शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

लकीर का फकीर

एक कवि एक सुंदर बाग के एकांत में सरोवर तट पर एक लंबे घने वृक्ष के नीचे बैठा कविता लिख रहा था। आसपास कोई भी नहीं था। एक कोवा वृक्ष की डाल पर बैठा था।
कवि अपनी पहली कविता कहता है :
सारी दुनिया की संपत्ति का
मैं मालिक
सोलोमन का खजाना भी
मैंने पा लिया
कुबेर का खजाना भी
मैंने पा लिया

ऊपर बैठा कौवा कांव-कांव करता है और कहता है “सो व्हॉट? , इससे क्या हुआ?
कवि बहुत हैरान हुआ। कवि कह रहा है मैं कुबेर हो गया,सारी संपत्ति मेरी हो गई और कौवा कह रहा है सो व्हॉट?
कवि ने क्रोध में ऊपर देखा, और कहा,” ना समझ कौवे तू क्या समझेगा?”
कौवे ने कहा, ठीक कहते हैं आप, धन की बात कोई दूसरा कौवा भी नहीं समझेगा। धन की बात सिवाए आदमी के कोई भी नहीं समझेगा। ना कोई विश्वास करेगा।“
लेकिन तुम समझते हो कि हम धन की बात नहीं समझते, इसलिए ना समझ हैं। तो यह बात नहीं है। सच बात तो ये है कि हम किसी चीज को बिना खोजे विश्वास नहीं करते।
कवि ने कहा , ठीक है, तुम्हें विश्वास नहीं आता तो दूसरी कविता सुनाता हूं :-
सारी पृथ्वी का राज्य मैंने पाया
चक्रवर्ती सम्राट मैं कहलाया
स्वर्ण सिंहासनों पर विराजा मैं
सब कुछ मैं हूं
सब कुछ मेरा है

इतना कहने के बाद कवि फिर आदत के अनुसार कौवे की तरफ़ देखता है। कौवा फिर कहता है सो व्हॉट? इससे क्या हुआ? कवि फिर चौंक गया। उसने सोचा मालूम होता है कि कौवा न धन की बात समझता है, न यश की। शायद कोई संन्यासी कौवा है, इसे संन्यास की कविता सुनाता हूं।
फिर कवि तीसरी कविता कहता है:-
मैंने सब खो दिया
तभी जाना कि मैं परमात्मा हूं
मैं जीवन से हट गया
और मैं मुक्त हो गया
मैं मोक्ष का आनंद भोग रहा हूं

लेकिन कौवा इस बार फिर बोला “ सो व्हॉट? इससे क्या हुआ? कवि तो घबड़ा कर खड़ा हो गया। और कहने लगा,हर चीज़ में कहते हो सो व्हॉट? मैं तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊं।  

कौवा बोला मुझे विश्वास दिलाने की जरूरत नहीं है। मैं तो हर चीज़ पर संदेह करता हूं। हां, अगर यही कविताएं तुम किसी आदमी को सुनाआगे तो वह अवश्य ही विश्वास कर लेगा क्योंकि वह लकीर का फ़कीर है।  

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

सिटनालटा

एक बार विद्वान लोगों के एक समूह ने ओशो को बोलने के लिए आमंत्रित किया। ओशो ने आमंत्रण सहर्ष स्वीकार किया और नियत दिन सभा को संबोधित करने पहुंचे। ओशो ने इस समूह के साथ चर्चा का जो विषय चुना वह था : "सिटनालटा- एक अनोखा समाज"। उन्होंने उस समाज के संबंध में बोलते हुआ कहा कि हमारे शरीर में सात चक्र नहीं,बल्कि सत्रह चक्र होते हैं। सिटनालटा समाज ने यह खोज निकाला था। यह पुरातन विद्या अब लुप्त हो गई है। लेकिन निर्वाणप्राप्त 'सिटनालटा' के इस इस गुप्त,गुह्य रहस्य को जानने वालों की एक गुप्त संस्था आज भी सक्रिय है। इन लोगों को जीवन के सभी रहस्यों का पता है। उनके पास ऐसी-ऐसी शक्तियां हैं,जिनकी सामान्य लोग कल्पना भी नहीं कर सकते।
सभा के अंत में सभापति ओशो से बोले कि उन्हें सिटनालटा के बारे में पता है। एक और व्यक्ति आकर कहने लगा कि वह सिटनालटा का सदस्य है। फिर उनके पास पत्र आने लगे उन लोगों के जो दावा करते थे कि वे भी उस रहस्यमयी संस्था के सदस्य हैं।
ओशो मन ही मन हंसे,क्योंकि सत्य तो यह था कि भाषण से पहले ओशो एटलांटिस नामक महाद्विप के बारे में पढ़ रहे थे। ऐसा माना जाता है कि यह महाद्विप कहीं लुप्त हो गया है। ओशो को शरारत सूझी,और उन्होंने एटलांटिस के अंग्रेजी शब्द-विन्यास को उल्टा करके 'सिटनालटा' बना दिया, और उसके संबंध में विद्वान लोगों के सम्मुख विवेचन करने लगे और लोग उन पर मोहित हो गए।
ओशो इस संदर्भ को लेते हुए कहते हैं कि ऐसा होता है विश्वास। विश्वास हमें आश्वासन देता है और बात जितनी विचित्र होती है, लोग उतना ही उसे मानने को तत्पर हो जाते हैं। लोग कुछ भी मानने को तैयार हो जाते हैं,यदि उन्हें आश्वासन मिले।े