गुरुवार, 30 सितंबर 2010

कुछ मुक्तक

यूं तन्हाई में रहने की
आदत तो न थी
जमाने की बेवफाई ने
तन्हाई में रहना सीखा दिया

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एक सपना मैंने देखा
जो मेरा अपना था
वो ही बेगाना निकला
सपना क्या अपना और क्या बेगाना
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जानें क्यों उससे प्रीत लगाई
रातें क्यों उसके लिए जगाई
जाने क्यों वो दिल में समाई
वो ही जाने ये तो ....
मैं इतना ही जानूँ  कि प्रीत पराई
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जब जब मैं उसे देखूँ
मेरी आँखों से कुछ रिसता
हृदय की अतल गहराई में जा गिरता
मैं मिटता, गिरता आनंदित पुलकित होता
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शनिवार, 18 सितंबर 2010

साहित्य क्या है


साहित्य का आनंद हर पढ़े-लिखे व्यक्ति ने जिंदगी में अपने-अपने ढंग से लिया ही है और जब कभी वह कुछ अच्छा पढ़ता है तो उसे दूसरों में बाँटने का भाव भी उसमें उमगता ही है । आपस में बांटने के लिए उस आनंद का कुछ ब्यौरा भी देना पड़ता है । उसे यह बताना पड़ता है कि जो अच्छा लगा वह क्या है और वह उसे क्यों अच्छा लगा । इस अच्छे लगने के पीछे शब्द और उसके अर्थ-ग्रहण का भाव निहित है । 


संस्कृत में एक शब्द है : वाङ्मय अर्थात भाषा में जो कहा गया या लिखा गया हो वह वाङ्मय है । वाङ्मय के अंतर्गत समस्त ज्ञान आ जाता है ।  वाङ्मय के दो भेद माने गए हैं : शास्त्र और काव्य । शास्त्र के अंतर्गत सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान- चाहे वे भौतिक विज्ञान हों या फिर समाज विज्ञान या मानविकी । लेकिन जिसे साहित्य कहा जाता है वह विशुद्ध रूप से काव्य है । यह काव्य साहित्य क्यों कहा जाने लगा, इसे समझ लेना चाहिए । संस्कृत में काव्य की प्राचीनतम परिभाषा है : शब्दार्थो सहितौ काव्यम । शब्द और अर्थ का सहित भाव काव्य है । इस परिभाषा में सहित शब्द इतना महत्वपूर्ण है कि कालांतर में यह सहित भाव ही साहित्य के रूप में काव्य के लिए स्वीकृत कर लिया गया । आचार्य विश्वनाथ महापात्र ने साहित्य दर्पण ग्रंथ लिख कर साहित्य शब्द को प्रचलन में ला दिया ।

इस सहित शब्द में ऐसी कौन सी विशेषता रही जिसके कारण शब्द और अर्थ साहित्य के गुणधर्म को प्राप्त होते हैं ? साधारणत: देखें तो शब्द और अर्थ तो हर जगह साथ-साथ ही रहते हैं । क्या शास्त्र में शब्द और अर्थ साथ-साथ नहीं रहते ? फिर साहित्य के शब्द और अर्थ में क्या विशेष जुड़ जाता है कि वह एक अलग कोटि में रखा जाता है ? 

आचार्य कुंतक ने इन प्रश्नों का बहुत सुंदर समाधान प्रस्तुत किया । वे कहते हैं कि जब शब्द और अर्थ के बीच सुंदरता के लिए स्पर्धा या होड़ लगी हो तो साहित्य की सृष्टि होती है । सुंदरता की इस दौड़ में शब्द अर्थ से आगे निकलने की कोशिश करता है और अर्थ शब्द से आगे निकल जाने के लिए कसम खाता है और निर्णय करना कठिन हो जाता है कि कौन अधिक सुंदर है । शब्द और अर्थ की यह स्पर्धा ही सहित भाव है और साहित्य का मूल गुणधर्म भी यही है ।

