा क्या?"
राम आश्रय चिल्ला कर बोला, तुम्हें क्या? जाओ अपना काम करो। और हां, यदि कुत्ते के बारे में किसी से कुछ कहा तो तुम्हारी खैर नहीं।"
मनु फिर से गली में खेलने लगा। कुछ देर बाद उसने देखा कि एक औरत गोद में बच्चे को लिए उसकी ओर चली आ रही है। उसके पास आते ही औरत ने पूछा, "बेटा क्या तुमने सफेद रंग का कोई कुत्ता देखा है? तुम्हारे गांव के किसी लड़के को उसे हमारे घर से उठाते हुए किसी ने देखा था। मेरा यह बच्चा कल से उसके बिना रो-रो कर हाल बुरा किए हुए है। बता बेटा, क्या तुमने उसे यहां किसी के घर देखा है क्या?"
मनु ने कहा, " देखा तो है, वह राम आश्रय चच्चा उसे कल लाए थे और कह रहे थे स्कूल के पास मिला।"
कहां है उसका घर ? औरत ने पूछा।
मनु ने अगले घर की ओर इशारा करते हुए, औरत को घर का पता बता दिया।
कुछ देर बाद औरत कुत्ते के साथ  वहां से निकली तो मनु के चहरे पर मुस्कान तैर गई। मनु घर चला गया।
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अगली सुबह मनु अपने घर की दीवार के साथ खड़ा धूप सेंक रहा था। तभी राम आश्रय आया और उसने मनु के पेट में जोर से पहले मूका व फिर लात से वार किया। मनु दर्द से चिल्ला उठा। उसके रोने की आवाज़ सुन कर उसकी मां घर से बाहर निकली। तब तक राम आश्रय नज़रों से ओझल हो चुका था।
मां ने उसे चुप कराया और उससे पूछा क्या हुआ?
मनु ने काफी देर बाद सारा हाल कह सुनाया।
मां ने कहा, "मैं उसकी शिकायत ताई से करूंगी। लेकिन तुझे उसके मामलें में पड़ने की क्या ज़रूरत थी?"
मनु के कोमल मन पर आज फिर एक संस्कार छप चुका था।
   

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

वह अकेला आदमी ::2::

एक दिन वह गांव की कच्ची गलियों में अपने हमउम्र  बच्चों के साथ खेल रहा था। खेलते-खेलते वह नीम की छांव तले  आ गया। पीछे-पीछे उसका दोस्त सुरेश भी आ गया। वह जमीन में देखने लगा। जमीन कभी गारे-गोबर से लीपी गई थी। जमीन में उसे दो चीज़ें दिखाई दी। जो गारे-गोबर के साथ जमीन में धंस गई थी। एक  नए पैसे का सिक्का और एक स्वर्ण की आभा लिए श्वेत पत्थर। पैसे से अधिक उसे पत्थर ने आकर्षित किया। उसने अपने नन्हें हाथों से खुर्च-खुर्च कर उस पत्थर को जमीन से निकालने का प्रयास किया। तब तक उसके दोस्त की निगाह एक पैसे के सिक्के पर पड़ चुकी थी। सुरेश उस सिक्के को निकालने में लग गया।कुछ देर बाद उसने वह पत्थर जमीन से बाहर निकाल लिया था। उधर सुरेश ने भी तब तक नए पैसे का सिक्का जमीन से निकाल लिया।


सुरेश ने उससे पूछा, "मनु तूने मुझ से पहले यह सिक्का देख लिया था,फिर तू यह पत्थर क्यों निकालने लगा।"


उसने कहा, "देख यह पत्थर कितना सुंदर है। इस पर यह पीले रंग की धारी कितनी सुंदर लग रही है और यह देख इसका आकार तेरे सिक्के से कितना अच्छा है-गोल-गोल। इस पत्थर को मैं हमेशा अपने पास रखूंगा। यह कोई सिक्का थोड़े ही है,जो आज तुम्हारे पास और  कल किसी और का होगा।  यह पत्थर तो कीमती है। हमेशा पास में रखने लायक। इसको देखते ही मैं जान गया था कि यह कोई साधारण पत्थर नहीं है,बल्कि हिरा है हिरा।"


