बुधवार, 26 अगस्त 2009

सृजन की वेदना

सृजन के पथ पर
निकली हर आह
प्रसव वेदना को सहने का संबल है
जो मन मंजूषा भरी है
भावों से, उनकी आभा पीली है
क्योंकि हर भाव अपनी परिपक्वता में
इसी रंगत में आकर टूट जाता है

पीड़ा अपने चरम पर
आकर बिखर जाती है

सृजन की अंतिम घड़ियों में
वीणा से संगीत भी शांत हो जाता है

और
धीरे से आह निकलती है
कोई जन्म ले रहा है ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सृजन के पथ पर
    निकली हर आह
    प्रसव वेदना को सहने का संबल है
    जो मन मंजूषा भरी है
    भावों से, उनकी आभा पीली है
    क्योंकि हर भाव अपनी परिपक्वता में
    इसी रंगत में आकर टूट जाता है
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  2. फिर एक सुंदर रचना !

    'बिखरे सितारे 'पे comment के लिए तहे दिलसे शुक्रिया !
    भाषा संबन्धी त्रुटियाँ ज़रूर बताएँ !

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