शुक्रवार, 25 मई 2012

तादात्म्य और चित्त की जटिलता

(पिछली पोस्ट में हमने जाना कि मनुष्य की सरलता खोती है उसके बनाए आदर्शों से,अनुकरण और अनुसरण से,अपने से अलग कुछ और बनने की कोशिश में। इस सरलता के खोने में एक और तत्त्व जिम्मेवार है और वह है तादात्म्य,आइए देखें कि तादात्म्य कैसे हमें जटिल बनाता है और खंडित करता है।)

यह स्मरण रखें कि जीवन में जितना कम द्वंद्व,जितना कम संघर्ष,जितने कम व्यर्थ के तनाव,व्यर्थ के खंड कम हों,उतनी सरलता उत्पन्न होगी। मनुष्य जितना अखंड हो उतनी सरलता उपलब्ध होती है। हम खंड-खंड हैं। और हम अपनी अखंडता को अपने हाथों से तोड़े हुए हैं। हम अपनी अखंडता को कैसे तोड़ देते हैं? 

हम अपनी अखंडता को तादात्म्य से,आइडिन्टटी से तोड़ देते हैं।

होता क्या है? मैं एक घर में पैदा हुआ। उस घर के लोगों ने मुझे एक नाम दे दिया और मैंने समझ लिया कि वह नाम मैं हूं। मैंने एक आइडिन्टटी कर ली। मैंने समझ लिया कि यह नाम मैं हूं। फिर मैं कहीं शिक्षित हुआ। फिर मुझे कोई उपाधि मिल गई। फिर मैंने उन उपाधियों को समझ लिया कि ये उपाधियां मैं हूं। फिर किसी ने मुझे प्रेम किया,तो मैंने समझ लिया कि लोग मुझे प्रेम करते हैं और वह प्रेम की तस्वीर मैंने बना ली और समझा कि यह मैं हूं। फिर किसी ने ग्रहण किया,अपमानित किया,सम्मानित किया तो मैंने वह तस्वीर बना ली। ऐसी बहुत सी तस्वीरें आपके चित्त के अलबम पर आपकी ही लगती चली जाती है और हर तस्वीर को आप समझ लेते हैं मैं हूं। इन तस्वीरों में बड़ा विरोध होता है। ये तस्वीरें बहुत प्रकार की हैं। अनेक रूपों की हैं। इन तस्वीरों को,यह समझ कर कि मैं हूं,आप अनेक रूपों में विभक्त हो जाते हैं।

एक गांव से क्राइस्ट निकले और एक आदमी ने आकर उनका पैर छुआ। उस आदमी ने पूछा--क्या मैं भी ईश्वर को पा सकता हूं? क्राइस्ट ने कहा कि इसके पहले कि तुम ईश्वर को पा सको,मैं तुमसे पूछूं कि तुम्हारा नाम क्या है? उस आदमी ने आंखे नीचे झुका ली और कहा मेरा नाम? क्या बताऊं अपना नाम? मेरे तो हजार नाम हैं। कौन सा नाम बताऊं? मैं तो हजार-हजार आदमी एक ही साथ हूं। जब घृणा करता हूं तो दूसरा आदमी हो जाता हूं। जब प्रेम करता हूं तो बुलकुल दूसरा आदमी हो जाता हूं। जब रोष और क्रोध से भरता हूं तो बिलकुल दूसरा आदमी हो जाता हूं। और जब क्षमा से भरता हूं तो बिलकुल दूसरा आदमी हो जाता हूं। अपने बच्चों में मैं दूसरा आदमी हूं । अपने शत्रुओं में मैं दूसरा आदमी हो जाता हूं। मित्रों में दूसरा हूं। अपरिचितों में दूसरा हूं। मेरे तो हजार नाम हैं। मैं कौन सा नाम बताऊं? 

यह हर आदमी की तस्वीर है। आपके नाम भी ऐसे ही हैं। आपके नाम भी हजार हैं। आप हजार टुकड़ों में बंटें हुए हैं। आप एक आदमी नहीं हैं। और जो एक आदमी नहीं है वह सरल कैसे होगा? उसके भीतर तो भीड़ है। हर आदमी एक क्राउड है। यह भीड़ बाहर नहीं है आपके भीतर है। तो आप में कई आदमी बैठे हुए हैं एक ही साथ। एक ही साथ कई आदमी आपके भीतर बैठे हुए हैं। ख्याल करें,अपने चेहरे को पहचाने। सुबह से उठते हैं तो सांझ तक क्या आपका चेहरा एक ही रहता है? जब आप घर से बाहर निकलते हैं और रास्ते पर एक भिखमंगा भीख मांगता है तब और जब आप बाजार में पहुंचते हैं और कोई आदमी आपको नमस्कार करता है तब,और जब आप दुकान पर बैठते हैं तब,जब आप अपनी पत्नी के पास होते हैं तब,जब आप अपने बच्चों के पास होते हैं तब,क्या आपका चेहरा एक ही है? अगर आपके चेहरे अनेक हैं तो आप सरल नहीं हो सकते,आप जटिलता पैदा कर लेंगे। बहुत जटिल हो जाएंगें। कैसे सरल हो सकते हैं,अगर एक आदमी के अंदर दस-पंद्रह रहते हों? 

