सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अंतस का समाधान

कल की पोस्ट में मैंने समस्या और समाधान के बारे में बात करते हुए लिखा था कि मनुज की कोई भी समस्या स्वयं उसके जीवन से बड़ी नहीं हो सकती इस संदर्भ में चंद्र मोहन गुप्त जी ने पूछा है कि " पर हमारी समस्या यह है कि यदि इन्सान, जैसा कि प्रायः होता है, जान-बुझ कर पैसा कमाने के लालच में समस्याएं खड़ी करता है. इसका क्या समाधान है ? क्या पैसा देकर ही काम कराया जाये ? यदि शिकायत करते हैं तो उनका मिला-जुला ग्रुप भविष्य में तरह-तरह से परेशान करता है, और परिणाम स्वरुप केवल ज्यादा आर्थिक हानि उठानी पड़ती है, बल्कि कानूनी पेचीदगियों में भी उलझा दिए जाते हैं.......मतलब कि " बैल मुझे मार" जैसी हालत कर बैठते है............. इस पर थोडा प्रकाश डालें... "

किसी समस्या को देखने के दो दृष्टिकोण हैं : एक दृष्टिकोण व्यवहारिक है, जिसे सांसारिक दृष्टिकोण कहा गया है और दूसरा उपाय अंदर का है, जिसे आध्यात्मिक उपाय कहा गया है सांसारिक दृष्टिकोण या व्यवहारिक दृष्टिकोण में समस्या के पहलूओं को सांसारिक ढ़ंग से देखा जाता है संसार के प्रचलित कायदे-कानून और दोहरे मापदंड इसमें दिखाई पड़ते हैं इस दृष्टि का विचार रखने वाले व्यक्ति का स्वयं का कोई विचार नहीं होता ऐसे व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति के साथ बदल जाते हैं आप के सम्मुख आप के जैसी बात, तो किसी अन्य के सम्मुख उस जैसी बात ऐसे लोगों का दायरा तो बहुत बड़ा होता है, पर वस्तुत: इनका व्यवहार इनके अंतस के अनुसार होकर अन्य लोगों की इच्छा तुष्टि का होता है फिर चाहे उन्हें अपनी बात को कितनी ही बार और कितने ही लोगों के सम्मुख बदल-बदलकर रखना पड़े ये अपने स्वार्थ और दूसरे की तुष्टि के लिए कभी स्वयं के अंतस का मंतव्य नहीं रखेंगे ऐसे लोगों को ही हम व्यवहारिक कहते हैं अब आपने जिस समस्या का संदर्भ दिया है, उस समस्या को पैदा करने वाले ऐसे लोग ही हैं समय के हर चक्र में, हर युग में सांसारिकता ऐसे ही चलती आई है लेकिन आध्यात्म में प्यास रखनेवाले व्यक्ति इस व्यवहारिकता से ऊपर उठते हैं और अपने मन और उसकी चालाकियों का अध्ययन शुरु करते हैं । उसके प्रति सजग होते हैं धीरे-धीरे उन्हें मन की चालबाजियाँ समझ में आने लगती हैं मन ही दौड़ाता है फिर मन से पार भावों पर नज़र जाती है, कि भाव कहां से और कैसे पैदा हो रहें हैं ? भावों के पार भी अंदर एक और सत्ता का अनुभव होता है जो सिर्फ चीजों को घटते हुए निरपेक्ष भाव से देखती है और कोई धारणा वह नहीं बनाती इसे ही द्रष्टा या अंतस- चेतना अथवा आत्मा कहा गया है

अब समस्या यह है कि बाहर की जिन समस्याओं की आपने बात की, उनका संबंध केवल आपसे नहीं है, बल्कि उसमें बाहर के बहुत से लोग शामिल हैं और आप बाहर के इन लोगों को बदल नहीं सकते लेकिन आपकी अपेक्षा होती है कि दूसरे लोग आपकी अपेक्षानुरूप व्यवहार करें लेकिन यह संभव नहीं दूसरों से की गई अपेक्षा जब पूरी नहीं होती तो दुख होता है, क्षोभ होता है वस्तुत:
अपेक्षा दुख के अतिरिक्त कुछ नहीं देती

लेकिन हम स्वयं को बदल सकते हैं
यात्रा को हम बाहर से अंदर की ओर मोड़ सकते हैं हम संसार के हर अनुभव से सीखें और स्वयं को इतना संवेदनशील बना लें कि बाहर की हर घटना के प्रति सजग रहें, तो धीरे-धीरे हम अंदर की ओर गमन करना शुरु करेंगे और चीजों को देखने का एक नया दृष्टिकोण विकसित होगा

लेकिन आपकी समस्या अभी भी ज्यों की त्यों है ? इसके लिए आप अभिनेता हो जाइए संसार को इस तरह से जिएं जैसे कि आप इसमें एक अभिनेता से अधिक कुछ नहीं हैं मात्र एक अभिनेता हैं जो संसार रूपी मंच पर अपनी भूमिका कथा के अनुसार निभा रहा है लेकिन अंदर का होश निरंतर बना रहे धीरे-धीरे आप कर्ता भाव से मुक्त हो जाएंगे और संसार की समस्याएँ, जो सदा से हैं और सदा रहेंगी, आपको दुखी और परेशान नहीं करेंगी , क्योंकि आप समस्या में शामिल नहीं होते
समस्या अलग होती है और आप अलग होते हैं । आपको समस्या का परम समाधान मिल चुका होता है ।

