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सम्यक निरीक्षण

सामने शून्य जगत में जो परिवर्तन हो रहे हैं वे अज्ञान के कारण ही यथार्थ दीख पड़ते हैं ; सत्य के पीछे दौड़ने की कोशिश मत करो , केवल मन की सारी आस्थाओं और विचारों को छोड़ दो । - ओशो   ज्योंही सत-असत का द्वैत खड़ा होता है ,  भ्रांति पैदा होती है , मन खो जाता है ।   हम अपने मन को पहचाने , देखें ।   इसकी गति-विधि का निरीक्षण करें  । जिसे तुम चाहते हो , उसे   उसके विरुद्ध खड़ा कर देना, ; जिसे तुम नहीं चाहते - मन का सबसे बड़ा रोग है ।   जब पथ के गूढ़ अर्थ का पता नहीं होता ,  तब मन की शांति भंग होती है , जीवन व्यर्थ होता है ।   मूक दर्शक रहें , पक्ष ग्रहण न करे , बल्कि अपनी वासनाओं , विचारों को ऐसे ही देखे जैसे कोई सागर पर खड़ा हो , सागर की लहरों को देखता हो । कृष्णमूर्ति ने इसे निर्विकल्प सजगता कहा है । यह बिल्कुल तटस्थ निरीक्षण है ।

ओशो के चिर-स्मरणीय दस सूत्र

1. किसी की आज्ञा कभी मत मानों, जब तक कि वह स्वयं की ही आज्ञा न हो । 2. जीवन के अतिरिक्त और कोई परमात्मा नहीं है । 3. सत्य स्वयं में है, इसलिए उसे और कहीं मत खोजना । 4. प्रेम प्रार्थना है । 5. शून्य होना सत्य का द्वार है; शून्यता ही साधन है, साध्य है, सिद्धि है। 6. जीवन है, अभी और यहीं । 7. जियो, जागे हुए । 8. तैरो मत - बहो । 9. मरो प्रतिपल ताकि प्रतिपल नए हो सको । 10. खोजो मत; जो है - है; रुको और देखो ।

नए की खोज

(नए के प्रति ओशो का नजरिया ) 1. हर पल और हर क्षण नया होता है । 2. दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं, एक वे जो अपने को नया करने का राज खोज लेते हैं और एक वे जो अपने को पुरानाबनाए रखते हैं । 3. उत्सव हमारे दुखी चित्त के लक्षण हैं । 4. जब तक दुनिया में दुखी आदमी हैं तभी तक उत्सव हैं । 5. जिस दिन दुनिया में प्रसन्न लोग रहेंगे उस दिन उत्सव नहींरहेंगे; क्योंकि रोज ही उत्सव का दिन होगा । 6. जब दुनिया में दुखी लोग हैं तब तक मनोरंजन के साधन हैं । जिस दिन आदमी आनंदित होगा उस दिन मनोरंजन के साधन एकदम विलीन हो जाएंगे । 7. सिर्फ दुखी आदमी मनोरंजन की खोज करता है और सिर्फ दुखी आदमी ने उत्सव ईजाद किए हैं । 8. रोज नया चित्त हो तो रोज नया दिन हो । 9. जो एक क्षण में शांत होने की तरकीब जान लेता है वहपूरी जिंदगी शांत रह सकता है ; क्योंकि एक क्षण से ज्यादाकिसी आदमी के हाथ में दो क्षण होते ही नहीं । 10. पुराना करने की तरकीबों में हम निष्णात हैं ; प्रत्येक चीजमें पुराने को खोजने को इतने आतुर हैं जिसका कोई हिसाबनहीं । 11. मनुष्य कितना विरोधाभासी सोचता है ; एक तरफ वहनिरंतर पुराने की अपेक्षा किए ...