सुरेश को बात जंची कि सचमुच सिक्के से वह ज्यादा से ज्यादा एक मीठी गोली खरीद पाएगा। जबकि उसे मिला वह पत्थर तो बहुत सुंदर और गले में लटकाने लायक था। सुरेश को लालच आया। उसने मनु के हाथ से पत्थर छीन लिया और वहां से भाग गया। भाग कर वह अपने घर में घुस गया। घर में जाकर फूस भरे छप्पर में घुस गया। पीछे-पीछे वह भी भागा। लेकिन सुरेश छप्पर में जा कर दुबुक गया और वहां से बोला- "नहीं दूंगा तुम्हें यह पत्थर। यह तो मैं रखूंगा।"


मनु उदास और रुआंसा हो गया। वह अपनी मां के पास गया। मां को सारा किस्सा कह सुनाया। मां उसे लेकर सुरेश के पास आयी और उसे उसका पत्थर लौटाने को कहा।


सुरेश ने कहा, "सिक्का ले ले, पत्थर न दूंगा। पत्थर तो मैं ही रखूंगा।"


मां ने उसे समझाया "बेटा तू सिक्का ले ले, पत्थर से उसे खेलने दे।"


"नहीं मां, मुझे तो वह पत्थर ही चाहिए, पैसा लेना होता तो मैं पहले सिक्के को ही चुनता। दोनों को पहले मैंने ही देखा था।"


मां ने उसे समझाया, "बेटा न वह पैसा और न पत्थर ही तेरे थे। दोनों ही मिट्टी में सने थे। तूने पत्थर को कीमती समझा और उसने पैसे को। लेकिन दोनों ही पराए हैं। न वो तेरा था न यह तेरा। सब उसका ही उसका।  तू समझदार है और उससे बड़ा भी। घर चल, बहुत देर हो गई है। भूख लगी होगी।"  

रविवार, 4 सितंबर 2016

सिद्धार्थ : हरमन हेसे का उपन्यास :: 2 ::

