सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

सामवेद

साम शब्द का अर्थ है गान, अर्थात सामवेद में संकलित मंत्र देवताओं की स्तुति के समय गाये जाने वाले मंत्र हैं।अन्य शब्दों में कहें तो गेय मंत्रों अथवा ऋचाओं का ही नाम साम है तथा इनका संकलन सामवेद संहिता कहलाता है।इस वेद का स्थान ऋग्वेद और यजुर्वेद के पश्चात निर्धारित है।सामवेद में संकलित ऋचाएँ अधिकतर ऋग्वेद की ऋचाएँ ही हैं।सामवेद में कुल 1549 ऋचाएँ हैं,इनमें 75 ऋचाएँ स्वतंत्र हैं,बाकी सारी ऋचाएँ ऋग्वेद की हैं।सामवेद का ऋत्विक उद्-गाता कहलाता है।संगीत-शास्त्र का उद्-गम यहीं से होता है।

सामवेद की शाखाओं की कुल संख्या 1000 मानी गई है, जिनमें 13 महत्त्वपूर्ण हैं।हालांकि वर्तमान में तीन शाखाएँ ही उपलब्ध हैं।ये शाखाएँ हैं - 1.कौथुमीय2.राणायनीय3.जैमिनीय।इन शाखाओं के आधार पर सामवेद की कौथुमीय संहिता,राणायनीय संहिता तथा जैमिनीय संहिता नाम से तीन संहिताएँ उपलब्ध हैं। इन संहिताओं के अलग-अलग ब्राह्मण,आरण्यक तथा उपनिषद भी मिलते हैं।

सामवेद संहिता के दो भाग हैं- 1.पूर्वार्चिक तथा 2.उत्तरार्चिक। पूर्वार्चिक भाग को छंद,छंदसी या छंदशिका भी कहते हैं।पूर्वार्चिक भाग चार उप विभागोँ में विभक्त है-(क)आग्नेय पर्व (ख)ऐन्द्र(ग)पवमान(घ)आरण्यक। उत्तरार्चिक भाग में विषयानुसार कई उपखंड हैं,जिनमें इन सात अनुष्ठानों का निर्देश किया गया है- 1.दशराज2.सम्वत्सर3.ऐकाह4.अहीन 5.सूत्र 6.प्रायश्चित 7.क्षुद्र। साम के गायनों में स्वरों का प्रयोग किया जाता है जो क्रुष्ट स्वरित और उदात्त से विकसित हुए हैं।साम विकारों की संख्या छ: तथा साम गान पाँच बताए गए हैं ।

सामवेद के 3 ब्राह्मण उपलब्ध हैं : 1.पंचविंश 2.षडविंश 3.जैमिनीय ।
सामवेद के 3 आरण्यक उपलब्ध हैं : 1.आरण्यक संहिता 2.आरण्यक गान 3.जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण
सामवेद के 2 उपनिषद् उपलब्ध हैं :1. छान्दोग्य 2.केन ।