हत्यारों ने जिन्होंने बड़ी हत्याएं की हैं,अनेकों ने यह कहा है कि हमें पता नहीं कि हमने हत्या भी की है। पहले तो लोग समझते थे कि ये लोग झूठ बोल रहें हैं,लेकिन अब मनोविज्ञान इस नतीजे पर पहुंचा है कि वे ठीक कह रहें हैं। उनके व्यक्तित्व इतने खंडित हैं कि जिस आदमी ने हत्या की है वह वह आदमी नहीं है,जो अदालत में बयान दे रहा है। वह दूसरा आदमी है। यह बिलकुल दूसरा चेहरा है,उसे याद भी नहीं कि मैंने हत्या की है। इतने खंड हो गए हैं भीतर कि दूसरे खंड ने यह काम किया है,इस खंड को पता ही नहीं। और आपके भीतर भी ऐसे बहुत से खंड हैं। नहीं लगता, क्रोध करने के बाद क्या आप नहीं कहते कि मैंने अपने बावजूद क्रोध किया। अजीब बात है, आपके बावजूद! मतलब--आपके भीतर कोई दूसरा आदमी भी है। आप नहीं चाहते थे कि क्रोध हो और उसने क्रोध करवा दिया। कई बार आप अनुभव करते हैं कि मैं नहीं करना चाहता था,फिर मैंने किया। फिर कौन करवा देता है? जरूर आपके भीतर कई दूसरे लोग हैं। आप नहीं चाहते हैं फिर भी आपसे हो जाता है। हजार बार निर्णय करते हैं कि अब ऐसा नहीं करेंगे,फिर भी कर लेते हैं और पछताते हैं। 

असल में आपके भीतर बहुत से लोग हैं। जिसने निर्णय किया था कि नहीं करेंगे और जिसने किया,उन दोनों को पता नहीं कि बीच में कोई और बातचीत है। उन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं है। सांझ को आप तय करके सोते हैं कि सुबह पांच बजे उठेंगे और सुबह पांच बजे आपके भीतर कोई कहता है कि रहने भी दो। आप सो जाते हैं। सुबह आप पछताते हैं कि मैंने तो तय किया था कि उठना है फिर मैं उठा क्यों नहीं? अगर आपने ही तय किया था कि उठना है और आप एक व्यक्ति होते, तो सुबह पांच बजे कौन कह सकता था कि मत उठो? लेकिन आपके भीतर और व्यक्ति बैठे हुए हैं और वे कहते हैं--रहने दो,चलने दो। 

महावीर ने कहा है कि मनुष्य बहुचित्तवान है। एक चित्त नहीं,आपके भीतर बहुचित्त हैं। और जिसके भीतर बहुचित्त हैं वह कभी सरल होगा? सरल हो ही नहीं सकता। आपके भीतर कई आवाजें हैं। एक आवाज कुछ कहती है,दूसरी आवाज कुछ कहती है। कभी सोचें आप, अपने भीतर की आवाजों को सुनें। आपको बहुत आवाजें सुनाई पडेंगी। आपको लगेगा,आप बहुत आदमियों से घिरे हुए हैं। सरलता के लिए जरूरी है एक चित्तता आ जाए,बहुचित्तता न हो। एक चित्तता कैसे आएगी? आप जिन तादात्म्य को बना लेते हैं,उनको तोड़ने से एक चित्तता आएगी।                                                                                                                    
 ...जारी
                                                                                                                                            --ओशो

रविवार, 20 मई 2012

सरलता

ओशो ने चित्त की शांति के लिए तीन सूत्रों की बात बार-बार की है। ये सूत्र हैं:सरलता,सजगता और शून्यता। आज  की इस पोस्ट में हम जानेंगे कि सरलता क्या है? सरलता क्या नहीं है? सरलता के मार्ग क्या हैं?सरलता कैसे आए?

जो भी बाहर से ओढ़ा जाता है वह हमें जटिल बनाता है। बाहर से ओढ़ी गई सादगी,सरलता,विनम्रता मनुष्य को जटिल बनाती है और जो लोग भीतर जटिल होते हैं अक्सर बाहर सादगी,सरलता और विनम्रता का वेश बना लेते हैं;केवल इसलिए नहीं कि दुनिया को धोखा दे सकें बल्कि स्वयं को भी धोखा दे सकें। दुनिया में जटिल लोग सरल होने का अभ्यास कर लेते हैं। इस ओढ़ी हुई सरलता का कोई मूल्य नहीं। कोई अत्यंत विनम्रता प्रदर्शित करे,उससे वह सरल नहीं हो जाता है। क्योंकि विनम्रता के पीछे अक्सर अहंकार खड़ा रहता है और विनम्र आदमी हाथ जोड़कर सिर तो झुकाता है,लेकिन अहंकार नहीं झुकता है और विनम्र आदमी को यह भाव बना रहता है कि मुझसे ज्यादा और कोई भी विनम्र नहीं है और उसको यह भी आकांक्षा होती है कि मेरी विनम्रता और मेरी सरलता स्वीकृत की जाए और वह सम्मानित हो। सरलता को इस प्रकार अभ्यास से ऊपर से साधना आसान है,लेकिन उसका कोई मूल्य नहीं। वह मनुष्य को जटिल ही बना रही है। सरलता के संबंध में पहली बात यह स्मरणीय है कि सरलता बाहर से थोपी हुई नहीं हो सकती,उसे भीतर फैलाना होता है,उसे भीतर गहराना है। अगर मनुष्य को छोड़कर हम चारों ओर देखें तो पाएंगे पशु सरल हैं,पौधे सरल हैं,पक्षी सरल हैं; मनुष्य मात्र जटिल प्राणी है।

क्राइस्ट ने एक गांव से निकलते हुए अपने मित्रों से कहा,लिली के फूलों की तरफ देखो। वे किस शांति से और शान से खड़ें हैं;बादशाह सोलोमन भी अपनी पूरी गरीमा और गौरव में इतना सुंदर नहीं था। लेकिन फूल कितने सरल हैं,फल सरल हैं,पौधे सरल हैं। आदमी भर जटिल है। आदमी क्यों जटिल है? इस प्रश्न पर विचार किया जाना चाहिए।

