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नास्तिक दर्शन

नास्तिक दर्शनों में चार्वाक, जैन और बौद्ध दर्शन आते हैं । ये वेदों के प्रमाण में विश्वास नहीं रखते, इसलिए नास्तिक दर्शन के अंतर्गत रखे गए हैं । चार्वाक दर्शन के प्रणेता बृहस्पति माने जाते हैं । बार्हस्पत्य सूत्र इनका ग्रंथ माना जाता है, जो अप्राप्य है । सर्व दर्शन संग्रह के पहले अध्याय में चार्वाक मत के सिद्धांतों का सार मिलता है । इसे लोकायत दर्शन के नाम से भी जाना जाता है । प्रबोध चंद्रोदय नाटक में इस नाम का उल्लेख आया है । भूमि, जल, अग्नि,वायु जिनका प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है, इनके अतिरिक्त संसार में कुछ भी नहीं है । इन चार तत्वों के समिश्रण से ही चेतना शक्ति और बुद्धि का प्रादुर्भाव होता है । इनके अनुसार ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत, अर्थात ऋण लेकर भी घी का भोग करना चाहिए । इस लोक के अलावा और कोई दूसरा लोक नहीं है । इसलिए इस लोक का भरपूर आनंद लेना चाहिए, खूब ऐश-आराम करना चाहिए । शरीर के एक बार भस्म हो जाने पर वह पुन: वापिस लौट कर नहीं  आता । जैन दर्शन के प्रणेता वर्धमान हैं । जो जिन् कहलाए और महावीर के नाम से जाने जाते हैं । जिन का अर्थ है जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया अर्थात स्वयं का ...