एकाकी जीवन
एकाकी है यह जीवन चिंतन बहुत मनन बहुत पर है सूना बहुत कोई नहीं जिसे समझा सकूँ इस मन की पीड़ा को इस चिंता के विषय को इस मनन के बिंदु को बस छटपटा कर रह जाता हूँ एक अभाव से भर जाता हूँ कि मैं जैसा हूँ वैसा क्यों हूँ क्या मैं स्वयं जैसा होने को हूँ अभिशप्त या है यह स्वयं को समझने की सजा कि- चिंतन है मनन है विचार है पर कोई साथी नहीं जिसे समझा सकूँ ठीक वैसा जैसा मैं हूँ !!!