आदमी जटिल है क्योंकि वह अपने सामने होने के आदर्श,आइडियल खड़ा कर लेता है और उसके होने के पीछे लग जाता है। व्यक्ति की स्वयं में आस्था खो गई है। बुद्ध,महावीर,कृष्ण की सरलता और शांति को देखकर मन में उन जैसा बनने का लोभ उठता है और एक आदर्श खड़ा होता है और फिर उस आदर्श के मुताबिक ढ़ांचे खड़े कर लिए जाते हैं; जिस से जटिलता पैदा होती है। या कोई किसी हिरो या हिरोइन को अपना आदर्श बना कर उन जैसा बनने की कोशिश करने लगता है। और जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के जैसा होने का अभ्यास शुरु करता है तो वह अपनी असलियत को दबाता है और आदर्श व्यक्तित्व को ओढ़ने लगता है,तब भीतर दो आदमी पैदा हो जाते हैं। एक जो वह वस्तुत: है और दूसरा वह जो वह होना चाहता है। इन दोनों के भीतर अंतर्द्वंद्व शुरु हो जाता है। भीतर चौबीस घंटे तनाव,संघर्ष होता है।व्यक्तित्व खंडों में बंट जाता है।प्रत्येक व्यक्ति के भीतर जो उसकी निजी क्षमता है,वह विकसित हो;यह तो समझ में आता है। लेकिन एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति जैसा होने की चेष्टा में लग जाए,यह बिलकुल समझ में आने जैसी बात नहीं। लेकिन मनुष्य फिर भी यह करता है। इसलिए जटिल है।

हर आदमी अलग है। हर आदमी अद्वितीय है,हर आदमी की अपनी गौरव-गरिमा है। हर आदमी के भीतर परमात्मा का अपना वैभव है। अपनी-अपनी निज की वृत्ति के भीतर बैठी हुई आत्मा है। उसकी अपनी क्षमता है,अद्वितीय क्षमता है। कोई मनुष्य न किसी दूसरे से ऊपर है,न नीचे है। न कोई साधारण है न कोई असाधारण है। सबके भीतर एक ही परमात्मा अनेक रूपों में प्रकट हो रहा है।

अनुकरण जटिलता पैदा करता है। किसी दूसरे का अनुकरण हमेशा जटिलता पैदा करता है। वह ऐसे ही है कि एक सांचा हम पहले बना लें और फिर उस सांचे के अनुसार अपने को ढ़ालना शुरु करें। आदमी कोई जड़ वस्तु नहीं है कि उसे सांचों में ढ़ाला जा सके। वह जीवंत और अद्वितीय है। उसके जैसा कोई दूसरा नहीं हो सकता।

सरलता के लिए जरूरी है कि सारे ढ़ांचे,सांचे तोड़ दिए जाएं। उन्हें अलग रख दिया जाए और स्वयं की निजता की खोज की जाए। बजाय इसके कि किसी के व्यक्तित्व को पकड़ के उस जैसा बनने की कोशिश करें। क्योंकि जो हम बनना चाहते हैं वह हम बन नहीं पाते और जो हम हैं उसकी हम फिक्र छोड़ देते हैं। इसलिए जटिलता है,तकलीफ है,बेचैनी है,अंतर्द्वंद्व,पीड़ा है,परेशानी है। स्मरण रखें कि जो आप हैं,अपनी वास्तविक सत्ता में,उससे अन्यथा आप कभी नहीं हो सकते हैं। कितनी भी चेष्टा करें तो भी केवल एक एक्टिंग,एक अभिनय भर कर पाएंगे,इससे ज्यादा कुछ नहीं। और अभिनय का क्या मूल्य है?

तो सरलता के लिए जरूरी है कि किसी का अनुगमन न करें और कोई ढ़ांचा व आदर्श न बनाएं। फिर क्या करें? सारे ढ़ांचे अलग कर दें। वह जो भीतर मूर्च्छित सोया हुआ मनुष्य पड़ा है,उसे जगाएं,उसे पहचानें,उसे समझें,उससे संबंधित हों,उसे खड़ा करें,उसे होश में भरें और तब आप पाएंगे कि सारी जटिलता क्षीण होने लगी है और सरलता का,सहजता का जन्म शुरु हो गया है।
...जारी

गुरुवार, 17 मई 2012

चित्त की झील में तूफान

सुबह-सुबह एक झील के किनारे से नौका छूटी। कुछ लोग उस पर सवार थे। नौका ने झील में थोड़ा ही प्रवेश किया होगा कि जोर का तूफान आ गया और बादल घिर आए। नौका डगमगाने लगी। आज की नौका नहीं थी,दो हजार वर्ष पहले की थी। उसके डूबने का डर पैदा हो गया। जितने लोग उस नौका पर थे,सारे लोग घबरा गए। प्राणों का संकट खड़ा हो गया। लेकिन उस समय भी उस नौका पर एक आदमी शांत सोया हुआ था। उन सारे लोगों ने जाकर उस आदमी को जगाया और कहा कि क्या सो रहे हो और कैसे शांत बने हो!!!प्राण संकट में हैं,मृत्यु निकट है और नौका बचने की कोई उम्मीद नहीं है। तूफान बड़ा है और दोनों किनारे दूर हैं। 