ओशो की डायरी से

ओशो की डायरी से चुने गए कुछ विचार-बिंदु : १.सत्य सरल है , शेष सब जटिल है , लेकिन हम सरल नहीं हैं , इसलिए सत्य को पाना कठिन हो जाता है । २.मैं दो ही प्रकार के मनुष्यों को जानता हूँ , एक तो वे जो सत्य की ओर पीठ किए हुए हैं और दूसरे वे जिन्होंने सत्य की ओर आंखें उठा ली हैं । इन दो वर्गों के अतिरिक्त और कोई वर्ग नहीं है । ३. विचार शक्ति है - वैसे ही जैसे , विद्युत या गुरुत्वाकर्षण । विद्युत का उपयोग हम जान गए हैं , लेकिन विचार का उपयोग अभी सभी को ज्ञात नहीं है । फिर जिन्हें ज्ञात है वे उसका उपयोग नहीं कर पाते हैं क्योंकि उस उपयोग के लिए स्वयं के व्यक्तित्व का आमूल परिवर्तन आवश्यक है । ४. सत्य और स्वयं के मध्य कोई अलंघ्य खाई नहीं है , सिवाय साहस के अभाव के । ५. मनुष्य भी कैसा अद्भूत है ? उसके भीतर कूड़े कर्कट की गंदगी भी है और स्वर्ग की अमूल्य निधि भी । और हम किसे उपलब्ध होते हैं , यह बिल्कुल ही हमारे हाथ में है । ६. प्रभु को भीतर पाते ही सर्वत्र उसी के दर्शन होने लगते हैं । वस्तुत: जो हम में होता है , उसकी ही हमें बाहर अनुभूति होती है । ईश्वर नहीं दिखाई पड़ता है ? तो जानन...

शिक्षा, प्रशिक्षण और विवेक जागरण

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सृष्टि में कोई भी वस्तु पूर्णतया पूर्ण और निर्दोष तो नहीं हो सकती, परंतु मानव हर वस्तु को निर्दोष बनाने का यत्न अवश्य करता है । चूंकि वह स्वयं पूर्ण नहीं है, इसलिए उसके समस्त कार्य अपूर्ण ही रहते हैं । हजारों वर्षों के मानव इतिहास में कभी भी शिक्षा की कोई पद्धति सर्वथा निर्दोष सर्वमान्य नहीं रही है । परंतु शिक्षा की वर्तमान पद्धति तो अत्यंत शोचनीय और चिंतनीय हो गई है । सारे संसार में कोई भी उससे संतुष्ट नहीं है । इसका मुख्य कारण यह है कि वर्तमान शिक्षा-पद्धति के माध्यम से मनुष्य को जानकारियां तो मिल जाती हैं, लेकिन सच्चे ज्ञान की उपलब्धि उसे नहीं होती । यह ज्ञान उपलब्ध न होने से स्वयं मानव का निर्माण यह शिक्षा नहीं कर पाती । तथ्यों की जानकारी से मनुष्य का मस्तिष्क तो भर जाता है, परंतु उसकी अंतरात्मा खाली की खाली बनी रहती है । न तो उसके अंत:करण का जागरण होता है, न ही उसके ह्रदय में शुभ भावना का अवतरण । इसे यों भी कह सकते हैं कि यह शिक्षा उस आहार की भांति है, जिससे भूख तो मिट जाती है, लेकिन तृप्ति नहीं होती और न ही नया रक्त और अन्य धातुओं की शरीर में अभिवृद्धि ही होती है। यही कारण है कि ...

