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क्रोध का स्रोत

यामाओकु तेशु एक युवा झेन-साधक हुआ। साधक वह जरूर था, पर अधीर इतना कि कभी किसी एक गुरु के पास न रहता । एक बार वह शोकोकू आश्रम के झेन-गुरु दोकुओन के पास गया।  अपना ज्ञान बघारते हुए यामाओका तेशु ने कहा, "मन,बुद्धि,चेतन,जगत आदि सब अस्तित्वहीन हैं । आभास मात्र। सत्य केवल शून्य है। और कुछ भी सत्य नहीं।कोई भ्रम नहीं।कोई महान नहीं,कोई अपूर्ण नहीं ...न किसी से कुछ लेना,न देना।" दोकुओन आराम से हुक्का गुड़गुड़ाते रहे, कोई प्रतिक्रिया नहीं की। अचानक उन्होंने हुक्का उठाया और यामाओका के सिर पर दे मारा। चोट खाया हुआ यामाओका क्रोध से आग-बबूला हो गया।  'अगर सबकुछ शून्य है', दोकुओन ने उससे पूछा, 'तो यह क्रोध कहाँ से आया?' 

स्वप्न

च्वांगत्सू ने स्वप्न में देखा कि वह एक तितली है । रंग बिरंगी, पंख फड़फड़ाती, उड़ती, फूलों पर मँडराती ,तितली । तितली के रूप में उसे जरा भी ध्यान नहीं आया कि वह वास्तव में एक इंसान है । अपने मनुष्य रूप का कोई बोध उसके मन में नहीं था । फूलों पर मँडराते-मँडराते अचानक उसकी नींद टूटी । वह सोचने लगा ," क्या मैं एक मनुष्य हूँ, जो तितली होने का स्वप्न देख रहा था ? या मैं एक तितली हूँ जो मनुष्य होने का स्वप्न देख रही है ?"

शायद है

एक गाँव के एक धनी किसान के पास एक बहुत सुंदर घोड़ा था । एक दिन उसका वह घोड़ा बाड़े की बाड़ तोड़ कर  जंगल में भाग गया । गाँव के जिन लोगों को इस बात का पता चला, उन्होंने किसान के पास आ कर कहा, "आपका घोड़ा भाग गया, बड़े अफसोस की बात है ।"  "शायद है ।" किसान ने कहा ।  तीन दिन बाद घोड़ा वापस आ गया और साथ में पाँच बेहतरीन ताकतवर जंगली घोड़े भी ले आया । गाँव वालों ने किसान से कहा, "भई वाह! यह तो बड़ी खुशी की बात है ।"  "शायद है ।" किसान ने कहा ।  कुछ दिन बाद एक जंगली घोड़े को काबू करने की कोशिश में किसान का जवान बेटा अपने हाथ-पाँव जख्मी करवा बैठा । गाँव वाले आकर बोले, "आपका इकलौता जवान बेटा इतना घायल हो गया । आपके तो दिन ही खराब चल रहें हैं । बड़े दुख की बात है ।"  "शायद है ।" किसान ने कहा ।  अगले दिन राजा के सैनिक गाँव में आए । पड़ोसी देश से बड़ा भारी युद्ध छिड़ गया था । रोज  सैकड़ों लोग मारे जा रहे थे । सेना कम हो रही थी । इसलिए राज्य के सभी जवान लोगों को सेना में भर्ती होना अनिवार्य कर दिया गया था । गाँव के सभी जवानों को सैन...

न पानी, न चाँद

चाँदनी रात थी । एक झेन साधिका लकड़ी की बाल्टी में पानी भर कर आश्रम की ओर लौट रही थी । पानी में चाँद प्रतिबिंबित हो रहा था । बाल्टी पुरानी थी । अचानक बाल्टी जिस बाँस से बंधी थी वह टूट गया और उसका पेंदा निकल गया । पानी बिखर गया । इस घटना से साधिका को ज्ञान हुआ ।  बाद में उसने एक कविता लिखी  - ऐसे-वैसे, जैसे-तैसे बचाया मैंने जल-पात्र को, कि  कमजोर पड़ता जा रहा था बाँस का बंधन  और आखिर टूट ही गया पेंदा उसका न जल-पात्र में रहा पानी न पानी में चाँद !!! 