गतांक से आगे ...
लेकिन सिद्धार्थ स्वयं खुश नहीं था। अंजीर के बाग की गुलाबी पगडंडियों पर घुमते हुए,बनी की नीली छाया में बैठकर चिंतन-मनन करते हुए ,प्रायश्चित के दैनिक स्नान के दौरान अपने अंग धोते हुए, आचरण की पूरी गरिमा के साथ छायादार अमराई में हवन करते हुए,सबके प्रिय,सबकी प्रसन्नता के कारण होते हुए भी,उसके अपने हृदय में आनंद नहीं था। नदी की लहरों से,रात के आकाश में टिमटिमाते सितारों से,सूर्य की पिघलती किरणों से,सपने और बेचैन ख़याल बहते हुए उस तक आते। हवन के घुमड़ते हुए धुएं से,ऋग्वेद के मंत्रों और ऋचाओं से नि:सृत होकर,वयोवृद्ध ब्राह्मणों की शिक्षा से रिसते और टपकते हुए स्वप्न और आत्मा की उद्विग्नता उसे घेर लेती। 
सिद्धार्थ को अपने भीतर असंतोष के बीज महसूस होने लगे थे।  उसे एहसास होने लगा था कि उसके माता-पिता का स्नेह और उसके मित्र गोविंदा का प्रेम भी उसे हमेशा सुखी नहीं रख पाएगा,उसे शांति नहीं दे सकेगा, न उसे संतुष्ट और परिपूर्ण कर पाएगा। उसे इस बात का आभास होने लगा था कि उसके योग्य पिता और दूसरे शिक्षक,वे ज्ञानी ब्राह्मण अब तक अपनी शिक्षा का अधिकतर और सर्वोत्तम अंश उसे सौंप चुके थे,और उन्होंने पहले ही अपने ज्ञान का कुल जमा उसके प्रतीक्षारत पात्र में उंडेल दिया था; लेकिन उसका पात्र पूरा नहीं भर पाया था,उसकी मेधा संतुष्ट नहीं हुई थी,उसकी आत्मा संतुष्ट नहीं थी,उसका हृदय शांत थिर नहीं था। प्रक्षालन(स्नान)के कर्मकांड अच्छे थे,पर उनमें केवल जल था,वे पाप नहीं धोते थे,वे संतप्त हृदय को राहत नहीं पहुंचाते थे। बलियां व देवताओं से की गई प्रार्थनाएं सर्वोत्तम थी - मगर वही सब कुछ नहीं थी? क्या बलियां सुख का संचार करती थी? और देवताओं के संबंध में क्या? क्या सचमुच प्रजापति ने ही दुनिया बनाई थी? क्या केवल आत्मा ने ही उसकी सृष्टि नहीं की थी? क्या देवता मेरी और तुम्हारी तरह रचे गए रूप नहीं थे,मरणशील और क्षणभंगुर? तब क्या यह शुभ और उचित था , क्या देवताओं को बलि देना उपयुक्त व उचित था? तब सिवा उसके, आत्मा के, उस एकमात्र के, और किसको हम बलि अर्पित करें,किसके प्रति सम्मान जतलाएं? और फिर, यह आत्मा मिलेगा कहां, कहां था उसका निवास, कहां धड़कता था उसका शाश्वत हृदय - अगर वह नहीं था आत्मा के भीतर,अंतरतम में,उस शाश्वत में जो हर व्यक्ति लिए रहता था अपने अंदर? लेकिन यह स्व, यह अंतरतम कहां था आखिर? वह मांस और हड्डी नहीं था, वह विचार या चेतना नहीं था। यही सिखाया था ज्ञानी पुरुषों ने। तब कहां था वह? क्या कोई और रास्ता था जो खोजे जाने योग्य था, जिससे स्व की ओर,आत्मा की ओर बढ़ा जा सकता था? कोई वह रास्ता नहीं दिखाता था। किसी को उसकी जानकारी नहीं थी --न उसके पिता को, न गुरुओं को और न ही ज्ञानी पुरुषों को और न ही पवित्र भजनों में। ब्राह्मण और उनके पवित्र ग्रंथ सब कुछ जानते थे, सब : उन्होंने हर चीज को परखा था - संसार की सृष्टि,वाणी की उत्पत्ति,भोजन,श्वास-प्रश्वास,इंद्रियों की व्यवस्था,देवताओं के कृत्य। उन्हें असंख्य बातें ज्ञात थी --लेकिन इन सब चीजों को जानने का क्या मूल्य   था? अगर उन्हें वह एक महत्वपूर्ण चीज़ ज्ञात नहीं थी, वह एकमात्र महत्वपूर्ण चीज़?
पवित्र ग्रंथों के अनेक श्लोक,सबसे अधिक सामवेद के उपनिषद इस अंतरंग चीज़ की चर्चा करते थे। लिखा है -- "तुम्हारी आत्मा ही संपूर्ण विश्व है।" यह कहता है कि जब आदमी सोता है, तब वह अपने अंतस्तल को भेद कर आत्मा में निवास करता है। इन श्लोकों में आश्चर्यजनक ज्ञान था; ऋषियों का सारा ज्ञान यहां मधुमक्खियों द्वारा इकट्ठाठा किए गए शुद्ध शहद की तरह चित्ताकर्षक भाषा में उल्लेखित था। नहीं,ज्ञानी ब्राहमणों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी इक्ट्ठा किए गए और सुरक्षित किए गए इस ज्ञान को आसानी से ओझल नहीं किया जा सकता। किंतु कहां थे वे ब्राह्मण,वे पुरोहित,वे विज्ञ जन जो इस ज्ञान,इस गहन पांडित्य को प्राप्त करने और सुरक्षित रखने में ही नहीं,बल्कि उसे अनुभव करने में भी सफल हुए थे? कहां थे वे दीक्षित-अभिमंत्रित व्यक्ति जो नींद के दौरान आत्मा को उपलब्ध हुए और उसे चेतनावस्था में,जीवन में,हर जगह, वाणी और कर्म में संजोये रख सकते थे? सिद्धार्थ बहुत से योग्य ब्राह्मणों से परिचित था, सबसे पहले उसके पिता- धर्मपरायण,ज्ञानी,प्रतिष्ठित,सम्मानित। उसके पिता प्रशंसा योग्य थे, उनका आचरण शांत व गरिमायुक्त था। वे अच्छा जीवन जीते थे। उनकी वाणी में ज्ञान था,उनके मस्तिष्क में ऊंचे और प्रकांड विचार रहते थे--लेकिन क्या वे भी,जो इतना जानते थे,आनंदपूर्ण जीते थे? क्या उनके भीतर शांति थी? क्या वे सतत अन्वेषी नहीं थे,कभी तृप्त न होने वाले? क्या वे लगातार न बुझनेवाली प्यास लिए उन पवित्र स्रोतों के पास नहीं जाते थे,यज्ञों व बलियों में हिस्सा लेने,धर्मग्रंथों का परायण करने,ब्राह्मणों और पंडितों के वाद-विवाद और धर्म चर्चा सुनने? जो निर्मल और निर्दोष है, उसे रोज नित्य-प्रति अपने पापों को क्यों धोना पड़ता और खुद को शुद्ध करना पड़ता? तो क्या उनके भीतर वह आत्मा नहीं था। क्या स्रोत उनके अपने हृदय के भीतर नहीं था? हमें खुद अपने अस्तित्व के भीतर उस स्रोत को खोजना चाहिए,हमें उसे पाना चाहिए। बाकी सब कुछ मात्र एक खोज थी -एक भटकाव, भूल।
यही थे सिद्धार्थ के मन में उठने वाले विचार,यही उसकी प्यास थी, उसकी वेदना व पीड़ा।     

