रविवार, 30 अगस्त 2009

अस्तित्व

अस्तित्व
यह कैसा खेल
रच रहा
धरती को चिलम बना
उसमें जीवन का
तंबाखू डाल
और
तारों की सुलगती अग्नि भर
जलते कश भर रहा
और धुंध भरी सांसे
उगल रहा ।

शनिवार, 29 अगस्त 2009

डूबना-उबरना

हम
गिरते रहे
भावना के
एक ही
कुँए में
रोज
और
डूब गए
डूबते को
तिनके का
सहारा भी
न मिला
और
हम टूट गए
इस कदर
कि अब
रोज भावना से मिलना होता है,
हम प्रतिबिंबित भी होते हैं उसमें
पर डूबते नहीं ...
सार समझ में आ गया !

( स्वप्न मंजूषा शैल जी (अदा जी), ने इस अभिव्यक्ति को शीर्षक भी दिया और लेबल भी, मैं ह्रदय से आभारी हूँ ।)

प्रतिध्वनि

एक व्यक्ति अपने नन्हें बेटे के साथ पहाड़ों की यात्रा पर था एक जगह अचानक बेटे का पैर फिसला, उसे चोट लगी और मुँह से आह! की तेज ध्वनि निकली बच्चे ने सुना कि घाटियों में कोई और भी है जो उसके जैसी ही आवाज निकाल रहा है उसने जोर से चिल्लाकर पूछा-"तुम कौन हो ?" जवाब मिला - "तुम कौन हो ?" लड़का फिर बोला-"मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ ?" उत्तर आया- "मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ ?" बच्चे ने आश्चर्य से अपने पिता से इसका रहस्य जानना चाहा पिता ने मुस्कराते हुए कहा- "बेटा, यह तुम्हारी ही आवाज़ है, जो घाटियों द्वारा वापस लौटा दी गई है विज्ञान इसे इको (प्रतिध्वनि) कहता है लेकिन मेरे देखे हमारा जीवन भी कुछ ऐसा ही है तुम जो कुछ इसे दोगे यह वापस कर देता है यह हमारे कर्मों का प्रतिबिंब है तुम दुनिया में जितना प्यार देखना चाहते हो, उतना प्यार स्वयं में पैदा करो, जितनी क्षमता दुनिया में देखना चाहते हो, उतना खुद में विकसित करो, जितना सकारात्मक परिणाम पाना चाहते हो, उतने ही सकारात्मक प्रयास करो यह जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है "

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

झूठ और सच

एक बहुत पुरानी कथा है, शायद तब की जब कि परमात्मा ने यह दुनिया बनाई । कहते हैं कि परमात्मा ने जब यह दुनिया बनाई तो बहुत एक रूप और साम्यबद्ध बनाई । फिर परमात्मा ने देखा कि पृथ्वी पर कोई हलचल नहीं है । सब एकरूप और शिथिल सा है । तब परमात्मा ने पृथ्वी पर विरोधी तत्वों की कामना की । और एक सच की देवी तथा एक झूठ की देवी बनाई । दोनों में विपरीत्त गुण भरे । और उन दोनों को पृथ्वी पर भेजा । आकाश से जमीन पर आते-आते उनके कपड़े मैले हो गए । रास्ते की धूल जम गई । जब वे जमीन पर उतर रही थी, तो भोर के अंतिम तारे डूब रहे थे। सूर्य निकलने के करीब था । थोड़ी देर थी सूरज निकलने में । इसके पहले कि वे परमात्मा के संदेश के अनुसार पृथ्वी की यात्रा पर जाएं और अपना काम शुरु करें, झूठ की देवी ने सच की देवी से सरोवर में स्नान का प्रस्ताव रखा । दोनों देवियाँ कपड़े उतारकर सरोवर में स्नान करने को उतरी । सच की देवी तैरती हुई आगे चली गई, उसे कुछ भी पता न था कि उसके पीछे कोई धोखा हो जाने को है । झूठ की देवी किनारे पर वापस आई और सच की देवी के कपड़े पहन कर भाग खड़ी हुई, और तो और स्वयं के कपड़े भी साथ ही लेते गई । जब लौटकर सच की देवी ने देखा, तो वह हैरान हो गई । वह नग्न थी । उसके कपड़े वहां नहीं थे । सूर्य निकल चुका था । गाँव के लोग जागने लगे थे । उसके पास कोई चारा न था । वह छुपते-छिपाते झूठ की देवी का पीछा करने लगी । कुछ डरी सी, कुछ सहमी सी, कुछ सकुचाई सी । लेकिन कथा कहती है कि वह अब तक भी झूठ की देवी को पकड़ नहीं पाई है । झूठ की देवी अब भी सच की देवी के वस्त्र पहन कर घूम रही है । और सच की देवी छुपती-छुपाती उसके पीछे-पीछे भाग रही है । लेकिन जब कभी वह झूठ के सामने प्रत्यक्ष नग्न खड़ी हो जाती है, तो किसी को बर्दाश्त नहीं होता क्योंकि सभी के मुखौटे उतर जाते हैं । तब से संसार में हलचल और विविधता तो बहुत है, पर सब थोथा और झूठा । मुखौटों से लदे चेहरे, जो सच के सामने तिलमिला जाते हैं ।

विडम्बना

मां दुखी
पिता परेशान
कि
बेटा छब्बीस का
होने को आया
पर
मिली नहीं नौकरी

बाप परेशान
कि
दे नहीं सकता
घूस में लाखों

मां दुखी
कि
बेटा यूनिवर्सिटी तक
प्रथम श्रेणी में रहकर
भी है बेकार

और बेटा ...
अर्थ से बेअर्थ हुआ
जो कुछ अर्थ पाता
ले जाकर उसको
खरीदता कविता की पुस्तकें
ताकि
अपना खोया संतुलन पा सके
और संयमित हो सके

बुधवार, 26 अगस्त 2009

मां-बेटी

हर मां
एक बेटी
फिर भी
वह
बेटा चाहती
शायद
वह
जानती है
बेटी होने का
दुख !

सृजन की वेदना

सृजन के पथ पर
निकली हर आह
प्रसव वेदना को सहने का संबल है
जो मन मंजूषा भरी है
भावों से, उनकी आभा पीली है
क्योंकि हर भाव अपनी परिपक्वता में
इसी रंगत में आकर टूट जाता है

पीड़ा अपने चरम पर
आकर बिखर जाती है

सृजन की अंतिम घड़ियों में
वीणा से संगीत भी शांत हो जाता है

और
धीरे से आह निकलती है
कोई जन्म ले रहा है ।

जीवन-रहस्य

एक लहर उठी
और गिर गई

एक पतंग उड़ी
और कट गई

एक दोस्त मिला
और बिछुड़ गया

एक फूल खिला
और मूर्झा गया

एक आशा बंधी
और निराशा बनी

एक सुख आया
और दुख हो गया

एक दोस्त बना
और दुश्मन हो गया

एक सांस आई
और एक सांस गई

एक ऋतु आई
और दूसरी ऋतु गई

एक अपेक्षा की
और उपेक्षा हो गई

एक जमाना आया
और दूसरा जमाना गया

क्या परिवर्तन का दूसरा नाम
जीवन नहीं है ?

या कुछ है शाश्वत
अमिट, अमृत, आनंद

हे जीवन तुम्हीं
रहस्य खोलो

सौंदर्य-परख

मैं चंडीगढ़ में था । फरवरी का महीना था । चंडीगढ़ के रोज़-गार्डन में रोज़-फैस्टिवेल लगा था । मैं एक मित्र के साथ रोज़-फैस्टिवेल देखने गया था । पहले तो हमने मेले में लगे विभिन्न स्टालों को देखा । फिर गार्डन के एक ओर एकांत में जाकर बैठ गए और आस-पास की चहल-पहल के बारे में बात करने लगे । तभी मैंने पास की एक क्यारी से गुलाब का एक सुंदर फूल तोड़ लिया और उसे सूंघते हुए अपने मित्र से पूछा -" क्या तुम्हें गुलाब सुंदर नहीं लगते ?" मित्र ने कहा- "मुझे फूल इतने प्रिय और सुंदर लगते हैं कि इन्हें डाल से तोड़ते हुए भी मुझे पीड़ा होती है ।" मित्र के इस जवाब से मैं सन्न रह गया । मुझे अपनी भूल का अहसास होने लगा था ।

सोमवार, 24 अगस्त 2009

बेदर्दों की दुनिया

कितनी पीड़ा होती है
जब किसी पेड़ पर खुदा
दिल,तीर और प्रेम संदेश देखता हूँ
पर बेबस मैं कर ही क्या सकता हूँ

बस एक ही ख्याल मन में
आता है बार-बार
क्या प्रेम इतना अंधा और संवेदनहीन होता है
कि दर्द नहीं होता ऐसे पेड़ की छाती को चीरते हुए


क्या ऐसा प्रेम प्रेमिका की छाती का दर्द समझता है
या यूं ही उसे चीरने का सुख लेता है
और फिर छोड़ उसे एकाकी दूर निकल जाता है
एक दर्द का निशान हमेशा उसके कलेजे पर छोड़

फिर देखता हूँ -
कि पेड़ के जख्म भरते जाते हैं
और दिल,तीर उभरते जाते हैं
और नाम छाती में अमिट बने रहते हैं

मानो कह रहें हों कहानी उस प्रेम की
जो न केवल अंधा और संवेदनहीन है
बल्कि बेदर्द और बेसबब भी है
जो किसी को दर्द दे वह किसी को सुख कैसे दे देता है

पेड़ से इस बारे में
एक दिन पूछ बैठा
पेड़ ने कहा मत पूछो
उस दर्द की कहानी -
बस बेदर्दों की दुनिया में जीना है
तो छाती चिरवाने में खुशी समझो ।

रविवार, 23 अगस्त 2009

टूटते-सपने



चीन में एक अद्भूत फकीर हुआ च्वांगत्से । एक रात जब वह सोया था, तो उसने एक सपना देखा । उसने सपने में देखा कि वह तितली हो गया । खुले आकाश में, हवाएँ बह रहीं हैं और मुक्त तितली उड़ रही है । सुबह च्वांगत्से उठा और रोने लगा । उसके संबंधियों ने पूछा कि क्यों रोते हो ? च्वांगत्से ने कहा, मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूँ । रात मैंने एक सपना देखा कि मैं तितली हो गया हूँ और बाग-बगीचे में फूल-फूल पर डोल रहा हूँ । संबंधियों ने कहा, सपने हम सभी देखते हैं, इसमें परेशानी की क्या बात है ?