ध्यान की ओर यात्रा

जापान में एक प्रसिद्ध योद्धा हुए शिंगेन । इनकी पोती रियोनेन हुई । जो बहुत सुंदर होने के साथ-साथ काव्य-प्रतिभा की धनी भी थी । इसी कारण वह 17 वर्ष की अल्पायु में ही जापान की साम्राज्ञी की विशिष्ट सेविका चुनी गई और शीघ्र ही राज-परिवार में अपना सिक्का जमा लिया ।  एक दिन अकस्मात सम्राज्ञी का निधन हो गया । जिससे उसे जीवन की क्षण-भंगुरता का अनुभव हुआ । उसमें जीवन को जानने की तीव्र जिज्ञासा हुई जो शीघ्र ही मुमुक्षु की हद तक पहुँच गई । वह झेन-साधिका होकर साधना करना चाहती थी ।  परंतु उसके परिवार ने इसकी अनुमति न दी और उस पर विवाह का दबाव डाला । परिवार इस शर्त पर उसके झेन साधवी बनने पर राजी हो गया कि यदि वह विवाह-बंधन में बंधे और तीन बच्चों की मां बने तो वह  साधवी हो सकती है । उसने विवाह कर लिया और पचीस वर्ष की होते-होते तीन बच्चों की मां बन गई । अब उसे साधवी होने से कोई रोक नहीं सकता था । उसने साधवी का रूप धारण किया और झेन आश्रम का रुख किया ।  रियोनेन ईडो नाम के एक शहर पहुँची और झेन गुरु तेत्सुग्या से स्वयं को शिष्या के रूप में स्वीकार करने की विनती की । उसको कुछ देर देखने ...

मन की फड़फड़ाहट

उस दिन हवा बहुत वेग से बह रही थी । एक झेन आश्रम की ध्वजा फड़फड़ा रही थी । एक झेन साधक ने यह नजारा देख कर कहा, "देखो, धर्म की ध्वजा फड़फड़ा रही है ।"  दूसरे साधक ने कहा, "नहीं,ध्वजा केवल नजर आ रही है, असल में तो हवा फड़फड़ा रही है ।" तीसरा साधक जो अब तक दोनों साधकों की बात सुन रहा था,  उनके निकट आ कर धीरे से बोला, "ध्वजा नजर आ रही है, हवा महसूस हो रही है, किंतु फड़फड़ाहट तो मन में हो रही है ।" *** **  नव वर्ष 2011 में इस मन की फड़फड़ाहट शांत हो, इसी मंगल कामना के साथ इस ब्लॉग के सभी पाठकों को नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाएं ।

हँसता हुआ बुद्ध

जब से भारत में चॉईनीज़ बाजार का जोर पकड़ा है, भारत में चॉईनीज़ वास्तु, फेंग्सुई, विंड चॉईम के साथ-साथ हँसते हुए बुद्ध यानी लॉफिंग बुद्धा भी बहुत प्रचारित हो गए हैं । हँसते हुए मुख, थुलथुल शरीर और पीठ पर बड़ी सी पोटली को लटकाए इस लॉफ़िंग बुद्धा की मूर्ति आजकल भारत के हर तीसरे घर और बाजार में गिफ्ट शॉपस पर दिखाई पड़ जाती है । जो समृद्धि व खुशहाली का प्रतीक है ।  बहुत कम लोग जानते हैं कि लॉफिंग बुद्धा वास्तव में कौन हैं । वस्तुत: वह एक झेन साधक था । जिसका जन्म चीन के ताँग साम्राज्य में हुआ  और जिसका वास्तविक नाम होतेई था । लेकिन उसमें गुरु होने की जरा भी इच्छा न थी । वह नहीं चाहता था कि वह किसी आश्रम में रहे और चेले बनाए । वह तो एक बड़ी सी पोटली पीठ पर लादे, गलियों में यायावर की तरह घूमता रहता । उसकी इस पोटली में सूखे-मेवे, टॉफियाँ, फल आदि भरे रहते थे । वह इन्हें उपहार स्वरूप उन बच्चों में बाँटता रहता था, जो खेल-खेल में उसके चारों ओर इकट्ठा हो जाते थे । यह कृत्य कुछ-कुछ सैंटा से मिलता-जुलता है । होतेई जब भी किसी झेन साधक से मिलता, तो अपना हाथ पसार कर एक पेनी देने का अ...

