मंगलवार, 1 मई 2012

चित्त की शांति और युद्ध

एक मुसलमान खलीफा था-उमर। सात वर्षों से एक दुश्मन के साथ उसकी लड़ाई चलती रही। यह संघर्ष बहुत भयंकर हो गया था। किसी के जीतने की कोई उम्मीद नहीं मालूम पड़ती थी। ऐसा नहीं लगता था कि कोई निर्णायक फैसला हो सकेगा। लेकिन सातवें वर्ष में निर्णायक फैसला होने के करीब आ गया। हाथ में आ गया वह क्षण जब निर्णय हो सकता था। उमर ने दुश्मन को गिरा दिया युद्ध के मैदान में और उसकी छाती पर सवार हो गया। वह कंधे में बंधे हुए भाले को निकाल कर दुश्मन की छाती पर भोंकने को है कि नीचे पड़े दुश्मन ने उमर के मुंह पर थूक दिया। मरता भी तो कुछ कर सकता है। आखरी अपमान तो वह कर ही सकता था।

उमर एक क्षण रुक गया और अपने भाले को वापिस रख लिया और रूमाल से मुंह पोंछ लिया। उसने नीचे पड़े दुश्मन से कहा-"दोस्त,अब लड़ाई कल सुबह फिर शुरू होगी।" लेकिन नीचे पड़ा दुश्मन कहने लगा-"पागल हो गए हो? इस मौके की तलाश में तुम सात वर्षों से थे,आज तुम्हारे पैरों के नीचे पड़ा हूं। तुम छाती पर सवार हो,मैं निहत्था हूं। मेरा हथियार छूट गया है। मेरा घोड़ा मर गया है। इस मौके को मत छोड़ो। यह मौका दुबारा आएगा,इसकी कोई उम्मीद न करो। भाले को उठा लो और मेरी छाती में भोंक दो। तुमने तो भाला उठा लिया था,फिर रोक क्यों लिया? तुम तो मारने के करीब थे।"

उमर ने कहा-"मेरी जिंदगी में हमेशा एक खयाल रहा -लड़ूंगा जरूर,लेकिन अशांत होकर नहीं। तुमने थूका और मैं अशांत हो गया। सात वर्षों से लड़ाई शांति से चल रही थी। मैं शांत था। लड़ाई बाहर की थी,भीतर की नहीं थी। एक क्षण को भी तुम्हारे प्रति मेरे मन में क्रोध न था। लड़ना एक सिद्धांत का था। लड़ाई एक तल पर थी,लेकिन मैं लड़ाई के बाहर था। लड़ रहा था सात वर्षों से युद्ध के मैदान में,लेकिन मैं युद्ध के मैदान में होते हुए भी युद्ध के बाहर था। मुंह पर थूक कर तुमने युद्ध के बीच मुझे खींच लिया है। मेरी भीतर की शांति डवांडोल हो गई,मेरा निर्णय चूक गया। नहीं,अब मैं भाला नहीं उठा सकता। कल सुबह मैं शांत होकर आ सकूंगा।"

लेकिन फिर दूसरे दिन लड़ाई नहीं हुई। क्योंकि ऐसे आदमी से लड़ना मुश्किल है। दुश्मन उमर के पैरों पर गिर पड़ा। उसने कहा- "मुझको भी तुम्हारी आंखों को देखकर ऐसा लगता था कि तुम लड़ते जरूर थे,लेकिन तुम्हारी आंखें कहती हैं कि कोई लड़ाई नहीं है। हां,परीक्षा के लिए थूक कर देखा था कि आज तुम्हारी आंखें बदलती हैं या नहीं। और तुम्हारे भाले पर रुक जाना याद दिला गया कि ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो युद्ध के मैदान में हों और युद्ध में न हों।"

3 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत प्रसंग.. इसी से याद आया.. ओहो कहते हैं कि आजकल के युद्ध वास्तव में युद्ध हैं ही नहीं, आसमान से बम गिरा दिया और लाखों की आबादी समाप्त.. जबकि प्राचीन काल में शस्त्रों से वैसे ही युद्ध हुआ करते थे जैसा इस प्रसंग में वर्णित है.. जहाँ लड़ने वाले शत्रु नहीं केवल विरोधी हुआ करते थे..!!
    मन को शीतलता प्रदान करने वाली कथा!!

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