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ज्ञान गंगा : 4


मनुष्य के व्यक्तित्व में सबसे बड़ा अंतर्द्वन्द्व इस मान्यता से पैदा होता है कि उसका शरीर और उसकी आत्मा विरोधी सत्य हैं । यह स्वीकृति आधारभूत रूप से मनुष्य को विभाजित कर देती है । फिर स्वभावत: इन दोनों विभाजित खेमों में संघर्ष और कलह प्रारंभ हो जाता है । यह फिर न केवल मनुष्य के व्यक्तित्व में बल्कि समाज के व्यक्तित्व में भी प्रतिफलित होता है । इसी के आधार पर अब तक की सारी संस्कृतियां खंड संस्कृतियां हैं । अखंड और समग्र जीवन को समाविष्ट करने वाली संस्कृति का अभी जन्म नहीं हुआ है । जब तक शरीर और आत्मा, पदार्थ और परमात्मा, संसार और मोक्ष के बीच विरोध की जगह सामंजस्य और समस्वरता स्थापित नहीं होती, तब तक यह हो भी नहीं सकता । अब तक या तो ऐसी विचार-दृष्टियाँ रही हैं, जो आत्मा के निषेध पर शरीर -मात्र को ही स्वीकार करती हैं या फिर ऐसी परम्पराएं रही हैं जो शरीर के निषेध पर मात्र आत्मा की सत्ता को स्वीकार करती हैं । एक विचार वर्ग परमात्मा को असत्य मानता है और दूसरा संसार को माया और भ्रम । ये दोनों विचारधाराएँ ही पूर्ण मनुष्य को स्वीकार करने में भय खाती हैं । वे उसी अंश को स्वीकार करते हैं, जिसे पहले से ही स्वीकार करने की उन्होंने धारणा बना रखी है । जैसे कोई वस्त्र पहले बना ले और फिर मनुष्य को काट-छांट कर वस्त्र पहनाने की चेष्टा करे । ऐसी ही चेष्टा उनकी है । धारणाएं पहले तय कर ली जाती हैं, और फिर बाद में उन्हें मनुष्य को पहना दिया जाता है । जबकि विवेकपूर्ण यही होगा कि हम पहले मनुष्य को उसकी समग्रता में विचार करें और फिर कोई जीवन-दर्शन बनाएं । विचार संख्या या विचारधाराएं महत्वपूर्ण नहीं - महत्वपूर्ण मनुष्य की यथार्थता है । धार्मिक और भौतिकवादी दोनों ही पूर्व पक्षों को छोड़ कर यदि मनुष्य को देखा जाए, तो न तो वह मात्र शरीर ही है और न मात्र आत्मा ही । वह तो अद्वय इकाई है । शरीर और आत्मा हमारे विचार के विभाजन हैं । मनुष्य तो अखंड है । वस्तुत: शरीर और आत्मा का जहां मिलन है, वहीं मनुष्य की उत्पत्ति है । वे आत्माएं जो किसी अशरीरी मोक्ष में हैं, उन्हें हम मनुष्य नहीं कह सकते और न ही उन शरीरों को को जो आत्म रहित हैं । मनुष्य आत्मा और शरीर का संगम है । इसलिए उसके संबंध में किसी भी पक्ष को दूसरे के निषेध पर स्वीकार कर लेना घातक ही सिद्ध होता है और ऐसी स्वीकृति से बनी हुई संस्कृति अधूरी, पंगु एवं एकांगी है । या तो सामान्य दैहिक वासनाओं का जीवन ही उसके लिए सब कुछ हो जाता है या फिर काम ही उसके लिए केंद्र हो जाता है । फिर उसके लिए और किसी चीज़ की सत्ता नहीं होती । स्वभावत: ऐसी दृष्टि शांति, सत्य और ऊर्ध्वगमन की सब संभावनाएं छीन लेती है । मनुष्य एक डबरे में बंद हो जाता है और सागर तक पहुँचने की गति, आकर्षण और अभीप्सा सभी खो जाते हैं । दूसरी ओर जो पदार्थ को अस्वीकार कर देते हैं, वे भी शक्तिहीन हो जाते हैं और भूमि से उनकी जड़ें टूट जाती हैं । उनका होना न होने की भांति हो जाता है । इस तरह से दोनों विकल्प अनुभव किए गए हैं, और उनकी दोषपूर्ण स्थिति भी प्रत्यक्ष हो गई है ।
जिन संस्कृतियों ने जड़ को सब कुछ माना उनके पास संपदा आई, शक्ति आई लेकिन साथ ही अशांति और विनाश भी । और जिन्होंने जड़ को कुछ भी न माना वे संपदाशून्य, शक्तिरिक्त, दास और दरिद्र होते देखे गए । समय आ गया है कि इस भूल के प्रति हम सचेत हों और जड़तावादी या ब्रह्मवादी की अतियों से बचें । अति सदा वर्जित है और अनिवार्य रूप से अति का अनुगमन असत्य में होता है । सत्य सदा मध्य में है, क्योंकि सत्य सदा संतुलन और संगति में है ।
शरीर और आत्मा में किसी एक को नहीं चुनना है । पदार्थ और परमात्मा में से किसी एक पक्ष में खड़ा नहीं होना है । क्योंकि जो जानते हैं, वे विश्व सत्ता में दो का अनुभव ही नहीं करते । जो जड़ की भांति प्रतीत हो रहा है, वह भी मूलत: और अंतत: वही है जो चैतन्य की तरह अनुभव में आता है । विश्वसत्ता एक ही है । उसकी अभिव्यक्तियां ही अलग हैं। जो दृश्य परमात्मा है, वही संसार है और जो अदृश्य संसार है वही परमात्मा है । यदि हम जड़ सत्ता का आत्यंतिक अनुसंधान करें, तो वह अदृश्य में विलीन हो जाता है । विज्ञान ने यह किया और परमाणु के विभाजन के बाद वह जिन सत्ता-कणों पर पहुँचा है, वे पदार्थ नहीं हैं, न ही वे दृश्य हैं, बल्कि अदृश्य ऊर्जा मात्र में परिणत हो गए । ऐसे ही जिन्होंने चेतना का आत्यंतिक अनुसंधान किया है, उन्होंने पाया है कि चेतना ही दृश्य हो जाती है अर्थात् अदृश्य आत्मशक्ति का भी साक्षात्कार हो जाता है । और यह साक्षात्कार इतना प्रगाढ़ होता है, कि उसके समक्ष पदार्थ ही असत्तावान मालूम होने लगता है । इस सत्य को ध्यान में रखें तो ज्ञात होगा कि जो दृश्य है, वह अदृश्य ही है और जो अदृश्य है वह भी दृश्य है । संसार और मोक्ष भिन्न नहीं हैं , अभिन्न हैं । अज्ञान में जो संसार मालूम होता है, ज्ञान में वही मोक्ष हो जाता है । अंधरे में जो पदार्थ मालूम होता है, आलोक में वही परमात्मा में परिणत हो जाता है । दोनों के बीच एकता है । और इस एकता का अनुभव केवल वही कर पाते हैं, जो दोनों के बीच अतिवादी द्वंद्व से नहीं बल्कि दोनों के मध्य संतुलन से प्रारंभ करते हैं ।
हमने अतियों में जीकर देख लिया है । वह प्रयोग किसी भी दिशा में सफल नहीं हुआ है । अब अन-अति का प्रयोग करने का समय है । मनुष्य को उसकी पूर्णता को स्वीकार कर संस्कृति का निर्माण करना है ।
( यह लेख ओशो देशना पर आधारित है । )

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