सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्षण-क्षण जीना

रोज़ रात
मैं
मर जाता हूँ
आज के
अच्छे-बुरे
विशेषणों से
ताकि
रोज़ सबेरे
मैं
जिंदा रहूँ
आज के
क्षण-क्षण में

टिप्पणियाँ

  1. भारती जी,
    आपकी यह कविता, उसमें व्यक्त आपके भाव, सोंच को मैं ठीक से पकड़ पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहा हूँ. अगर कुछ सहायता कर सकें तो ज्ञान में वृद्धि होगी.

    हार्दिक आभार.
    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर.
    www.cmgupta.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  2. bahut acche bhav .aaj kee parichai me kal jeena mayne nahee rakhata .ise pal-pal badalatee duniya me .

    जवाब देंहटाएं
  3. गहरा भाव! कम शब्दों में सुंदर अभिवयक्ति !

    जवाब देंहटाएं
  4. मुमुक्षु जी !

    वस्तुत: जब हम रात को सोने जाते हैं तो दिन भर की घटनाओं का अच्छे-बुरे में विश्लेषण करना शुरु कर देते हैं, कुछ घटनाओं को अच्छा मान कर हम उनमें खो जाते हैं, तो कुछ बुरी घटनाओं के लिए चिंतित होते हैं । लेकिन घटनाओं पर लगाए गए अच्छे-बुरे के लेबल हमारे मन में गहरे बैठ जाते हैं, जो कभी उतारे नहीं उतरते और हमारे अचेतन मन में हलचल पैदा करते रहते हैं । लेकिन यदि हम इन घटनाओं को अच्छे-बुरे के विश्लेषण में न तोड़ें और शांत भाव से उन्हें बस विदा कर दें, उनके प्रति हम मर जाएं तो अगली सुबह हम ताजा उठते हैं और हमारे सामने एक नया दिन होता है जिसका हर पल नया है, यदि हम इसे बीते कल की यादों से धूमिल न करें तो हम आनंद मना सकते हैं, प्रत्येक क्षण का ।

    बस यही भाव व्यक्त करना चाह रहा था मैं इन पंक्तियों में ।

    सादर,

    मनोज भारती

    जवाब देंहटाएं
  5. ye kis ke vichaar hain bhaarti ji..?
    aap ke to nahi hain

    जवाब देंहटाएं
  6. प्रिय अनाम जी !!

    सप्रेम !

    बहुत बार हम दूसरों के अनुभवों से भी सीखते हैं, निश्चित ही क्षण-क्षण जीने का विचार मेरा नहीं है, लेकिन इस विचार से प्रेरित यह भाव अभिव्यक्ति मेरी ही है ।

    कोई भी जो आध्यात्म की यात्रा पर चलता है,
    वह स्वयं का अध्ययन करना शुरु करता है और
    इस अध्ययन में वह अपने शरीर, विचार,भाव की गहराइयों में प्रवेश करता है इस यात्रा में जो भी उसकी अनुभूति से मेल खाता है, वह उसका ही मौलिक अनुभव होता है ।

    हमारा जीवन जो चेतन मन से होते हुए अचेतन, अति-चेतन मन के अंधेरे-उजालों से संचालित होता है; की गहराइयों में प्रवेश किए बिना मानवीय समस्याओं का हल नहीं ढ़ूँढ़ा जा सकता । हम स्वयं अपने अचेतन मन के निर्माता हैं, जो रोज-रोज की हमारी अच्छी-बुरी धारणाओं के आधार पर बड़ा होता जाता है । अगर हम कोई धारणा न बनाएँ तो हम प्रति पल जी सकते हैं और किसी के प्रति हमारा कोई राग या द्वेष भी नहीं होगा; क्योंकि वस्तुत: अच्छा या बुरा हमारे द्वारा दिए गए लेबल हैं इसके अतिरिक्त कुछ नहीं ।

    और इस प्रश्न को पूछने के लिए बेनामी का सहारा क्यों ले रहे हो ? अपनी पहचान बता कर सीधा संवाद करते तो आपके प्रश्न की सार्थकता अधिक होती ।

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये रचना प्रशंग्सनीय है!

