सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

चित्त की शांति और युद्ध

एक मुसलमान खलीफा था-उमर। सात वर्षों से एक दुश्मन के साथ उसकी लड़ाई चलती रही। यह संघर्ष बहुत भयंकर हो गया था। किसी के जीतने की कोई उम्मीद नहीं मालूम पड़ती थी। ऐसा नहीं लगता था कि कोई निर्णायक फैसला हो सकेगा। लेकिन सातवें वर्ष में निर्णायक फैसला होने के करीब आ गया। हाथ में आ गया वह क्षण जब निर्णय हो सकता था। उमर ने दुश्मन को गिरा दिया युद्ध के मैदान में और उसकी छाती पर सवार हो गया। वह कंधे में बंधे हुए भाले को निकाल कर दुश्मन की छाती पर भोंकने को है कि नीचे पड़े दुश्मन ने उमर के मुंह पर थूक दिया। मरता भी तो कुछ कर सकता है। आखरी अपमान तो वह कर ही सकता था।

उमर एक क्षण रुक गया और अपने भाले को वापिस रख लिया और रूमाल से मुंह पोंछ लिया। उसने नीचे पड़े दुश्मन से कहा-"दोस्त,अब लड़ाई कल सुबह फिर शुरू होगी।" लेकिन नीचे पड़ा दुश्मन कहने लगा-"पागल हो गए हो? इस मौके की तलाश में तुम सात वर्षों से थे,आज तुम्हारे पैरों के नीचे पड़ा हूं। तुम छाती पर सवार हो,मैं निहत्था हूं। मेरा हथियार छूट गया है। मेरा घोड़ा मर गया है। इस मौके को मत छोड़ो। यह मौका दुबारा आएगा,इसकी कोई उम्मीद न करो। भाले को उठा लो और मेरी छाती में भोंक दो। तुमने तो भाला उठा लिया था,फिर रोक क्यों लिया? तुम तो मारने के करीब थे।"

उमर ने कहा-"मेरी जिंदगी में हमेशा एक खयाल रहा -लड़ूंगा जरूर,लेकिन अशांत होकर नहीं। तुमने थूका और मैं अशांत हो गया। सात वर्षों से लड़ाई शांति से चल रही थी। मैं शांत था। लड़ाई बाहर की थी,भीतर की नहीं थी। एक क्षण को भी तुम्हारे प्रति मेरे मन में क्रोध न था। लड़ना एक सिद्धांत का था। लड़ाई एक तल पर थी,लेकिन मैं लड़ाई के बाहर था। लड़ रहा था सात वर्षों से युद्ध के मैदान में,लेकिन मैं युद्ध के मैदान में होते हुए भी युद्ध के बाहर था। मुंह पर थूक कर तुमने युद्ध के बीच मुझे खींच लिया है। मेरी भीतर की शांति डवांडोल हो गई,मेरा निर्णय चूक गया। नहीं,अब मैं भाला नहीं उठा सकता। कल सुबह मैं शांत होकर आ सकूंगा।"

लेकिन फिर दूसरे दिन लड़ाई नहीं हुई। क्योंकि ऐसे आदमी से लड़ना मुश्किल है। दुश्मन उमर के पैरों पर गिर पड़ा। उसने कहा- "मुझको भी तुम्हारी आंखों को देखकर ऐसा लगता था कि तुम लड़ते जरूर थे,लेकिन तुम्हारी आंखें कहती हैं कि कोई लड़ाई नहीं है। हां,परीक्षा के लिए थूक कर देखा था कि आज तुम्हारी आंखें बदलती हैं या नहीं। और तुम्हारे भाले पर रुक जाना याद दिला गया कि ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो युद्ध के मैदान में हों और युद्ध में न हों।"

टिप्पणियाँ

  1. अद्भुत प्रसंग.. इसी से याद आया.. ओहो कहते हैं कि आजकल के युद्ध वास्तव में युद्ध हैं ही नहीं, आसमान से बम गिरा दिया और लाखों की आबादी समाप्त.. जबकि प्राचीन काल में शस्त्रों से वैसे ही युद्ध हुआ करते थे जैसा इस प्रसंग में वर्णित है.. जहाँ लड़ने वाले शत्रु नहीं केवल विरोधी हुआ करते थे..!!
    मन को शीतलता प्रदान करने वाली कथा!!

