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हिंदू विवाह के प्रकार

हिंदू धर्मसूत्रों,शास्त्रों और स्मृतियों में विभिन्न प्रकार के विवाह बताए गए हैं। मनु ने विवाह के आठ भेद किए हैं परंतु वशिष्ठ ने छ: प्रकार के विवाह माने हैं। मनु स्मृति में कहा गया है- ब्राह्मो दैवस्तथैवार्ष प्राजापत्यस्तथासुर:। गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चष्टमोधम:॥ इस प्रकार मनु ने ब्रह्म,दैव,आर्ष,प्राजापत्य,आसुर,गांधर्व,राक्षस और पैशाच आठ प्रकार के विवाह माने हैं।वशिष्ठ ने ब्राह्म,दैव,आर्ष,गांधर्व,क्षात्र(राक्षस) और मानुष(आसुर) विवाह के छ: प्रकार माने हैं।ब्राह्म विवाह, दैव विवाह,आर्ष विवाह और प्राजापत्य विवाहों को धर्म विवाह कहा गया है और ये समाज द्वारा स्वीकृत विवाह होने के कारण उत्तम विवाह कहे गए।अन्य चार विवाहों को अधर्म विवाह कहा गया है और इसीलिए ये समाज द्वारा अस्वीकृत कहे गए हैं। 1) ब्राह्म विवाह :मनुस्मृति में ब्राह्म विवाह के संबंध में लिखा है- आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुति शीलवते स्वयम्। आहुय दानं कन्याय ब्राह्मो धर्म: प्रकीर्तित:॥ अर्थात कन्या को वस्त्र,अलंकार आदि से सुसज्जित करके विद्वान,शीलवान वर को आमंत्रित करके कन्यादान करने का नाम ब्रह्म विवाह है। यह ...

हिंदू विवाह : एक संस्कार

हिंदू दर्शन में विवाह एक संस्कार के रूप में स्वीकृत है। भारत में प्राचीन समय से ही विवाह संबंधी अनेक प्रत्यय जैसे-परिणयन,उपयम,पाणिग्रहण आदि प्रचलित रहें हैं।इन प्रत्ययों में विवाह संस्कार के अनेक पहलू सम्मिलित हैं। स्त्री-पुरुष के पारस्परिक संबंधों के लिए प्रत्येक समाज में कोई न कोई संस्थात्मक व्यवस्था होती है।जिससे परिवार बनता है। परिवार किसी समाज की आधारभूत इकाई है।यह स्त्री-पुरुष के संबंधों पर आधारित है।परिवार के निर्माण के लिए विवाह समाज द्वारा स्वीकृत एक मान्य संस्था है। दूसरे शब्दों में विवाह यौन संबंधों को स्थापित करने की एक सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था है। इसी कारण भारतीय शास्त्रकारों ने विवाह तथा गृहस्थ जीवन को अत्यधिक महत्त्व दिया है। भारतीय दर्शन में मानव जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष) में काम की पूर्ति हेतु विवाह का विधान है। इसी के द्वारा मनुष्य अपने पितृ-ऋण से मुक्त होता है। समाजशास्त्री डॉ. कपाड़िया के अनुसार," हिंदू विवाह स्त्री-पुरुष के बीच धर्म के पालन की दृष्टि से एक ऐसा संस्कार है,जो जन्म-जन्मांतर के संबंधों की धारणा पर आधारित है।....ह...