तुलसी की एक पंक्ति है : वरदंत की पंगति कुंद कली अधराधर पल्लव खोलन की । यह राम के शिशु रूप का वर्णन है । शब्द भी सुंदर हैं और अर्थ भी । लेकिन कौन अधिक सुंदर है, यह कहना कठिन है । शब्द और अर्थ के बीच जैसे स्पर्धा लगी है । यह स्पर्धा ही सहित भाव है । इसलिए यह साहित्य है ।

सहित का जो भाव साहित्य का अपना धर्म है, वही मनुष्य के समाज की भी बुनियाद है । इसे परस्परता या आपसी संबंधों के रूप में देखा जा सकता है । मनुष्य सामाजिक प्राणी है । इसलिए वह अपने अलावा दूसरों के कृत्यों में भी रस लेता है औरों के सुख-दुख में शामिल होता है तथा औरों को भी अपने सुख दुख में साझीदार बनाना चाहता है । इतना ही नहीं बल्कि वह अपने इर्द-गिर्द की दुनिया को समझना चाहता है और इस दुनिया में कोई कमी दिखाई पड़ती है तो उसे बदल कर बेहतर बनाने की भी कोशिश करता है । परस्परता के इस वातावरण में ही प्रसंगवश वह चीज पैदा होती है जिसे साहित्य की संज्ञा दी गई है । दूसरी ओर जब मनुष्य की कोई वाणी समाज में परस्परता के इस भाव को मजबूत बनाती है तो वह भी साहित्य कहा जाता है । इस प्रकार साहित्य में निहित सहित शब्द का एक व्यापक सामाजिक अर्थ भी है जो उसके उद्देश्य और प्रयोजन की ओर संकेत करता है । 

जब कोई अपने और पराये की संकुचित सीमा से ऊपर उठ कर सामान्य मनुष्यता की भूमि पर पहुँच जाए तो समझना चाहिए कि वह साहित्य धर्म का निर्वाह कर रहा है । आचार्य राम चंद्र शुक्ल ने इसी को ह्रदय की मुक्तावस्था कहा है । 

इस प्रकार साहित्य के संसार में शब्द और अर्थ सौंदर्य के लिए आपस में स्पर्धा करते हुए लोकमंगल के ऊँचे आदर्श की ओर अग्रसर होते हैं ।   

बुधवार, 15 सितंबर 2010

जुंग के अनमोल विचार

  • खुशियों से सावधान रह । 
  • शांति ठीक वहां से शुरु होती है, जहां महत्त्वाकांक्षा का अंत हो ।
  • यदि यह जान लिया जाए कि परिग्रही अपनी प्रचुरता का कितना कम भोग-उपभोग कर पाते हैं, तो संसार से बहुत सी ईर्ष्या मिट जाए ।
  • ओ  इंसान ! अपने आप को जान; समस्त ज्ञान वहीं केन्द्रीभूत होता है ।
  • बादल चाहें पदवियां और जागीरें बरसा दें, दौलत चाहे हमें ढ़ूँढ़े, लेकिन ज्ञान को तो हमें ही खोजना पड़ेगा ।

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

व्यक्ति जितना अधिक मूल्यों के प्रति आस्थावान होता है, उसके जीवन में उतने ही अधिक कष्ट और कठिनाइयाँ आती हैं । कष्ट और कठिनाइयाँ अग्निपरीक्षा का काम करते हैं । - मनोज भारती 

सोमवार, 13 सितंबर 2010

अनुभव और आनंद

व्यक्ति संसार के अनुभवों की भट्ठी में जल कर ही आनंद रूपी कुंदन को प्राप्त होता है ।- मनोज भारती

रविवार, 12 सितंबर 2010

संबंध

मानवीय संबंध कभी नहीं टूटते, हमेशा व्यक्ति की अपेक्षाएँ टूटती हैं । इसलिए संबंध टूटते दिखाई पड़ते हैं । -मनोज भारती

