रविवार, 13 मई 2012

अनजाना जीवन

हमारे चित्त की पूरी व्यवस्था ऐसी है कि वह कहता है कि कहीं चलो। पूरा चित्त ही इस तनाव से बना है कि कहीं चलो-वहां जहां कहीं दूर मंजिल है। मन जीवित रहता है तनाव में। यह तनाव गहरे में कहीं पहुंचने का तनाव है-चाहे धन हो,चाहे यश हो,चाहे मोक्ष।

मन उस वक्त मर जाता है जिस वक्त आपने कहा--कहीं नहीं जाना है।

जहां हम खड़े हैं यदि वहीं हम अपनी सारी डिजायर को,सारे विचार को,सारी कामना को रोक लें तो हम जो हैं वह हमें पता चल जाएगा।

मजे की बात है कि मंजिल यहीं मौजूद है,अभी इसी वक्त। कहीं जाना नहीं है खोजने,सिर्फ ठहर जाना है।...असल में मजा यह है कि रास्ता मात्र बाहर जाने का होता है,क्योंकि अंदर तो हम हैं। लेकिन विचार बाहर कि यात्रा करता है।विचार में आप यहीं होते हुए भी कलकत्ता में हो सकते हैं। इसलिए भीतर जाने का सवाल नहीं है। हम बाहर किन-किन रास्तों से चले गए हैं,उन रास्तों को छोड़ देने का सवाल है असल में।

विचार चला गया है वासना के वाहन पर बैठ कर और हम वहीं हैं यानी यह आधारभूत सत्य खयाल में आ जाना चाहिए कि हम वहीं हैं,वासना के वाहन पर बैठ कर विचार चला गया है।विचार न जाए तो आप फौरन पाएंगे कि हम भीतर हैं।सिर्फ आप दिवा-स्वप्न में खो गए थे। यह बुनियादी सत्य है कि हम कभी अपने से बाहर गए ही नहीं।

एक बात अगर ठीक से खयाल में आ जाए तो सवाल सिर्फ इतना है कि हम जो विचार की किरण बाहर भेजते हैं वह वापस लौट आए और वापस लौटने के लिए भी कुछ होना नहीं है,सच में लौटने की बात नहीं है। सिर्फ कल्पना में हम बाहर चले गए हैं,जो लोभ पर सवार हो गई है। फिर मोक्ष,स्वर्ग,मुक्ति सब लोभ पर सवार हो गए हैं और इसी लोभ का शोषण कर रहा है गुरुॱ । गुरु लोभ का शोषण कर रहा है। इसलिए जिनको धन की तृप्ति हो जाएगी वह धर्म के लोभ में पड़ जाएंगे। वह कहेंगें धन तो मिल गया,ठीक है,अब मोक्ष भी चाहिए। इस लोभ का शोषण कर रहा है गुरुॱ। वह कह रहा है कि हम तुम्हें जो चीज चाहिए दिलवा देंगे। इसलिए सब गुरुडम भ्रांत है,खतरनाक है।

ठहरना अनरिपीटेबल एक्सपीरियंस है। क्योंकि हम कुछ करते नहीं हैं जिसको हम रिपीट कर सकें। कुछ करते तो रिपीट हो सकता था। हम कुछ करते नहीं हैं,हम सिर्फ होते हैं--तो एक रिजर्वायर हो जाता है माइंड पर--कहीं नहीं जा रहा है बाहर,कहीं नहीं जा रहा है,ठहर गया है। चारों तरफ बांध है,झरना एक झील बन गया है,कहीं जा नहीं रहा है,कहीं जाने की कोई बात ही नहीं,सब अनंत झील है,एक लहर भी नहीं है,तो सारी शक्ति,सारी ताजगी,सारा युवापन उस स्थिति में पैदा हो जाएगा। वह युवापन,वह शक्ति,वह डायनमिक फोर्स, वह रिपीट करेगी आटोमेटिक-जैसे वृक्ष से फूल आ रहा है,वैसे आपसे भी चीजें आएंगी। लेकिन आप फिर उनको कर नहीं रहे हैं,वह हो रहीं हैं और जब हो रहीं हैं तब आपके मन पर का बोझ गया। आपके मन पर कोई बोझ नहीं है,कोई भार नहीं है। ऐसी स्थिति में जो अनुभव होगा,वह अनुभव तो मुक्ति का है,निर्भार होने का है।

