संदेश

आदतवश

बात तेरह साल पहले की है । मेरे पड़ौस में एक परिवार रहता था । उनके दो बेटे थे । माँ अक्सर अपने बेटों को बात - बात पर डाँटती रहती थी । डाँटते समय उनके मुख से हमेशा हरामजादा शब्द निकलता था । मैं जब भी इस शब्द को सुनता तो मुझे बहुत अजीब - सा लगता था । मैं सोचता कि इस शब्द का प्रयोग सचेतन हो रहा है या आदतवश ? पड़ौस से इस शब्द का प्रयोग रोज ही सुनने को मिल जाता था । एक दिन मैंने उनके छोटे बेटे से पूछ ही लिया कि क्या तुम्हें हरामजादे शब्द का मतलब मालूम है । जो आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था । उसने अनभिज्ञता व्यक्त की । मैंने उसे कहा , ठीक है ! इस बार आंटी जब आप को यह गाली दे तो उनसे पूछना कि हरामजादे का मतलब क्या होता है । छोटे बेटे ने वैसा ही किया । कुछ असर दिखाई पड़ा । पड़ौस से अब हरामजादे की आवाज़े बहुत कम सुनाई देने लगी थी । व्यवहार में हम कितने ही शब्दों का प्रयोग आदतवश करते हैं , बिना यह सोचे विचारे की कि जिन शब्द...

प्रेम

तुम्हारी सांसों में वही बसता है जो मेरी सांसों में अनंत विस्तार में टूटा यह जीवन प्रेम की आंखों से बंधा यह जीवन द्वैत में नहीं वह जीवन आधार अद्वैत में है वह आकार निराकार तुम मुझ से पृथक नहीं इस अनुभूति में है प्रेम

उस दिन जिंदगी हार गई

अभी तो मुश्किल से सत्रह बरस भी पूरे नहीं किए थे और जिंदगी को यूं खत्म कर लिया क्यों ... क्यों... क्यों ? बार-बार अब भी पूछता रहता हूँ बीस साल बीतने पर भी नहीं भूला हूँ उस ह्रदय विदारक घटना को जब तुमने उस सत्रह बरस की कोमल काया को समाप्त कर लिया शायद वो तुम्हारा निर्णय न रहा हो तुम्हें उकसाया गया होगा तुम्हें फुसलाया गया होगा तुम्हें जीने के मोह से भटकाया गया होगा समझ ही कहां रही होगी जीने का मतलब ही कब जाना था या वो दिन ही ऐसे रहे होंगे जब मां-बाप की बेटे की चाहत ने तुम तीनों बहनों को हिला कर रख दिया होगा अब तक जिन्हें नाज़ों से पाला गया था जिनके लिए तुम सब बेटों के बराबर थी उनके मनों में कहीं गहरे में बेटे की चाहत दबी थी और प्रकृति ने भी अज़ब लीला रची थी सोलह बरस बाद तुम्हारी मां की गोद फिर से हरी हुई थी और कोख़ में बेटा दिया ... तुम तीनों ने बहुत समझाया होगा अपने मां-बाप को कि नहीं चाहिए तुम्हें भाई कि तुम सब हो उनकी पुत्रवत बेटियाँ फिर पुत्र क्यों ? सबसे पहले विरोध के स्वर बड़ी बेटी में उपजे उसने मां को समझाया, नहीं चाहिए उन्हे भाई मां-बाप और बेटियों में इस पर लम्बी बहसें हुई होंगी प...

दिवाली के दिन

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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ यह दीपावली आप सब के जीवन में लाए खुशियाँ अपार धन - सुख समृद्धि बढ़े अपार रहे जीवन आपका जगमगाता हर दम हर पल ................................................................................................. अक्सर दिवाली या तो मंगलवार को आती है या शुक्रवार को । इसी संदर्भ में हमारे लोक-जीवन में मान्यता रही है कि :- मंगल को आए दिवाली तो हँसे किसान रोये व्यापारी  और शुक्र को आए दिवाली तो हँसे व्यापारी और रोये काश्तकारी लेकिन इस बार तो दिवाली न मंगलवार की है, न शुक्रवार की । क्या इस रहस्य को आप खोलेंगे कि आज दिवाली शनिवार को क्यों हैं ?

देहरी पर

जीवन यह सारा देहरी पर ही बीत गया बाहर की बहुत पूजा प्रार्थना की अंदर के देवता से पहचान न हुई ऐसी प्रणति हमारी बाहर देवता को पुष्प चढ़ाए अंदर के देवता सम्मुख न झुके मैं के मद में जीवन देहरी पर ही ठहरा रहा वहां भीतर देवता स्थिर सनातन बिन नैवद्य के सदा पूरा रहा मैं इधर देहरी पर आधा अधूरा रिक्त होता रहा, जीवन कणों से

सत्य

सत्य न नया है न पुराना न अपना है न पराया न दिखावा है न बहाना न लुभावना है न डरावना न प्रचारक है न भ्रामक वह तो अनुभव की अग्नि में जल कर तप्त हुआ निखरा हुआ कुंदन है जो बहुत से सत्यों में अकेला अलग सा पहचाना गया

अश्रु

वह ह्रदय की मृदु भूमि में दफ़न करती रही कोमल बीज भावनाओं को और मृदु हिय भूमि मरु बनती रही एक रोज प्रेम की वर्षा हुई ह्रदय की मरु भूमि फिर से मृदु हुई समझ की हवाओं से विश्वास की उष्मा से दमित भाव अंकुरित हो उठे और अश्रु बन आँख से झरने लगे आंखे जो पत्थरा गई थी दमन से, प्रताड़ना से और द्वंद्व से धुल गई एक ही फुहार में और देख पा रही हैं जीवन को आज नए ढ़ंग से ...