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चमार राष्ट्रपति

लिंकन अमेरिका का राष्ट्रपति हुआ । उसका बाप एक गरीब चमार था । कौन सोचता था कि चमार के घर एक लड़का पैदा होगा, जो मुल्क में आगे खड़ा हो जाएगा ? अनेक-अनेक लोगों के मन को चोट पहुँची । एक चमार का लड़का राष्ट्रपति बन जाए । दूसरे जो धनी थे और सौभाग्यशाली घरों में पैदा हुए थे, वे पिछड़ रहे थे । जिस दिन सीनेट में पहला दिन लिंकन बोलने खड़ा हुआ, तो किसी एक प्रतिस्पर्धी ने, किसी महत्वाकांक्षी ने, जिसका क्रोध प्रबल रहा होगा, जो सह नहीं सका होगा, वह खड़ा हो गया । उसने कहा, "सुनों लिंकन, यह मत भूल जाना कि तुम राष्ट्रपति हो गए तो तुम एक चमार के लड़के नहीं हो । नशे में मत आ जाना । तुम्हारा बाप एक चमार था, यह खयाल रखना ।" सारे लोग हँसे, लोगों ने खिल्ली उड़ाई, लोगों को आनंद आया कि चमार का लड़का राष्ट्रपति हो गया था । चमार का लड़का कह कर उन्होंने उसकी प्रतिभा छीन ली ।फिर नीचे खड़ा कर दिया । लेकिन लिंकन की आँखें  खुशी के आँशुओं से भर गई । उसने हाथ जोड़ कर कहा कि मेरे स्वर्गीय पिता की तुमने स्मृति दिला दी, यह बहुत अच्छा किया । इस क्षण में मुझे खुद उनकी याद आनी चाहिए थी । लेकिन मैं तुमसे कहूँ, मैं…

राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी

आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं । कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं । जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है । आइए हम हिंदी के इन विभिन्न रूपों को विधिवत समझ लें, ताकि हमारे मन-मस्तिष्क में स्पष्टता आ जाए ।
राष्ट्रभाषा से अभिप्राय: है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा । क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है ? यद्यपि हिंदी का व्यवहार संपूर्ण भारतवर्ष में होता है,लेकिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है । चूँकि भारतवर्ष सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई दृष्टि से विविधताओं का देश है । इस राष्ट्र में किसी एक भाषा का बहुमत से सर्वमान्य होना निश्चित नहीं है । इसलिए भारतीय संविधान में देश की चुनिंदा भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा है । शुरु में इनकी संख्या 16 थी , जो आज बढ़ कर 22 हो गई हैं । ये सब भाषाएँ भारत की अधिकृत भाषाएँ हैं, जिनमें भारत देश की सरकारों का काम होता है । भारतीय मुद्रा नोट पर 16 भाषाओं में नोट का मूल्य अंकित रहता है और भारत सरकार इन सभी भाषाओं के विकास के लिए संविधान अनुसा…

मेरी सेवानिवृत्ति

एक दिन मैं भी
ऐसे ही सेवानिवृत्त हो
कर
जाउंगा कार्यालय से

लोग अनमने मन से
मुझे भी कुछ हार पहनाएंगे
थोड़े मेरी प्रशंसा में
वे शब्द कहेंगे
जिनमें न रस होगा
न ताज़गी
और फिर खाने-पीने
का दौर शुरु हो जाएगा

तब मैं घर लौट आऊंगा
और लोग धीरे-धीरे
मुझे भूल जाएंगें
कार्यालय वैसे ही चलता
रहेगा
जैसे आज चलता है
बस मैं न रहूंगा
न मेरे हस्ताक्षर होंगे
0
0
0
होगा एक विराट शून्य
जिसमें धीरे-धीरे
सब समा जाएगा
और अस्तित्व अपनी
एक महायात्रा पूरी
कर चुका होगा