उस शांत सोए हुए व्यक्ति ने आंखें खोली और कहा--कितने कम विश्वास के तुम लोग हो,कितनी कम श्रद्धा है तुममें। कहो झील से कि शांत हो जाए। वे लोग हैरान हुए कि झील किसी के कहने से शांत होती है! यह कैसी पागलपन की बात है! लेकिन वह शांत सोया हुआ आदमी उठा और झील के पास गया और उसने जाकर झील से कहा,झील! शांत हो जाओ! और आश्चर्यों का आश्चर्य कि झील शांत हो गई। 

यह आदमी जीसस क्राइस्ट था और झील गैलीली झील थी और उनके साथ दस-बारह मित्र थे। यह कहानी एकदम सच है। आज हर आदमी झील पर सवार है, हर आदमी नौका पर सवार है और कोई आदमी जब तक जीवन में है कभी जमीन पर नहीं है,हमेशा झील में है। एक भी दिन ऐसा नहीं है जब आंधी नहीं आती है,तूफान नहीं आता है। हम रोज ही तूफान में घिरे हैं। लेकिन अगर हममें श्रद्धा हो,आत्म-श्रद्धा,और हम झील से कह सकें कि शांत हो जाओ,तो झील निश्चिंत शांत हो जाती है।

कैसे हम उस झील को कहें जो अशांत बन गई? तूफान और आंधियों से पूर्ण उस चित्त की झील में कैसे शांति ला सकते हैं?

आपमें वह क्षमता आ सकती है कि आप आंख उठाकर झील की तरफ देख लें तो झील शांत हो जाएगी। यह कहने की भी जरूरत न पड़ेगी कि झील,शांत हो जाओ। क्योंकि तूफान हमारा ही पैदा किया हुआ है और आंधी हमारी पैदा की हुई है। जिस अशांति में हम खड़े हैं हुए हैं उसको जानने वाला कोई और नहीं,हम हैं। जिस अशांति को मैंने बनाया है,मैं चाहूं तो उसे इसी क्षण मिटा सकता हूं। और जिस अंधकार को मैंने निर्मित किया है उसको मिटाने की पूरी सामर्थ्य और शक्ति मुझमें है। मनुष्य कितना ही पाप करे और कितना ही अशांत हो और कितना ही दुख में हो और कितना ही पीड़ा में हो,एक सत्य स्मरण रख लेने जैसा है कि सब उसका अपना बनाया हुआ है। और इसी लिए इस सत्य में से एक आशा की किरण भी निकल आती है कि जो खुद का बनाया हुआ हो,उसे खुद मिटाने के हमेशा हकदार होते हैं।

शांति की आंख सत्य के दर्शन देने में समर्थ बनाती है। जब भीतर शांति होती है और भीतर के चित्त की झील पर कोई लहर नहीं होती है,कोई आंधी नहीं होती,तो हम दर्पण बन जाते हैं और परमात्मा का प्रतिबिम्ब हममें प्रतिफलित होने लगता है। तब हमारी अंतरात्मा अपनी गहराइयों में उस सत्य को प्रतिबिंबित करने लगती है,जो चारों तरफ व्याप्त है। लेकिन वह हमें दिखलाई नहीं पड़ता है। हम अशांत हैं इसलिए सुन नहीं पाते उस आवाज को जो चारों तरफ मौजूद है और हम इतने व्यस्त और उलझे हुए हैं कि देख नहीं पाते उस सत्य को जो चारों तरफ खड़ा है। काश,हम शांत हो जाएं,हमारा चित्त शांत हो जाए तो जो जानने-जैसा है वह जान लिया जाएगा और वह जो पाने जैसा है वह पा लिया जाएगा।

रविवार, 13 मई 2012

अनजाना जीवन

हमारे चित्त की पूरी व्यवस्था ऐसी है कि वह कहता है कि कहीं चलो। पूरा चित्त ही इस तनाव से बना है कि कहीं चलो-वहां जहां कहीं दूर मंजिल है। मन जीवित रहता है तनाव में। यह तनाव गहरे में कहीं पहुंचने का तनाव है-चाहे धन हो,चाहे यश हो,चाहे मोक्ष।

मन उस वक्त मर जाता है जिस वक्त आपने कहा--कहीं नहीं जाना है।

जहां हम खड़े हैं यदि वहीं हम अपनी सारी डिजायर को,सारे विचार को,सारी कामना को रोक लें तो हम जो हैं वह हमें पता चल जाएगा।

मजे की बात है कि मंजिल यहीं मौजूद है,अभी इसी वक्त। कहीं जाना नहीं है खोजने,सिर्फ ठहर जाना है।...असल में मजा यह है कि रास्ता मात्र बाहर जाने का होता है,क्योंकि अंदर तो हम हैं। लेकिन विचार बाहर कि यात्रा करता है।विचार में आप यहीं होते हुए भी कलकत्ता में हो सकते हैं। इसलिए भीतर जाने का सवाल नहीं है। हम बाहर किन-किन रास्तों से चले गए हैं,उन रास्तों को छोड़ देने का सवाल है असल में।

विचार चला गया है वासना के वाहन पर बैठ कर और हम वहीं हैं यानी यह आधारभूत सत्य खयाल में आ जाना चाहिए कि हम वहीं हैं,वासना के वाहन पर बैठ कर विचार चला गया है।विचार न जाए तो आप फौरन पाएंगे कि हम भीतर हैं।सिर्फ आप दिवा-स्वप्न में खो गए थे। यह बुनियादी सत्य है कि हम कभी अपने से बाहर गए ही नहीं।