शनिवार, 9 जुलाई 2016

रविवार, 12 जून 2016

पुस्तक समीक्षा :: डॉ. सुप्रिया पी की पुस्तक हिंदी उपन्यास के विदेशी पात्र

हिंदी उपन्यासों में आए विभिन्न विदेशी पात्रों के माध्यम से समाज में आए विभिन्न परिवर्तनों और व्यक्ति की वैचारिक सोच को प्रतिबिंबित करती डॉ. सुप्रिया पी की पुस्तक "हिंदी उपन्यास के विदेशी पात्र" पढ़ने को मिली। पुस्तक में कुल पंद्रह ऐसे हिंदी  उपन्यास चुने गए हैं, जिनमें विदेशी पात्र आए हैं। ये उपन्यास हैं : अज्ञेय का "अपने अपने अज़नबी;  निर्मल वर्मा का "वे दिन": सुनीता जैन का "सफ़र के साथी" ; उषा प्रियंवदा का "रूकोगी नहीं राधिका"; प्रभाकर माचवे का "तीस चालीस पचास"; महेन्द्र भल्ला का " दूसरी तरफ"; योगेश कुमार का "टूटते बिखरते लोग"; भगवती स्वरूप चतुर्वेदी का "हिरोशिमा की छाया में"; मीनाक्षी पुरी का "जाने पहचाने अजनबी";नासिरा शर्मा का "सात नदियां एक समन्दर"; प्रभा खेतान का "आओ पेपे घर चलें"; मृदुला गर्ग का "कठगुलाब"; कमल कुमार का "हैमबरगर"; उषा प्रियंवदा का " अन्तर्वंशी"; राजी सेठ का "निष्कवच" । इस तरह छह पुरुष व आठ महिला लेखकों के उपन्यासों के विदेशी किरदार इस  पुस्तक में लिए गए हैं। इन किरदारों के माध्यम से लेखिका ने विभिन्न देशों की संस्कृति व वहां के मूल्यों, आदतों व परिवार आदि का संश्लेषित परिचय दिया है। यदि आपने इन उपन्यासों को पढ़ा है, तब इस पुस्तक को पढ़कर आपको लगेगा कि आपने इन पात्रों के माध्यम से इन उपन्यासों को एक बार फिर पढ़ लिया है। यदि आपने इनमें से किसी उपन्यास को नहीं पढ़ा है, तो संभव है कि किसी विशेष पात्र को पढ़ कर आप उस उपन्यास को पढ़ना चाहें।

लेखिका का उद्देश्य विदेशी पात्रों के माध्यम से पाश्चात्य व भारतीय संस्कृति के अंतर को समझना,समझाना है। कुछ पात्र अकेले हैं और समाज से विरक्त। इस विरक्तता में कहीं यथार्थ बोध है तो कहीं संबंधों की टूटन। आधुनिक जीवन शैली से उपजी विसंगतियां भी इस अकेलेपन का एक कारण है।

उपन्यासों में आए विभिन्न पात्रों की मनोस्थितियों में कहीं युद्ध का आतंक दिखाया है तो कहीं मृत्यु बोध व सुख मृत्यु ही कुछ पात्रों के लिए सुखद अहसास है। आधुनिक  समाज में नारी के स्थान को रेखांकित करती, उसकी ख़्वाहिशों, इच्छाओं व स्वतंत्रता से स्वच्छंदता तथा नारी सशक्तीकरण व उसके परिणामों तक को उकेरते पात्र विभिन्न उपन्यासों में आए है। राजी सेठ के "निष्कवच" की मार्था अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है। अपने निर्णय स्वयं लेकर उन्हें लागू करना वह अपना अधिकार समझती है। गर्भपात कराने के बाद जब पति उससे  जवाब-तलब करता है तब वह कहती है " यह तुम क्या बक रहे हो? यह मेरी देह है। मेरा निजी मामला। मेरा ही परमाधिकार। "