तो मूल प्रश्न माइंड को विदा करने का है और माइंड हमेशा सुरक्षा चाहता है। पर संन्यासी कहता है हम कोई सुरक्षा नहीं मानते,हम असुरक्षा में जीते हैं,हम नहीं कहते कि कल कुछ मिलेगा,कल सुबह देखेंगे। वह आदमी बुरा है या भला,हम क्यों सोचें? यदि वह बिस्तर से उठाकर ले जाएगा,तो ले जाएगा। यह मैं क्यों निर्णय लूं कि यह आदमी कैसा है? हम कुछ सोचते नहीं,हम जीते हैं चुपचाप एक-एक क्षण में। इतनी असुरक्षा में जो जीता है उसके माइंड में एक्सप्लोजन हो सकता है;क्योंकि माइंड फिर जी नहीं सकता,माइंड को मरना पड़ेगा।

जितनी सुरक्षा उतना मरा आदमी है। और मजा यह है कि भगवान के मामले में भी जोखिम लेने की तैयारी न हो,वहां भी हम पक्का करके ही चलें सब,तो फिर बहुत मुश्किल है। भगवान का मतलब यह है कि अनजान वह जो सागर है,उसमें हमें कूदना पड़ेगा,किनारे को छोड़ कर।

लेकिन जो परम खतरे में उतरने की तैयारी करता है,वह खतरे में उतरने की तैयारी ही उसके भीतर ट्रांसफर्मेशन बन जाती है क्योंकि इस खतरे में जाना बदल जाना है। सब व्यवस्था छोड़कर,सब सुरक्षा छोड़कर जो उतर जाता है अनजान में,यह उतरने की तैयारी ही,यह साहस ही उसके भीतर संकेत-चिह्न बनता है और उसके भीतर परिवर्तन हो जाता है।जितनी बड़ी असुरक्षा में हम जाने को तैयार हैं उतने ही हम वस्तुत: सुरक्षित हो जाते हैं--क्योंकि कोई भय न रहा,फिर कोई डर न रहा।

कुछ है जो निरंतर अनजाना है और वही परमात्मा है। वही जीवन है जो अनजाना है। जो मृत है कल उसके बाबत हम सुरक्षित हो सकते हैं;जो जीवित है वह कल कहां होगा,कुछ भी कहना मुश्किल है। जीवंत के साथ बड़ी कठिनाई है और हम सब व्यवस्था बनाकर उसको मार देते हैं। मजे की बात यह है कि जो भी सिस्टम बनाई जाए वह झूठी हो जाती है। झूठी इसलिए हो जाती है कि उसमें विरोध बरदास्त नहीं किए जा सकते। उसमें विरोध अलग कर देने पड़ते हैं।लेकिन जिंदगी पूरे विरोध से मिलकर बनी है। सब चीजें विरोधी हैं। इसलिए जो पूरी जिंदगी को समझने जाएगा वह सब तरफ के विरोधों को स्वीकार करेगा।

अनुभूति सीढ़ी चढ़ने जैसी नहीं है। अनुभूति छत से कूदने जैसी है। उसमें कोई सीढ़ियां नहीं होती। लेकिन हमारा मन चढ़ना चाहता है। और अहंकार चढ़ने में रस लेता है,उतरने में रस नहीं लेता और अहंकार निरंतर कहता है चढ़ो कहीं ऊपर--और एक सीढ़ी, और एक सीढ़ी,और एक सीढ़ी। फिर सीढ़ियां किसी भी चीज़ की हों। इसलिए अहंकार मार्ग पकड़ता है,टेकनीक पकड़ता है,गुरु पकड़ता है,शास्त्र पकड़ता है,सब पकड़ता है। और धर्म कहता है कूद जाओ,चढ़ने का यहां कहीं उपाय नहीं है,बिल्कुल उतर जाओ,जहां तक उतर सकते हो और उतरना भी हो सकता था अगर सीढ़ियां होती। सीढ़ियां हैं ही नहीं,कूद ही सकते हो। छलांग लगा सकते हो। यह जो छलांग लगाने की हिम्मत नहीं जुटती है,तो हम कहते हैं कि यह ज्यादा हो गया,इसे थोड़ा सिम्पल करो,सरल करो.टेकनिक से,व्यवस्था से ताकि हम उसको टुकड़े-टुकड़े में पा लें। किंतु वह किस्तों में नहीं मिलता।

2 टिप्‍पणियां:

  1. अनुभूति और अहंकार... छलांग और सीढियां, उतरना और चढना, सम्पूर्ण या किस्तों में.. पा लेना या दूर होते जाना..अद्भुत, मनोज भाई!!

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  2. ये खास बात है कि ये संसार हमें अपनी तरफ बहुत आकर्षित करता है

    अच्छे बुरे से परे हम इसको बारे के लिए परेशान होते है

    शानदार लेख

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