शनिवार, 11 सितंबर 2010

अहंकार

अहंकार मनुष्य की नकारात्मक शक्ति है । जिसका बीज हर मनुष्य में होता है । आयु बढ़ने के साथ-साथ यह बीज अंकुरित,पल्लवित होता हुआ विकसित होता है । पर जब अहंकार अपने शिखर पर होता है, तो मनुष्य अपने जीवन के निम्नतम स्तर पर होता है । 

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

स्त्री और पुरुष

कोई पुरुष कभी भी किसी स्त्री से नहीं जीत सकता, क्योंकि पुरुष का उद्-गम स्त्री से है, उसे अस्तित्व में लाने वाली स्त्री है और पुरुष स्वयं अस्तित्व से बड़ा नहीं हो सकता ।-मनोज भारती

सोमवार, 6 सितंबर 2010

चमार राष्ट्रपति

लिंकन अमेरिका का राष्ट्रपति हुआ । उसका बाप एक गरीब चमार था । कौन सोचता था कि चमार के घर एक लड़का पैदा होगा, जो मुल्क में आगे खड़ा हो जाएगा ? अनेक-अनेक लोगों के मन को चोट पहुँची । एक चमार का लड़का राष्ट्रपति बन जाए । दूसरे जो धनी थे और सौभाग्यशाली घरों में पैदा हुए थे, वे पिछड़ रहे थे । जिस दिन सीनेट में पहला दिन लिंकन बोलने खड़ा हुआ, तो किसी एक प्रतिस्पर्धी ने, किसी महत्वाकांक्षी ने, जिसका क्रोध प्रबल रहा होगा, जो सह नहीं सका होगा, वह खड़ा हो गया । उसने कहा, "सुनों लिंकन, यह मत भूल जाना कि तुम राष्ट्रपति हो गए तो तुम एक चमार के लड़के नहीं हो । नशे में मत आ जाना । तुम्हारा बाप एक चमार था, यह खयाल रखना ।" सारे लोग हँसे, लोगों ने खिल्ली उड़ाई, लोगों को आनंद आया कि चमार का लड़का राष्ट्रपति हो गया था । चमार का लड़का कह कर उन्होंने उसकी प्रतिभा छीन ली ।फिर नीचे खड़ा कर दिया । लेकिन लिंकन की आँखें  खुशी के आँशुओं से भर गई । उसने हाथ जोड़ कर कहा कि मेरे स्वर्गीय पिता की तुमने स्मृति दिला दी, यह बहुत अच्छा किया । इस क्षण में मुझे खुद उनकी याद आनी चाहिए थी । लेकिन मैं तुमसे कहूँ, मैं उतना अच्छा राष्ट्रपति कभी न हो सकूँगा, जितने अच्छे चमार मेरे बाप थे । वे जितने आनंद से जूते बनाते थे, शायद मैं उतने आनंद से इस पद पर नहीं बैठ सकूँगा । वे अद्-भुत व्यक्ति थे । मैंने उन्हें जूते बनाते और गीत गाते देखा था । मैंने उन्हें दरिद्रता में और झोंपड़े में आनंद से मग्न देखा था । मेरी वह क्षमता नहीं, मेरी वह प्रतिभा नहीं । वे बड़े अद्-भुत थे, बहुत अलौकिक थे । मैं उनके समक्ष कुछ भी नहीं हूँ ।

यह जो लिंकन कह सका, एक दरिद्र वृद्ध चमार के बाबत, जिसने गीत गा कर जूते बनाए थे और जो आनंदित था और जो अपने से तृप्त था । उसे उसने स्वीकार किया था । जीवन में जो उसे था, उसके अनुग्रह से वह भरा था । उसके प्राण निस्पंद थे । वह किसी प्रतिस्पर्धा में न था । वह किसी दौड़ में न था । वह अपनी जिंदगी के आनंद में मग्न था ।