च्वांगत्से ने कहा, नहीं, मैं परेशान इसलिए हो रहा हूँ कि अगर च्वांगत्से रात सपने में तितली हो सकता है, तो यह भी हो सकता है कि तितली अब सपना देख रही हो कि वह च्वांगत्से नाम का आदमी हो गई है । जब आदमी सपने में तितली बन सकता है तो क्या तितली सपने में आदमी नहीं बन सकती ? मैं इसलिए मुश्किल में पड़ गया हूँ कि मैं च्वांगत्से हूँ, जिसने तितली का सपना देखा है या मैं हकीकत में एक तितली हूँ , जो अब च्वांगत्से का सपना देख रही है !


वस्तुत: न तो च्वांगत्से सपने में तितली बनता और न तितली च्वांगत्से । एक अदृश्य शक्ति दो तरह के सपने देखती है, वह रात में तितली बन जाती है, दिन में च्वांगत्से बन जाती है । लेकिन सब सपने टूट जाते हैं । क्या जीवन भी एक सपना नहीं है ? जो टूट जाता है और बिखर जाता है ।यदि वास्तव में ही जिंदगी सपना नहीं, तो क्या है ???



जीवन के प्रतिबिंब

जीवन क्या है ? निश्चित ही जीवन आधा-अधूरा नहीं है। क्योंकि मैंने इसमें पूर्णता का प्रतिबिंब देखा है और जिसमें पूर्णता प्रतिबिंबित हो सके,वह आधा-अधूरा कैसे हो सकता है ? यह व्यर्थ और सारहीन भी नहीं है। क्योंकि इसमें जो घटता है, उससे कहीं बड़ा है इसका विस्तार। कितनी ही चीजें इस जीवन में आई और हमें उनकी व्यर्थता दिखाई पड़ी । लेकिन खुद जीवन, जो चीजों की परिभाषा बुनता है, अपरिभाष्य है । क्योंकि जिस जीवन में चीजों की व्यर्थता दिखाई पड़ती है,वह खुद व्यर्थ नहीं हो सकता । अर्थहीन चीज अर्थ को कैसे जन्म दे सकती है । इसलिए यह जीवन सार्थक है, क्योंकि यह अर्थों को परिभाषित करता है ।

जीवन की कोई पगडंडियाँ नहीं होती । इन्हें तो व्यक्ति-व्यक्ति को खुद ही बनाना पड़ता है । हर व्यक्ति के लिए जीवन का अर्थ उतना ही होता है, जितना कि वह जीता है और वह उतना ही जीता है, जितना कि वह अपने लिए आकाश देखता है । आकाश अनंत है,लेकिन आप उसे किस नजर से देखते हैं, यह आप पर निर्भर है । आपकी दृष्टि ही सृष्टि बनती है ।

जीवन को देखने की कितनी ही दृष्टियाँ रहीं हैं । लेकिन फिर भी जीवन रहस्यमय बना रहता है । इन विभिन्न दृष्टियों में भी एकता दिखाई पड़ती है, क्योंकि कोई भी दृष्टि संपूर्ण का अंश ही हो सकती है । संपूर्ण सत्ता में हम सब संबंधित है । एक अदृश्य सेतु से बंधे हुए । मैं कभी यह नहीं कह सकता कि मेरा अस्तित्व तुम्हारे अस्तित्व से भिन्न है । क्योंकि वस्तुत: आपका होना ही मेरा होना है । हम संपूर्णता की सत्ता के अंश मात्र हैं । आपके न होने से मुझ में कुछ रिक्त हो जाएगा, इस रिक्तता को कोई नहीं भर सकता ।

वस्तुत: मेरा या आपका अस्तित्व नहीं है, बल्कि स्वयं अस्तित्व का ही अस्तित्व है । हम सिर्फ उसके रूप हैं, जो बदलते रहते हैं । और जब तक मैं और तू की लहरें रहती हैं, तब तक हममें अधूरापन रहता है । जब हम स्वयं को अस्तित्व से अलग समझते हैं, तभी यह अधूरापन दिखाई पड़ता है । किंतु आपका और मेरा जीवन अलग-अलग अस्तित्व नहीं रखता । यह संयुक्त है । सब जीवन उसी में समाहित हैं । व्यक्ति को जब यह दृष्टि मिलती है, तभी उसे पूर्णता की अनुभूति होती है ।

इन अर्थों में जीवन की कोई परिभाषा नहीं हो सकती । क्योंकि अगर इसे परिभाषा में बांधते हैं, तो इसके रहस्य को, इसके विस्तार को सीमा में बांध रहें हैं । जो सब कुछ है, उसकी परिभाषा कैसे हो सकती है ? परिभाषा तो उन चीजों की ही की जा सकती है, जो इस जीवन में प्रतिबिंबित होती है। उस जीवन की नहीं जिसमें वह सब प्रतिबिंबित होता है । क्योंकि हम उसको नाम दे सकते हैं, जो हम नहीं हैं, पर जो हम हैं, उसे नाम या परिभाषा कैसे दें ?

जीवन सदा से है और सदा रहेगा । लेकिन इसके रूप बदलते रहेंगे । किंतु जीवन, "जीवन-नहीं" कभी नहीं होगा ।


यारो ! मैं तो बहता हूँ, निरुद्देश्य ही
चारों ओर इन उद्देश्य की आंधियों में
जाने मेरा क्या वजूद हो इन आंधियों में
यारो ! मैं तो बहता हूँ अंतत: यहीं और अभी
यही जीवन है कि रुकता नहीं सफर इसका ।

शनिवार, 22 अगस्त 2009

रेत और पत्थर

एक कहानी कहती है कि दो दोस्त एक रेगिस्तान से गुजर रहे थे । यात्रा में किसी क्षण दोनों के बीच किसी मुद्दे को लेकर बहस हुई और बहस इस कदर बढ़ गई कि एक मित्र ने दूसरे के गाल पर थप्पड़ मार दिया । दूसरे ने अपमानित महसूस किया ।
लेकिन बिना कुछ बोले, उसने रेत पर लिखा – "आज मेरे सर्वोत्तम मित्र ने मुझे थप्पड़ मारा ।"
वे चलते रहे । तब वे एक मरु उद्यान में पहुँचे । जहां एक तालाब था । उन्होंने तालाब में स्नान करने की सोची । थप्पड़ खाया हुआ दोस्त दलदल में धँसने लगा, लेकिन दूसरे मित्र ने उसे दलदल से बचा कर बाहर निकाल लिया ।
तालाब से बाहर आने के बाद पहले मित्र ने पत्थर पर लिखा – "आज मेरे सर्वोत्तम मित्र ने मेरी जान बचाई ।"
दूसरे मित्र ने पहले मित्र से पूछा, "जब मैंनें थप्पड़ मारा तो तुमने रेत पर लिखा और अब पत्थर पर लिख रहे हो, ऐसा क्यों ?"
दूसरे मित्र ने जवाब दिया, "जब कभी कोई हमें अपमानित करे तो हमें रेत पर लिखना चाहिए, ताकि क्षमा की हवा इसे मिटा सके, लेकिन जब कभी कोई हमारा अच्छा करे, तो इसे पत्थर पर उकेरना चाहिए, ताकि इसे कोई हवा न मिटा सके ।"

अपने अपमानों को रेत पर लिखना और दूसरों की अच्छाइयों को पत्थर पर तराशना सीखिए ...

एक मिनट में हमें कोई विशेष व्यक्ति मिल सकता है, जो एक घंटे में हमें प्रशंसनीय मालूम हो, और एक दिन में प्रेम करने लायक प्रतीत हो, जिसे जीवन भर भूलाना कठिन हो, पत्थर पर तराशे शब्दों की तरह ।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

निश्चल आकाश

चारों ओर
उद्देश्य की आंधियाँ
बह रही
न जाने इन आंधियों में
इस निरुद्देश्य
जीवन का
क्या वजूद हो
नहीं जानता
पर इसमें जो प्रतिबिम्ब
बनते बिगड़ते रहते हैं
उसके पीछे जो अनन्त
आकाश है
वह शाश्वत निश्चल है

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

वह

वह
मेरी सांसों में बसता है
मेरे होंठों से झरता है
मेरी आंखों से देखता है
मेरे कानों से सुनता है
मेरी जिह्वा से स्वाद लेता है
मेरे हाथों से लिखता है
फिर भी ...
वह मुझ से दूर है
क्योंकि -
मैं हूँ !!!
मेरा है !!!
मेरी है !!!

बुधवार, 19 अगस्त 2009

क्षणिका

जब-जब कुछ
माँगा
चाहा
इच्छा की
तब-तब कुछ
टूटा
छूटा
बिखरा
अब जब छूटा
माँगना
चाहना
पकड़ना
तब सब घटा
अनघटा !!!

अनुभूति

वो तेरा
चुपके से
मेरी पलकों पर आना
छू गया
मेरे अंत:करण को
कैसे कहूँ -
उस अनुभूति को
जो कहूँ
वही झूठ लगता है
इसलिए
संकोची हो गया हूँ ।

मैं कौन हूँ ?

मैं कौन हूँ ?
कैसे कहूँ ...कौन
मन से बेचैन हूँ
पर दिल में सब्र है
सहन करता हूँ
इस बेचैनी को
क्योंकि -
तू है !!!
इसका अहसास है


विरह की पीड़ा क्षण प्रतिक्षण
बढ़ती जाती है
तेरे बिना
यह संसार अधूरा लगता है
लेकिन तू है !!!
इसका अहसास गहराता जाता है


क्या यह पीड़ा
तेरा ही गीत है
जिसको गाने के लिए
तू इस नासाज़ की
तारें खींच -खींच कर
तान बिठा रहा ?