बाहर-भीतर का द्वंद्व और चित्त का रुपांतरण

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आज मनुष्य के विकास में एक अद्भूत विरोधाभास दिखाई देता है । जहां एक ओर भौतिक तल पर समृद्धि और प्रगति अनुभव होती है, वहीं इस भौतिक समृद्धि और प्रगति के साथ-साथ ही आत्मिक तल पर ह्तास और पतन भी दिखाई पड़ता है । अत: वे लोग भी ठीक हैं जो कहते हैं कि मनुष्य निरंतर उन्नत हो रहा है और वे लोग भी ठीक हैं जिनकी मान्यता है कि मनुष्य का प्रतिदिन पतन होता जा रहा है । हम दोनों को ठीक इसलिए कहते हैं कि भौतिकवादी अपनी दृष्टि से आधुनिक मनुष्य को देखते हैं और आध्यात्मवादी अपनी दृष्टि से । कठिनाई यह है कि दोनों यह अनुभव नहीँ करते कि उनकी दृष्टि एकांगी है । भौतिक विचारधारा वाले तो, आत्मिकतल जैसी कोई चीज है, इसे जानते तक नहीं हैं । और आध्यात्मिक विचारधारा वाले इस सारी समृद्धि और प्रगति को निरर्थक मानते हैं । विचारणीय यह हो गया है कि विरोधी दिशाओं में खिंच रही मानव की यह स्थिति कहीं उसका अंत ही न कर दे । यह घटना असंभव घटना नहीं है । यह इसलिए है कि यदि हम भौतिकतल की उन्नति में ही लगे रहे और हमारा अंतस जैसा अभी है, वैसा ही रहा, तो यह सारी भौतिक समृद्धि नष्ट हो सकती है । भीतर रुग्णता हो और बाहर स्वस्थता दिखाई पड़े...

मनुष्यता की भूल

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सत्य की कोई भी धारणा चित्त को बंदी बना लेती है । सत्य को जानने के लिए चित्त की परिपूर्ण स्वतंत्रता अपेक्षित है । चित्त जब समस्त सिद्धांतों, शास्त्रों से स्वयं को मुक्त कर लेता है, तभी उस निर्दोष और निर्विकार दशा में सत्य को जानने में समर्थ हो पाता है । व्यक्ति जब शून्य होता है तभी उसे पूर्ण को पाने का अधिकार मिलता है । मनुष्य के सारे जीवन सूत्र उलझ गए हैं । उसके संबंध में कोई भी सत्य सुनिश्चित नहीं प्रतीत होता । न जीवन के अथ का पता है, न अंत का । पहले के समय में जो धारणाएं स्पष्ट प्रतीत होती थी, वे सब अस्पष्ट हो गई हैं । धारणाओं के पुराने भवन तो गिर गए पर नए निर्मित नहीं हुए । पुराने सब मूल्य मर गए हैं, या मर रहें हैं और कोई नए मूल्य अंकुरित नहीं हो पाते । एक ही नया मूल्य अंकुरित हुआ है कि यह भौतिक जीवन ही सब कुछ है । परंतु इस नए मूल्य ने संघर्ष, द्वंद्व और युद्ध तथा अशांति को जन्म दिया है । इस भांति जीवन दिशाशून्य होकर ठिठका सा खड़ा है । यह किंकर्तव्य-विमूढ़ता हमारी प्रत्येक चिंतना और क्रिया पर अंकित है । स्वभावत: ऐसी दशा में हमारे चित्त यदि तीव्र संताप से भर गए हों, तो कोई आश्चर्य नह...

