शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

अहंकार:एक रहस्यवादी कहानी


एक नदी है नाम है उसका मोत्जू। वैसे तो वह भी अन्य नदियों की तरह ही है। परंतु उसमें कुछ खास है तो वह है उसका शीतल जल और उसके किनारों पर सुंदर हरियाली। कहतें हैं यह दिव्य नदी है जो रूप बदल सकने में सक्षम है और कभी भी अपना रूप आकार बदल कर आस-पास के जीवन को प्रभावित कर सकती है।

इसी नदी के एक तट पर रहता है संतसू किसान। यह किसान भी अपने आप में सबसे अलग है क्योंकि  इसकी आवश्यकताएं सीमित हैं और चेहरे पर एक खुशी हर पल छायी रहती है। वह अपनी जरूरत  का सामान मोत्जू नदी के तट से लगते अपने एकमात्र खेत से पूरी कर लेता है। भूख लगती तो खेत के अन्न-फल खा कर तृप्त हो जाता है। प्यास लगती तो मोत्जू का शीतल जल पी कर प्यास बुझा लेता है। इस प्रकार मोत्जू नदी और संतसू का परस्पर गहन संबंध है।

एक बार मोत्जू नदी ने संतसू किसान की परीक्षा लेनी चाही कि देखूं संतसू मुझे कितना प्रेम करता है। गर्मियों के दिन हैं। संतसू अपने खेत में काम कर रहा है। प्यास लगी तो वह मोत्जू के तट पर आया और शीतल जल पीने लगा। तभी मोत्जू नदी ने अपना दिव्य रूप धारण किया और संतसू से पूछा, यदि मैं न होती तो क्या होता?  संतसू ने अपने स्वभावानुसार सहज ही कहा,"यदि तुम न होती तो कुछ न होता। हाँ,शायद मेरा यह खेत यहां न होकर कहीं ओर किसी दूसरी नदी के किनारे होता या फिर मुझे कूआं खोदना पड़ता।" 

यह जवाब देकर संतसू खेत में आ गया है। कुछ समय बाद ही संतसू को पुन: प्यास लगी। वह पानी पीने के लिए मोत्जू नदी के तट पर आया।

किंतु आश्चर्य! नहीं आश्चर्य किस बात का,मोत्जू तो दिव्य नदी है और दिव्य में आश्चर्य कैसा? संतसू ने देखा कि अब मोत्जू नदी के स्थान पर एक सड़ांधयुक्त तालाब है। जिसमें तरह-तरह के सूक्ष्म-लघु-बृहतकाय जीव-जीवाणु हैं। विभिन्न प्रकार के शैवाल हैं। जो सभी दुर्गंध छोड़ रहें हैं। तालाब बनी मोत्जू नदी का जल पूरी तरह दूषित है। जो पीने योग्य नहीं रहा। 

संतसू ने तालाब बनी दिव्य मोत्जू नदी से कहा,"तू बड़ी अहंकारी है। संतसू ने यह कहा और शांत गंभीर मुद्रा में उसी सड़ांधयुक्त दूषित वातावरण में बैठ गया और बस बैठा रहा। समय अबाध गति से चलता रहा और संतसू वहीं बैठा रहा। 

संतसू की फसलें मुर्झाने लगी,मोत्जू के तटों की हरियाली उजड़ने लगी। धीरे-धीरे वहां विरान सन्नाटा छा गया। पशु-पक्षी अन्यत्र चले गए। किंतु संतसू वहीं बैठा है--शांत,गंभीर एवं साक्षीत्व में। 

संतसू अब काफी कमजोर हो चुका है। भूख और प्यास से उसके हृष्ट-पुष्ट शरीर की जगह अब मात्र एक हड्डियों का ढांचा रह गया है। वह लगभग मरने के करीब पहुंच गया है।

तालाब बनी दिव्य मोत्जू से संतसू की यह दशा देखी न गई और वह अपने वर्तमान रूप को छोड़ कर पुन: अपने पूर्व रूप में आ गई। 