माना कि मैं खुद से बेखुदा हूँ
पर तुझ से जुदा तो नहीं हूँ
यह अहसास है
तभी तो इस जीवन में रस है !!!
रस में रम ।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

कर्मों के चिह्न

एक समय की बात है । एक स्त्री के एक लड़का था । वह उसे बहुत प्यार करती थी । लेकिन बुरी संगत में पड़कर लड़का बुरे काम करने लगा । उस स्त्री ने लड़के को बहुत समझाया । पर लड़के ने अपनी मां की एक बात न सुनी । मां द्वारा पुत्र से कही सब बातें पानी पर खिंची गई लकीरें साबित हुई । और उसने बुरी संगत न छोड़ी । वह बुरे कर्म करता रहा । मां ने भी अब उसे समझाना छोड़ दिया । लेकिन अब वह एक नया काम करने लगी ।जब भी उसका बेटा कोई बुरा काम करके घर आता, तो वह घर की दीवार में एक कील ठौंक देती । धीरे-धीरे दिन बीतने लगे और घर की दीवार पर कीलों की संख्या बढ़ने लगी । एक दिन ऐसा आया कि घर की चारों दीवारें कीलों से भर गई । एक दिन जब वह स्त्री दीवार में एक और कील ठौकने की कोशिश कर रही थी, तो लड़के ने दीवार को चारों ओर से कीलों से भरा देख कर मां से पूछा - "मां, तुम दीवारों पर ये कीलें क्यों ठौकती रहती हो ?" मां ने जवाब दिया, "ये तेरे बुरे कर्म हैं, जब तू कोई बुरा कर्म करके घर लौटता है, तो मैं उन्हें याद रखने के लिए दीवार पर एक कील ठौक देती हूँ ।" लड़का यह देखकर आश्चर्य चकित रह गया कि उसने अपनी जिंदगी में कितने बुरे कर्म किये हैं । उसकी अंतश्चेतना जाग उठी और उसने उसी समय यह ठान लिया कि वह बुरे कर्म नहीं करेगा । अब लड़का अच्छे कर्म करने लगा । प्रत्येक अच्छे कर्म पर उसकी मां ने एक कील दीवार से निकालनी शुरु कर दी । धीरे-धीरे करके दीवार से कीले कम होनी शुरु हो गई और एक दिन सभी कीलें दीवार से निकाल ली गई । तब बेटे ने मां से कहा - "मां, मैंने अच्छे कर्मों से अपने बुरे कर्मों को धौ डाला है ।" मां ने दीवार पर पीछे छूटे कीलों के निशानों को देखते हुए कहा, "बेटा ! तूने अच्छे कर्मों से बुरे कर्मों को नष्ट तो कर दिया, लेकिन तेरी आत्मा पर तेरे किये गए बुरे कर्मों के चिह्न आज भी दीवार पर पड़े इन कीलों के निशान की तरह हमेशा बने रहेंगे ।"

कहानी बताती है कि जीवन में किए गए कर्म निशान छोड़ जाते हैं ।

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

आकर्षणों में वास्तविक लक्ष्य से न भटकें

एक यात्री एक निर्जन पहाड़ी स्थल से गुजर रहा था । अचानक उसने देखा कि सामने से एक पागल, मदमस्त हाथी बड़ी तेजी से उसकी ओर बढ़ा आ रहा है । उसे देख कर यात्री विपरीत्त दिशा में भागने लगा । हाथी भी उसके पीछे भागने लगा । यात्री ने अपनी गति दुगुनी कर दी । लेकिन हाथी पीछा नहीं छोड़ रहा था । भागते-भागते वह पहाड़ी की कगार पर पहुँच गया, जहाँ से आगे गहरी खाई थी । लेकिन पागल हाथी उसकी ओर अभी भी बढ़ा आ रहा है । स्वयं को हाथी से बचाने के लिए वह एक लता के सहारे खाई में कूद गया । लता कमजोर है, जो अधिक समय तक उसका भार सहन नहीं कर सकती । हाथी अब भी उसके इंतजार में पहाड़ी के किनारे खड़ा है । यात्री ने देखा कि दो चूहे लता की जड़ों को कुतर रहें हैं । एक चूहा दिन की तरह सफेद है और दूसरा रात की तरह काला । जल्दी ही वे अपना काम पूरा कर लेंगे । किनारे पर ही एक बड़े वृक्ष पर मधुमक्खियों का छत्ता लगा है, जिससे बूँद-बूँद मधुर मधु टपक रहा है और वह रिसता हुआ मधु यात्री के मुख पर गिर रहा है । यात्री ने उस मधु के लिए अपना मुँह खोला और रिसते मधु का रसस्वादन करने लगा । मधु के स्वाद में पड़ा यात्री निकट खड़ी मौत भूल गया । साक्षात काल रूपी हाथी, दिन और रात की भांति उसके जीवन को नष्ट करने वाले चूहे, ये सब मधुर मधु के आकर्षण में बँधे उस यात्री के लिए विस्मृत हो गए । वह अपना सही लक्ष्य भूल गया ।

उसका क्या अंत हुआ होगा, यह हम समझ सकते हैं ? कहीं संसार के बाह्य आकर्षणों में बँधे हम जीवन के सही लक्ष्य को तो नहीं भूल रहे ?

यह कथा महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों से अक्सर कहा करते थे ।

सोमवार, 10 अगस्त 2009

पुरानी-पीढ़ी बनाम नई पीढ़ी

पुरानी पीढ़ी
पुरानी किताब सरीखी
नई पीढ़ी
नई किताब सरीखी

जैसे पुरानी किताब का
बाह्य आवरण आकर्षित नहीं करता
और मुद्रण भी चित्ताकर्षक नहीं होता
और पुराने धब्बों व धूल से विकृत-जर्जर
पर
उसकी पाठ्य वस्तु भरपूर
अपार ज्ञान से

नई किताब का
बाह्य आवरण बहुत ही आकर्षक
मुद्रण भी मन-भावन
विविध रंगों से भरपूर चित्र सामग्री
न धूल न धब्बे
फिर भी -
उसकी पाठ्य वस्तु
उधार बासी, ज्ञान के नाम पर कचरा
न चिंतन न कोई विचार
बस शब्द ज्ञान और वस्तुओं की पहचान
कराना ही जैसे इनका उद्देश्य हो !!!

फिर पाता हूँ
पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी का फर्क
भी कुछ ऐसा ही है
देख रहा हूँ कि -
नई पीढ़ी ज्ञान का बोझ नहीं ढ़ोती
इसलिए -
वह ज्यादा वर्तमान में रहती है
ज्यादा सुनती, देखती है
पर बुद्धि को ज्ञान के बोझ से
नहीं भरती
शायद-
जानने से ज्यादा
जीने में यकीन रखती है !!!

रविवार, 9 अगस्त 2009

जीवन क्या है ?

जीवन क्या है ?
सुख दुख की छाया
या प्रेम,ध्यान का उत्सव
जिसे जीना है हर हाल में

जीवन क्या है ?
दिन और रात का एक क्रम
जिसमें हैं दिन के उजाले और रातों के अंधेरे
जिसे काटना है किसी तरह

जीवन क्या है ?
अस्तित्व की एक यात्रा
जिसमें वह फिर-फिर जन्मता है
और नए रहस्यों के द्वार खोलता है
और एक नई जीवन यात्रा की सांसे फूंकता है

जीवन क्या है ?
अतीत और भविष्य में
त्रिशंकु की तरह लटकी आशाएं
जिनमें पेंडुलम की तरह डोलता यह जीवन
क्या यह यूं ही डोलता रहेगा अनंत जन्मों तक ?

या कहीं लेगा विराम
जहां होगा समाधान
इन सब द्वैतों का
क्या जीवन का हर क्षण
अवसर नहीं
उस सत्य को पहचानने का
जहां अद्वैत घट रहा प्रति क्षण ।

शनिवार, 8 अगस्त 2009

धारणाओं में मत बंधिए, चीजों को पूरा परखिए

दो राजकुमार आखेट के लिए घुमते हुए किसी घने वनीय क्षेत्र में विपरीत दिशाओं से आते हुए एक स्थान पर आकर रुके, जहां एक विशाल मूर्ति स्थापित थी । पहला राजकुमार उस मूर्ति को देख कर बोला - आश्चर्य ! इतनी सुंदर, अनुपम साक्षात सौंदर्य की देवी को इस घने वन में किस कलाकार ने बनाया होगा । दूसरे राजकुमार ने, जो मूर्ति के दूसरी ओर खड़ा था, पहले राजकुमार के वचनों को सुना और बोला - अरे मूर्ख ! तुम्हें यह सौंदर्य की देवी दिखाई पड़ती है, यह तो किसी कलाकार द्वारा बनाई किसी वीर,ओजस्वी सेनापति की मूर्ति है । इस बात को लेकर दोनों राजकुमारों में ठन गई और उन्होंने अपनी मयान से तलवारें खींच ली और एक दूसरे से भीड़ गए । दोनों वीर परस्पर रक्त-रंजित हो गए । तभी वहां एक बूढ़ी स्त्री आई, जो अब तक दूर खड़ी दोनों राजकुमारों के बीच इस बहस और द्वंद्व को देख रही थी । उसने राजकुमारों से कहा, ठहरो! तुम व्यर्थ इतनी देर से झगड़ रहे हो । तुम दोनों अपनी जगह बदल कर इस मूर्ति को देखो । दोनों राजकुमारों ने लड़ना छोड़, अपनी जगह बदल कर देखा तो दोनों के हाथों से तलवार छूट गई और दोनों एक दूसरे के गले लग गए । वस्तुत: वह विशाल मूर्ति सौंदर्य और वीरता की ही प्रतिमूर्ति थी । विपरीत दिशाओं में खड़े होने के कारण उन्होंने वही जाना, जो उन्होंने एक ओर से देखा था । उनका सत्य अर्ध सत्य था । यदि उन्होंने पहले ही मूर्ति को अच्छी तरह देख लिया होता, तो उनके बीच व्यर्थ लड़ाई न हुई होती ।

हमारी भ्रांत धारणाएं भी ऐसी ही होती हैं । हम चीजों के एक पक्ष को जान कर ही उनके बारे में धारणाएं बना लेते हैं और सत्य को पूरी तरह जानने की कोशिश नहीं करते और व्यर्थ के विवादों में उलझ जाते हैं । मनुष्य का विवेक जागने पर ही चीजों को पूरा और हर पहलू से जानने की समझ पैदा होती है । हर झगड़े की जड़ समझ का अभाव है ।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

शिक्षा, प्रशिक्षण और विवेक जागरण


सृष्टि में कोई भी वस्तु पूर्णतया पूर्ण और निर्दोष तो नहीं हो सकती, परंतु मानव हर वस्तु को निर्दोष बनाने का यत्न अवश्य करता है । चूंकि वह स्वयं पूर्ण नहीं है, इसलिए उसके समस्त कार्य अपूर्ण ही रहते हैं । हजारों वर्षों के मानव इतिहास में कभी भी शिक्षा की कोई पद्धति सर्वथा निर्दोष सर्वमान्य नहीं रही है । परंतु शिक्षा की वर्तमान पद्धति तो अत्यंत शोचनीय और चिंतनीय हो गई है । सारे संसार में कोई भी उससे संतुष्ट नहीं है । इसका मुख्य कारण यह है कि वर्तमान शिक्षा-पद्धति के माध्यम से मनुष्य को जानकारियां तो मिल जाती हैं, लेकिन सच्चे ज्ञान की उपलब्धि उसे नहीं होती । यह ज्ञान उपलब्ध न होने से स्वयं मानव का निर्माण यह शिक्षा नहीं कर पाती । तथ्यों की जानकारी से मनुष्य का मस्तिष्क तो भर जाता है, परंतु उसकी अंतरात्मा खाली की खाली बनी रहती है । न तो उसके अंत:करण का जागरण होता है, न ही उसके ह्रदय में शुभ भावना का अवतरण । इसे यों भी कह सकते हैं कि यह शिक्षा उस आहार की भांति है, जिससे भूख तो मिट जाती है, लेकिन तृप्ति नहीं होती और न ही नया रक्त और अन्य धातुओं की शरीर में अभिवृद्धि ही होती है। यही कारण है कि वर्तमान शिक्षा हमारे चरित्र को स्पर्श भी नहीं कर पाती और इससे मनुष्य के व्यक्तित्व को गढ़ने का कोई उपाय प्रतिपादित नहीं होता । यह कितना आश्चर्यजनक और अभाग्यपूर्ण है कि शिक्षा - प्रशिक्षण द्वारा पशु को मानव बनाने का उपक्रम तो किया जाता है, पर मानव को मानव बनाने का नहीं । या इसे यों कहें कि पशु की पशुता दूर करने के प्रयत्न तो किए जा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर मनुष्य में अंतर्निहित पाशविकता को उलटा बढ़ाया ही जा रहा है । यही नहीं, उसे मानव से कुछ और बनाने के सभी प्रयत्न आधुनिक शिक्षा में किए जा रहें हैं ।