ज्ञान-गंगा : 10/ धर्म और संप्रदाय

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धर्म के प्रति आधुनिक मन में बड़ी उपेक्षा है । और यह अकारण भी नहीं है । धर्म का जो रूप आंखों के सामने आता है, वह न तो रुचिकर ही प्रतीत होता है और न ही धार्मिक । धार्मिक से अर्थ है : सत्य, शिव और सुंदर के अनुकूल । तथाकथित धर्म वह वृत्ति ही नहीं बनाता जिससे सत्य, शिव और सुंदर की अनुभूति होती हो । वह असत्य, अशिव और असुंदर की भावनाओं को बल और समर्थन भी देता है । हिंसा, वैमनस्य और विद्वेष उसकी छाया में पलते हैं । मनुष्य का इतिहास तथाकथित धर्म के नाम पर इतना रक्तरंजित हुआ है कि जिनमें थोड़ा विवेक और बुद्धि है, बहुत स्वाभाविक है कि न केवल उनके ह्रदय धर्म के प्रति उदासीन हो जाएं, बल्कि ऐसे विकृत रूपों के प्रति विद्रोह का भी अनुभव करें । यह बात विरोधाभासी मालूम होगी । किंतु बहुत सत्य है कि जिनके चित्त वस्तुत: धार्मिक हैं, वे ही लोग तथाकथित धर्मों के प्रति विद्रोह अनुभव कर रहें हैं । धर्म एक जीवंत प्रवाह है । और निरंतर रुढ़ियों, परम्पराओं और अंधविश्वासों को तोड़कर उसे मार्ग बनाना होता है । सरिताएं जैसे सागर की ओर बहती हैं, और उन्हें अपने मार्ग में बहुत सी चट्टाने तोड़नी पड़ती हैं, और बहुत सी बाधाएँ दूर...

ज्ञान-गंगा : 9 / ज्ञान, ज्ञाता , ज्ञेय और अहंकार

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साधारणत: जिसे ज्ञान कहते हैं, वह ज्ञान द्वैत के ऊपर नहीं ले जाता । वहां द्वैत हमेशा बना रहता है । जहां दो का भाव हो, वहीं यह संभव होता है कि ज्ञेय और ज्ञाता अलग-अलग बने रहते हैं । इसी लिए यह ज्ञान एक बाह्य संबंध है । यह अंदर प्रवेश नहीं कर पाता । ज्ञाता ज्ञेय के कितने ही निकट पहुँच जाए, फिर भी दूर ही बना रहता है । इस तथाकथित ज्ञान के लिए दूरी अनिवार्य और अपरिहार्य है । इसलिए ऐसा ज्ञान मात्र किसी विषय का परिचय ही दे पाता है, वस्तुत: ज्ञान नहीं बन पाता । मनुष्य के लिए बड़ी से बड़ी पहेलियों में से एक यही है कि ज्ञान बिना दूरी के संभव नहीं । लेकिन जहां दूरी है,वहां सच्चा ज्ञान असम्भव है । क्या यह संभव है कि दूरी न हो और ज्ञान संभव हो जाए ? यदि यह संभव नहीं है, तो सत्य कभी भी नहीं जाना जा सकता । और साधारणत: यह संभव नहीं दिखता, क्योंकि जो भी हम जानते हैं, वह जानने के कारण ही हमसे पृथक और अन्य हो जाता है । ज्ञान ज्ञाता और ज्ञेय को तोड़ देता है । वह जोड़ने वाला सेतु नहीं, वरन् पृथक करने वाली खाई है । और यही कारण है कि जिन्हें हम ज्ञानी कहते हैं, वे अति अहंकार युक्त हो जाते हैं । जैसे-जैसे उनका ज्ञ...

ज्ञान-गंगा : 8 राग, लालसा और प्रेम

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प्रेम क्या है ? इसे समझने के पहले यह जानना जरूरी है कि प्रेम क्या नहीं है । क्योंकि जिसे हम प्राय: प्रेम के नाम से जानते हैं, वह और कुछ भले ही हो, प्रेम कतई नहीं है । मानव के संबंधों में भी हमें अधिकतर राग,लालसा, आसक्ति दिखाई देती है, वह प्रेम नहीं कहा जा सकता । प्रेम की विकृति ही राग, लालसा और आसक्ति है । पहले काम को लें । यह राग से उत्पन्न होता है । काम प्रेम नहीं है । काम या यौन आकर्षण तो प्रकृति का संतति उत्पादन के लिए प्रयोग किया गया सम्मोहन है । यथार्थ में यह वैसी ही मूर्छा है, जैसी शल्य-चिकित्सक शल्य क्रिया के पूर्व उपयोग में लाता है । इस मूर्छा के अभाव में प्रकृति का संतति-क्रम चलना संभव नहीं है । इसे ही जो प्रेम समझ लेते हैं, वे भ्रांति में पड़ जाते हैं । यह मूर्छा मनुष्य में ही नहीं वरन् समस्त पशु-पक्षी, कीट-पतंग में भी ऐसी ही पाई जाती है । कई जीवधारियों की तो संभोग के बाद मृत्यु हो जाती है । शहद की मक्खी का दृष्टांत लीजिए । इस मक्खी के छत्ते में इन मक्खियों की एक रानी रहती है । इस रानी मक्खी से अनेक नर मक्खियां संभोग की इच्छा रखते हैं । अंत में जिस नर को वह रानी पसंद करती ह...

