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मानवीय संवेदना

आज होम्ज़ का एक वचन याद आ रहा है : - संसार के महान व्यक्ति अक्सर बड़े विद्वान नहीं रहते, और न ही बड़े विद्वान महान व्यक्ति हुए हैं । यह वचन जब पहली बार पढ़ा था, तभी मन-मस्तिष्क और अंतस ने इसे स्वीकार कर लिया था और जीवन-अनुभव में भी यह पाता हूँ कि जो विद्वान होने का दंभ भरते हैं; उनके पास पुस्तकों और शास्त्रों की स्मृतियाँ तो बहुत होती हैं, पर उनके पास वह संवेदना नहीं होती जो जीवंत सत्य को देख सके और उसके अनुरुप व्यवहार कर सके और न ही मुझे ऐसे विद्वानों में वो सनकीपन और जुनून ही दिखाई पड़ता जो महान लोगों में होता है । अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने एक बार मार्ग से गुजरते हुए एक बीमार सूअर को कीचड़ में फँसे हुए देखा और अपने अंतस की आवाज को सुन उसे बचाने कीचड़ में कूद उस सूअर को बाहर निकाल लाए । लोगों ने हैरानी से इसका सबब पूछा तो वे बोले - मैंने सूअर को बचा कर अपने ह्रदय की वेदना का बोझ दूर किया है । दुखियों को देखकर हमारे ह्रदय में जो टीस उठती है, उसी को मिटाने के लिए हम दुखियों का दु:ख दूर करते हैं । काश ! कुछ थोड़े से लोग भी अपने अंतस की आवाज़ के अनुसार जिएं और उसके साथ कभी समझौता न ...

नीत्शे के बहाने

प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्शे ने कहा है : विशाल जन-समूह निरे साधन हैं अथवा रुकावटें या नकलें हैं महान कार्य ऐसी सामूहिक हलचल पर निर्भर नहीं हुआ करते, क्योंकि सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ का भी जन-समूह पर कोई प्रभाव नहीं ! कितना सही कहा है । सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ हमेशा भीड़ से अलग अकेला खड़ा होता है और हर सफल इंसान सफल इस लिए होता है क्योंकि वह भीड़ से अलग कुछ विशेष रखता है । दूसरी ओर यह भी सच है कि सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ का भी जन-समूह पर कोई प्रभाव नहीं ! कितने लोग सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ, फिर चाहे वे कलात्मक फिल्में हों या उत्कृष्ट साहित्य पसंद करते हैं । निश्चित ही सर्वोत्तम सर्वोत्तम को ही प्रभावित कर सकता है ।