मानव को मानव बनाए रखना है अथवा कुछ और बना देना है, यही आधुनिक शिक्षा की समस्या है, जिस पर हर बुद्धिवादी, विवेकशील व्यक्ति और संसार का हर वर्ग चिंतित है ।


मनुष्य को छोड़कर अन्य किसी जीव को शिक्षित नहीं किया जा सकता, क्योंकि निसर्ग ने जो ज्ञान-शक्ति मनुष्य को दी है, वह अन्य किसी प्राणी को नहीं । अन्य जीवों को केवल प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) दिया जा सकता है; जैसे कि सर्कस में हाथी, घोड़े, बंदर, बकरे और तोता-मैना आदि को । शिक्षण और प्रशिक्षण के इस बुनियादी भेद को समझना बहुत आवश्यक है ।

शिक्षा का सूत्र और उसका स्रोत अंतस में है । वह एक संस्कार है, जो बीज रूप से अंकुरित हो वृक्ष बनता है और उसमें पुष्प और फल फलते हैं, जबकि प्रशिक्षण मात्र अभ्यास है। वह (प्रशिक्षण) उस पौधे की भांति है, जो पुष्प और फलों से रहित रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए सजावट के किसी स्थल पर क्षणिक महत्व के लिए रोपा जाता है, जिसे आर्टिफिसियल कह सकते हैं । यानी शिक्षा एक प्राकृतिक संस्कार है और प्रशिक्षण एक कृत्रिम वस्तु मात्र । पहले का संबंध अंतस से है, दूसरे का बाहर से, पहला प्राकृतिक है, दूसरा कृत्रिम । एक विकासशील प्राण -तत्व है, तो दूसरा निर्जीव पदार्थवत । इस प्रकार प्रशिक्षण ऊपर से जबर्दस्ती थोपा हुआ ढ़ांचा है । शिक्षा ऊपर से नहीं थोपी जाती वरन अंतस को जगा कर दी जाती है । पानी के हौज में जिस प्रकार पानी ऊपर से भरा जाता है, उसी प्रकार प्रशिक्षण है, जो ऊपर से भरा जाता है । जबकि शिक्षा कूएं की तरह से है, जिसमें जल-स्रोत जमीन की गहराई से फूटते हैं । अंग्रेजी शब्द एजुकेशन का अर्थ बड़ा महत्वपूर्ण है । उसका अर्थ है : भीतर से बाहर निकालना । उसका अर्थ बाहर से भीतर डालना नहीं है। जो बाहर से डाला जाता है, उसे शिक्षा कैसे कहा जा सकता है ? यह मात्र प्रशिक्षण है और यही कारण है कि जिसे हम शिक्षित होना कहते हैं, और जिसे विश्वविद्यालय सम्मानित करते हैं, वह जीवन की व्यापक और बृहद परीक्षा में असफल हो जाता है । ऐसा शिक्षित जन केवल रटा हुआ तोता होता है । उसमें स्वयं के विचार की न तो कोई ऊर्जा होती है और न ही अपने जीवन को निर्देशित करने का कोई विवेक । वह पानी की लहरों पर बहते हुए उस लकड़ी के टुकड़े की तरह होता है, जिसे लहरें जहां ले जाती हैं, चला जाता है ।

प्रशिक्षण का शिक्षण के रूप में इस भांति प्रचलित होना तकनीकी शिक्षा के अति प्रभाव के कारण हुआ है, क्योंकि तकनीक का प्रशिक्षण ही हो सकता है, शिक्षण नहीं । सारा संसार चूंकि भौतिक समृद्धि के लिए लालायित है, और भारत जैसा अविकसित देश तो गरीबी के कारण और भी अधिक, इसलिए तकनीकी ज्ञान को ही प्रमुखता मिली है । तकनीकी ज्ञान से ही रोजी-रोटी और भौतिक-समृद्धि के सुख युवाओं को आकर्षित करते हैं । हम तकनीकी ज्ञान और उसके द्वारा होने वाली भौतिक समृद्धि के विरुद्ध नहीं हैं । संसार के लिए और हमारे लिए यह आवश्यक है । किंतु इस प्रशिक्षण से वास्तविक शिक्षा से जो हम छुटे जा रहें हैं, उस से बड़ा अहित हो रहा है । हमारा विवेक कहीं खोता जा रहा है। हमारे जीवन के बुनियादी आधार खोखले होते जा रहें हैं । इससे हम अधिक समय तक अपनी आंखे मूंद कर नहीं रह सकते । अपनी अयोग्यता को छिपाकर, केवल अभ्यास के बल पर, हम आखिर कहां तक आगे बढ़ सकेंगे ? वास्तविक शिक्षा के अभाव में यह प्रशिक्षण हमारे जीवन को खोखला और एकांगी बना रहा है । इसी के साथ इसके कुछ भयावह नतीजे भी निकल रहे हैं । तकनीकी ज्ञान भौतिक जगत के नियंत्रण के लिए आवश्यक है । परंतु जिस वास्तविक शिक्षा की हम बात कर रहें हैं, उसके द्वारा शिक्षित न होने के कारण मनुष्य स्वयं से नियंत्रण खोता जा रहा है । स्वयं पर इस अनियंत्रण के कारण ही उसका पदार्थ-ज्ञान व भौतिक वस्तुओं पर आधिपत्य वैसा ही जैसे अबोध बालक के हाथ में तलवार देना । पिछले दो महायुद्ध इसके प्रमाण हैं और दिन-प्रतिदिन होने वाले जानमाल के घातक विस्फोट निरंतर हमें इस बात की खबर दे रहे हैं । हमें इन घटनाओं से चेतावनी नहीं मिली । यदि हम सचेत नहीं होते हैं, तो अनियंत्रित मनुष्य के हाथ में प्रकृति की नियंत्रित शक्तियां आत्मघाती ही सिद्ध होंगी । इसकी चरम परिणति समस्त मानवता के अंत में हो सकती है । इसलिए भौतिक वस्तुओं पर नियंत्रण के पूर्व मनुष्य का उसका स्वयं पर नियंत्रण कहीं अधिक जरूरी है । क्योंकि शक्ति केवल संयमी के हाथों में ही सुरक्षित रहती है । असंयमी, अविवेकी के शक्तिशाली होने से भस्मासुर की पुनरावृत्ति अवश्यम्भावी है ।


इस जगत में मनुष्य के लिए मनुष्य से अधिक महत्वपूर्ण और कुछ भी नहीं है । वह प्रथम है और जो शिक्षा मनुष्य के सृजन की शिक्षा न होकर उसके संहार का कारण बनती है, उसे शिक्षा कैसे कहा जा सकता है ? शिक्षा का अर्थ है : सदिच्छा, सद्भाव का प्रसार करना । एक ऐसे ज्ञान का विस्तार शिक्षा-तत्व में निहित है, जो व्यष्टि के माध्यम से समष्टि के कल्याण का केंद्र बने । तकनीकी ज्ञान शिक्षा का मुख्य अंग कभी नहीं होना चाहिए वह गौण ही रहना चाहिए । मानवीय मूल्यों की स्थापना ही शिक्षा का केंद्रीय तत्व है । तकनीकी ज्ञान से उपार्जित वस्तुएं जीवन यापन का साधन हो सकती हैं, लेकिन साध्य नहीं । साध्य तो मनुष्य स्वयं है । इस साध्य की प्राप्ति के लिए ही शिक्षा उसका एक शस्त्र है, एक साधन है । वर्तमान शिक्षा पद्धति में हुआ यह है कि जो साध्य है, वह साधन बन गया है और जो साधन है वह साध्य । इस प्रकार साधन को साध्य के ऊपर रखना घातक सिद्ध हुआ है । भौतिक शिक्षा में साधन साध्य बन जाते हैं और आध्यात्मिक शिक्षा में साधन साधन रहते हैं और साध्य साध्य । यदि आवश्यकता पड़े और कोई अन्य विकल्प शेष न रहे तो वास्तविक शिक्षा साधनों का परित्याग कर सकती है , लेकिन साध्य का नहीं । उसकी दृष्टि में वे हर साधन सम्यक हैं, जो जीवन के चरम साध्य की उपलब्धि में सहयोगी है । उसके विपरीत पड़ते ही वे व्यर्थ और त्याज्य हो जाते हैं ।


मानव की सम्यक शिक्षा मूलत: उसके विवेक और उसकी भावनाओं की शिक्षा होगी । विवेक जागृत और शक्तिशाली हो तथा भावनाएं संयमित और शुभ । विवेक के जागृत होते ही वासनाएं अनिवार्यत: उसकी अनुगामी हो जाती हैं । फिर श्रेय ही प्रेम हो जाता है । ऐसा जीवन ही यज्ञपूर्ण है । शिक्षा का लक्ष्य ऐसा ही जीवन है ।