एक बात अगर ठीक से खयाल में आ जाए तो सवाल सिर्फ इतना है कि हम जो विचार की किरण बाहर भेजते हैं वह वापस लौट आए और वापस लौटने के लिए भी कुछ होना नहीं है,सच में लौटने की बात नहीं है। सिर्फ कल्पना में हम बाहर चले गए हैं,जो लोभ पर सवार हो गई है। फिर मोक्ष,स्वर्ग,मुक्ति सब लोभ पर सवार हो गए हैं और इसी लोभ का शोषण कर रहा है गुरुॱ । गुरु लोभ का शोषण कर रहा है। इसलिए जिनको धन की तृप्ति हो जाएगी वह धर्म के लोभ में पड़ जाएंगे। वह कहेंगें धन तो मिल गया,ठीक है,अब मोक्ष भी चाहिए। इस लोभ का शोषण कर रहा है गुरुॱ। वह कह रहा है कि हम तुम्हें जो चीज चाहिए दिलवा देंगे। इसलिए सब गुरुडम भ्रांत है,खतरनाक है।

ठहरना अनरिपीटेबल एक्सपीरियंस है। क्योंकि हम कुछ करते नहीं हैं जिसको हम रिपीट कर सकें। कुछ करते तो रिपीट हो सकता था। हम कुछ करते नहीं हैं,हम सिर्फ होते हैं--तो एक रिजर्वायर हो जाता है माइंड पर--कहीं नहीं जा रहा है बाहर,कहीं नहीं जा रहा है,ठहर गया है। चारों तरफ बांध है,झरना एक झील बन गया है,कहीं जा नहीं रहा है,कहीं जाने की कोई बात ही नहीं,सब अनंत झील है,एक लहर भी नहीं है,तो सारी शक्ति,सारी ताजगी,सारा युवापन उस स्थिति में पैदा हो जाएगा। वह युवापन,वह शक्ति,वह डायनमिक फोर्स, वह रिपीट करेगी आटोमेटिक-जैसे वृक्ष से फूल आ रहा है,वैसे आपसे भी चीजें आएंगी। लेकिन आप फिर उनको कर नहीं रहे हैं,वह हो रहीं हैं और जब हो रहीं हैं तब आपके मन पर का बोझ गया। आपके मन पर कोई बोझ नहीं है,कोई भार नहीं है। ऐसी स्थिति में जो अनुभव होगा,वह अनुभव तो मुक्ति का है,निर्भार होने का है।

तो मूल प्रश्न माइंड को विदा करने का है और माइंड हमेशा सुरक्षा चाहता है। पर संन्यासी कहता है हम कोई सुरक्षा नहीं मानते,हम असुरक्षा में जीते हैं,हम नहीं कहते कि कल कुछ मिलेगा,कल सुबह देखेंगे। वह आदमी बुरा है या भला,हम क्यों सोचें? यदि वह बिस्तर से उठाकर ले जाएगा,तो ले जाएगा। यह मैं क्यों निर्णय लूं कि यह आदमी कैसा है? हम कुछ सोचते नहीं,हम जीते हैं चुपचाप एक-एक क्षण में। इतनी असुरक्षा में जो जीता है उसके माइंड में एक्सप्लोजन हो सकता है;क्योंकि माइंड फिर जी नहीं सकता,माइंड को मरना पड़ेगा।

जितनी सुरक्षा उतना मरा आदमी है। और मजा यह है कि भगवान के मामले में भी जोखिम लेने की तैयारी न हो,वहां भी हम पक्का करके ही चलें सब,तो फिर बहुत मुश्किल है। भगवान का मतलब यह है कि अनजान वह जो सागर है,उसमें हमें कूदना पड़ेगा,किनारे को छोड़ कर।

लेकिन जो परम खतरे में उतरने की तैयारी करता है,वह खतरे में उतरने की तैयारी ही उसके भीतर ट्रांसफर्मेशन बन जाती है क्योंकि इस खतरे में जाना बदल जाना है। सब व्यवस्था छोड़कर,सब सुरक्षा छोड़कर जो उतर जाता है अनजान में,यह उतरने की तैयारी ही,यह साहस ही उसके भीतर संकेत-चिह्न बनता है और उसके भीतर परिवर्तन हो जाता है।जितनी बड़ी असुरक्षा में हम जाने को तैयार हैं उतने ही हम वस्तुत: सुरक्षित हो जाते हैं--क्योंकि कोई भय न रहा,फिर कोई डर न रहा।

कुछ है जो निरंतर अनजाना है और वही परमात्मा है। वही जीवन है जो अनजाना है। जो मृत है कल उसके बाबत हम सुरक्षित हो सकते हैं;जो जीवित है वह कल कहां होगा,कुछ भी कहना मुश्किल है। जीवंत के साथ बड़ी कठिनाई है और हम सब व्यवस्था बनाकर उसको मार देते हैं। मजे की बात यह है कि जो भी सिस्टम बनाई जाए वह झूठी हो जाती है। झूठी इसलिए हो जाती है कि उसमें विरोध बरदास्त नहीं किए जा सकते। उसमें विरोध अलग कर देने पड़ते हैं।लेकिन जिंदगी पूरे विरोध से मिलकर बनी है। सब चीजें विरोधी हैं। इसलिए जो पूरी जिंदगी को समझने जाएगा वह सब तरफ के विरोधों को स्वीकार करेगा।

