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आवाज़

एक झेन साधक की मृत्यु हुई । उसके आश्रम के निकट ही एक अंधा वृद्ध रहता था । साधक की शोकसभा में उसने कहा – “मैं जन्म से अंधा हूँ । लोगो के चेहरे नहीं देख सकता । लेकिन उनकी भावनाएँ उनकी आवाज़ से पहचान पाता हूँ । आमतौर पर मैं जब किसी को बधाई देते सुनता हूँ, तो आवाज के पीछे छिपी ईर्ष्या की गूँज भी मुझे सुनाई देती है । जब किसी को सांत्वना देते हुए सुनता हूँ तो छिपी हुई खुशी भी मुझ से बच नहीं पाती, कि चलो यह दु:ख हमें तो नहीं है । पर इस साधक को मैंने जब भी सुना, वह वही था, जो वह कह रहा था । जब यह बधाई देता था तो अंदर से बाहर तक खुश होता था । जब दु:ख जताता था तो सचमुच दु:खी होता था । “

त्याग

आज ओशो के प्रवचन पथ की खोज से ली गई एक कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ , जो त्याग का सही अर्थ बताने में सहायक होगी । त्याग एक फकीर था, अत्यंत अपरिग्रही और त्यागी । वह था और उसकी पत्नी थी । दोनों लकड़ियाँ काटते और उन्हें बेच कर अपनी आजीविका चलाते । संध्या जो पैसा बचता, उसे बाँट देते । एक बार चार छ: दिन लगातार पानी गिरा । वे लकड़ियाँ काटने नहीं जा सके । और उन्हें भूखा ही रहना पड़ा । भिक्षा वे मांगते नहीं थे । और संपत्ति उनके पास थी नहीं । उनने वे दिन उपवास और उपासना में बिताए । फिर जब पानी बंद हुआ , तो वे लकड़ियाँ काटने गए । जिस दिन वे लकड़ियाँ काटकर भूखे और थके वापिस लौट रहे थे, उस दिन एक घटना घटी । पति आगे था , पत्नी पीछे थी । पति ने राह के किनारे किसी राहगीर की स्वर्ण अशर्फियों से भरी थैली पड़ी देखी । उसने अपने मन में सोचा : मैंने तो स्वर्ण को जीत लिया है । मैं तो कांचन मुक्त हो गया हूँ । लेकिन मेरी पत्नी के मन में कहीं स्वर्ण देख प्रलोभन न आ जाए, - ऐसा विचारकर , ऐसे सोच से, ऐसी सदिच्छा से उसने उन स्वर्ण अशर्फियों को गड्ढ़े में ढकेल ऊपर से मिट्टी डाल दी । वह मिट्टी डाल ही रहा था कि उसकी पत्नी ...

पशु और बुद्धत्व

एक झेन कथा :  शोदाई एरो जो ध्यान की शिक्षा ग्रहण करना चाहता था, ध्यान सीखना चाहता था । इस प्रयोजन हेतु वह बासो के पास आया । बासो ने एरो से पूछा, "तुम्हारा आना किस लिए हुआ है ?" एरो ने कहा, "मुझे ज्ञान चाहिए, मैं ध्यान सीखना चाहता हूँ और बुद्धत्व की प्राप्ति चाहता हूँ ।" "बुद्धत्व की प्राप्ति असंभव है । ऐसे ज्ञान का संबंध शैतान से है । " बासो का जवाब था । एरो बासो की बात नहीं समझा । तब बासो ने उसे सेकितो नाम के एक अन्य झेन गुरु के पास भेज दिया । एरो ने सेकितो के पास जाकर पूछा, " बुद्धत्व क्या है ? " सेकितो ने कहा, "तुममें बुद्धत्व के लक्षण नहीं हैं । " एरो ने पूछा, "क्या पशु बुद्ध हो सकते हैं ?" सेकितो ने कहा,"हाँ, वे हैं ।" एरो ने स्वाभाविक जिज्ञासा से प्रश्न किया - "फिर मैं बुद्ध क्यों नहीं हो सकता ?" सेकितो ने जवाब दिया,"क्योंकि तुम पूछते हो " झेन गुरु सेकितो के उक्त कथन से एरो की उलझन मिट गई और उसे ज्ञान हो गया ।