संतसू ने यह सब देखा। चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आय़ी किंतु क्षण में यह विदा हो गई। संतसू ने अपने में एक दिव्य बल अनुभव किया। वह उठा और फिर एक क्षण मोत्जू की ओर देखा तथा तत्क्षण वह घनी आबादी की ओर भाग पड़ा। यह सब बड़ी तीव्रता से हुआ और संभवत: इसी उन्मादवश वह पानी भी न पी सका। वह अपनी पूरी ताकत के साथ भाग रहा है और चिल्ला रहा है-"मैंने मोत्जू का अहंकार गिरा दिया...मैंने मोत्जू का अहंकार गिरा दिया।"आबादी के निकट आ कर संतसू गिर पड़ा है। चारों ओर भीड़ इकट्ठी हो गयी है और सभी देख रहें हैं कि संतसू के प्राण-पखेरू उड़ गए हैं। 

मोत्जू को संतसू के देहांत का पता चला और संतसू की स्थिरता पर आश्चर्य हुआ और कहते हैं उस दिन के बाद से मोत्जू ने फिर कभी किसी की परीक्षा न ली। 

लेखक यहां कहानी समाप्त करता है। किंतु फिर भी उसके मनस पटल पर कुछ प्रश्न विचर रहें हैं--
"क्या मोत्जू नदी वास्तव में अहंकारी है?"
"संतसू ने अंत में अपनी प्यास क्यों नहीं बुझायी?" 
"संतसू आबादी की ओर यह कहता हुआ क्यों दौड़ा कि मैंने नदी का अहंकार तोड़ दिया है? 

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

उच्च आत्मा की ओर:ओशो का आह्वाहन

हिंदुस्तान में दो विपरीत ढंग के प्रयोग पचास सालों से चले। (वर्ष 1967). एक प्रयोग गांधी ने किया। एक प्रयोग श्री अरविंद ने। गांधी ने एक-एक मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाने का प्रयोग किया। उसमें गांधी सफल होते हुए दिखाई पड़े,लेकिन बिलकुल असफल हो गए। जिन लोगों को गांधी ने सोचा था कि इनका चरित्र मैंने उठा लिया,वे बिलकुल मिट्टी के पुतले साबित हुए। जरा पानी गिरा और सब रंग-रौगन बह गया। बीस साल में रंग-रौगन बह गया। वह हम सब देख रहे हैं। कहीं कोई रंग-रौगन नहीं है। वह जो गांधी ने पोतपात कर तैयार किया था,वह वर्षा में बह गया। जब तक पद की वर्षा नहीं हुई थी तब तक उनकी शकलें बहुत शानदार मालूम पड़ती थी और उनके खादी के कपड़े बहुत धुले हुए दिखाई पड़ते थे और उनकी टोपियां ऐसी लगती थी कि मुल्क को ऊपर उठा लेंगी। लेकिन आज वे ही टोपियां मुल्क में भ्रष्टाचार की प्रतीक बन गई हैं। गांधी ने एक प्रयोग किया था,जिसमें मालूम हुआ कि वे सफल हो रहे हैं,लेकिन बिलकुल असफल हो गए। गांधी जैसा प्रयोग बहुत बार किया गया और हर बार असफल हो गया। 

श्री अरविंद एक प्रयोग करते थे जिसमें वे सफल होते हुए मालूम पड़े,लेकिन उनकी दिशा बिलकुल ठीक थी। वे यह प्रयोग कर रहे थे कि क्या यह संभव है कि थोड़ी-सी आत्माएं इतने ऊपर उठ जाएं कि उनकी मौजूदगी,दूसरी आत्माओं को ऊपर उठाने लगे और पुकारने लगे और दूसरी आत्माएं ऊपर उठने लगें। क्या यह संभव है कि एक मनुष्य की आत्मा ऊपर उठे और उसके साथ अन्य आत्माओं का स्तर ऊपर उठ जाए। यह न केवल संभव है,बल्कि केवल यही संभव है। दूसरी आज कोई बात सफल नहीं हो सकती। आज तो आदमी इतने नीचे गिर चुका है कि अगर हमने यह फिक्र की कि हम एक-एक आदमी को बदलेंगे तो शायद यह बदलाहट कभी नहीं होगी। बल्कि जो आदमी उनको बदलने जाएगा,उनके सत्संग में उसके खुद के बदल जाने की संभावना ज्यादा है। उसके बदले जाने की संभावना है कि वह भी उनके साथ भ्रष्ट हो जाएगा। आप देखते हैं कि जितने जनता के सेवक,जनता की सेवा करने जाते हैं,थोड़े दिनों में पता चलता है कि वे जनता की जेब काटने वाले सिद्ध होते हैं। वे गए थे सेवा करने,वे गए थे लोगों को सुधारने,थोड़े दिन में पता चलता है कि लोग उनको सुधारने का विचार करते हैं। 