प्रेम व विवाह को भारत में अलग -अलग ढ़ंग से देखा गया। प्रेम-विवाह तो हमारे समाज में बहुत बाद में आए। लेकिन दूसरे देशों में, इनकी स्थिति की पड़ताल भी विभिन्न पात्रों के माध्यम से लेखकों ने अपने उपन्यासों में करने की कोशिश की है। 'सात नदियां एक समुन्दर' की तय्यबा प्रेम या इश्क को पूर्वनिश्चित अनुबंध मानती है। प्रेम जैसी भावना पर से उसका विश्वास उठ चुका है। यदि प्रेम होता तो तलाक,कत्ल,धोखा,आत्महत्या,बेवफ़ाई सब मिट जाते। वह कहती है " इश्क एक तयशुदा अनुबंध का नाम है, जो कुछ समय बाद स्वयं टूटने लगता है। जिंदगी, वह भी आज के दौर की, किसी से जिंदगी-भर साथ रहने का पट्टा नहीं लिखवा सकती है। अन्तर्वंशी की ग्रेस भारतीय विवाह व्यवस्था पर चकित है। एक अपरिचित से दो-तीन बार मिलकर  शादी कर लेना मूर्खता है। बिना व्यक्ति को जाने-पहचाने,बिना पहले साथ सोए हुए उससे बंध जाना  उसकी समझ से परे है। "एक पुरुष या स्त्री का पल्ला पकड़ कर कौन बैठता है। जीवन में नए-नए उतार चढ़ाव आते रहते हैं, बार-बार प्यार, बार-बार- जुड़ना और अलग होना। यह तो यहां का क्रम ही है, इसमें न अच्छा, न बुरा। मन न मिले तो विवाह क्या? साथ रहना क्यों? "

कमल कुमार का हैमबरगर"; योगेश कुमार का "टूटते बिखरते लोग' व प्रभा खेतान का आओ पेपे घर चलें" और
प्रभाकर माचवे के 'तीस चालीस पचास  जैसे उपन्यासों में रंग-भेद या जातीय भेद-भाव उभर कर आया है।

भारतीय जीवन पद्धति पाश्चात्य जीवन पद्धति से अलग रही है। इसमें विभिन्न लेखकों ने जो वैषम्य देखा उसे उभारने के लिए भारतीय व विदेशी पात्रों का संवाद जरूरी हो जाता है। इसी बिंदु को लेकर लेखिका डॉ. सुप्रिया पी ने हिंदी के कुछ चुनिंदा उपन्यासों को चुना और इन उपन्यासों में आए विभिन्न पात्रों के माध्यम से समाज में आए विभिन्न बदलावों को देखा। उन बदलावों के पीछे के कारणों को जानने समझने की कोशिश की। यह कोशिश कोई गंभीर दार्शनिक चर्चा नहीं है। बल्कि सामान्य जन-जीवन की, सामान्य समस्याओं के बीच में रहते हुए समाज़ में व्याप्त विभिन्न सोच और उस सोच को जाहिर करते विभिन्न विदेशी पात्रों के माध्यम से सीधी-सपाट भाषा में दर्ज़ करने की कोशिश की गई है।


शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

हिंदू नव वर्ष की शुभकामनाएं


सृष्टि (पृथ्वी)की आयु (अवधि) चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष है। अब तक यह एक अरब छयानवे करोड़ आठ लाख त्रेपन हजार एक सौ पंद्रह वर्ष की हो चुकी है और दो अरब पैंतीस करोड़ इक्यावन लाख छयालिस हजार आठ सौ पिचासी वर्ष प्रलय होने में शेष  हैं।

विक्रम संवत्सर 2073 की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ...
चैत्र नवरात्र,युगाडी,गुडी पाडवा 
 की हार्दिक शुभकामनाएं 


स्रोत::यजुर्वेद अध्याय३१,मंत्र १; ऋग्वेदअष्टक ८,अध्याय ७, मंत्र १ व ऋग्वेद अष्टक ६,अध्याय४,मंत्र २

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

सिद्धार्थ : हरमन हेसे का उपन्यास :: 01 ::