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

बाहर-भीतर का द्वंद्व और चित्त का रुपांतरण


आज मनुष्य के विकास में एक अद्भूत विरोधाभास दिखाई देता है । जहां एक ओर भौतिक तल पर समृद्धि और प्रगति अनुभव होती है, वहीं इस भौतिक समृद्धि और प्रगति के साथ-साथ ही आत्मिक तल पर ह्तास और पतन भी दिखाई पड़ता है । अत: वे लोग भी ठीक हैं जो कहते हैं कि मनुष्य निरंतर उन्नत हो रहा है और वे लोग भी ठीक हैं जिनकी मान्यता है कि मनुष्य का प्रतिदिन पतन होता जा रहा है । हम दोनों को ठीक इसलिए कहते हैं कि भौतिकवादी अपनी दृष्टि से आधुनिक मनुष्य को देखते हैं और आध्यात्मवादी अपनी दृष्टि से । कठिनाई यह है कि दोनों यह अनुभव नहीँ करते कि उनकी दृष्टि एकांगी है । भौतिक विचारधारा वाले तो, आत्मिकतल जैसी कोई चीज है, इसे जानते तक नहीं हैं । और आध्यात्मिक विचारधारा वाले इस सारी समृद्धि और प्रगति को निरर्थक मानते हैं । विचारणीय यह हो गया है कि विरोधी दिशाओं में खिंच रही मानव की यह स्थिति कहीं उसका अंत ही न कर दे । यह घटना असंभव घटना नहीं है । यह इसलिए है कि यदि हम भौतिकतल की उन्नति में ही लगे रहे और हमारा अंतस जैसा अभी है, वैसा ही रहा, तो यह सारी भौतिक समृद्धि नष्ट हो सकती है । भीतर रुग्णता हो और बाहर स्वस्थता दिखाई पड़े, तो किसी भी क्षण दुर्घटना घटित हो सकती है । जिस ह्रदयरोग का आजकल बाहुल्य हो गया है, उसमें बाहरी स्वस्थता ही दिखाई पड़ती है । परंतु बाहर का स्वास्थ्य अच्छा दिखते हुए भी, यह ऐसा रोग है जो क्षण भर में सारी स्वस्थता समाप्त कर व्यक्ति का नाश कर देती है । बाहर संपदा दिखाई पड़े और भीतर पास में कुछ भी न हो, तो दिवालियापन कभी भी प्रकट हो सकता है । बाहर विकास हो और भीतर ह्तास तो भविष्य के संबंध में आशावान नहीं हुआ जा सकता । बाह्य और अंतस के तनाव से बड़ा और कोई तनाव संभव नहीं है। इससे बड़ी न तो कोई अशांति हो सकती है और न ही कोई आत्मवंचना । हम कब तक अपने आप को धोखा देते जाएंगे । हर धोखे के टूट जाने का समय आता है और भौतिक समृद्धि के रहते हुए अंतस् की इस शून्यता के कारण जिस धोखे की स्थिति में हम रह रहें हैं, उस धोखे के टूटने का समय निकट है । अंतस की यह स्थिति ही भौतिक समृद्धि के बढ़ते रहने पर चारों ओर अनैतीकता और अमानवीयता बढ़ा रही है । जिसे सच्ची धार्मिकता कहते हैं, वह नष्ट हो गई है । इस स्थिति में प्रतिक्षण पैदा हो रहे छोटे-बड़े दुष्परिणाम क्या हमें सजग कर देने को यथेष्ट नहीं हैं ? क्या संपत्ति और समृद्धि के बीच भी तीव्र संताप की मन: स्थिति और चिंता की ज्वाला का ताप हमें जगा देने को पर्याप्त नहीं है ?
व्यक्ति के तल पर ही नहीं, समाज और राष्ट्रों के तल पर भी फैला हुआ विद्वेष, घृणा और हिंसा और आए दिन होते हुए विस्फोट, घातक युद्ध भी क्या हमारी निद्रा को नहीं तोड़ सकेंगे ?विगत शताब्दी में दो महायुद्धों में कोई दस करोड़ लोगों की हत्या हुई । जहां-जहां युद्ध की विभीषिका फैली थी, वहां-वहां युद्ध के पश्चात जीवित जन-समुदाय ने अगणित कष्ट पाए । इतनी बड़ी हिंसा और दुर्दशा का जन्म निश्चित ही हमसे हुआ है । हम ही इसके लिए उत्तरदायी हैं । हम जैसे हैं, उसमें ही उसके बीज मौजूद हैं । ये युद्ध केवल राजनीतिक या आर्थिक स्थिति के ही परिणाम नहीं थे । मूलत: और अंतत: तो सब कुछ मानव के मन से संबंधित होता है । ऊपर से इस प्रकार की घटनाएं चाहे राजनीतिक दिखें या आर्थिक , किंतु गहरे में तो सभी कुछ मानसिक रहता है । समाज में ऐसी कोई स्थिति नहीं है, जिसके मूल कारण व्यक्ति के मन में न खोजे जा सकें । वस्तुत: समाज व्यक्तियों के जोड़ के अतिरिक्त और क्या है ? जो चिंगारियां व्यक्ति के मन में अत्यंत छोटे रूप में दिखाई पड़ती हैं, वे ही तो समूह की सामूहिकता में विकराल अग्निकांड बन जाती हैं ।


व्यक्ति की आत्मा में ही यथार्थ में समूह का सारा स्वास्थ्य या रुग्णता छिपी रहती है । आत्म विपन्न व्यक्ति स्वस्थ समाज के निर्माता नहीं हो सकते । दुखी, संतापग्रस्त ईकाइयां किसी भी भांति आनंदपूर्ण और शांतचित्त समाज की घटक कैसे हो सकती हैं ? ऐसा कोई भी चमत्कार संभव नहीं है कि जो तत्व के किसी भी अंश-रूप में, इकाई में उपस्थित न हो और वह पूर्ण जोड़ में आ जाए । जो समूह में और जोड़ में दिखाई पड़ता हो, मानना होगा कि वह अपने अंश-रूप में अति सूक्ष्म रूप से अवश्य ही मौजूद रहता है । इसलिए केवल ऊपर-ऊपर या उथला देख कर ही मानवीय जीवन की किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता । उथले में समूह ही पकड़ में आता है, गहरे जाने पर व्यक्ति उपलब्ध होता है । जहां समस्या का जन्म है, वहीं समाधान भी खोजना होगा । केवल तभी समाधान और कहना चाहिए वास्तविक समाधान होगा । अन्यथा जिसे हम समाधान मानते हैं, वह और कई दूसरी नई समस्याएँ खड़ी कर देता है । जैसे युद्ध को मिटाने के लिए या शांति पाने के लिए, उथली दृष्टि युद्ध का ही समाधान प्रस्तुत करती है । आज तक जितने युद्ध लड़े गए वे अन्याय का निराकरण करने और न्याय की स्थापना करने के उद्देश्य से ही लड़े गए । यह सदा कहा गया है । परंतु जिसे अन्याय कहा जाता था, न युद्ध से उस अन्याय का निराकरण हुआ और जिसे न्याय कहा जाता था, न उस न्याय की स्थापना हुई । इस प्रकार भ्रांत तर्क के आधार पर हजारों वर्षों से मनुष्य लड़ता रहा है । लेकिन कोई भी युद्ध न अन्याय का निराकरण कर सका और न न्याय की स्थापना । फिर शांति तो वह स्थापित कर ही कैसे सकता था ? जो युद्ध शांति का विरोधी है, उससे शांति की स्थापना !!! अनेक युद्धों को तो धर्मयुद्ध तक कहा गया है । कोई युद्ध भी धर्म युद्ध हो सकता है ? युद्ध शांति का जनक न होकर नए युद्धों का ही जन्मदाता होता है और नया युद्ध पुराने युद्ध से भीषणतर होता है । पश्चिम में जहां सर्वप्रथम सभ्यता का विकास हुआ उस यूनान के ऐथेन्स और स्पार्टा के युद्धों में वीरगति प्राप्त करने वालों की संख्या कितनी और उस यद्ध के आयुध कैसे थे ? पूर्व में भारतीय महाद्विप में महाभारत युद्ध में कितना नरसंहार हुआ था और उसमें भी किस प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग किया गया था ? पिछली शताब्दी के दो विश्वयुद्धों के नरसंहार और आयुधों का इन प्राचीन युद्धों से मिलान किया जाए । और अब तो अणुबम और हाइड्रोजन बम तक हम पहुंच गए हैं । यदि तीसरा महायुद्ध हुआ और युद्ध में इन आयुधों का उपयोग किया गया तो विश्व की मानवता की क्या स्थिति रहेगी ? इस संबंध में बड़े से बड़ा भविष्य वक्ता भी कोई ठीक भविष्यवाणी करने में असमर्थ है । ऐसे ही जीवन की अन्य समस्याओं के भी हमारे समाधान हैं । अपराध को मिटाना है, तो दंड और फांसी है। किंतु हजारों वर्षों तक दंड देने पर भी, अपराध मिटा नहीं, वह बढ़ता गया और विकराल रूप लिए खड़ा है । इतने पर भी हमारी आंखें नहीं खुलती और हम सतह पर ही इलाज किए चले जाते हैं, जबकि बीमारी गहरी है और भीतर है । शोषण मिटाने के लिए हिंसात्मक क्रांतियां हुई, जबकि शोषण भी हिंसा ही है । तो वह हिंसा से कैसे मिटाया जा सकेगा ? हिंसा से जो क्रांतियां हुई, उनसे क्या कहीं कोई शोषण मिट पाया है ? इस प्रकार की क्रांतियों का परिणाम यह होता है कि शोषक तो बदल जाते हैं, किंतु शोषण बना रहता है ।


व्यक्ति के अंतस्तल के परिवर्तन के बिना कोई परिवर्तन वास्तविक परिवर्तन नहीं हो सकता । व्यक्ति के ह्रदय में समृद्धि आनी चाहिए । वहां की दरिद्रता, दीनता और रिक्तता मिटनी चाहिए । वहां दुख, चिंता और संताप का अंत होना चाहिए । जब तक उस गहराई में आलोक, प्रेम और आनंद का आविर्भाव न होगा, तब तक जीवन को शांत और सुखी बनाने के सब उपाय व्यर्थ होंगे । क्या केवल भौतिक तल की समृद्धि यह कर सकती है ? केवल बाह्य समृद्धि और बाह्य विकास उस अवस्था को देने में असमर्थ है । मनुष्य की आंतरिकता भी विकसित होनी चाहिए । चीज़ों का बढ़ता जाना ही पर्याप्त नहीं है, ह्रदय भी बढ़ना चाहिए । वस्तुओं की पारिमाणिकता ही नहीं, मनुष्य की गुणात्मिकता भी बढ़नी चाहिए । मनुष्यता की वृद्धि जितनी अधिक होगी, उतनी ही अधिक समस्याएं कम हो जाएंगी । क्योंकि हमारी अधिकांश समस्याएं हमारे भीतर जो पाशविकता है, उससे ही उत्पन्न होती हैं । आज हम इस पाशविकता की अभिव्यक्ति के लिए ही अधिकतर नए-नए उपाय खोजते हैं । फिर चाहे वे राष्ट्रों के नाम पर हों, चाहे सिद्धांतों के नाम पर, चाहे वादों के नाम पर । अच्छे-अच्छे शब्दों की आड़ में हम अपने बुरे से बुरे रूप को प्रकट करते रहते हैं । शब्द तो बहाने हैं, उन्हें कोई समस्याएं न समझे । जो उन्हें समस्याएं समझ लेता है, वह समाधान तक कभी न पहुंच सकेगा । समस्या शब्दों की नहीं, चित्त की है । प्रश्न युद्ध का नहीं, युद्ध करने वाले मन का है । वह मन जो संघर्ष, विप्लव युद्ध करना चाहता है, वह एक बहाना न मिलने पर दूसरा बहाना खोज लेगा । इसलिए हम बहाने को बदलते जाते हैं । परंतु अशांति बनी रहती है । जो चित्त इसाईयत और इस्लाम के नाम पर या हिंदु या बोद्ध के नाम पर लड़ता था, वही चित्त साम्यवाद और जनतंत्र के नाम पर लड़ सकता है । लेकिन लड़ाई वही की वही है । इस स्थिति को बदलना हो तो चित्त को बदलना आवश्यक है ।