टिप्पणियाँ

  1. लेकिन अंदर का होश निरंतर बना रहे । धीरे-धीरे आप कर्ता भाव से मुक्त हो जाएंगे और संसार की समस्याएँ, जो सदा से हैं और सदा रहेंगी, आपको दुखी और परेशान नहीं करेंगी , क्योंकि आप समस्या में शामिल नहीं होते । समस्या अलग होती है और आप अलग होते हैं । आपको समस्या का परम समाधान मिल चुका होता है

    भारती जी आपने समाधान देने का काफी प्रयास किया, पर यह सब कोरी बातें ही लगाती है, हकीकत की ज़मीन पर ये दुष्ट लोग इतना गिर जाते हैं कि समझदार का इज्ज़त से जीना दूभर हो जाता है, समस्या में शामिल न होने के बावजूद केंद्र बिंदु बन कर रह जाते हैं, अंततः समस्या का समाधान या तो उनसे हाथ मिला लेने में या खुदकशी में ही दिखता है, वर्ना जीवन पर्यत्न परेशानिया ही परेशानियाँ को झेलना पड़ता है, अपमानित सा होकर जीना पड़ता है......

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  3. दूसरों की समस्‍याओं का समाधान करने में मजा लेने वाले मन का चरि‍त्र भी होशपूर्वक देखना चाहि‍ये।

    जवाब देंहटाएं
  4. आपने सही मुद्दे पर बहुत ही सुंदर रूप से प्रस्तुत किया है! हर इंसान के जीवन में कठिनाइयाँ आती है पर उनका समाधान तो निकालना ही चाहिए वरना ज़िन्दगी कैसे गुज़रेगी!

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी

आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं । कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं । जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है । आइए हम हिंदी के इन विभिन्न रूपों को विधिवत समझ लें, ताकि हमारे मन-मस्तिष्क में स्पष्टता आ जाए । राष्ट्रभाषा से अभिप्राय: है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा । क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है ? यद्यपि हिंदी का व्यवहार संपूर्ण भारतवर्ष में होता है,लेकिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है । चूँकि भारतवर्ष सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई दृष्टि से विविधताओं का देश है । इस राष्ट्र में किसी एक भाषा का बहुमत से सर्वमान्य होना निश्चित नहीं है । इसलिए भारतीय संविधान में देश की चुनिंदा भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा है । शुरु में इनकी संख्या 16 थी , जो आज बढ़ कर 22 हो गई हैं । ये सब भाषाएँ भारत की अधिकृत भाषाएँ हैं, जिनमें भारत देश की सरकारों का काम होता है । भारतीय मुद्रा नोट पर 16 भाषाओं में नोट का मूल्य अंकित रहता है और भारत सरकार इन सभी भाषाओं के विकास के लिए संविधान अनुसा

अमीर खुसरो की चतुराई

एक बार गर्मियों के दिनों में अमीर खुसरो किसी गाँव की यात्रा पर निकले थे । रास्ते में उन्हें बहुत जोर की प्यास लगी । वे पानी की खोज में एक पनघट पर जा पहुँचे । वहां चार पनिहारिनें पानी भर रही थी । खुसरों ने उनसे पानी पिलाने का अनुरोध किया । उनमें से एक पनिहारिन खुसरो को पहचानती थी । उसने अपनी तीनों सहेलियों को बता दिया कि पहेलियाँ बनाने वाले यही अमीर खुसरों हैं । विदित है कि अमीर खुसरो अपनी पहेलियों,मुकरियों तथा दो-सखुनों के लिए जगत प्रसिद्ध हैं । फिर क्या था ? चारों पनिहारिनों में से एक ने कहा मुझे खीर पर कविता सुनाओ, तब पानी पिलाऊंगी । इसी तरह से दूसरी पनिहारिन ने चरखा, तीसरी ने ढोल और चौथी ने कुत्ते पर कविता सुनाने के लिए कहा । खुसरो बेचारे प्यास से व्याकुल थे । पर खुसरो की चतुराई देखिए कि उन्होंने एक ही छंद में उन सबकी इच्छानुसार कविता गढ़ कर सुना दी -               खीर पकाई जतन से, चरखा दिया जला । आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा ।।                                                  ला पानी पीला ।  यह सुन कर पनिहारिनों की खुशी का ठीकाना न रहा । उन्होंने खुश होकर खुसरो को न केवल पानी

शेख और आलम

कवि आलम रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि हुए । इनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण जाति में हुआ । उस समय देश में औरंगजेब का राज था । इनकी कवि प्रतिभा और चतुराई से औरंगजेब का लड़का बहुत प्रभावित था । उसके आग्रह पर ही आलम उनका राज कवि बना । एक बार उन्हें एक समस्या पहेली के रूप में दी गई और इसे पूरा करने के लिए कहा गया । दोहे की वह पंक्ति कुछ यूँ थी :- "कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन " बहुत सोच-विचार करने पर भी वे इसके समाधान में दूसरी पंक्ति न सोच सके । जिस कागज पर यह पंक्ति लिखी गई थी, वह कागज उन्होंने अपनी पगड़ी में रख लिया । वह कागज उनकी पगड़ी के साथ धुलने के लिए रंगरेजिन के पास चला गया । कहते हैं कि वह रंगरेजिन बहुत सुंदर और चतुर थी । उसका नाम शेख था । जब उसने पगड़ी को धोने के लिए खोला, तो उसके हाथ वह कागज लगा, जिस पर पहेली-रूपी में वह पंक्ति लिखी थी । उसने समस्या को ध्यान से पढ़ा और उसके नीचे लिख दिया :- "कटि को कंचन काटि विधि कुचन मध्य धर दीनी ।" जब पगड़ी धुल गई तो उस कागज को ज्यों का त्यों उसमें रख दिया । जब आलम ने पगड़ी लेकर अपना कागज देखा तो उसमें समस्या का उत्तर लिखा हुआ द