मनुष्य जाति की चेतना का इतिहास यह कहता है कि दुनिया की चेतना किन्हीं कालों में एकदम ऊपर उठ गई थी,शायद आपको इसका अंदाज न हो। 2500 वर्ष पहले,हिंदुस्तान में बुद्ध पैदा हुए, प्रबुद्ध कात्यायन हुआ,मावली गोसाल हुआ,संजय विलाटीपुत्र हुआ। यूनान में सुकरात हुआ,प्लेटो हुआ,अरस्तू हुआ,प्लटनस हुआ। चीन में लाओत्से,कंफ्यूशस हुआ,च्वांगतसे हुआ। 2500 साल पहले सारी दुनिया में कुल दस-पंद्रह लोग इतनी कीमत के हुए कि उन एक सौ वर्षों में दुनिया की चेतना एकदम आकाश छूने लगी। सारी दुनिया का स्वर्ण युग आ गया,ऐसा मालूम हुआ। इतनी प्रखर आत्मा मनुष्य की कभी प्रकट नहीं हुई थी। महावीर के साथ पचास हजार लोग गांव-गांव घूमने लगे। बुद्ध के साथ हजारों भिक्षु खड़े हो गए और उनकी रोशनी और ज्योति गांव-गांव को जागाने लगी। जिस गांव में बुद्ध अपने दस हजार भिक्षुओं को लेकर पहुंच जाते,तीन दिन के भीतर उस गांव की हवा के अणु बदल जाते। जिस गांव में वे दस हजार भिक्षु बैठ जाते,जिस गांव में वे दस हजार भिक्षु प्रार्थना करने लगते उस गांव से जैसे अंधकार मिट जाता,जैसे उस गांव में रोशनी छा जाती,जैसे उस गांव के हृदय में कुछ फूल खिलने लगते,जो कभी नहीं खिले थे। कुछ थोड़े से लोग उठे ऊपर और उनके साथ ही नीचे के लोगों की आंखें ऊपर उठीं। नीचे के लोगों की आंखें तभी ऊपर उठती हैं जब ऊपर देखने जैसा कुछ हो। लेकिन ऊपर देखने जैसा कुछ भी नहीं है,नीचे देखने जैसा बहुत कुछ है। जो आदमी जितना नीचे उतर जाता है,उतनी बड़ी तिजोरी बना लेता है। जो आदमी जितना नीचे उतर जाता है वह उतने कीमती जवाहर खरीद लाता है। नीचे देखने जैसा बहुत कुछ है। दिल्ली बिलकुल गड्ढ़े में बस गई है। बिलकुल नीचे। वहां नीचे देखो,पाताल में दिल्ली है। तो जिसको दिल्ली पहुंचना हो उसको पाताल में उतरना चाहिए। नीचे-नीचे उतरते जाना चाहिए। ऊपर देखने जैसा कुछ नहीं है। किसकी तरफ देखेंगे,कौन है ऊपर? इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि ऊपर देखने जैसी आत्माएं ही नहीं हैं,जिनकी तरफ देखकर प्राण धिक्कारने लगे,अपने को कि यह प्रकाश तो मैं भी हो सकता था,ये फूल तो मेरे भीतर भी खिल सकते थे। यह गीत तो मैं भी गा सकता था। एक बार यह खयाल आ जाए कि मैं भी हो सकता था। यहां लेकिन कोई हो, जिसे देखकर यह खयाल आ जाए तो प्राण ऊपर की यात्रा शुरु कर देते हैं। स्मरण रहे प्राण हमेशा यात्रा करते हैं,अगर ऊपर की नहीं करते हैं तो नीचे की करते हैं। प्राण रुकते कभी नहीं या तो ऊपर जाएंगे या नीचे। रुकना जैसी कोई चीज नहीं है। ठहराव जैसी कोई चीज नहीं है,स्टेशन जैसी कोई जगह चेतना के जगत में नहीं है,जहां आप रुक जाएं और विश्राम कर लें। जीवन प्रति क्षण गतिमान है। ऊपर की तरफ चेतनाएं खड़ी करनी हैं।

