सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

तादात्म्य और चित्त की जटिलता

(पिछली पोस्ट में हमने जाना कि मनुष्य की सरलता खोती है उसके बनाए आदर्शों से,अनुकरण और अनुसरण से,अपने से अलग कुछ और बनने की कोशिश में। इस सरलता के खोने में एक और तत्त्व जिम्मेवार है और वह है तादात्म्य,आइए देखें कि तादात्म्य कैसे हमें जटिल बनाता है और खंडित करता है।)

यह स्मरण रखें कि जीवन में जितना कम द्वंद्व,जितना कम संघर्ष,जितने कम व्यर्थ के तनाव,व्यर्थ के खंड कम हों,उतनी सरलता उत्पन्न होगी। मनुष्य जितना अखंड हो उतनी सरलता उपलब्ध होती है। हम खंड-खंड हैं। और हम अपनी अखंडता को अपने हाथों से तोड़े हुए हैं। हम अपनी अखंडता को कैसे तोड़ देते हैं? 

हम अपनी अखंडता को तादात्म्य से,आइडिन्टटी से तोड़ देते हैं।

होता क्या है? मैं एक घर में पैदा हुआ। उस घर के लोगों ने मुझे एक नाम दे दिया और मैंने समझ लिया कि वह नाम मैं हूं। मैंने एक आइडिन्टटी कर ली। मैंने समझ लिया कि यह नाम मैं हूं। फिर मैं कहीं शिक्षित हुआ। फिर मुझे कोई उपाधि मिल गई। फिर मैंने उन उपाधियों को समझ लिया कि ये उपाधियां मैं हूं। फिर किसी ने मुझे प्रेम किया,तो मैंने समझ लिया कि लोग मुझे प्रेम करते हैं और वह प्रेम की तस्वीर मैंने बना ली और समझा कि यह मैं हूं। फिर किसी ने ग्रहण किया,अपमानित किया,सम्मानित किया तो मैंने वह तस्वीर बना ली। ऐसी बहुत सी तस्वीरें आपके चित्त के अलबम पर आपकी ही लगती चली जाती है और हर तस्वीर को आप समझ लेते हैं मैं हूं। इन तस्वीरों में बड़ा विरोध होता है। ये तस्वीरें बहुत प्रकार की हैं। अनेक रूपों की हैं। इन तस्वीरों को,यह समझ कर कि मैं हूं,आप अनेक रूपों में विभक्त हो जाते हैं।

एक गांव से क्राइस्ट निकले और एक आदमी ने आकर उनका पैर छुआ। उस आदमी ने पूछा--क्या मैं भी ईश्वर को पा सकता हूं? क्राइस्ट ने कहा कि इसके पहले कि तुम ईश्वर को पा सको,मैं तुमसे पूछूं कि तुम्हारा नाम क्या है? उस आदमी ने आंखे नीचे झुका ली और कहा मेरा नाम? क्या बताऊं अपना नाम? मेरे तो हजार नाम हैं। कौन सा नाम बताऊं? मैं तो हजार-हजार आदमी एक ही साथ हूं। जब घृणा करता हूं तो दूसरा आदमी हो जाता हूं। जब प्रेम करता हूं तो बुलकुल दूसरा आदमी हो जाता हूं। जब रोष और क्रोध से भरता हूं तो बिलकुल दूसरा आदमी हो जाता हूं। और जब क्षमा से भरता हूं तो बिलकुल दूसरा आदमी हो जाता हूं। अपने बच्चों में मैं दूसरा आदमी हूं । अपने शत्रुओं में मैं दूसरा आदमी हो जाता हूं। मित्रों में दूसरा हूं। अपरिचितों में दूसरा हूं। मेरे तो हजार नाम हैं। मैं कौन सा नाम बताऊं? 

यह हर आदमी की तस्वीर है। आपके नाम भी ऐसे ही हैं। आपके नाम भी हजार हैं। आप हजार टुकड़ों में बंटें हुए हैं। आप एक आदमी नहीं हैं। और जो एक आदमी नहीं है वह सरल कैसे होगा? उसके भीतर तो भीड़ है। हर आदमी एक क्राउड है। यह भीड़ बाहर नहीं है आपके भीतर है। तो आप में कई आदमी बैठे हुए हैं एक ही साथ। एक ही साथ कई आदमी आपके भीतर बैठे हुए हैं। ख्याल करें,अपने चेहरे को पहचाने। सुबह से उठते हैं तो सांझ तक क्या आपका चेहरा एक ही रहता है? जब आप घर से बाहर निकलते हैं और रास्ते पर एक भिखमंगा भीख मांगता है तब और जब आप बाजार में पहुंचते हैं और कोई आदमी आपको नमस्कार करता है तब,और जब आप दुकान पर बैठते हैं तब,जब आप अपनी पत्नी के पास होते हैं तब,जब आप अपने बच्चों के पास होते हैं तब,क्या आपका चेहरा एक ही है? अगर आपके चेहरे अनेक हैं तो आप सरल नहीं हो सकते,आप जटिलता पैदा कर लेंगे। बहुत जटिल हो जाएंगें। कैसे सरल हो सकते हैं,अगर एक आदमी के अंदर दस-पंद्रह रहते हों? 

