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ज्ञान-गंगा : 7/ चेतन, अचेतन और सृजन


मनुष्य में और पशु में जन्म और मृत्यु की दृष्टि से कोई भेद नहीं है । न तो मनुष्य को ज्ञात है कि वह क्यों पैदा होता है और क्यों मर जाता है और न ही पशु को ।लेकिन मनुष्य को यह ज्ञात है कि वह पैदा होता है और मरता है । यह ज्ञान पशु को नहीं है । और यह ज्ञान बहुत बड़ा भेद पैदा करता है । इसके कारण ही मनुष्य पशुओं के बीच होते हुए भी पशुओं से भिन्न हो जाता है । वह जीवन पर विचार करने लगता है । जीवन में अर्थ और प्रयोजन खोजने लगता है । वह मात्र होने से तृप्त नहीं होता ।वरन् सप्रयोजन और सार्थक रूप से होना चाहता है ।इससे ही जीवन उसके लिए केवल जीना न होकर, एक समस्या और उसके समाधान की खोज बन जाता है । स्वभाविक है कि इससे तनाव, अशांति और चिंता पैदा होती है । कोई पशु न तो चिंतित है, न अशांत है । मनुष्य अकेला प्राणी है, जिसमें ऊब प्रकट होती है । और वही एकमात्र प्राणी है जो कि हँसता है और रोता है । न तो किसी और पशु को किसी भी भांति उबाया ही जा सकता है और न ही हँसाया । पशु जीते हैं सहज और सरल । कोई समस्या वहां नहीं है । भोजन, छाया या इस तरह की तात्कालिक खोजें हैं, लेकिन जीवन का कोई अनुसंधान नहीं है । न कोई अतीत की स्मृति है और न कोई भविष्य का विचार । वर्तमान ही सब कुछ है । और वर्तमान का यह बोध भी हमारे विचार में है । क्योंकि जिनके लिए अतीत और भविष्य नहीं हैं, उनके लिए वर्तमान भी नहीं है । समय या काल मानवीय घटना है । इसीलिए जो भी व्यक्ति मानवीय चिंताओं से मुक्त होना चाहता है, वह किसी न किसी रूप में समय को भुलने या मिटाने की चेष्टा करता है । भूलने के उपाय हैं निद्रा, नशा, सेक्स और इसी तरह की अन्य मूर्छाएं। समय को मिटाने का उपाय है समाधि । लेकिन जब तक चित्त समय में है, तब तक वह चिंता के बाहर नहीं होता है। समय ही चिंता है । उसका बोध भार है । पशु निर्भार,निर्बोध होते हैं, क्योंकि उन्हें समय का कोई बोध नहीं है ।

मनुष्य की यह विशेष स्थिति कि वह सृष्टि का अंग होते हुए भी सामान्य रूप से अन्य अंगों की भांति अचेतन अंग नहीं है, उसके जीवन में असामान्य और असाधारण उलझाव खड़े कर देती है । जीवन भर किसी न किसी रूप में इस दबावग्रस्त स्थिति के अतिक्रमण की खोज चलती है । मनुष्य सृष्टि का अचेतन अंग तो नहीं हो पाता । होश में रहते यह असंभव है । वह पशु और पौधों के निश्चिंत जीवन को नहीं पा सकता । उसकी चेतना ही इन द्वारों को वर्जित किए हुए है । फिर अतिक्रमण का मार्ग एक ही है कि वह किसी तरह सृष्टा हो जाए । सृष्टि के साथ सम्मिलन की भूमिका है अचेतना ,और सृष्टा के साथ सम्मिलन की संभावना है संपूर्ण चेतना । मनुष्य है मध्य में । न वह पूरा अचेतन है और न पूरा चेतन । पशुओं को वह पीछे छोड़ आया है और प्रभु होना अभी दूर है । चेतना जितनी आलोकित होती जाए, और अचेतना का अंधकार जितना दूर हो, उतना ही वह परमात्मा के निकट पहुँचता है । प्रकृति और परमात्मा, अचेतना और चेतना, यही दो ध्रुव हैं, जिनके मध्य पतन है या प्रगति है । दोनों ही ध्रुव मनुष्य को खींचते हैं और इससे ही उसमें संताप और चिंता का जन्म होता है । छोटे मोटे रूप में भी यदि वह सृष्टा बन जाता है, तो आनंद अनुभव करता है । काव्य हो या चित्र हो या मूर्ति हो, इनका निर्माता होकर भी वह सृष्टा के जगत का अंशभूत भागीदार हो पाता है । विज्ञान के आविष्कार भी उसकी चेतना को इसी बिंदु पर ले आते हैं । मां या पिता को संतति को पाकर जो खुशी है, वह भी सृष्टा होने की ही खुशी है । इसी कारण जो किसी भी भांति का सृजन नहीं कर पाते, उनकी पीड़ा अनंतगुना बढ़ जाती है । सृजन जीवन में न हो तो किसी भी भांति की आनंद-अनुभूति कठिन है । एक विकल्प और है : वह है विनाश का । उससे भी मनुष्य अचेतन सृष्टि के ऊपर होने का अनुभव करता है । हत्यारे, हत्या करके स्वयं को मिटाने की क्षमता का अनुभव करते हैं । वह भी बनाने की क्षमता का दूसरा पहलू है । तैमूर लंग, हिटलर या स्टेलिन या अन्य युद्धखोरों का जो सुख है, वह सृष्टि के अचेतन अंग-मात्र होने के अतिक्रमण की चेष्टा है । जो सृजन नहीं कर पाते वे विनाश की ओर झुक जाते हैं । समाधान भिन्न और विपरीत्त हैं, लेकिन समस्या दोनों की एक ही है । निश्चय ही सृजन के आनंद और विनाश के सुख में मूलभूत अंतर है । दोनों स्थितियों में व्यक्ति प्रकृति से दूर हटता है । लेकिन पहली स्थिति में वह परमात्मा के निकट पहुँच जाता है और दूसरी स्थिति में कहीं नहीं पहुंचता । पहली स्थिति में स्वयं से मुक्त हो जाता है । दूसरी स्थिति में मात्र अहंकार में केंद्रित । इसीलिए विनाश की दिशा में जो सुख जैसा आभास था, वह अंत में चरम दुख सिद्ध होता है । क्योंकि स्वयं की अहंता में बंद हो जाने से बड़ा और कोई नरक है । जीवन का जो भी विकास और विस्तार है वह स्वयं से मुक्त हो, समग्र के साथ संयुक्त होने में है । यह अवस्था केवल सतत सृजनशील मन ही उपलब्ध कर पाता है । सतत सृजनशील इसलिए कि यदि अपने ही किसी सृजन पर व्यक्ति रुक जाए तो वह भी अहंकार का पोषण हो जाता है । सतत सृजन का अर्थ है, जो हमसे निर्मित हुआ है, उससे मुक्त होते जाना । जिस दिन सृजन ही रह जाता है और कृतत्व -भाव विलीन हो जाता है, उस दिन ही, उस क्षण ही, व्यक्ति मिटता है , अहंकार की छाया विसर्जित होती है । समष्टि के द्वार खुलते हैं और ब्रह्म में चेतना का प्रवेश होता है । यह प्रवेश ही आनंद में, आलोक में और अमृत में प्रतिष्ठा है।
(यह शृंखला ओशो की देशना पर आधारित है । लेखक 30 वर्षों से ओशो साहित्य से जुड़ें हैं)

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