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी

आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं । कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं । जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है । आइए हम हिंदी के इन विभिन्न रूपों को विधिवत समझ लें, ताकि हमारे मन-मस्तिष्क में स्पष्टता आ जाए । राष्ट्रभाषा से अभिप्राय: है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा । क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है ? यद्यपि हिंदी का व्यवहार संपूर्ण भारतवर्ष में होता है,लेकिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है । चूँकि भारतवर्ष सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई दृष्टि से विविधताओं का देश है । इस राष्ट्र में किसी एक भाषा का बहुमत से सर्वमान्य होना निश्चित नहीं है । इसलिए भारतीय संविधान में देश की चुनिंदा भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा है । शुरु में इनकी संख्या 16 थी , जो आज बढ़ कर 22 हो गई हैं । ये सब भाषाएँ भारत की अधिकृत भाषाएँ हैं, जिनमें भारत देश की सरकारों का काम होता है । भारतीय मुद्रा नोट पर 16 भाषाओं में नोट का मूल्य अंकित रहता है और भारत सरकार इन सभी भाषाओं के विकास के लिए संविधान अनुसा

अमीर खुसरो की चतुराई

एक बार गर्मियों के दिनों में अमीर खुसरो किसी गाँव की यात्रा पर निकले थे । रास्ते में उन्हें बहुत जोर की प्यास लगी । वे पानी की खोज में एक पनघट पर जा पहुँचे । वहां चार पनिहारिनें पानी भर रही थी । खुसरों ने उनसे पानी पिलाने का अनुरोध किया । उनमें से एक पनिहारिन खुसरो को पहचानती थी । उसने अपनी तीनों सहेलियों को बता दिया कि पहेलियाँ बनाने वाले यही अमीर खुसरों हैं । विदित है कि अमीर खुसरो अपनी पहेलियों,मुकरियों तथा दो-सखुनों के लिए जगत प्रसिद्ध हैं । फिर क्या था ? चारों पनिहारिनों में से एक ने कहा मुझे खीर पर कविता सुनाओ, तब पानी पिलाऊंगी । इसी तरह से दूसरी पनिहारिन ने चरखा, तीसरी ने ढोल और चौथी ने कुत्ते पर कविता सुनाने के लिए कहा । खुसरो बेचारे प्यास से व्याकुल थे । पर खुसरो की चतुराई देखिए कि उन्होंने एक ही छंद में उन सबकी इच्छानुसार कविता गढ़ कर सुना दी -               खीर पकाई जतन से, चरखा दिया जला । आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा ।।                                                  ला पानी पीला ।  यह सुन कर पनिहारिनों की खुशी का ठीकाना न रहा । उन्होंने खुश होकर खुसरो को न केवल पानी

शेख और आलम

कवि आलम रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि हुए । इनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण जाति में हुआ । उस समय देश में औरंगजेब का राज था । इनकी कवि प्रतिभा और चतुराई से औरंगजेब का लड़का बहुत प्रभावित था । उसके आग्रह पर ही आलम उनका राज कवि बना । एक बार उन्हें एक समस्या पहेली के रूप में दी गई और इसे पूरा करने के लिए कहा गया । दोहे की वह पंक्ति कुछ यूँ थी :- "कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन " बहुत सोच-विचार करने पर भी वे इसके समाधान में दूसरी पंक्ति न सोच सके । जिस कागज पर यह पंक्ति लिखी गई थी, वह कागज उन्होंने अपनी पगड़ी में रख लिया । वह कागज उनकी पगड़ी के साथ धुलने के लिए रंगरेजिन के पास चला गया । कहते हैं कि वह रंगरेजिन बहुत सुंदर और चतुर थी । उसका नाम शेख था । जब उसने पगड़ी को धोने के लिए खोला, तो उसके हाथ वह कागज लगा, जिस पर पहेली-रूपी में वह पंक्ति लिखी थी । उसने समस्या को ध्यान से पढ़ा और उसके नीचे लिख दिया :- "कटि को कंचन काटि विधि कुचन मध्य धर दीनी ।" जब पगड़ी धुल गई तो उस कागज को ज्यों का त्यों उसमें रख दिया । जब आलम ने पगड़ी लेकर अपना कागज देखा तो उसमें समस्या का उत्तर लिखा हुआ द