आध्यात्मिक विषयों पर केंद्रित यह ब्लॉग सत्य,अस्तित्व और वैश्विक सत्ता को समर्पित एक प्रयास है : जीवन को इसके विस्तार में समझना और इसके आनंद को बांटना ही इसका उद्देश्य है।
एक सनातन गूंज...जो गूंज रही है अनवरत...उसी गूंज की अनुगूंज यहां प्रतिध्वनित हो रही है...
ख्याल आते रहे
जवाब देंहटाएंसोहबत में
ज़रुरत के
ज़िन्दगी गुज़रती रही
इशारों को कैसे
जुबां दे दें हम
मोहब्बत बच जाए
दुआ निकलती रही
रेत के बुत से
खड़े रहे सामने
पत्थर की इक नदी
गुज़रती रही
रूह थी वो मेरी
लहू-लुहान सी
बदन से मैं अपने
निकलती रही
बेवजह तुम
क्यों ठिठकने लगे हो
मैं अपने ही हाथों
फिसलती रही
आईना तो वो
सीधा-सादा था 'अदा
मैं उसमें बनती
संवरती रही
मैं आपकी यह
जवाब देंहटाएंरचना पढ़ गया था
लेकिन -
रूह थी वो मेरी
लहू-लुहान सी
बदन से मैं अपने
निकलती रही
इन भावों को
अभी समझ पा
रहा हूँ ।
आपकी पढने में छोटी , छोटी , लेकिन बड़ी ही गहरी , रचनाएँ पढ़ रही हूँ ..पहली बार आयी हूँ आपके ब्लॉग पे ...और विस्मित हूँ !
जवाब देंहटाएंविस्मित हैं
जवाब देंहटाएंधन्यवाद !!!