हत्यारों ने जिन्होंने बड़ी हत्याएं की हैं,अनेकों ने यह कहा है कि हमें पता नहीं कि हमने हत्या भी की है। पहले तो लोग समझते थे कि ये लोग झूठ बोल रहें हैं,लेकिन अब मनोविज्ञान इस नतीजे पर पहुंचा है कि वे ठीक कह रहें हैं। उनके व्यक्तित्व इतने खंडित हैं कि जिस आदमी ने हत्या की है वह वह आदमी नहीं है,जो अदालत में बयान दे रहा है। वह दूसरा आदमी है। यह बिलकुल दूसरा चेहरा है,उसे याद भी नहीं कि मैंने हत्या की है। इतने खंड हो गए हैं भीतर कि दूसरे खंड ने यह काम किया है,इस खंड को पता ही नहीं। और आपके भीतर भी ऐसे बहुत से खंड हैं। नहीं लगता, क्रोध करने के बाद क्या आप नहीं कहते कि मैंने अपने बावजूद क्रोध किया। अजीब बात है, आपके बावजूद! मतलब--आपके भीतर कोई दूसरा आदमी भी है। आप नहीं चाहते थे कि क्रोध हो और उसने क्रोध करवा दिया। कई बार आप अनुभव करते हैं कि मैं नहीं करना चाहता था,फिर मैंने किया। फिर कौन करवा देता है? जरूर आपके भीतर कई दूसरे लोग हैं। आप नहीं चाहते हैं फिर भी आपसे हो जाता है। हजार बार निर्णय करते हैं कि अब ऐसा नहीं करेंगे,फिर भी कर लेते हैं और पछताते हैं। 

असल में आपके भीतर बहुत से लोग हैं। जिसने निर्णय किया था कि नहीं करेंगे और जिसने किया,उन दोनों को पता नहीं कि बीच में कोई और बातचीत है। उन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं है। सांझ को आप तय करके सोते हैं कि सुबह पांच बजे उठेंगे और सुबह पांच बजे आपके भीतर कोई कहता है कि रहने भी दो। आप सो जाते हैं। सुबह आप पछताते हैं कि मैंने तो तय किया था कि उठना है फिर मैं उठा क्यों नहीं? अगर आपने ही तय किया था कि उठना है और आप एक व्यक्ति होते, तो सुबह पांच बजे कौन कह सकता था कि मत उठो? लेकिन आपके भीतर और व्यक्ति बैठे हुए हैं और वे कहते हैं--रहने दो,चलने दो। 

महावीर ने कहा है कि मनुष्य बहुचित्तवान है। एक चित्त नहीं,आपके भीतर बहुचित्त हैं। और जिसके भीतर बहुचित्त हैं वह कभी सरल होगा? सरल हो ही नहीं सकता। आपके भीतर कई आवाजें हैं। एक आवाज कुछ कहती है,दूसरी आवाज कुछ कहती है। कभी सोचें आप, अपने भीतर की आवाजों को सुनें। आपको बहुत आवाजें सुनाई पडेंगी। आपको लगेगा,आप बहुत आदमियों से घिरे हुए हैं। सरलता के लिए जरूरी है एक चित्तता आ जाए,बहुचित्तता न हो। एक चित्तता कैसे आएगी? आप जिन तादात्म्य को बना लेते हैं,उनको तोड़ने से एक चित्तता आएगी।                                                                                                                    
 ...जारी
                                                                                                                                            --ओशो

टिप्पणियाँ

  1. चित्त का कई रूप होना मनुष्य को ज्ञात है लेकिन वह उससे अलग नहीं हो पाता. बहुत अच्छी प्रस्तुति. आभार.

    जवाब देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  5. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. भारत भूषण जी आपकी एक ही टिप्पणी पांच बार प्रकाशित होने के कारण मूल के अतिरिक्त अन्य टिप्पणियां हटा दी गई हैं।

      हटाएं
  6. ओशो के सभी प्रवचनों में यह दर्शन हमेशा ही दिखाई देता है.. निदा साहब ने भी कहा है कि
    हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी,
    जिसको भी देखना हो कई बार देखिये!
    और काफी पहले एक फिल्म आई थी "आसमान से गिरा" जिसमें अन्य ग्रह से आया एक प्राणी यह कहता है कि तुम एक नाम की कैद में कैसे रह सकते हो, हमारे ग्रह पर तो सुबह का एक नाम होता है, दोपहर का दूसरा और शाम का तीसरा.. यही नहीं हर रोज के नाम भी इसी तरह होते हैं!!
    बहुत ही प्यारी श्रृंखला!!

