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सोच और सृजन

व्यक्ति की वैयक्तिक सोच, जब तक सृजन में साकार नहीं हो जाती, तब तक उस व्यक्ति की वह सोच वायवीय समझी जाती है । एक पागलपन । - मनोज भारती 

टिप्पणियाँ

  1. मनोज जी, व्यक्ति की सोच तो वैयक्तिक ही हुई न? फिर यह वैयक्तिक शब्द पुनरावृत्त हो रहा प्रतीत होता है. चैतन्य जी की बात को आगे बढाते हुए कहना चाहूँगा कि सोच एक सृजन है, कदाचित् आपका तात्पर्य किसी भौतिक सृजन से है, जो चिंतन का मूर्त्त परिणाम है!

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  2. चैतन्य जी ! चिंतन निश्चित ही सृजन है । सोच के दो तल मुझे समझ आते हैं : एक सोच में सार्वजनिक सोच उभरती है...जो स्थापित हो गई है...ऐसी सोच में मूर्त और अमूर्त दोनों विचार समाहित हैं । कोई विचार जब तक मानव मस्तिष्क में रहता है, तब तक वह सृजन तो है, लेकिन उसकी उपयोगिता समाज के लिए नहीं है, इसलिए वह वायवीय समझा जाता है ...समाज मूर्त और स्थापित मूल्यों (अमूर्त विचार लेकिन पहचाना गया विचार) को महत्त्व देता है । इसी कारण किसी भी प्रतिभाशाली व्यक्ति को अपने विचारों को सिद्ध करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है...और जब तक वह विचार स्थापित नहीं हो जाता समाज उसे मात्र एक फिजूल कल्पना ही मानता है ।

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  3. बिहारी बाबू !!! जब मैं व्यक्ति की वैयक्तिक सोच का शब्दों का इस्तेमाल कर रहा हूँ, तो इसमें दोहराव नहीं है, बल्कि व्यक्ति के निजी विचार को अन्य स्थापित विचारों से अलग करने का भाव निहित है । विचार की स्पष्टता के लिए यह जरूरी है । दूसरी बात, हर भौतिक सृजन के मूल में अमूर्त विचार ही रहता है । जब विचार किसी आकार में परिवर्तित हो जाता है, तो वह मूर्त संसार में स्थापित हो जाता है ।

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  4. बिल्कुल सही लिखा है आपने! अच्छी सोच!

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