अनुभूति सीढ़ी चढ़ने जैसी नहीं है। अनुभूति छत से कूदने जैसी है। उसमें कोई सीढ़ियां नहीं होती। लेकिन हमारा मन चढ़ना चाहता है। और अहंकार चढ़ने में रस लेता है,उतरने में रस नहीं लेता और अहंकार निरंतर कहता है चढ़ो कहीं ऊपर--और एक सीढ़ी, और एक सीढ़ी,और एक सीढ़ी। फिर सीढ़ियां किसी भी चीज़ की हों। इसलिए अहंकार मार्ग पकड़ता है,टेकनीक पकड़ता है,गुरु पकड़ता है,शास्त्र पकड़ता है,सब पकड़ता है। और धर्म कहता है कूद जाओ,चढ़ने का यहां कहीं उपाय नहीं है,बिल्कुल उतर जाओ,जहां तक उतर सकते हो और उतरना भी हो सकता था अगर सीढ़ियां होती। सीढ़ियां हैं ही नहीं,कूद ही सकते हो। छलांग लगा सकते हो। यह जो छलांग लगाने की हिम्मत नहीं जुटती है,तो हम कहते हैं कि यह ज्यादा हो गया,इसे थोड़ा सिम्पल करो,सरल करो.टेकनिक से,व्यवस्था से ताकि हम उसको टुकड़े-टुकड़े में पा लें। किंतु वह किस्तों में नहीं मिलता।

गुरुवार, 10 मई 2012

अतीत की मृत्यु और शून्यता

एक संन्यासी ने अपने शिष्य को एक दिन कहा कि तू बहुत दिन मेरे पास रहा है। अब मैं तुझे कहीं और भेजता हूं। ताकि मैंने तुझसे जो कहा है वह और ठीक से समझ ले। तो उसको एक दूसरे संन्यासी के पास भेजा कि तू जा और उसके पास रह और उसकी जीवन चर्या को देख।

वह वहां गया। सुबह से शाम तक उसने दिनचर्या को देखा। उसमें कुछ भी नहीं था। वह संन्यासी एक छोटी-सी सराय का रखवाला था। वह संन्यासी भी नहीं था। साधारण कपड़े पहनता था। लेकिन उसके गुरु ने उसे वहां भेजा,तो गया। वह सुबह से शाम तक देखता रहा,वहां तो कुछ भी नहीं था। वह आदमी है,रखवाला है,रखवाली करता है। सराय साफ करता है। मेहमान ठहरते हैं,उनके कमरे साफ करता है। मेहमान जाते हैं,उनके कमरे साफ करता है। उसने दो-चार दिन देखा तो ऊब गया। वहां तो कोई बात ही नहीं थी,चर्या की कोई बात ही नहीं थी। चलते वक्त उसने कहा,सब देख लिया,जिसके लिए मेरे गुरु ने भेजा था। सिर्फ दो बातें मैं नहीं देख पाया हूं: रात को सोते समय आप क्या करते हैं,वह मुझे पता नहीं है और सुबह उठते वक्त आप क्या करते हैं,वह मुझे पता नहीं। यह मुझे बता दें। मैं वापस लौट जाऊं।

संन्यासी ने कहा,कुछ नहीं करता। दिन भर मैं सराय के जो बरतन गंदे हो जाते हैं,रात में उनको साफ करके रख देता हूं और सुबह जब उठता हूं तो रात भर उनपर थोड़ी बहुत धूल जम जाती है, तो उन्हें मैं फिर पोंछ देता हूं। बस इससे ज्यादा कुछ नहीं करता।

शिष्य ने वापस लौटकर गुरु से कहा,कहां तुमने मुझे भेज दिया। एक साधारण सराय के रखवाले के पास! उस नासमझ से मैंने पूछा,तो न तो वह प्रार्थना करता है,न ध्यान,न कुछ। वह मुझसे बोला,रात बरतन साफ कर देता हूं,जो दिन भर गंदे हो जाते हैं। और सुबह थोड़ी धूल जम जाती है तो फिर उसे पोंछ देता हूं।

उसके गुरु ने कहा--कह दिया उसने। जो कहने-जैसा था,उसने वह कह दिया। सारा ध्यान,सारी समाधि,सब कह दिया। तू समझा नहीं। दिन भर बरतन गंदे हो जाते हैं,सांझ को उन्हें पोंछ कर साफ कर दो। रात भर में सपनों की थोड़ी धूल जम जाएगी,सुबह में फिर पोंछ डालो और खाली हो जाओ।मरते जाएं,रोज-रोज धूल इकट्ठी न करें। रोज मर जाएं,सांझ को मर जाएं। जो हो गया उसके प्रति मर जाएं। वह जो बीत गया उसको मन में जगह न दें,उसे पोंछ दें,उसके प्रति मर जाएं। उसे छोड़ दें। वह स्मृति से ज्यादा कुछ भी नहीं। उस कचरे को अलग करें। शांत हो जाएं,चुप हो जाएं,शून्य हो जाएं। सुबह उठें जैसे कोई शून्य उठा हो,जिसका कोई आगा-पीछा नहीं है। दिन भर ऐसे जिएं जैसे सब शून्य है। बाहर सब हो रहा है,भीतर शून्य है। अगर सतत इस शून्य का भीतर स्मरण हो तो धीरे-धीरे वह गड्ढ़ा तैयार हो जाता है,जिसमें परमात्मा का अवतरण होता है और अमृत की वर्षा होती है। खाली हो जाएं-परमात्मा आपको भर देगा। इसके सिवा और कोई महत्त्वपूर्ण बात नहीं है। खाली हो जाएं--परमात्मा आपको भर देगा। भर जाएं--परमात्मा आपको खाली कर देगा।