भाग-1
ब्राह्मण का बेटा 
घर की छाया तले,नदी के किनारे,नावों के निकट धूप में साल और अंजीर की छांव में सिद्धार्थ ,ब्राह्मण का सुंदर बेटा, अपने मित्र गोविंदा के संग पला-बढ़ा। नदी किनारे उसके  पवित्र स्नान और पवित्र बलि-कर्म करते हुए भी सूर्य ने उसके छरहरे कंधों को सांवला बना दिया था। अमराई तले खेलते हुए , मां के गुनगुनाए हुए गीतों को सुनते हुए,अपने पिता की शिक्षाओं को सुनते हुए व ज्ञानियों की संगत करते हुए उसकी आंखों से छवियां गुजरती रही। सिद्धार्थ ने  बहुत समय तक ज्ञानियों के साथ चर्चाएं की, गोविंदा के साथ अनेक बार बहसें हुई और उसके साथ मनन-चिंतन के साथ ध्यान-साधना का अभ्यास किया। वह पहले से जानता था कि कैसे ओम - शब्दों के शब्द-महाशब्द,  का अंतस्थ में मौन उच्चारण किया जाए। सांस को कैसे भीतर लेना है और कैसे बाहर छोड़ना है,संपूर्णता के साथ। ऐसा करते समय उसका मस्तक दमकता था, अंत:करण के प्रकाश से।  वह जानता था कि अपने अस्तित्व की गहराई में कैसे आत्मा को पहचाना जाए। जो अनश्वर है और ब्रह्मांड के साथ एकाकार। 

उसके पिता के हृदय में खुशी थी क्योंकि उसका बेटा बुद्धिमान व ज्ञान-पिपासु था। वे उसे एक महान ज्ञानी बनते हुए देख रहे थे। उनकी इच्छा थी कि वह बड़ा होकर एक महान ज्ञानी,पुरोहित और ब्राह्मणों में सम्राट बने। 

उसकी मां की छाती गर्व से फूल जाती जब वह उसे चलते,बैठते और उठते हुए देखती। शक्तिशाली,सुंदर,लचीले अंगों वाला  सिद्धार्थ उसका समूची गरिमा और सौम्यता से अभिवादन करता था। 

जब सिद्धार्थ शहर की गलियों से निकलता तो उसके उन्नत मस्तक,सम्राट सरीखी आंखों और छरहरे शरीर को देखकर  ब्राह्मणों की जवान बेटियों के हृदयों में प्रेम हिलोरें लेने लगता। 

गोविंदा, उसका मित्र, ब्राह्मण का बेटा, उसे सबसे बढ़कर प्यार करता था। वह सिद्धार्थ की आंखों और उसकी स्पष्ट आवाज को प्रेम करता था। उसे उसके चलने के ढ़ंग से प्यार था। उसकी संपूर्ण गरिमापूर्ण चाल से उसे आसक्ति थी। उसे उस सबसे प्यार था जिसे सिद्धार्थ ने किया और कहा, और सबसे बढ़कर उसे उसकी बुद्धिमता, उसके सुंदर उत्साही विचारों ,उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति,उसके ऊंचे लक्ष्य से प्यार था। गोविंदा जानता था कि वह कोई सामान्य ब्राह्मण नहीं होने वाला, और न ही एक आलसी पुरोहित ,जादूभरे मंत्रों का उच्चारण करने वाला लालची धंधेबाज, अहंकारी कोरा वक्ता, कोई दुष्ट या चालाक पुजारी या किसी रेवड़ के समूह की एक भली व बुद्धिहीन भेड़।  नहीं, और वह, गोविंदा,इनमें से कोई भी नहीं बनना चाहता था। और ब्राह्मण भी नहीं, अपनी किस्म के दस हजार अन्य ब्राह्मणों की तरह वह भी इनमें से कोई एक। वह सिद्धार्थ का अनुगमन करना चाहता था।  अपने भव्य प्रेम-पात्र का। और अगर कभी वह देवता बने,अगर वह कभी परम ज्योति का अंग बने, तो गोविंदा हमेश एक मित्र की तरह,एक साथी की तरह, एक नौकर की तरह, उसके रक्षक की तरह ,उसकी छाया की तरह वह उसके साथ चलना चाहता था। 

इसी प्रकार से सभी सिद्धार्थ से प्यार करते थे। वह सबको आनंदित और सुखी रखता   था।
...जारी
अनुवाद :: मनोज भारती