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एकाकी जीवन

कुछ व्यक्तियों के भाग्य में एकाकी जीवन लिखा रहता है ; ताकि वे समूह के लिए कुछ चिंतन, मनन कर सकें । -मनोज भारती 

टिप्पणियाँ

  1. पते की बात है. रंग सभी का अलग-अलग है. सभी रंग स्वीकार्य होने चाहिएँ.

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  2. देखा जाये तो सभी जीवन एकाकी ही होते हैं,
    कौन साथ जाता है ?
    कौन साथ होता है?
    हम खुद अपने नहीं होते?
    औरों की क्या कहें?
    खुद को भीड़ का हिस्सा मानकर जीना एक मनोवज्ञानिक सुरक्षा का उपाय भर है, जो जब तब भरभरा कर गिर जाता है.

    समुहों के बारे मे चिंतन उसी तरह फज़ूल बात है, जिस तरह समूह स्वमं, भीड़ का मनोविज्ञान समझना उसी तरह है जैसे बच्चे बादलों मे नयी नयी आकृतियां देखते हैं, अपनी अपनी सोच के अनुसार!

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  3. चैतन्य जी ! प्राय: आम लोग या कहें कि समूह के पास न तो सोच-विचार का समय होता है और न ही जीवन के अर्थ को समझने की प्यास । इतिहास में जो भी श्रेष्ठ चिंतन-मनन हुआ है, वह एकांत की छाया में ही पनपा है । क्योंकि एकांत ही है जो मनुष्य को उसके स्वयं के करीब लाने और जीवन की गहराइयों में उतरने का अवसर देता है । फिर बहुधा ऐसा भी होता है जो स्वयं को जानने की फिक्र करता है...वह समूह से असमपृक्त सा हो जाता है ...शायद यह उसकी नियती होती है...बुद्ध को भी ज्ञान प्राप्ति के लिए एकाकी जीवन का सहारा लेना पड़ा । फिर संबोधि को उपलब्ध होने पर बेशक उन्हें वापस समूह में लौठना पड़ा, ताकि एकांत की साधना से जो पाया गया था...उसकी खुश्बू बँट सके विश्व में ...समूह में । जो विचार नहीं कर सकता, वह विचार से मुक्ति की भी नहीं सोच सकता । विचार कर कर के जब आदमी टूट जाता है...तभी तो स्वयं की ओर की यात्रा शुरु होती है ।

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  4. सही कहा आपने चिंतन, मनन के लिए एकाकी होना जरुरी है

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  5. मनोज जी, आपका बात से बचपन में पढा हुआ का मलूम किसका एगो लाइन याद आ गया... ई लाइन आज भी गड़ा हुआ है हमरे मस्तिस्क में..
    यूँ तो मैं नित अकेले ही सफर करता हूँ
    ये बात और है कि बसों में बहुत भीड़ हुआ करती है.

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  6. ढूंढता हूँ क्यूँ अंधेरों में रूहे-ताबानी
    दर्द से मैं भी तो घबरा के भाग सकता हूँ

    पर मैं घर-बार को ठुकरा के जी नहीं सकता
    मैं भी गौतम हूँ, मगर और ही तरह का हूँ...

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  7. ढूंढता हूँ क्यूँ अंधेरों में रूहे-ताबानी
    दर्द से मैं भी तो घबरा के भाग सकता हूँ

    पर मैं घर-बार को ठुकरा के जी नहीं सकता
    मैं भी गौतम हूँ, मगर और ही तरह का हूँ...

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  8. ज़रा इस पर भी ग़ौर करें:

    रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो
    कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो

    मित्र मंडली का एक मंदिर बनाया चाहिए
    अमन चेतन विमल चिंतन मनन कोई न हो

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