रविवार, 6 मई 2012

बचें हर चार सेकंड में डिमेंशिया की दस्तक से

इस समय विश्व में महामारी के स्तर पर एक रोग उभर रहा है जिसके दस प्रतिशत से अधिक शिकार भारत में हैं। रोग का नाम है डिमेंशिया। यह एक सिंड्रोम है जिसके विकास में मस्तिष्क के बहुत से विकार सहायक होते हैं। इस सिंड्रोम के चलते धीरे-धीरे या कभी बहुत तेजी से मस्तिष्क का क्षय होने लगता है और अंतत: व्यक्ति को समय और स्थान का बोध समाप्त होने लगता है,भाषा कभी समझ आती है और कभी नहीं,लोगों को पहचानने की शक्ति कम या बिल्कुल समाप्त हो जाती है,दैनिक क्रिया-कलापों को करना लगभग असंभव हो जाता है।

इस समय पूरे विश्व में लगभग साढ़े तीन करोड़ लोग डिमेंशिया से ग्रस्त हैं,जिनमें से सैंतीस लाख लोग भारत में हैं। वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार सत्तर लाख लोग हर साल डिमेंशिया के शिकार हो रहे हैं,अर्थात हर चार सैकिंड में विश्व में कहीं न कहीं कोई इसकी चपेट में आ रहा है।

डब्लू एच ओ की इस नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार सन्2030 तक छह करोड़ और 2050 तक कोई पंद्रह करोड़ लोग विश्व में डिमेंशिया से ग्रस्त होंगे। सबसे अधिक क्षति भारत,चीन और ब्राज़ील की होगी क्योंकि अपवाद छोड़कर यह रोग 60 वर्ष की आयु के ऊपर ज्यादा संभावित होता है और शीघ्र ही ये देश संसार में वृद्धों की सबसे बड़ी जनसंख्या लिए होंगे।

जन्म के पहले क्षण से लेकर मनुष्य के अंतिम क्षण तक मस्तिष्क क्रियाशील रहता है,हमारे शरीर और मन में होने वाली एक-एक क्रिया को संचालित भी करता है और उनसे प्रभावित भी होता है। इस सतत क्रियाशील यंत्र को अन्य किसी भी यंत्र की तरह सुचारू रूप से चलते रहने के लिए समुचित व्यायाम और विश्राम की जरूरत है। इस यंत्र का विश्राम है अपनी स्वाभाविक स्थिति में केवल शारीरिक क्रियाओं का संचालन करना,और व्यायाम है-अनजान परिस्थितियों का सामना,खोज,अन्वेषण,सृजन। व्यर्थ की मानसिक उहापोह इसका व्यायाम नहीं,इस पर अतिरिक्त बोझ हैं। और आधुनिक जीवन शैली में तो ये बोझ अतिरिक्त ही नहीं अतिशय हो चलें है- चैनल दर चैनल टीवी के कार्यक्रम,विज्ञापन,खबरें,सोशल नेटवर्किंग साइट्स...। न मस्तिष्क को विश्राम है,और मजे की बात कि समुचित व्यायाम भी नहीं।

ओशो कहते हैं,कोई जरूरत नहीं है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ मस्तिष्क की क्षमता कम होती जाए। मस्तिष्क अंतिम क्षण तक युवा और तरोताजा रह सकता है, यदि हम मन को मौन करने की कला सीख जाएं। दिन में कम से कम कुछ क्षण ऐसे हों जब आप मौन में डूबें। जैसे-जैसे यह कला गहराती जाएगी,आप पाएंगे कि दिन में कई क्षण आते हैं जब आपका मन नहीं चल रहा,आप पूरी तरह से मौन में हैं। ये क्षण मस्तिष्क के लिए विश्राम के होंगे। विश्राम के बाद मस्तिष्क और स्पष्ट होकर,और शुद्ध होकर,और ऊर्जा से भरकर आपका सहयोगी होगा।

कनाडा में डिमेंशिया पर एक लंबी क्लिनिकल शोध के बाद यह पाया गया कि अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त जो लोग किसी दूसरी भाषा का भी उपयोग करते हैं,उनमें डिमेंशिया की संभावना एकभाषी लोगों की तुलना में कुछ कम होती है। इस निष्कर्ष का विश्लेषण करते हुए यह कहा गया कि दूसरी भाषा का उपयोग करते हुए हमारे मस्तिष्क में विश्राम और व्यायाम की एक लय चलती है। उस समय मस्तिष्क में अनुवाद की सतत प्रक्रिया एक व्यायाम होती है और बीच के गैप में एक विश्राम।

हो सकता है यह शोध उन लोगों के संबंध में बहुत सच हो जो किसी अन्य भाषा को नया-नया सीख रहें हों या उसमें कभी भी पूरी तरह पारंगत न हो पाए हों। लेकिन पूरी तरह पारंगत हो गए लोगों में यह गतिविधि बहुत कम होगी।

आइए इसी मनोशारीरिक तथ्य के परिप्रेक्ष्य में जिबरिश की बात करें। जो कि ओशो ने हमें एक ध्यानविधि की तरह दी है। यह मन के लिए एक संपूर्ण विश्राम है। जिबरिश करते समय,ओशो कहते हैं हम अनर्गल शब्द बोलें जिनका कोई अर्थ न हो। वे कहते हैं इसका उपयोग हम रेचन की तरह न करें। बल्कि ऐसे करें जैसे कि एक ऐसी भाषा बोल रहें हैं जो हम नहीं जानते। ऐसी भाषा बोलते हुए निश्चित ही सोचने की प्रक्रिया रुक जाएगी और मस्तिष्क को विश्राम मिलेगा। आप को जब पता ही नहीं कि आप क्या बोल रहे हैं,तो उसके साथ कोई भाव भी नहीं जुड़े होंगे। आप केवल एक बच्चे की तरह उस बोलने का आनंद लेंगे। यह क्रिया मस्तिष्क के लिए ऐसी ही है जैसे कि शरीर के लिए स्विमिंग या जॉगिंग-स्वास्थ्यकारी।