अनाड़ी हाथ

झेन आश्रमों में चाय बनाना और उसे पीना भी ध्यान की एक विशेष विधि है । वस्तुत: यह" कार्य करते हुए ध्यान" का एक अनूठा प्रयोग है । साधक एक-एक चीज़ होशपूर्ण ढंग से करता है । चुल्हे का जलाना, उस पर चाय की केतली रखना, उसमें पानी डालना, उसे उबलते हुए देखना, उसमें विशेष मात्रा में चाय की पत्तियाँ उँडेलना, दूध डालना और फिर चाय की महक को महसूस करना और फिर विशेष ढंग से बने नाजुक प्यालों में चाय को डालना और फिर उसकी धीरे-धीरे करके चुस्कियाँ लेना । इस पूरे उपक्रम में साधक घंटों व्यतीत करते हैं । यह उनका चाय ध्यान होता है ।  एक बार ऐसे ही चाय-ध्यान के अवसर पर  एक वरिष्ठ साधक एक नवीन साधक के साथ था । चाय  के नाजुक प्याले को पकड़ते हुए, उसने वरिष्ठ साधक से पूछा, "ये चाय के प्याले इतने नाजुक क्यों बनाए जाते हैं कि जरा-सी चूक होते ही टूट जाएँ ।"  वरिष्ठ साधक ने कहा," प्याले नाजुक नहीं होते, जिन हाथों में प्याले टूटते हैं, वे अनाड़ी होते हैं ।"

ज्ञान की बत्ती

"तेन्दई" बौद्ध-दर्शन की एक दार्शनिक विचारधारा है । इसी विचारधारा का एक दार्शनिक झेन का ज्ञान हासिल करना चाहता था । वह इस उद्देश्य से झेन-गुरु "गासन" के आश्रम में आ कर ठहरा । कुछ वर्ष आश्रम में रहकर उसने झेन का अध्ययन किया । झेन पद्धति के संबंध में तथ्यों को एकत्रित किया । जब वह आश्रम से लौटने लगा तो गासन ने उसे सचेत किया, "सत्य की दार्शनिक विवेचना संबंधी सामग्री इकट्ठा करना एक उपयोगी कार्य हो सकता है, लेकिन याद रखना, अगर तुमने नियमित रूप से ध्यान नहीं किया तो तुम्हारे दार्शनिक-ज्ञान की बत्ती कभी भी गुल हो सकती है ।" 

चाँद की चोरी

जो भी चुराया जा सकता है, वह द्रष्टा के सम्मुख दो कोड़ी का साबित होता है । जब तक व्यक्ति को यह समझ नहीं आता कि वह जिन-जिन चीजों का लालच करता है,वह दो कोड़ी से ज्यादा मूल्य नहीं रखता, उसका लालच बना रहता है । एक बहुत सुंदर झेन कहानी है । झेन गुरु रियोकॉन प्रकृति के सान्निध्य में पर्वतों की तलहटी में एक कुटिया में रहते थे । एक रात उनकी कुटिया में एक चोर घुस आया । लेकिन वहाँ चुराने लायक कुछ भी नज़र नहीं आया । वह निराश खाली हाथ लौटने ही वाला था कि रियोकॉन वहां आ पहुँचे ।  रियोकॉन ने चोर से कहा, तुम बड़ी दूर से चल कर आए लगते हो । मैं तुम्हें यूँ निराश नहीं लौटने दूँगा । मेरे पास चुराने लायक कुछ नहीं है । लेकिन मेरे पास ये कपड़े हैं, इन्हें उपहार स्वरूप प्राप्त करो । चोर चकित था, उसने ऐसा व्यक्ति नहीं देखा था, जो स्वयं चोर की सहायता करे । उसने कपड़े थामे और चुपचाप वहां से चला गया ।  वस्त्रहीन शरीर के साथ रियोकॉन बाहर एक शिला पर बैठ कर चाँद को निहारने लगा । चाँद की खूबसूरती देखते ही बनती थी । आधी रात का पूर्णिमा का चाँद और रियोकॉन की दृष्टि उसमें कुछ अमूल्य पा रही थी । रियोकॉन ने स्व...

अवधान

हम दैनिक जीवन में कितने चेतनशील जीते हैं, दैनिक जीवन के कामों को करते हुए कितने चेतनशील होते हैं ? इस चेतनशीलता को विकसित करना ही झेन का आधार है । झेन साधक इस चेतनशील जीवन को साधने के लिए झेन गुरु के सान्निध्य में शिक्षा लेते हैं । कम से कम दो वर्ष । झेन गुरु नान-इन के पास इस हेतु एक टेन्नो नाम का साधक शिक्षा ग्रहण करता था । शिक्षा पूरी होने पर टेन्नो अपने गुरु से मिलने गया । वर्षा का मौसम था । टेन्नो खड़ाऊ पहने था और छाता साथ में लिए हुए था । गुरु के निवास स्थान में प्रवेश करने से पूर्व उसने अपने खड़ाऊ और छाता बाहर अहाते में रखे और कुटिया में प्रवेश किया । नान-इन ने टेन्नो का स्वागत किया और उसकी ओर गौर से देखते हुए पूछा, मेरा ख्याल है, तुम अपने खड़ाऊ अहाते में छोड़ कर आए हो । मैं यह जानना चाहता हूँ कि तुम्हारा छाता तुम्हारे खड़ाऊ के दायीं तरफ रखा है या बायीं तरफ ?  टेन्नो उलझन में था । वह यह कार्य करते हुए सजग न था । उसे तत्काल कोई जवाब न सूझा । उसे एहसास हुआ कि जिस ध्यान की शिक्षा वह ग्रहण कर चुका है, वह पूरी नहीं हुई है और वह सजग जीवन जीने में सफल नहीं हुआ है । इसे पूरा करने के...