मैं सारी दुनिया में एक आंदोलन चाहता हूँ। बहुत ज्यादा लोगों का नहीं,थोड़े से हिम्मतवर लोगों का,जो प्रयोग करने को राजी हों। अगर सौ आदमी हिंदुस्तान में प्रयोग करने को राजी हो और तय कर लें इस बात को कि हम आत्मा को उन ऊँचाइयों तक ले जाएंगे जहां आदमी का जाना संभव है। 20 वर्ष में हिंदुस्तान की शकल बदल सकती है। विवेकानंद ने मरते वक्त कहा था कि मैं पुकारता रहा सौ लोगों को,लेकिन वे सौ लोग नहीं आए और मैं हारा हुआ मर रहा हूँ। सिर्फ सौ लोग आ जाते तो मैं देश को बदल देता। विवेकानंद पुकारते रहे,सौ लोग नहीं आए। मैंने तय किया है कि मैं पुकारुंगा नहीं,गांव-गांव खोजूंगा,आंख-आंख में झांकूंगा कि वह कौन आदमी है। अगर पुकारने से नहीं आएगा तो तो खींचकर लाना पड़ेगा। सौ लोगों को भी लाया जा सके तो यह मैं आप लोगों को विश्वास दिलाता हूं कि उन सौ लोगों की उठती हुई आत्माएं एक एवरेस्ट की तरह,एक गौरीशंकर की तरह खड़ी हो जाएंगी। पूरे मूल्क के प्राण उस यात्रा पर आगे बढ़ सकते हैं।

जिन मित्रों को मेरी चुनौती ठीक लगती हो और जिनको साहस और बल मालूम पड़ता हो उस रास्ते पर जाने का जो बहुत अपरिचित है,उस रास्ते पर,उस समुद्र में,जिसका कोई नक्शा नहीं है हमारे पास। तो उसे समझ लेना चाहिए कि उसमें हिम्मत और साहस सिर्फ इसलिए है कि बहुत गहरे में परमात्मा ने उसको पुकारा होगा,नहीं तो इतना साहस और इतनी हिम्मत नहीं हो सकती थी। मिश्र में कहा जाता था कि जब कोई परमात्मा को पुकारता है तो उसे जान लेना चाहिए कि उससे बहुत पहले परमात्मा ने उसे पुकार लिया होगा अन्यथा पुकार ही पैदा नहीं होती। जिनके भीतर भी पुकार है,उनके ऊपर एक बड़ा दायित्व है। आज तो जगत के कोने-कोने में जाकर कहने की बात है कि कुछ थोड़े से लोग बाहर निकल आवें और सारे जीवन को ऊँचाइयां अनुभव करने के लिए समर्पित कर दें। जीवन के सारे सत्य,जीवन के आज तक के सारे अनुभव असत्य हुए जा रहें हैं। जीवन की आज तक की जितनी ऊँचाइयां थीं,जो छूई गई थीं,वे काल्पनिक हुई जा रही हैं,पुराण कथाएं हुई जा रही हैं। सौ-दो-सौ वर्ष बाद बच्चे इनकार कर देंगे कि बुद्ध और महावीर और क्राइस्ट जैसे लोग हुए थे,ये सब कहानियां हैं। एक आदमी ने तो पश्चिम में एक किताब लिखी है और उसने लिखा है कि क्राइस्ट जैसा आदमी कभी नहीं हुआ है। यह सिर्फ एक पुराना नाटक है। धीरे-धीरे लोग भूल गए कि ड्रामा है और लोग समझने लगे कि इतिहास है। अभी हम रामलीला खेलते हैं। हम समझते हैं कि राम कभी हुए और इसलिए रामलीला खेलते हैं। सौ वर्ष बाद बच्चे कहेंगे कि रामलीला लिखी जाती रही और लोगों में भ्रम पैदा हो गया कि राम कभी हुए। रामलीला एक नाटक रहा होगा। बहुत दिनों से चलता रहा क्योंकि जब हमारे सामने राम और बुद्ध और क्राइस्ट जैसे आदमी दिखाई पड़ने बंद हो जाएंगे तब हम कैसे विश्वास कर लेंगे कि ये लोग कभी हुए।