    जवाब देंहटाएं
  7. परत-दर-परत, इतनी परतें हमने अपने वुजूद पर चढ़ा लिए हैं कि सरलता तो ग़ायब ही हो गई है, और जटिलता अपनी सारी कुटिलता के साथ विद्यमान है।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी

आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं । कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं । जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है । आइए हम हिंदी के इन विभिन्न रूपों को विधिवत समझ लें, ताकि हमारे मन-मस्तिष्क में स्पष्टता आ जाए । राष्ट्रभाषा से अभिप्राय: है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा । क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है ? यद्यपि हिंदी का व्यवहार संपूर्ण भारतवर्ष में होता है,लेकिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है । चूँकि भारतवर्ष सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई दृष्टि से विविधताओं का देश है । इस राष्ट्र में किसी एक भाषा का बहुमत से सर्वमान्य होना निश्चित नहीं है । इसलिए भारतीय संविधान में देश की चुनिंदा भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा है । शुरु में इनकी संख्या 16 थी , जो आज बढ़ कर 22 हो गई हैं । ये सब भाषाएँ भारत की अधिकृत भाषाएँ हैं, जिनमें भारत देश की सरकारों का काम होता है । भारतीय मुद्रा नोट पर 16 भाषाओं में नोट का मूल्य अंकित रहता है और भारत सरकार इन सभी भाषाओं के विकास के लिए संविधान अनुसा

अमीर खुसरो की चतुराई

एक बार गर्मियों के दिनों में अमीर खुसरो किसी गाँव की यात्रा पर निकले थे । रास्ते में उन्हें बहुत जोर की प्यास लगी । वे पानी की खोज में एक पनघट पर जा पहुँचे । वहां चार पनिहारिनें पानी भर रही थी । खुसरों ने उनसे पानी पिलाने का अनुरोध किया । उनमें से एक पनिहारिन खुसरो को पहचानती थी । उसने अपनी तीनों सहेलियों को बता दिया कि पहेलियाँ बनाने वाले यही अमीर खुसरों हैं । विदित है कि अमीर खुसरो अपनी पहेलियों,मुकरियों तथा दो-सखुनों के लिए जगत प्रसिद्ध हैं । फिर क्या था ? चारों पनिहारिनों में से एक ने कहा मुझे खीर पर कविता सुनाओ, तब पानी पिलाऊंगी । इसी तरह से दूसरी पनिहारिन ने चरखा, तीसरी ने ढोल और चौथी ने कुत्ते पर कविता सुनाने के लिए कहा । खुसरो बेचारे प्यास से व्याकुल थे । पर खुसरो की चतुराई देखिए कि उन्होंने एक ही छंद में उन सबकी इच्छानुसार कविता गढ़ कर सुना दी -               खीर पकाई जतन से, चरखा दिया जला । आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा ।।                                                  ला पानी पीला ।  यह सुन कर पनिहारिनों की खुशी का ठीकाना न रहा । उन्होंने खुश होकर खुसरो को न केवल पानी

शेख और आलम

कवि आलम रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि हुए । इनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण जाति में हुआ । उस समय देश में औरंगजेब का राज था । इनकी कवि प्रतिभा और चतुराई से औरंगजेब का लड़का बहुत प्रभावित था । उसके आग्रह पर ही आलम उनका राज कवि बना । एक बार उन्हें एक समस्या पहेली के रूप में दी गई और इसे पूरा करने के लिए कहा गया । दोहे की वह पंक्ति कुछ यूँ थी :- "कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन " बहुत सोच-विचार करने पर भी वे इसके समाधान में दूसरी पंक्ति न सोच सके । जिस कागज पर यह पंक्ति लिखी गई थी, वह कागज उन्होंने अपनी पगड़ी में रख लिया । वह कागज उनकी पगड़ी के साथ धुलने के लिए रंगरेजिन के पास चला गया । कहते हैं कि वह रंगरेजिन बहुत सुंदर और चतुर थी । उसका नाम शेख था । जब उसने पगड़ी को धोने के लिए खोला, तो उसके हाथ वह कागज लगा, जिस पर पहेली-रूपी में वह पंक्ति लिखी थी । उसने समस्या को ध्यान से पढ़ा और उसके नीचे लिख दिया :- "कटि को कंचन काटि विधि कुचन मध्य धर दीनी ।" जब पगड़ी धुल गई तो उस कागज को ज्यों का त्यों उसमें रख दिया । जब आलम ने पगड़ी लेकर अपना कागज देखा तो उसमें समस्या का उत्तर लिखा हुआ द