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ईर्ष्या

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सामने की दीवाल पर पड़ने वाली तेज धूप के कारण आंखें मिचमिचाती थी और लोगों के चेहरे भी कुछ अस्पष्ट दीखते थे । एक छोटी लड़की स्वयं ही मेरे पास आकर बैठ गई । यह सब क्या चल रहा है, इस कौतूहल से उसकी आंखें विस्फारित हो रही थी । शायद उसने अभी-अभी स्नान किया था और वह स्वच्छ वस्त्र पहने थी । उसके बालों में फूल भी लगे थे । बाल-स्वभाव के अनुरूप बहुत कुछ ध्यान में न रखने की चिंता न करते हुए, वह आसपास की सारी बातों का निरीक्षण कर रही थी । उसकी आंखों में अनोखी चमक थी । अब क्या किया जाए- रोए,हँसे कि उछल-कूद करे - उसे सूझ नहीं रहा था । संभवत: इसी कारण उसने सहज रूप से मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और उसका अत्यंत ध्यानपूर्वक निरीक्षण करने लगी ।जल्दी ही वह आसपास के लोगों को भूल गई और मेरी जांघ पर सिर रखकर सो गई । उसका माथा सुंदर,सुडौल था और वह अत्यंत स्वच्छ और निर्मल थी । लेकिन उसका भविष्य कमरे में बैठे अन्य लोगों की तरह भ्रम और दुखमय था । भविष्य में उसके मन में पैदा होनेवाला संघर्ष और दुख सामने की दीवाल पर पड़ने वाले सूर्य-प्रकाश की तरह स्पष्ट है । क्योंकि दुख और वेदना से मुक्त होने के लिए श्रेष्ठ प्रज्ञा आ...