शनिवार, 29 अगस्त 2009

डूबना-उबरना

हम
गिरते रहे
भावना के
एक ही
कुँए में
रोज
और
डूब गए
डूबते को
तिनके का
सहारा भी
न मिला
और
हम टूट गए
इस कदर
कि अब
रोज भावना से मिलना होता है,
हम प्रतिबिंबित भी होते हैं उसमें
पर डूबते नहीं ...
सार समझ में आ गया !

( स्वप्न मंजूषा शैल जी (अदा जी), ने इस अभिव्यक्ति को शीर्षक भी दिया और लेबल भी, मैं ह्रदय से आभारी हूँ ।)

3 टिप्‍पणियां:

  1. sarvpratham, ise AKAVITA kyon kaha aapne...MUKTAK kah sakte hain...
    kyonki roj-roj girne mein bhi lay hogi..
    aur tootne mein taal...
    fir bhawna se pratidin milna ho to sangeet ban hi gaya hoga...
    ubar kar aagaye hain aur saar bhi samjha gaye hain...
    khoobsurat...

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  2. अगर आपको इसमें कविता नज़र आई तो मैं शुक्रगुजार हूँ .
    सुनता हूँ कि हर भाव कविता होता है
    पर कुछ लोग छंद और अलंकार के बिना व्यक्त किए गए भाव को
    अकविता कहते हैं और मैं तो सीधा-सपाट भाव लिखता हूँ ।
    आपकी व्याख्या भी बहुत पसंद आई ।

    आपने अपने ब्ला़ग पर जो गाना बजाना शुरु किया है...उसने ब्लॉग पढ़ने का आनंद बढ़ा दिया है ।

    धन्यवाद !

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  3. भारती जी,
    आपने इतना सम्मान दे दिया मुझे...
    सच कहूँ तो मैं इस काबिल नहीं हूँ..
    मैं सिर्फ नत-मस्तक हो सकती हूँ..

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