बुधवार, 5 अगस्त 2009

मनुष्यता की भूल


सत्य की कोई भी धारणा चित्त को बंदी बना लेती है । सत्य को जानने के लिए चित्त की परिपूर्ण स्वतंत्रता अपेक्षित है । चित्त जब समस्त सिद्धांतों, शास्त्रों से स्वयं को मुक्त कर लेता है, तभी उस निर्दोष और निर्विकार दशा में सत्य को जानने में समर्थ हो पाता है । व्यक्ति जब शून्य होता है तभी उसे पूर्ण को पाने का अधिकार मिलता है ।


मनुष्य के सारे जीवन सूत्र उलझ गए हैं । उसके संबंध में कोई भी सत्य सुनिश्चित नहीं प्रतीत होता । न जीवन के अथ का पता है, न अंत का । पहले के समय में जो धारणाएं स्पष्ट प्रतीत होती थी, वे सब अस्पष्ट हो गई हैं । धारणाओं के पुराने भवन तो गिर गए पर नए निर्मित नहीं हुए । पुराने सब मूल्य मर गए हैं, या मर रहें हैं और कोई नए मूल्य अंकुरित नहीं हो पाते । एक ही नया मूल्य अंकुरित हुआ है कि यह भौतिक जीवन ही सब कुछ है । परंतु इस नए मूल्य ने संघर्ष, द्वंद्व और युद्ध तथा अशांति को जन्म दिया है । इस भांति जीवन दिशाशून्य होकर ठिठका सा खड़ा है । यह किंकर्तव्य-विमूढ़ता हमारी प्रत्येक चिंतना और क्रिया पर अंकित है । स्वभावत: ऐसी दशा में हमारे चित्त यदि तीव्र संताप से भर गए हों, तो कोई आश्चर्य नहीं । गंतव्य के बोध के बिना गति एक बोझ ही हो सकती है । जीवन के अर्थ को जाने बीना जीना एक भार ही हो सकता है । अर्थ और अभिप्राय: शून्य उपक्रम अंतत:अर्थ और अभिप्राय: को कैसे जन्म दे सकते हैं ? जिस यात्रा का प्रथम चरण ही अर्थहीन हो, तब तो उसका अंतिम चरण अर्थ नहीं बन सकता । फिर जो पूरी की पूरी यात्रा ही अर्थहीन हो, तब तो अंत में अनर्थ ही हाथ आएगा । यह कोई कोरे सिद्धांत की बात नहीं है । यह तो सीधा अनुभव ही है । चारों ओर हजारों चेहरों पर छाई हुई निराशा, लाखों आंखों में घिरा हुआ अंधकार, करोड़ों ह्रदयों पर ऊब और संताप का भार इसका स्पष्ट प्रमाण है । खोज करने पर भी शांत, संतुष्ट और आनंदित व्यक्ति का मिलना दुर्लभ होता जा रहा है । अभी भी ऋतुराज आता है और सृष्टि सुमनों तथा उनकी सुगंध से भर जाती है । पावस में मेघमालाएं उठती , दामिनी दमकती, वर्षा होती, इंद्रधनुष निकलता और हरियाली छा जाती है । ऊषा और संध्या की सुनहरी आभा से पूर्व और पश्चिम नित्य ही आलोकित होते हैं । उदय होते हुए भास्कर की आभा और नित्य प्रति बढ़ती हुई चंद्रमा की कलाएं अपना सौंदर्य बिखेरती हैं । विविध समीर बहता है और पंछी अपना मधुर राग अलापते हैं । किंतु वे मनुष्य कहां हैं, जिनके ह्रदय संगीत से भरे हों और जिनकी आंखों से सौंदर्य झरे ? निश्चय ही मनुष्य के साथ कुछ भूल हो गई है । निश्चय ही उसके भीतर कुछ टूट और खो गया है । निश्चय ही मनुष्य जो होने को पैदा हुआ है, वही होना भूल गया है ।


यह भूल इसलिए हुई कि मनुष्य जो उसके बाहर है, उसे समझने और जीतने में अतिशय संलग्न हो गया है । उसकी बाहर की अति संलग्नता ने भीतर की भूमि से क्रमश: उसे अपरिचित कर दिया है । धीरे-धीरे यह स्मरण ही न रहा, कि हमारे भीतर भी जानने और जीतने को एक जगत है ।बाहर के जगत में मिली विजय क्रमश: उसे और बाहर ले गई । नए-नए अविजित क्षितिज उसे आकर्षित करते रहे और उनके प्रलोभनों में वह स्वयं से ही दूर बढ़ता गया ।जगत का कोई अंत नहीं है । बाहर अनंत विस्तार है । यह संभव नहीं कि कभी भी उस पूरे विस्तार को हम अपनी मुट्ठी में ले सकेंगे । जितना हम जानते हैं, जगत उतना ही बड़ा होता जाता है । जितना हम उसे जीतते हैं, उतना ही वह अविजित क्षेत्र बड़ा होता जाता है । इस दौड़ में स्वर्णमृग तो हाथ आता नहीं, बल्कि स्वयं की सीता से दूर जरुर हुए जाते हैं । राम ने जैसा अंत में पाया कि स्वर्ण मृग तो मिला नहीं, लेकिन सीता अवश्य खो गई । ऐसी ही दशा पूरी मनुष्यता की है । बाहर के सर्व को खोजने और जीतने हम निकले और अंत में यह पा रहें हैं कि भीतर के स्व को ही हार गए और खो बैठे । मनुष्य की चेतना को वापिस उसके स्व में प्रतिष्ठित करना अपरिहार्य हो गया है ।ऐसा होने पर ही हम स्वयं को जानने में समर्थ हो सकेंगे । और उस ज्ञान के प्रकाश से ही जीवन की उलझी गुत्थी सुलझ पाएगी । यह अज्ञान चरम अज्ञान है कि जो स्वयं को ही न जानता हो, वह शेष सबको जानने में संलग्न हो । प्रकृति नहीं, पुरुष सर्वप्रथम जानने योग्य है । उस ज्ञान के आधार पर शेष सब ज्ञान सार्थक हो सकता है । उस मूल ज्ञान के अभाव में और किसी भी भांति के ज्ञान का कोई भी मूल्य नहीं । मनुष्य प्रथम है, शेष सब पीछे है । मनुष्य को सबसे अंत में रखकर ही भूल हो गई है ।

सोमवार, 3 अगस्त 2009

ज्ञान-गंगा : 10/ धर्म और संप्रदाय


धर्म के प्रति आधुनिक मन में बड़ी उपेक्षा है । और यह अकारण भी नहीं है । धर्म का जो रूप आंखों के सामने आता है, वह न तो रुचिकर ही प्रतीत होता है और न ही धार्मिक । धार्मिक से अर्थ है : सत्य, शिव और सुंदर के अनुकूल । तथाकथित धर्म वह वृत्ति ही नहीं बनाता जिससे सत्य, शिव और सुंदर की अनुभूति होती हो । वह असत्य, अशिव और असुंदर की भावनाओं को बल और समर्थन भी देता है । हिंसा, वैमनस्य और विद्वेष उसकी छाया में पलते हैं । मनुष्य का इतिहास तथाकथित धर्म के नाम पर इतना रक्तरंजित हुआ है कि जिनमें थोड़ा विवेक और बुद्धि है, बहुत स्वाभाविक है कि न केवल उनके ह्रदय धर्म के प्रति उदासीन हो जाएं, बल्कि ऐसे विकृत रूपों के प्रति विद्रोह का भी अनुभव करें । यह बात विरोधाभासी मालूम होगी । किंतु बहुत सत्य है कि जिनके चित्त वस्तुत: धार्मिक हैं, वे ही लोग तथाकथित धर्मों के प्रति विद्रोह अनुभव कर रहें हैं ।

धर्म एक जीवंत प्रवाह है । और निरंतर रुढ़ियों, परम्पराओं और अंधविश्वासों को तोड़कर उसे मार्ग बनाना होता है । सरिताएं जैसे सागर की ओर बहती हैं, और उन्हें अपने मार्ग में बहुत सी चट्टाने तोड़नी पड़ती हैं, और बहुत सी बाधाएँ दूर करनी होती हैं, ठीक वैसे ही धर्म का भी विकास होता है । धर्म के प्रत्येक सत्य के आसपास शीघ्र ही सम्प्रदाय अपने घेरे बांध कर खड़े हो जाते हैं । फिर इन घेरों से न्यस्त स्वार्थ होते हैं । स्वाभाविक है कि जहां स्वार्थ है, वहां संघर्ष भी आ जाए । ऐसे संप्रदाय आपस में लड़ने लगते हैं । यह लड़ाई वैसी ही है, जैसी प्रतिस्पर्धी दुकानों में ग्राहकों के लिए होती है । संगठन संख्या पर जीते हैं । इसलिए येन-केन प्रकारेण अनुयायियों को बढ़ाने की दौड़ चलती रहती है । धर्म के नाम पर भी इस प्रकार शोषण शुरु हो जाता है । मार्क्स ने संभवत: इसी कारण धर्म को जनता के लिए अफीम का नशा कहा है ।

धर्म, संप्रदाय सत्य के खोजी भी नहीं रह जाते । वे तो अपनी-अपनी धारणाओं को हर स्थिति में सत्य सिद्ध करने में संलग्न हैं और इसलिए वे ज्ञान के प्रत्येक नए चरण के शत्रु हो जाते हैं । विज्ञान के साथ धर्म का संघर्ष इसी बात की सूचना है । ज्ञान तो नित्य आगे बढ़ता रहता है और तथाकथित धार्मिक पुरानी और मृत धारणाओं से ही चिपके रहते हैं । इसलिए वे प्रगति के विरोध में प्रतिक्रियावादी सिद्ध होते हैं । ऐसे धर्म-संप्रदाय धर्म के ही मार्ग में बाधा बन जाते हैं । धर्म को जितना अहित साम्प्रदायिक दृष्टि ने पहुंचाया है, उतना किसी और बात ने नहीं । सम्प्रदाय जितने बढ़ते गए, धर्म का उतना ही ह्तास होता गया । सम्प्रदाय तो जड़ आवरण है । धर्म की विकासशील आत्मा के वे कारागृह बन जाते हैं ।