उसके बाद,ओशो कहते हैं कि हम शरीर को बिलकुल लेट गो में छोड़कर लेट जाएं-जैसे स्विमिंग के बाद बीच पर लेटे हुए नर्म धूप का आनंद।

आइए मौन हों,आनंदित हों और बचें हर चार सेकंड में डिमेंशिया की दस्तक से।

-संजय भारती
संपादक,यैस ओशो,
मई-2012माह के अंक का संपादकीय

शुक्रवार, 4 मई 2012

मजनू की आंख

मजनू को उसके गांव के राजा ने पकड़वा लिया था। गांव भर में चर्चा थी कि वह पागल हो गया है लैला के लिए। उसने बार-बार लैला को देखने की कोशिश की। बड़ी मुश्किल में पड़ा। लैला बहुत साधारण लड़की थी। फिर भी मजनू पागल हो गया।

राजा ने मजनू को बुलाया और कहा,"तू पागल तो नहीं है! लैला बड़ी साधारण लड़की है। मैंने बहुत सुंदर लड़कियां तेरे लिए बुला कर रखी हैं,उनको देख और जो तुझे पसंद हो उसके साथ तेरा विवाह कर दें।लेकिन लैला को भूल जा। लैला बड़ी साधारण लड़की है।"

मजनू हंसने लगा। उसने राजा से कहा कि शायद आपको पता नहीं,लैला को देखने के लिए मजनू की आंख चाहिए। मेरी आंख है आपके पास?

राजा ने कहा,"तेरी आंख मेरे पास कैसे हो सकती है!!!"

तो मजनू ने कहा,"फिर छोड़िए खयाल,आप लैला को न देख पाएंगे। लैला को मजनू देख सकता है। मजनू की आंख ही लैला को देख सकती है।" 
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मंगलवार, 1 मई 2012

चित्त की शांति और युद्ध

एक मुसलमान खलीफा था-उमर। सात वर्षों से एक दुश्मन के साथ उसकी लड़ाई चलती रही। यह संघर्ष बहुत भयंकर हो गया था। किसी के जीतने की कोई उम्मीद नहीं मालूम पड़ती थी। ऐसा नहीं लगता था कि कोई निर्णायक फैसला हो सकेगा। लेकिन सातवें वर्ष में निर्णायक फैसला होने के करीब आ गया। हाथ में आ गया वह क्षण जब निर्णय हो सकता था। उमर ने दुश्मन को गिरा दिया युद्ध के मैदान में और उसकी छाती पर सवार हो गया। वह कंधे में बंधे हुए भाले को निकाल कर दुश्मन की छाती पर भोंकने को है कि नीचे पड़े दुश्मन ने उमर के मुंह पर थूक दिया। मरता भी तो कुछ कर सकता है। आखरी अपमान तो वह कर ही सकता था।

उमर एक क्षण रुक गया और अपने भाले को वापिस रख लिया और रूमाल से मुंह पोंछ लिया। उसने नीचे पड़े दुश्मन से कहा-"दोस्त,अब लड़ाई कल सुबह फिर शुरू होगी।" लेकिन नीचे पड़ा दुश्मन कहने लगा-"पागल हो गए हो? इस मौके की तलाश में तुम सात वर्षों से थे,आज तुम्हारे पैरों के नीचे पड़ा हूं। तुम छाती पर सवार हो,मैं निहत्था हूं। मेरा हथियार छूट गया है। मेरा घोड़ा मर गया है। इस मौके को मत छोड़ो। यह मौका दुबारा आएगा,इसकी कोई उम्मीद न करो। भाले को उठा लो और मेरी छाती में भोंक दो। तुमने तो भाला उठा लिया था,फिर रोक क्यों लिया? तुम तो मारने के करीब थे।"

उमर ने कहा-"मेरी जिंदगी में हमेशा एक खयाल रहा -लड़ूंगा जरूर,लेकिन अशांत होकर नहीं। तुमने थूका और मैं अशांत हो गया। सात वर्षों से लड़ाई शांति से चल रही थी। मैं शांत था। लड़ाई बाहर की थी,भीतर की नहीं थी। एक क्षण को भी तुम्हारे प्रति मेरे मन में क्रोध न था। लड़ना एक सिद्धांत का था। लड़ाई एक तल पर थी,लेकिन मैं लड़ाई के बाहर था। लड़ रहा था सात वर्षों से युद्ध के मैदान में,लेकिन मैं युद्ध के मैदान में होते हुए भी युद्ध के बाहर था। मुंह पर थूक कर तुमने युद्ध के बीच मुझे खींच लिया है। मेरी भीतर की शांति डवांडोल हो गई,मेरा निर्णय चूक गया। नहीं,अब मैं भाला नहीं उठा सकता। कल सुबह मैं शांत होकर आ सकूंगा।"

लेकिन फिर दूसरे दिन लड़ाई नहीं हुई। क्योंकि ऐसे आदमी से लड़ना मुश्किल है। दुश्मन उमर के पैरों पर गिर पड़ा। उसने कहा- "मुझको भी तुम्हारी आंखों को देखकर ऐसा लगता था कि तुम लड़ते जरूर थे,लेकिन तुम्हारी आंखें कहती हैं कि कोई लड़ाई नहीं है। हां,परीक्षा के लिए थूक कर देखा था कि आज तुम्हारी आंखें बदलती हैं या नहीं। और तुम्हारे भाले पर रुक जाना याद दिला गया कि ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो युद्ध के मैदान में हों और युद्ध में न हों।"