फिर आदमी का मन यह मानने को राजी नहीं होता कि उससे ऊँचे आदमी भी हो सकते हैं। आदमी का मन यह मानने को कभी भी राजी नहीं होता कि मुझसे ऊँचा भी कोई है। हमेशा उसके मन में यह मानने की इच्छा होती है कि मैं सबसे ऊँचा आदमी हूँ। अपने से ऊँचे आदमी को तो बहुत मजबूरी में मानता है,नहीं तो कभी मानता ही नहीं है। हजार कोशिश करता है खोजने की कि कोई भूल मिल जाए,कोई खामी मिल जाए,तो बता दूं कि वह आदमी भी नीचा है। तृप्त हो जाऊं कि नहीं यह बात गलत थी। कोई पता चल जाए तो जल्दी से घोषणा कर दूं कि पुरानी मूर्ति खंडित हो गई,वह पुरानी मूर्ति अब मेरे मन में नहीं रही,क्योंकि इस आदमी में यह गलती मिल गई। खोज इसी की चलती थी कि कोई गलती मिल जाए। नहीं मिल पाए तो ईजाद कर लो ताकि तुम निश्चिंत हो जाओ अपनी मूढ़ता में और तुम्हें लगे कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ। 

आदमी धीरे-धीरे सबको इनकार कर देगा। क्योंकि उनके प्रतीक,उनके चिह्न कहीं भी दिखाई नहीं पड़ते। पत्थर की मूर्तियां कब तक बताएंगी कि बुद्ध हुए थे और महावीर हुए थे और कागज पर लिखे गए शब्द कब तक समझाएंगे कि क्राइस्ट हुए थे और कब तक तुम्हारी गीता बता पाएगी कि कृष्ण थे। नहीं,ज्यादा दिन नहीं चलेगा। हमें आदमी चाहिए जीसस जैसे,कृष्ण जैसे,बुद्ध जैसे,महावीर जैसे। अगर हम वैसे आदमी आने वाले पचास वर्षों में पैदा नहीं करते हैं तो मनुष्य जाति एक अत्यंत अंधकारपूर्ण युग में प्रविष्ट होने को है। उसका कोई भविष्य नहीं है। जिन लोगों को भी लगता है कि जीवन के लिए कुछ कर सकते हैं,उनके लिए एक बड़ी चुनौती है और मैं तो गांव-गांव यह चुनौती देते हुए घूंमूंगा और जहां भी मुझे कोई आंखें मिल जाएंगी,लगेगा कि ये प्रकाश बन सकती हैं,इनमें ज्योति जल सकती है तो मैं अपना पूरा श्रम करने को तैयार हूँ। मेरी तरफ से पूरी तैयारी है। देखना है कि मरते वक्त मैं भी यह न कहूँ कि सौ आदमियों को खोजता था,वे मुझे नहीं मिले। 

(ओशो का वर्ष 1967ई. में दिया गया एक प्रवचनांश)  

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

स्त्री की सुंदरता का रहस्य

शायद आपको पता नहीं होगा,स्त्री पुरुषों से ज्यादा सुंदर क्यों दिखाई पड़ती है? शायद आपको खयाल न होगा,स्त्री के व्यक्तित्व में एक राउन्डनेस,एक सुडौलता क्यों दिखाई पड़ती है? वह पुरुष के व्यक्तित्व में क्यों नहीं दिखाई पड़ती? शायद आपको खयाल में न होगा कि स्त्री के व्यक्तित्व में एक संगीत,एक नृत्य,एक इनर डांस,एक भीतरी नृत्य क्यों दिखाई पड़ता है जो पुरुष में नहीं दिखाई पड़ता। 