धर्म एक है, लेकिन संप्रदाय अनेक हैं और इसी कारण अद्वय सत्य की उपलब्धि में उनकी अनेकता सहयोगी नहीं हो पाती । जैसे विज्ञान एक है और उसके कोई संप्रदाय नहीं, वैसे ही वस्तुत: धर्म भी एक है और उसके सत्य भी सार्वभौम है । धर्म की संप्रदायों से मुक्ति अत्यंत आवश्यक हो गई है । मनुष्य के विकास में ऐसी घड़ी आ गई है कि धर्म संप्रदाय से मुक्त होकर ही प्रीतिकर, उपादेय और वांछनीय ज्ञान हो सकेगा । संप्रदाय से मुक्त होते ही धर्म के न्यस्त स्वार्थ रूप नष्ट हो जाते हैं । वह दुकानदारी नहीं है और न ही किन्हीं अंधविश्वासों का प्रचार है । वह न संगठन है और न शोषण । फिर भी वह व्यक्ति, सत्ता और सर्व सत्ता के बीच प्रेम और प्रार्थना का अत्यंत निजी संबंध है । धर्म अपने शुद्ध रूप में वैयक्तिक है । वह तो स्वयं का समर्पण है । संगठन से नहीं, साधना से उसका संबंध है । क्या प्रेम के कोई संप्रदाय हैं ? और जब प्रेम के नहीं हैं तब प्रार्थना के कैसे हो सकते हैं ? प्रार्थना तो प्रेम का ही शुद्धतम रूप है ।

रविवार, 2 अगस्त 2009

ज्ञान-गंगा : 9 / ज्ञान, ज्ञाता , ज्ञेय और अहंकार


साधारणत: जिसे ज्ञान कहते हैं, वह ज्ञान द्वैत के ऊपर नहीं ले जाता । वहां द्वैत हमेशा बना रहता है । जहां दो का भाव हो, वहीं यह संभव होता है कि ज्ञेय और ज्ञाता अलग-अलग बने रहते हैं । इसी लिए यह ज्ञान एक बाह्य संबंध है । यह अंदर प्रवेश नहीं कर पाता । ज्ञाता ज्ञेय के कितने ही निकट पहुँच जाए, फिर भी दूर ही बना रहता है । इस तथाकथित ज्ञान के लिए दूरी अनिवार्य और अपरिहार्य है । इसलिए ऐसा ज्ञान मात्र किसी विषय का परिचय ही दे पाता है, वस्तुत: ज्ञान नहीं बन पाता । मनुष्य के लिए बड़ी से बड़ी पहेलियों में से एक यही है कि ज्ञान बिना दूरी के संभव नहीं । लेकिन जहां दूरी है,वहां सच्चा ज्ञान असम्भव है ।

क्या यह संभव है कि दूरी न हो और ज्ञान संभव हो जाए ? यदि यह संभव नहीं है, तो सत्य कभी भी नहीं जाना जा सकता । और साधारणत: यह संभव नहीं दिखता, क्योंकि जो भी हम जानते हैं, वह जानने के कारण ही हमसे पृथक और अन्य हो जाता है । ज्ञान ज्ञाता और ज्ञेय को तोड़ देता है । वह जोड़ने वाला सेतु नहीं, वरन् पृथक करने वाली खाई है । और यही कारण है कि जिन्हें हम ज्ञानी कहते हैं, वे अति अहंकार युक्त हो जाते हैं । जैसे-जैसे उनका ज्ञान बढ़ता है, वैसे-वैसे वे विश्वसत्ता से टूटते जाते हैं । इस भांति यदि कोई सर्वज्ञ हो जाए तो वह अपने अहम बिंदु पर समग्र रूपेण केंद्रित हो जाएगा । और जहां जितना अहंकार है, उतना ही अंधकार है । ज्ञानी होने का बोध अहंकार की सूचना है । और सर्वज्ञ होने की धारणा परम अज्ञान की स्थिति है । सुकरात को परम ज्ञानी कहा गया है । क्योंकि उसने कहा है कि मैं इतना ही जानता हूँ कि मैं कुछ भी नहीं जानता । उपनिषद् भी घोषणा करते हैं, कि अज्ञान तो अंधकार में ले ही जाता है, लेकिन ज्ञान महा अंधकार में ले जाता है । ईशोपनिषद् का इस संबंध में स्पष्ट कथन है : जो जन अविद्या में निरंतर मग्न हैं, वे डूब जाते हैं तमस में । जो मनुज विद्या में सदा रमें हैं, वे और भी अधिक तमस में धंस जाते हैं और जो मनुष्य निरोध उपासना करते हैं, वे डूब जाते हैं घने तमस-अंध में तथा जो जन सदैव विकास में लगे हैं वे और अधिकाधिक तमस-अंध में धंस जाते हैं ।

अहंकार ही अज्ञान है । इसलिए जिस ज्ञान से अहंकार पोषित होता हो, वह प्रच्छन रूप में अज्ञान ही है । फिर क्या ऐसा भी कोई ज्ञान संभव है, जो अज्ञान न हो अर्थात् क्या ऐसा ज्ञान संभव है, जिसमें अहंकार न हो ? दूसरे शब्दों में क्या ज्ञान ज्ञाता और ज्ञेय को जोड़ने वाला सेतु भी हो सकता है ? निश्चय ही ऐसा ज्ञान संभव है और उस ज्ञान का नाम ही प्रेम है । प्रेम ज्ञान का ऐसा मार्ग है, जहां अहंकार को मिटा कर प्रवेश मिलता है । प्रेम का अर्थ है स्वयं के और सर्व के बीच दूरी को मिटाना । यह दूरी उसी मात्रा में विलीन होने लगती है, जिस मात्रा में मैं का भाव नष्ट हो जाता है । रूमी की एक कविता है - जिसमें प्रेमी ने प्रेयसी के द्वार पर दस्तक दी है । भीतर से आवाज आई - कौन है? प्रेमी ने कहा मैं तेरा प्रेमी । लेकिन फिर भीतर से कोई आवाज न आई और न ही दरवाजा खुलता मालूम पड़ा । प्रेमी ने चिल्लाकर पूछा कि क्या कारण है कि द्वार नहीं खुलता । उत्तर आया - प्रेम के द्वार उसके लिए ही खुलते हैं, जिसने उसकी पात्रता अर्जित कर ली हो । यह सुन कर प्रेमी चला गया और वर्षों की तपश्चर्या के बाद पुन: उस द्वार पर आया । फिर पूछा गया कि द्वार पर कौन है ? इस बार उत्तर अलग था । प्रेमी ने कहा - मैं नहीं हूँ, अब तो तू ही तू है । और जो द्वार बंद थे वे खुल गए । प्रेम का द्वार तभी खुलता है, जब अहंकार का आभास गिर जाता है । सत्य पर पर्दा नही है । पर्दा हमारी दृष्टि पर है । और गहरे में देखने पर प्रेम के द्वार बंद नहीं थे, बल्कि अहंकार से आंखें बंद थी । अहंकार गया तो द्वार सदा से ही खुले हैं ।

प्रेम की साधना स्वयं को मिटाने की साधना है । और आश्चर्यों का आश्चर्य तो यही है कि जो स्वयं को मिटाता है, वही स्वयं को पाने में समर्थ होता है ।

ज्ञान-गंगा : 8 राग, लालसा और प्रेम


प्रेम क्या है ? इसे समझने के पहले यह जानना जरूरी है कि प्रेम क्या नहीं है । क्योंकि जिसे हम प्राय: प्रेम के नाम से जानते हैं, वह और कुछ भले ही हो, प्रेम कतई नहीं है । मानव के संबंधों में भी हमें अधिकतर राग,लालसा, आसक्ति दिखाई देती है, वह प्रेम नहीं कहा जा सकता । प्रेम की विकृति ही राग, लालसा और आसक्ति है । पहले काम को लें । यह राग से उत्पन्न होता है । काम प्रेम नहीं है । काम या यौन आकर्षण तो प्रकृति का संतति उत्पादन के लिए प्रयोग किया गया सम्मोहन है । यथार्थ में यह वैसी ही मूर्छा है, जैसी शल्य-चिकित्सक शल्य क्रिया के पूर्व उपयोग में लाता है । इस मूर्छा के अभाव में प्रकृति का संतति-क्रम चलना संभव नहीं है । इसे ही जो प्रेम समझ लेते हैं, वे भ्रांति में पड़ जाते हैं । यह मूर्छा मनुष्य में ही नहीं वरन् समस्त पशु-पक्षी, कीट-पतंग में भी ऐसी ही पाई जाती है । कई जीवधारियों की तो संभोग के बाद मृत्यु हो जाती है । शहद की मक्खी का दृष्टांत लीजिए । इस मक्खी के छत्ते में इन मक्खियों की एक रानी रहती है । इस रानी मक्खी से अनेक नर मक्खियां संभोग की इच्छा रखते हैं । अंत में जिस नर को वह रानी पसंद करती है, उसके साथ उड़ती है और संभोग होने के पश्चात् नर का प्राणांत हो जाता है । फिर भी प्रकृति का सम्मोहन इतना गहरा है कि सामने खड़ी मृत्यु भी यौन आकर्षण से प्राणियों को नहीं रोक पाती ।जहां तक इस प्रकार के प्रेम का संबंध है, मनुष्य के संबंध में भी, वह अन्य पशु-पक्षियों कीटादि से अलग नहीं है । प्रेम के संबंध में विचार करते समय यह ध्यान में रखना जरूरी है कि यौन-आकर्षण को ही प्रेम न समझ लिया जाए । यथार्थ में यह राग का सबसे बड़ा रूप है । सत्य तो यह है कि राग की यह शक्ति, जिस मात्रा में वासना से मुक्त हो जाती है, उतनी ही मात्रा में उसका रूपांतरण प्रेम में होता है । प्रेम राग नहीं है, बल्कि राग-शक्ति का दिव्य रूपांतरण है । राग के बाद लालसा आती है । हम लालसा और प्रेम को भी एक ही समझ बैठे हैं । लालसा में युद्ध- अधिकार की भावना रहती है । मनुष्य शक्ति का पिपासु है । फिर चाहे यह प्रेम के नाम से भी क्यों न हो । इसलिए अधिकार और स्वामित्व खोजा जाता है । पिता-पुत्र, मित्र-मित्र, पति-पत्नी आदि के अधिकांश संबंधों में यह अधिकार की भावना ही दृष्टिगोचर होती है । इसलिए अनेक बार हमें पिता-पुत्र, मित्र-मित्र और पति-पत्नी तक के संबंध टूटते दिखाई पड़ते हैं । पति को अपने स्वामित्व का बड़ा ध्यान रहता है और पत्नी दासी बन जाती है । पत्नी भी ऊपर से चाहे स्वयं को दासी कहे, परन्तु बहुधा भीतर से उसमें भी मालिक बनने का भाव सक्रिय रहता है । मालकियत की यह प्रतिस्पर्धा चाहे वह पिता-पुत्र में हो, चाहे मित्र-मित्र में और पति-पत्नी में, बहुता संघर्ष और कलह बन जाती है । प्रेम की पहली शर्त है निरहंकारिता । मनुष्य की सबसे बड़ी और गहरी भावना है अहंकार । जहां अहंकार नहीं वहीं प्रेम का जन्म होता है । लालसा में अहंकार सबसे प्रधान वस्तु रहती है । अहंकार केंद्रित जीवन में जिसे हम प्रेम समझते हैं, वह प्रेम न होकर लालसा होती है । जिसके प्रति यह लालसा रहती है, वह भी अनेक बार इसे प्रेम समझ कर भ्रांति में पड़ जाता है । वस्तुओं और साधनों से प्रेम नहीं किया जा सकता । उसका तो बस उपयोग और शोषण ही होता है । हां, उनसे प्रेम जतलाया जा सकता है । वैसे ही जैसे दासता के युगों में मालिक गुलामों को जीवन सुविधाएं देता था ताकि वे मर जाएं । शायद वे मालिक अपने दासों के प्रति प्रेम भी जतलाते रहे हों । जैसा उनका प्रेम रहा होगा वैसी ही यह लालसा है । इस प्रकार राग, लालसा और आसक्ति चाहे प्रेम दिखें, पर वह यथार्थ में प्रेम नहीं है । जो व्यक्ति स्वयं को निपट शून्य बना लेता है, उससे और केवल उससे ही प्रेम की ऊर्जा अभिव्यक्त होती है । प्रेम व्यष्टि और समष्टि दोनों के प्रति हो सकता है । जिनके ह्रदय में प्रेम है , वह चाहे व्यष्टि के प्रति हो या समष्टि के, वह प्रेम पात्र के लिए ही सब कुछ करता है । उसकी समस्त इच्छाएं प्रेम-पात्र को सुख देने में रहती हैं । उस प्रेम के बदले में वह कुछ नहीं चाहता । प्रेम बेशर्त दान है । और जब ऐसा प्रेम समष्टि से हो जाता है, तब उसे विश्व प्रेम की सत्ता मिल जाती है । इस प्रेम के लिए स्वयं को मिटाना आवश्यक है । जो कठीनतम कार्य है । हम तो स्वयं को भरने और बनाने में लगे रहते हैं । इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं है, कि हमारे जीवन राग,लालसा और आसक्ति से भरे हों तथा प्रेम से रहित । और जहां प्रेम नहीं वहां दुख है । प्रेम से उदात्त आनंद से बढ़कर निर्दोष और दिव्य कोई दूसरी अनुभूति नहीं है । इस सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ प्राणी के अनुभव में प्रेम ही सर्वश्रेष्ठ अनुभव है । प्रेम की गहराइयों में ही उसकी चेतना पदार्थ का अतिक्रमण करती है और प्रभु के द्वार पर उपस्थित होती है । प्रेम ही प्रभु का द्वार है । प्रेम है रहस्य और अबूझ । उसे मनुष्य जानता भी है और नहीं भी जानता, परंतु अनजाने ही उसका अनुभव होता है । प्रेम के समक्ष परमात्मा भी प्रत्यक्ष हो जाता है । इसी से प्रेम परम कला है और प्रेम ही परम प्रार्थना है और वही परमात्मा है ।

