सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

My thoughts/मेरे विचार


  • SINCERITY comes from heart;hypocrites never know sincerity.
  • In the existence only man tries to be perfect. Nothing but existence itself perfect.
  • Nothing is transparent unless you have eyes to see through things.
  • Without zest zenith never comes.
  • Self image sets the boundaries of individual perspective.
  • Without a good rapport no team exists. With a good rapport team definitely wins.
  • BOSS stands for Big Offer to Sure Success.
---------------------------------------------------------------
  • निष्कटता हृदय से आती है;ढ़ोंगी इसे कभी नहीं समझ सकते।
  • अस्तित्व में मनुष्य ही पूर्ण होने का प्रयास करता है। परंतु अस्तित्व के अतिरिक्त कुछ भी पूर्ण नहीं है।
  • जब तक चीजों को आर-पार देखने वाली आंखें न हों कुछ भी पारदर्शी नहीं है।
  • जोश के बिना शिखर कभी नहीं आता।
  • आत्म-छवि व्यक्ति की सीमाओं को निर्धारित करती है।
  • सौहार्द के बिना टीम नहीं बन सकती। जहां सौहार्द है वह टीम अवश्य ही जीतती है।
  • सुनिश्चित सफलता के लिए बड़ा प्रस्ताव, अंग्रेजी के शब्द बॉस का विस्तार है। 

टिप्पणियाँ

  1. हिन्दी माह की पूर्व सन्ध्या पर अग्रेंजी की सूक्तिया बहुत खूब लगी, मनोज भाई!!

    जवाब देंहटाएं
  2. मनोज बाबू!
    सितम्बर महीना सुरू होने के पहिलहीं आप अंगरेजी में बिचार ठोंक दिए हैं.. आपको तो पते है कि हम बिहारी लोग का अंगरेजी तानी डांवाडोल होता है.. इसलिए उम्मीद करते हैं कि जाउन लिखे होंगे ऊ जरूर गहिरा बात होगा!

    जवाब देंहटाएं
  3. आदरणीय मनोज जी!
    अनुवाद से मार्ग की बाधाएं हट गयी हैं और सूक्तियां स्वतः ग्राह्य लग रही हैं.. एक एक विचार स्वागत योग्य है और इनमें संदेह का कोई स्थान नहीं प्रतीत होता है!!

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया लगा! उत्तम विचार!
    आपको एवं आपके परिवार को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं
  5. बेहद सुन्दर और अनुकरणीय विचार। आभार।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी

आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं । कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं । जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है । आइए हम हिंदी के इन विभिन्न रूपों को विधिवत समझ लें, ताकि हमारे मन-मस्तिष्क में स्पष्टता आ जाए । राष्ट्रभाषा से अभिप्राय: है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा । क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है ? यद्यपि हिंदी का व्यवहार संपूर्ण भारतवर्ष में होता है,लेकिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है । चूँकि भारतवर्ष सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई दृष्टि से विविधताओं का देश है । इस राष्ट्र में किसी एक भाषा का बहुमत से सर्वमान्य होना निश्चित नहीं है । इसलिए भारतीय संविधान में देश की चुनिंदा भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा है । शुरु में इनकी संख्या 16 थी , जो आज बढ़ कर 22 हो गई हैं । ये सब भाषाएँ भारत की अधिकृत भाषाएँ हैं, जिनमें भारत देश की सरकारों का काम होता है । भारतीय मुद्रा नोट पर 16 भाषाओं में नोट का मूल्य अंकित रहता है और भारत सरकार इन सभी भाषाओं के विकास के लिए संविधान अनुसा

अमीर खुसरो की चतुराई

एक बार गर्मियों के दिनों में अमीर खुसरो किसी गाँव की यात्रा पर निकले थे । रास्ते में उन्हें बहुत जोर की प्यास लगी । वे पानी की खोज में एक पनघट पर जा पहुँचे । वहां चार पनिहारिनें पानी भर रही थी । खुसरों ने उनसे पानी पिलाने का अनुरोध किया । उनमें से एक पनिहारिन खुसरो को पहचानती थी । उसने अपनी तीनों सहेलियों को बता दिया कि पहेलियाँ बनाने वाले यही अमीर खुसरों हैं । विदित है कि अमीर खुसरो अपनी पहेलियों,मुकरियों तथा दो-सखुनों के लिए जगत प्रसिद्ध हैं । फिर क्या था ? चारों पनिहारिनों में से एक ने कहा मुझे खीर पर कविता सुनाओ, तब पानी पिलाऊंगी । इसी तरह से दूसरी पनिहारिन ने चरखा, तीसरी ने ढोल और चौथी ने कुत्ते पर कविता सुनाने के लिए कहा । खुसरो बेचारे प्यास से व्याकुल थे । पर खुसरो की चतुराई देखिए कि उन्होंने एक ही छंद में उन सबकी इच्छानुसार कविता गढ़ कर सुना दी -               खीर पकाई जतन से, चरखा दिया जला । आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा ।।                                                  ला पानी पीला ।  यह सुन कर पनिहारिनों की खुशी का ठीकाना न रहा । उन्होंने खुश होकर खुसरो को न केवल पानी

शेख और आलम

कवि आलम रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि हुए । इनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण जाति में हुआ । उस समय देश में औरंगजेब का राज था । इनकी कवि प्रतिभा और चतुराई से औरंगजेब का लड़का बहुत प्रभावित था । उसके आग्रह पर ही आलम उनका राज कवि बना । एक बार उन्हें एक समस्या पहेली के रूप में दी गई और इसे पूरा करने के लिए कहा गया । दोहे की वह पंक्ति कुछ यूँ थी :- "कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन " बहुत सोच-विचार करने पर भी वे इसके समाधान में दूसरी पंक्ति न सोच सके । जिस कागज पर यह पंक्ति लिखी गई थी, वह कागज उन्होंने अपनी पगड़ी में रख लिया । वह कागज उनकी पगड़ी के साथ धुलने के लिए रंगरेजिन के पास चला गया । कहते हैं कि वह रंगरेजिन बहुत सुंदर और चतुर थी । उसका नाम शेख था । जब उसने पगड़ी को धोने के लिए खोला, तो उसके हाथ वह कागज लगा, जिस पर पहेली-रूपी में वह पंक्ति लिखी थी । उसने समस्या को ध्यान से पढ़ा और उसके नीचे लिख दिया :- "कटि को कंचन काटि विधि कुचन मध्य धर दीनी ।" जब पगड़ी धुल गई तो उस कागज को ज्यों का त्यों उसमें रख दिया । जब आलम ने पगड़ी लेकर अपना कागज देखा तो उसमें समस्या का उत्तर लिखा हुआ द