एक छोटा-सा कारण है। एक छोटा सा,इतना छोटा है कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इतने छोटे-से कारण पर व्यक्तित्व का इतना भेद पैदा हो जाता है। मां के पेट में जो बच्चा निर्मित होता है उसके पहले अणु में चौबीस जीवाणु पुरुष के होते है और चौबीस जीवाणु स्त्री के होते हैं। अगर चौबीस-चौबीस के दोनों जीवाणु मिलते हैं तो अड़तालीस जीवाणुओं का पहला सेल(कोष्ठ)निर्मित होता है। अड़तालीस सेल से जो प्राण पैदा होता है वह स्त्री का शरीर बन जाता है। उसके दोनों बाजू 24-24 सेल के संतुलित होते हैं।

 पुरुष का जो जीवाणु होता है वह सैंतालिस जीवाणुओं का होता है। एक तरफ चौबीस होते हैं,एक तरफ तेइस। बस यहीं संतुलन टूट गया और वहीं से व्यक्तित्व का भी। स्त्री के दोनों पलड़े व्यक्तित्व के बाबत संतुलन के हैं। उससे सारा स्त्री का सौंदर्य,उसकी सुड़ौलता,उसकी कला,उसके व्यक्तित्व का रस,उसके व्यक्तित्व का काव्य पैदा होता है और पुरुष के व्यक्तित्व में जरा सी कमी है। क्योंकि उसका तराजू संतुलित नहीं है,तराजू का एक पलड़ा चौबीस जीवाणुओं से बना है तो दूसरा तेईस का। मां से जो जीवाणु मिलता है वह चौबीस का बना हुआ है और पुरुष से जो मिलता है वह तेईस का बना हुआ है। पुरुष के जीवाणुओं में दो तरह के जीवाणु होते हैं: चौबीस कोष्ठधारी और तेईस कोष्ठधारी। तेईस कोष्ठधारी जीवाणु अगर मां के चौबीस कोष्ठधारी से मिलता है तो पुरुष का जन्म होता है और यदि पुरुष के चौबीस कोष्ठधारी स्त्री के चौबीस कोष्ठधारी से मिलता है तो स्त्री का जन्म होता है। निश्चित ही स्त्री के गर्भ में पल रहा बच्चा स्त्री होगा या पुरुष,इसके लिए जिम्मेवार स्त्री नहीं बल्कि पुरुष है। चूंकि पुरुष की पैदाइश एक असंतुलन से होती है,इसलिए पुरुष में एक बेचैनी जीवन भर बनी रहती है,एक असंतोष बना रहता है। क्या करुं,क्या न करुं,एक चिन्ता,एक बेचैनी,यह कर लूं,वह कर लूं। पुरुष की जो बेचैनी है वह एक छोटी सी घटना से शुरु होती है और वह घटना है कि उसके एक पलड़े पर एक अणु कम है। उसके व्यक्तित्व का संतुलन कम है। स्त्री का संतुलन पूरा है,उसकी लयबद्धता पूरी है। इतनी सी घटना इतना फरक लाती है। इससे स्त्री सुंदर तो हो सकी लेकिन विकासमान नहीं हो सकी; क्योंकि जिस व्यक्तित्व में समता है वह विकास नहीं करता,वह ठहर जाता है।पुरुष का व्यक्तित्व विषम है। विषम होने के कारण वह दौड़ता है,विकास करता है। एवरेस्ट चढ़ता है,पहाड़ पार करता है,चांद पर जाएगा,तारों पर जाएगा,खोजबीन करेगा,सोचेगा,ग्रंथ लिखेगा,धर्म-निर्माण करेगा। स्त्री यह कुछ भी नहीं करेगी। न वह एवरेस्ट पर जाएगी,न वह चांद-तारों पर जाएगी,न वह धर्मों की खोज करेगी,न ग्रंथ लिखेगी,न विज्ञान की शोध करेगी। वह कुछ भी नहीं करेगी। उसके व्यक्तित्व में एक संतुलन उसे पार होने के लिए तीव्रता से नहीं भरता है। पुरुष ने सारी सभ्यता विकसित की। इस एक छोटी सी जैविक परिघटना के कारण। उसमें एक अणु कम है। स्त्री ने सारी सभ्यताएं विकसित नहीं की। उसमें एक अणु पूरा है। इतनी सी जैविक परिघटना व्यक्तित्व का भेद ला देती है।