शनिवार, 1 अगस्त 2009

ज्ञान-गंगा : 7/ चेतन, अचेतन और सृजन


मनुष्य में और पशु में जन्म और मृत्यु की दृष्टि से कोई भेद नहीं है । न तो मनुष्य को ज्ञात है कि वह क्यों पैदा होता है और क्यों मर जाता है और न ही पशु को ।लेकिन मनुष्य को यह ज्ञात है कि वह पैदा होता है और मरता है । यह ज्ञान पशु को नहीं है । और यह ज्ञान बहुत बड़ा भेद पैदा करता है । इसके कारण ही मनुष्य पशुओं के बीच होते हुए भी पशुओं से भिन्न हो जाता है । वह जीवन पर विचार करने लगता है । जीवन में अर्थ और प्रयोजन खोजने लगता है । वह मात्र होने से तृप्त नहीं होता ।वरन् सप्रयोजन और सार्थक रूप से होना चाहता है ।इससे ही जीवन उसके लिए केवल जीना न होकर, एक समस्या और उसके समाधान की खोज बन जाता है । स्वभाविक है कि इससे तनाव, अशांति और चिंता पैदा होती है । कोई पशु न तो चिंतित है, न अशांत है । मनुष्य अकेला प्राणी है, जिसमें ऊब प्रकट होती है । और वही एकमात्र प्राणी है जो कि हँसता है और रोता है । न तो किसी और पशु को किसी भी भांति उबाया ही जा सकता है और न ही हँसाया । पशु जीते हैं सहज और सरल । कोई समस्या वहां नहीं है । भोजन, छाया या इस तरह की तात्कालिक खोजें हैं, लेकिन जीवन का कोई अनुसंधान नहीं है । न कोई अतीत की स्मृति है और न कोई भविष्य का विचार । वर्तमान ही सब कुछ है । और वर्तमान का यह बोध भी हमारे विचार में है । क्योंकि जिनके लिए अतीत और भविष्य नहीं हैं, उनके लिए वर्तमान भी नहीं है । समय या काल मानवीय घटना है । इसीलिए जो भी व्यक्ति मानवीय चिंताओं से मुक्त होना चाहता है, वह किसी न किसी रूप में समय को भुलने या मिटाने की चेष्टा करता है । भूलने के उपाय हैं निद्रा, नशा, सेक्स और इसी तरह की अन्य मूर्छाएं। समय को मिटाने का उपाय है समाधि । लेकिन जब तक चित्त समय में है, तब तक वह चिंता के बाहर नहीं होता है। समय ही चिंता है । उसका बोध भार है । पशु निर्भार,निर्बोध होते हैं, क्योंकि उन्हें समय का कोई बोध नहीं है ।

मनुष्य की यह विशेष स्थिति कि वह सृष्टि का अंग होते हुए भी सामान्य रूप से अन्य अंगों की भांति अचेतन अंग नहीं है, उसके जीवन में असामान्य और असाधारण उलझाव खड़े कर देती है । जीवन भर किसी न किसी रूप में इस दबावग्रस्त स्थिति के अतिक्रमण की खोज चलती है । मनुष्य सृष्टि का अचेतन अंग तो नहीं हो पाता । होश में रहते यह असंभव है । वह पशु और पौधों के निश्चिंत जीवन को नहीं पा सकता । उसकी चेतना ही इन द्वारों को वर्जित किए हुए है । फिर अतिक्रमण का मार्ग एक ही है कि वह किसी तरह सृष्टा हो जाए । सृष्टि के साथ सम्मिलन की भूमिका है अचेतना ,और सृष्टा के साथ सम्मिलन की संभावना है संपूर्ण चेतना । मनुष्य है मध्य में । न वह पूरा अचेतन है और न पूरा चेतन । पशुओं को वह पीछे छोड़ आया है और प्रभु होना अभी दूर है । चेतना जितनी आलोकित होती जाए, और अचेतना का अंधकार जितना दूर हो, उतना ही वह परमात्मा के निकट पहुँचता है । प्रकृति और परमात्मा, अचेतना और चेतना, यही दो ध्रुव हैं, जिनके मध्य पतन है या प्रगति है । दोनों ही ध्रुव मनुष्य को खींचते हैं और इससे ही उसमें संताप और चिंता का जन्म होता है । छोटे मोटे रूप में भी यदि वह सृष्टा बन जाता है, तो आनंद अनुभव करता है । काव्य हो या चित्र हो या मूर्ति हो, इनका निर्माता होकर भी वह सृष्टा के जगत का अंशभूत भागीदार हो पाता है । विज्ञान के आविष्कार भी उसकी चेतना को इसी बिंदु पर ले आते हैं । मां या पिता को संतति को पाकर जो खुशी है, वह भी सृष्टा होने की ही खुशी है । इसी कारण जो किसी भी भांति का सृजन नहीं कर पाते, उनकी पीड़ा अनंतगुना बढ़ जाती है । सृजन जीवन में न हो तो किसी भी भांति की आनंद-अनुभूति कठिन है । एक विकल्प और है : वह है विनाश का । उससे भी मनुष्य अचेतन सृष्टि के ऊपर होने का अनुभव करता है । हत्यारे, हत्या करके स्वयं को मिटाने की क्षमता का अनुभव करते हैं । वह भी बनाने की क्षमता का दूसरा पहलू है । तैमूर लंग, हिटलर या स्टेलिन या अन्य युद्धखोरों का जो सुख है, वह सृष्टि के अचेतन अंग-मात्र होने के अतिक्रमण की चेष्टा है । जो सृजन नहीं कर पाते वे विनाश की ओर झुक जाते हैं । समाधान भिन्न और विपरीत्त हैं, लेकिन समस्या दोनों की एक ही है । निश्चय ही सृजन के आनंद और विनाश के सुख में मूलभूत अंतर है । दोनों स्थितियों में व्यक्ति प्रकृति से दूर हटता है । लेकिन पहली स्थिति में वह परमात्मा के निकट पहुँच जाता है और दूसरी स्थिति में कहीं नहीं पहुंचता । पहली स्थिति में स्वयं से मुक्त हो जाता है । दूसरी स्थिति में मात्र अहंकार में केंद्रित । इसीलिए विनाश की दिशा में जो सुख जैसा आभास था, वह अंत में चरम दुख सिद्ध होता है । क्योंकि स्वयं की अहंता में बंद हो जाने से बड़ा और कोई नरक है । जीवन का जो भी विकास और विस्तार है वह स्वयं से मुक्त हो, समग्र के साथ संयुक्त होने में है । यह अवस्था केवल सतत सृजनशील मन ही उपलब्ध कर पाता है । सतत सृजनशील इसलिए कि यदि अपने ही किसी सृजन पर व्यक्ति रुक जाए तो वह भी अहंकार का पोषण हो जाता है । सतत सृजन का अर्थ है, जो हमसे निर्मित हुआ है, उससे मुक्त होते जाना । जिस दिन सृजन ही रह जाता है और कृतत्व -भाव विलीन हो जाता है, उस दिन ही, उस क्षण ही, व्यक्ति मिटता है , अहंकार की छाया विसर्जित होती है । समष्टि के द्वार खुलते हैं और ब्रह्म में चेतना का प्रवेश होता है । यह प्रवेश ही आनंद में, आलोक में और अमृत में प्रतिष्ठा है।
(यह शृंखला ओशो की देशना पर आधारित है । लेखक 30 वर्षों से ओशो साहित्य से जुड़ें हैं)