ज्ञान-गंगा : 7/ चेतन, अचेतन और सृजन

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मनुष्य में और पशु में जन्म और मृत्यु की दृष्टि से कोई भेद नहीं है । न तो मनुष्य को ज्ञात है कि वह क्यों पैदा होता है और क्यों मर जाता है और न ही पशु को ।लेकिन मनुष्य को यह ज्ञात है कि वह पैदा होता है और मरता है । यह ज्ञान पशु को नहीं है । और यह ज्ञान बहुत बड़ा भेद पैदा करता है । इसके कारण ही मनुष्य पशुओं के बीच होते हुए भी पशुओं से भिन्न हो जाता है । वह जीवन पर विचार करने लगता है । जीवन में अर्थ और प्रयोजन खोजने लगता है । वह मात्र होने से तृप्त नहीं होता ।वरन् सप्रयोजन और सार्थक रूप से होना चाहता है ।इससे ही जीवन उसके लिए केवल जीना न होकर, एक समस्या और उसके समाधान की खोज बन जाता है । स्वभाविक है कि इससे तनाव, अशांति और चिंता पैदा होती है । कोई पशु न तो चिंतित है, न अशांत है । मनुष्य अकेला प्राणी है, जिसमें ऊब प्रकट होती है । और वही एकमात्र प्राणी है जो कि हँसता है और रोता है । न तो किसी और पशु को किसी भी भांति उबाया ही जा सकता है और न ही हँसाया । पशु जीते हैं सहज और सरल । कोई समस्या वहां नहीं है । भोजन, छाया या इस तरह की तात्कालिक खोजें हैं, लेकिन जीवन का कोई अनुसंधान नहीं है । न कोई अ...

ज्ञान-गंगा : 6

मनुष्य के चित्त-विश्लेषण से जो केंद्रिय तत्त्व उपलब्ध होता है, वह है परिग्रह की दौड़ । चाहे यश हो, चाहे धन हो,चाहे ज्ञान हो,लेकिन प्रत्येक स्थिति में मनुष्य किसी न किसी भांति स्वयं को भरना चाहता है और संग्रह करता है । संग्रह न हो तो तो वह स्वयं को स्वत्वहीन अनुभव करता है । और संग्रह हो तो उसे लगता है कि मैं भी कुछ हूँ । संग्रह, शक्ति देता हुआ मालूम पड़ता है । और संग्रह स्व या अहं को भी निर्मित करता है । इसलिए जितना संग्रह उतनी शक्ति और उतना अहंकार । इस दौड़ का क्या मूलभूत कारण है ? इसे बिना समझे जो इस दौड़ के विरोध में दौड़ने लगते हैं, वे ऊपर से भले ही अपरिग्रही दिखाई पड़ें, लेकिन अंतस् में उनके भी परिग्रह ही केंद्र होता है । जो व्यक्ति स्वर्ग के लिए, बैकुण्ठ के लिए या बहिस्त के लिए सम्पत्ति और संग्रह छोड़ देते हैं, उनका छोड़ना (त्याग) कोई वास्तविक छोड़ना नहीं है । क्योंकि जहां भी कुछ पाने की आकांक्षा है, वहां परिग्रह है । फिर चाहे यह आकांक्षा परमात्मा के लिए हो या चाहे मोक्ष के लिए, चाहे निर्वाण के लिए । वासना परिग्रह की आत्मा है । लोभ ही उसका श्वांस-प्रश्वांस है । इस भांति धन को जो धर्म या पु...

