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August, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

My thoughts/मेरे विचार

SINCERITY comes from heart;hypocrites never know sincerity.In the existence only man tries to be perfect. Nothing but existence itself perfect.Nothing is transparent unless you have eyes to see through things.Without zest zenith never comes.Self image sets the boundaries of individual perspective.Without a good rapport no team exists. With a good rapport team definitely wins.BOSS stands for Big Offer to Sure Success. --------------------------------------------------------------- निष्कटता हृदय से आती है;ढ़ोंगी इसे कभी नहीं समझ सकते।अस्तित्व में मनुष्य ही पूर्ण होने का प्रयास करता है। परंतु अस्तित्व के अतिरिक्त कुछ भी पूर्ण नहीं है।जब तक चीजों को आर-पार देखने वाली आंखें न हों कुछ भी पारदर्शी नहीं है।जोश के बिना शिखर कभी नहीं आता।आत्म-छवि व्यक्ति की सीमाओं को निर्धारित करती है।सौहार्द के बिना टीम नहीं बन सकती। जहां सौहार्द है वह टीम अवश्य ही जीतती है।सुनिश्चित सफलता के लिए बड़ा प्रस्ताव, अंग्रेजी के शब्द बॉस का विस्तार है।

अन्ना हजारे होने के मायने

आज देश ने अन्ना हजारे को जितना प्यार और स्नेह दिया है,उतना देश की जनता ने शायद ही किसी ओर को दिया हो।अन्ना में ऐसा क्या है?जो उन्हें हमारे तथाकथित नेताओं से अलग करता है।पिछले बारह दिनों में अन्ना को मैंने जितना सुना,देखा और समझा है; उसके अनुसार अन्ना में अग्रलिखित गुण पाएं हैं:
1.कथनी और करनी में एकरूपता:: अन्ना हजारे हमारे समय के एक ऐसे युगपुरुष के रूप में उभरे हैं जिनकी कथनी और करनी एक है।वे जो बोले उस पर अडिग रहे।उनके हृदय की सरलता देखते ही बनती है।वे जो बोलते हैं,उसी के अनुरूप उनका कर्म है। दोहरापन या कूटनीति उनमें लेश मात्र भी नहीं है।वे विशुद्ध रूप से खरा सोना हैं।जिन्हें देश की जनता और युवा शक्ति पर पुरा भरोसा है।
2. निरहंकारिता: अन्ना जी में अहंकार और झूठे घमंड का तनिक भी दर्शन नहीं हुआ। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आंदोलन खड़ा किया,उसमें उनके हृदय की विशालता और इस निरंहकारिता का बहुत बड़ा योग है। देश में पहली बार ऐसा हुआ,जब किसी गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति ने देश को अपने साथ जोड़ा और इस पर उन्हें किसी प्रकार का गर्व या अहंकार किंचित भी न छू सका।सचमुच अन्ना एक संत छवि क…

मेरी सेवानिवृत्ति

एक दिन मैं भी
ऐसे ही सेवानिवृत्त हो
कर
जाउंगा कार्यालय से

लोग अनमने मन से
मुझे भी कुछ हार पहनाएंगे
थोड़े मेरी प्रशंसा में
वे शब्द कहेंगे
जिनमें न रस होगा
न ताज़गी
और फिर खाने-पीने
का दौर शुरु हो जाएगा

तब मैं घर लौट आऊंगा
और लोग धीरे-धीरे
मुझे भूल जाएंगें
कार्यालय वैसे ही चलता
रहेगा
जैसे आज चलता है
बस मैं न रहूंगा
न मेरे हस्ताक्षर होंगे
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होगा एक विराट शून्य
जिसमें धीरे-धीरे
सब समा जाएगा
और अस्तित्व अपनी
एक महायात्रा पूरी
कर चुका होगा


दोस्ती और शेयरिंग

आज एक दृष्टांत प्रस्तुत कर रहा हूँ; दोस्ती और दोस्ती में अपेक्षाओं का। दोस्त अक्सर परस्पर एक-दूसरे के साथ अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं और इन्हें आपस में बांट कर सांझा करते हैं। लेकिन दोस्ती में क्या जरुरी है कि दोस्त की हर अपेक्षा को पूरा किया जाए??? 
एक बार मेरे किसी मित्र ने ई-मेल मेल से मुझे कुछ फोटोग्राफ़ भेजे। उन्होंने जो चित्र मुझे भेजे,वे तकनीकी कारणों से मेरी मेल पर खुले नहीं। मैंने उन्हें,प्रत्युत्तर भेजा कि आपने जो फोटोग्राफ़ भेजे थे,वे खुल नहीं पा रहे हैं? कृपया इन्हें पुन:भेज दें। मित्र ने मुझ से मेरे ई-मेल का पॉस-वर्ड पूछा। मैंने उन्हें पासवर्ड नहीं दिया।इस बात को लेकर मित्र मुझ से नाराज़ हो गए। और उन्हें लगा कि मैं उन्हें मित्र नहीं मानता। मित्र मानता तो पॉसवर्ड देता? इसके बाद हमारे बीच में दूरियाँ बढ़ गई,जिन्हें मैं चाह कर भी खतम नहीं कर सका। क्या किसी मित्र को अपनी इस तरह की निजी और गोपनीय बातें भी बतानी चाहिएं??? 
कृपया पाठक गण अपनी राय व्यक्त कर मेरी समस्या का समाधान करें।

समाज और सत्य

"समाज में रहने के लिए'सत्य' जैसे खुले आकाश की नहीं; बल्कि बंद,अंधेरे कमरे जैसे 'झूठ' की ज्यादा जरूरत रहती है।" _मनोज भारती