वीणा के तार तोड़ना - एक चीनी मुहावरा

झेन कथाएं हमें चेतनशील जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं । झेन कथाओं में व्यक्ति की चेतना का अनेक-अनेक ढ़ँग से अवबोध कराने का प्रयास रहता है । इनके द्वारा दैनिक जीवन में सजगता के प्रयोग को गहराया जाता है और व्यक्ति को ध्यान में अवस्थित होने का अवसर मिलता है । इसी प्रकार की एक झेन कथा प्रस्तुत है :- चीन में दो मित्र हुए । एक मित्र वीणा वादन में कुशल था । उसके वीणा वादन में विभिन्न स्वर लहरियाँ थी । जब वह वीणा के तार झंकृत करता था, तो दूसरा उसके स्वरों को डूब कर सुनता था । जब पहला वीणा से कोई पहाड़ी धुन छेड़ता, तो दूसरा कहता, मेरी आँखों के सम्मुख पर्वतों की चोटियाँ सजीव हो उठी हैं और घाटियों की प्रतिध्वनि गूँज उठी है ।  वादक पानी के सुर लगाता, तो दूसरा मित्र कहता, ऐसा लगता है जैसे कल-कल करती नदी मेरे सम्मुख प्रवाहित हो रही है । एक मित्र के पास वीणा वादन की कुशलता थी तो दूसरे के पास सुनने की अद्-भूत कर्ण शक्ति ।  एक दिन सुनने वाला मित्र बीमार पड़ा और जल्दी ही देह से मुक्त हो गया । वीणा वादक ने अपनी वीणा के तार तोड़ डाले और कहते हैं कि फिर उसने कभी वीणा नहीं बजाई ।  क्यो ?...

पुस्तकें और ज्ञान

एक जिज्ञासु साधक था । वह ध्यान (झेन) साधना की तीव्र उत्कंठा से भरा हुआ था । वह जगह-जगह घूमा और ध्यान के संबंध में जितनी भी जानकारियाँ हो सकती थी, वे सब इकट्ठी कर ली । वर्षों तक उसने झेन का अध्ययन किया । हजारों किताबे उसके घर में इकट्ठी हो गई । उन किताबों को अनेकों बार वह पढ़ चुका था ।झेन के एक बड़े विद्वान के रूप में उसकी ख्याति भी हो गई । लोग दूर-दूर से उससे ध्यान के संबंध में जानने के लिए आने लगे । वह अनेक साधकों और जिज्ञासुओं के संपर्क में था । निरंतर ध्यान के संबंध में नई-नई विधियाँ ढ़ूँढ़ता और उन्हें आजमाता । अपने अनुभव को लिखता । अंतत: एक दिन उसे परम ज्ञान उपलब्ध हो गया ।  उस दिन उसने सब किताबों को आग लगा दी और घर से दूर कहीं चला गया ।  क्यों ???

आवाज़

एक झेन साधक की मृत्यु हुई । उसके आश्रम के निकट ही एक अंधा वृद्ध रहता था । साधक की शोकसभा में उसने कहा – “मैं जन्म से अंधा हूँ । लोगो के चेहरे नहीं देख सकता । लेकिन उनकी भावनाएँ उनकी आवाज़ से पहचान पाता हूँ । आमतौर पर मैं जब किसी को बधाई देते सुनता हूँ, तो आवाज के पीछे छिपी ईर्ष्या की गूँज भी मुझे सुनाई देती है । जब किसी को सांत्वना देते हुए सुनता हूँ तो छिपी हुई खुशी भी मुझ से बच नहीं पाती, कि चलो यह दु:ख हमें तो नहीं है । पर इस साधक को मैंने जब भी सुना, वह वही था, जो वह कह रहा था । जब यह बधाई देता था तो अंदर से बाहर तक खुश होता था । जब दु:ख जताता था तो सचमुच दु:खी होता था । “