ज्ञान-गंगा : 5

मनुष्य स्वरूपत: शुभ है या अशुभ ? जो उसे स्वरूपत: अशुभ मान लेते हैं, उनकी दृष्टि अत्यंत निराशाजनक और भ्रांत है । क्योंकि जो स्वरूपत: अशुभ हो, उसके शुभ की संभावना समाप्त हो जाती है । स्वरूप का अर्थ ही यही है कि उसे छोड़ा नहीं जा सकता है । जो सदा अनिवार्य रूप से साथ है वही स्वरूप है । यदि मनुष्य स्वरूप से ही अशुभ हो, तब तो उसे शुभ का विचार भी नहीं उठ सकता । इसलिए हम मनुष्य को स्वरूपत: शुभ मानते हैं । अशुभ आच्छादन है । यह दुर्घटना -मात्र है । जैसे सूर्य अपने ही द्वारा पैदा की हुई बदलियों में छिप जाता है । वैसे ही मनुष्य की चेतना में जो शुभ है, वह उसकी अंतर्निहित स्वतंत्रता के दुरुपयोग से आच्छादित हो जाता है । चेतना स्वरूपत: शुभ और स्वतंत्र है । स्वतंत्रता के कारण ही अशुभ भी चुना जा सकता है । तब एक क्षण को अशुभ आच्छादित कर लेता है । जिस क्षण अशुभ हो रहा है, उसी क्षण वह आच्छादन रहता है । उसके बाद आच्छादन तो नहीं, मात्र स्मृति रह जाती है । शुद्ध वर्तमान में स्मृति शून्य चेतना सदा ही शुभ में प्रतिष्ठित है । अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति अपनी शुद्ध वर्तमान सत्ता में शुभ और निर्दोष है । जो व्यक्ति सोच...

ज्ञान गंगा : 4

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मनुष्य के व्यक्तित्व में सबसे बड़ा अंतर्द्वन्द्व इस मान्यता से पैदा होता है कि उसका शरीर और उसकी आत्मा विरोधी सत्य हैं । यह स्वीकृति आधारभूत रूप से मनुष्य को विभाजित कर देती है । फिर स्वभावत: इन दोनों विभाजित खेमों में संघर्ष और कलह प्रारंभ हो जाता है । यह फिर न केवल मनुष्य के व्यक्तित्व में बल्कि समाज के व्यक्तित्व में भी प्रतिफलित होता है । इसी के आधार पर अब तक की सारी संस्कृतियां खंड संस्कृतियां हैं । अखंड और समग्र जीवन को समाविष्ट करने वाली संस्कृति का अभी जन्म नहीं हुआ है । जब तक शरीर और आत्मा, पदार्थ और परमात्मा, संसार और मोक्ष के बीच विरोध की जगह सामंजस्य और समस्वरता स्थापित नहीं होती, तब तक यह हो भी नहीं सकता । अब तक या तो ऐसी विचार-दृष्टियाँ रही हैं, जो आत्मा के निषेध पर शरीर -मात्र को ही स्वीकार करती हैं या फिर ऐसी परम्पराएं रही हैं जो शरीर के निषेध पर मात्र आत्मा की सत्ता को स्वीकार करती हैं । एक विचार वर्ग परमात्मा को असत्य मानता है और दूसरा संसार को माया और भ्रम । ये दोनों विचारधाराएँ ही पूर्ण मनुष्य को स्वीकार करने में भय खाती हैं । वे उसी अंश को स्वीकार करते हैं, जिसे प...