गुरुवार, 17 मई 2012

चित्त की झील में तूफान

सुबह-सुबह एक झील के किनारे से नौका छूटी। कुछ लोग उस पर सवार थे। नौका ने झील में थोड़ा ही प्रवेश किया होगा कि जोर का तूफान आ गया और बादल घिर आए। नौका डगमगाने लगी। आज की नौका नहीं थी,दो हजार वर्ष पहले की थी। उसके डूबने का डर पैदा हो गया। जितने लोग उस नौका पर थे,सारे लोग घबरा गए। प्राणों का संकट खड़ा हो गया। लेकिन उस समय भी उस नौका पर एक आदमी शांत सोया हुआ था। उन सारे लोगों ने जाकर उस आदमी को जगाया और कहा कि क्या सो रहे हो और कैसे शांत बने हो!!!प्राण संकट में हैं,मृत्यु निकट है और नौका बचने की कोई उम्मीद नहीं है। तूफान बड़ा है और दोनों किनारे दूर हैं। 

उस शांत सोए हुए व्यक्ति ने आंखें खोली और कहा--कितने कम विश्वास के तुम लोग हो,कितनी कम श्रद्धा है तुममें। कहो झील से कि शांत हो जाए। वे लोग हैरान हुए कि झील किसी के कहने से शांत होती है! यह कैसी पागलपन की बात है! लेकिन वह शांत सोया हुआ आदमी उठा और झील के पास गया और उसने जाकर झील से कहा,झील! शांत हो जाओ! और आश्चर्यों का आश्चर्य कि झील शांत हो गई। 

यह आदमी जीसस क्राइस्ट था और झील गैलीली झील थी और उनके साथ दस-बारह मित्र थे। यह कहानी एकदम सच है। आज हर आदमी झील पर सवार है, हर आदमी नौका पर सवार है और कोई आदमी जब तक जीवन में है कभी जमीन पर नहीं है,हमेशा झील में है। एक भी दिन ऐसा नहीं है जब आंधी नहीं आती है,तूफान नहीं आता है। हम रोज ही तूफान में घिरे हैं। लेकिन अगर हममें श्रद्धा हो,आत्म-श्रद्धा,और हम झील से कह सकें कि शांत हो जाओ,तो झील निश्चिंत शांत हो जाती है।

कैसे हम उस झील को कहें जो अशांत बन गई? तूफान और आंधियों से पूर्ण उस चित्त की झील में कैसे शांति ला सकते हैं?

आपमें वह क्षमता आ सकती है कि आप आंख उठाकर झील की तरफ देख लें तो झील शांत हो जाएगी। यह कहने की भी जरूरत न पड़ेगी कि झील,शांत हो जाओ। क्योंकि तूफान हमारा ही पैदा किया हुआ है और आंधी हमारी पैदा की हुई है। जिस अशांति में हम खड़े हैं हुए हैं उसको जानने वाला कोई और नहीं,हम हैं। जिस अशांति को मैंने बनाया है,मैं चाहूं तो उसे इसी क्षण मिटा सकता हूं। और जिस अंधकार को मैंने निर्मित किया है उसको मिटाने की पूरी सामर्थ्य और शक्ति मुझमें है। मनुष्य कितना ही पाप करे और कितना ही अशांत हो और कितना ही दुख में हो और कितना ही पीड़ा में हो,एक सत्य स्मरण रख लेने जैसा है कि सब उसका अपना बनाया हुआ है। और इसी लिए इस सत्य में से एक आशा की किरण भी निकल आती है कि जो खुद का बनाया हुआ हो,उसे खुद मिटाने के हमेशा हकदार होते हैं।

शांति की आंख सत्य के दर्शन देने में समर्थ बनाती है। जब भीतर शांति होती है और भीतर के चित्त की झील पर कोई लहर नहीं होती है,कोई आंधी नहीं होती,तो हम दर्पण बन जाते हैं और परमात्मा का प्रतिबिम्ब हममें प्रतिफलित होने लगता है। तब हमारी अंतरात्मा अपनी गहराइयों में उस सत्य को प्रतिबिंबित करने लगती है,जो चारों तरफ व्याप्त है। लेकिन वह हमें दिखलाई नहीं पड़ता है। हम अशांत हैं इसलिए सुन नहीं पाते उस आवाज को जो चारों तरफ मौजूद है और हम इतने व्यस्त और उलझे हुए हैं कि देख नहीं पाते उस सत्य को जो चारों तरफ खड़ा है। काश,हम शांत हो जाएं,हमारा चित्त शांत हो जाए तो जो जानने-जैसा है वह जान लिया जाएगा और वह जो पाने जैसा है वह पा लिया जाएगा।

1 टिप्पणी:

  1. मन अगर शांत हो तो सत्य का दर्शन सुलभ हो जाता है। उत्तम विचार से सजी पोस्ट।

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