क्या तुम भी अपने जीवन में आनंद मग्न होने के खयाल को जन्म दे सकोगे ? क्या प्रतिस्पर्धा को छोड़कर अपने में , निज में, निजता में, कोई खुशी का कारण खोज सकोगे ? दूसरे के सुख में नहीं, अपने आनंद में क्या तुम कोई द्वार खोज सकोगे ? अगर खोज सको तो एक दुनिया बन सकती है, जो प्रेम की नगरी है । अन्यथा नहीं ।
( ओशो की पुस्तक "घाट भुलाना बाट बिनु" के " प्रेम नगर के पथ पर" प्रवचन का एक अंश )

शनिवार, 4 सितंबर 2010

संसार और दुनिया

संसार शब्द कब दुनिया शब्द के अर्थ में व्यवहार में आने लगा, मालूम नहीं । संसार शब्द का अर्थ दुनिया शब्द से नितांत भिन्न है । संसार शब्द का मूल अर्थ है : सम्यक् सार । अर्थात सार तत्त्व की बात । लेकिन दुनिया शब्द का अर्थ है : जहां दु का राज है अर्थात जहां द्वैत और द्वंद्व है । शायद नकली गुरुओं द्वारा सात्विक सार तत्त्व की बात को बहुत बार बिना अनुभव के दोहराया गया, तो द्वैत में जीने वालों ने संसार और दुनिया में अंतर करना छोड़ दिया और संसार शब्द भी दुनिया का पर्याय बन कर रह गया ।- मनोज भारती

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

प्रेम और प्रार्थना

हेनरी थोरो अमेरिका का एक बहुत बड़ा विचारक हुआ । वह मरने के करीब था । वह कभी चर्च में नहीं गया था । उसे कभी किसी ने प्रार्थना करते हुए नहीं देखा था । मरने का वक्त था, तो उसके गाँव का पादरी उससे मिलने गया । उसने सोचा यह मौका अच्छा है, मौत के वक्त आदमी घबड़ा जाता है । मौत के वक्त डर पैदा हो जाता है , क्योंकि अनजाना रास्ता है मृत्यु का । न मालूम क्या होगा ? उस समय भयभीत आदमी कुछ भी स्वीकार कर सकता है । मौत का शोषण धर्मगुरु बहुत दिनों से करते रहे हैं । इसलिए तो मंदिरों, मस्जिदों में बूढ़े लोग दिखाई पड़ते हैं । पादरी ने हेनरी थोरो से जाकर कहा, क्या तुमने अपने और परमात्मा के बीच शांति स्थापित कर ली है ? क्या तुम दोनों एक दूसरे के प्रति प्रेम से भर गए हो ? हेनरी थोरो मरने के करीब था । उसने आंखें खोली और कहा, "महाशय, मुझे याद नहीं पड़ता है कि मैं उससे कभी लड़ा भी हूँ । मेरा उससे कभी झगड़ा नहीं हुआ तो उसके साथ शांति स्थापित करने का सवाल कहाँ है ? जाओ, तुम शांति स्थापित करो, क्योंकि जिंदगी में तुम उससे लड़ते रहे हो । मुझे तो उसकी प्रार्थना करने की जरूरत नहीं है । मेरी जिंदगी ही प्रार्थना थी ।" कोई मरता हुआ आदमी ऐसा कहेगा, इसकी तो हम कल्पना नहीं कर सकते, लेकिन बड़ी सच्ची बात उसने यह कही कि अगर मैं उससे लड़ा होता, अगर एक पल को भी मेरे और उसके बीच कोई शत्रुता खड़ी हुई होती तो फिर मैं शांति स्थापित करने की कोशिश करता । 

( ओशो की किताब 'घाट भुलाना बाट बिनु '  के  प्रवचन 'प्रेम नगर के पथ पर ' से उद्धृत एक अंश )