सोमवार, 13 सितंबर 2010

अनुभव और आनंद

व्यक्ति संसार के अनुभवों की भट्ठी में जल कर ही आनंद रूपी कुंदन को प्राप्त होता है ।- मनोज भारती

7 टिप्‍पणियां:

  1. ਭੱਠੀ 'ਚ ਜਲਕੇ ਹੀ
    ਕੁੰਦਨ ਸੁੱਖ ਪਾਵੇਂਗਾ
    ਸੇਕ ਤੋਂ ਡਰਕੇ
    ਜੇ ਤੂੰ ਕੋਲ਼ ਹੀ ਨਾ ਆਵੇਂਗਾ
    ਜੀਵਨ ਦੇ ਨਿੱਘ ਤੋਂ ਵਾਝਾ ਰਹਿ ਜਾਵੇਂਗਾ.....
    भट्ठी में जलकर ही
    कुंदन-सुख पाएगा
    जलने से डर से
    अगर पास न आएगा
    जीवन का उष्ण कैसा तू पाएगा ?

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  2. उम्मीद करता हूँ कि यह ओशो ने नहीं कहा था.

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश कि शीघ्र उन्नत्ति के लिए आवश्यक है।

    एक वचन लेना ही होगा!, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वारूप की प्रस्तुति, पधारें

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  4. @ Bhushan जी
    @ उम्मीद करता हूँ कि यह ओशो ने नहीं कहा था.

    आपको स्पष्ट करना चाहिये कि क्या आप इस विचार को ओशो दर्शन के विपरीत मानते हैं?

    आग में तप कर ही सोना कुन्दन बनता है! यह मुहावरा ही इस विचार की पुरातनता का परिचायक है!

    अज्ञेय ने इसे यू कहा है कि " दुख हमें माझंता हैं" (नदी के द्वीप, पुस्तक से)

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  5. @ भूषण जी
    बचपन में ज्यामिति में प्रमेय के साथ उपप्रमेय पढाया जाता था, जो प्रमेय का विस्तार होता था… ओशो ने कई ऐसी बातें कही हैं जिनको अगर विस्तार में देखें तो अनगिनत ऐसे उपप्रमेय दिखाई देंगे... ज्यामिति भले ही गोले को एक वृत्त के रूप में देखती है किंतु ओशो के उपप्रमेय इस वृत्त को एक शून्य मानता है जिसकी परिधि में दुनिया का समस्त ज्ञान सन्निहित है!!

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  6. भारत भूषण जी, आपकी टिप्पणी आशय चाहती है ।
    आशा है स्पष्ट करेंगे ?

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  7. कई बार हम कुछ शब्दों के आधार पर अपनी टिप्पणी देते हैं. मेरी उपर्युक्त टिप्पणी इसी प्रकार की थी. भारतीय तत्त्व मनीषा में संसार रूपी अग्नि से बचने का प्रबंध किया जाता है. उसमें तपने और आनंद प्राप्त करके कुंदन बनने का भाव विवादी स्वर ही हो सकता है. ओशो तत्त्व ज्ञान के हिमायती हैं. ब्लॉग पर ओशो की छवि देख कर मैंने स्वाभाविक ही टिप्पणी की थी.

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