शनिवार, 29 मई 2010

त्याग

आज ओशो के प्रवचन पथ की खोज से ली गई एक कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ , जो त्याग का सही अर्थ बताने में सहायक होगी ।

त्याग


एक फकीर था, अत्यंत अपरिग्रही और त्यागी । वह था और उसकी पत्नी थी । दोनों लकड़ियाँ काटते और उन्हें बेच कर अपनी आजीविका चलाते । संध्या जो पैसा बचता, उसे बाँट देते । एक बार चार छ: दिन लगातार पानी गिरा । वे लकड़ियाँ काटने नहीं जा सके । और उन्हें भूखा ही रहना पड़ा । भिक्षा वे मांगते नहीं थे । और संपत्ति उनके पास थी नहीं । उनने वे दिन उपवास और उपासना में बिताए । फिर जब पानी बंद हुआ , तो वे लकड़ियाँ काटने गए । जिस दिन वे लकड़ियाँ काटकर भूखे और थके वापिस लौट रहे थे, उस दिन एक घटना घटी । पति आगे था , पत्नी पीछे थी । पति ने राह के किनारे किसी राहगीर की स्वर्ण अशर्फियों से भरी थैली पड़ी देखी । उसने अपने मन में सोचा : मैंने तो स्वर्ण को जीत लिया है । मैं तो कांचन मुक्त हो गया हूँ । लेकिन मेरी पत्नी के मन में कहीं स्वर्ण देख प्रलोभन न आ जाए, - ऐसा विचारकर , ऐसे सोच से, ऐसी सदिच्छा से उसने उन स्वर्ण अशर्फियों को गड्ढ़े में ढकेल ऊपर से मिट्टी डाल दी ।


वह मिट्टी डाल ही रहा था कि उसकी पत्नी भी पहुँच गई । उसने पूछा, कि यह क्या करते हो ? उस साधु चरित्र व्यक्ति को बताना ही पड़ा, क्योंकि असत्य न बोलने का उसका व्रत था । उसने कहा : यहां बहुत सी स्वर्ण अशर्फियाँ पड़ी थी । मैं तो अपरिग्रही हूँ । स्वर्ण पर मेरा मन नहीं आता । मैंने तो जान लिया है कि स्वर्ण असार है , लेकिन तुम स्त्री हो, अनेक दिन की भूखी प्यासी हो, दुख और दरिद्रता के कारण कहीं उस स्वर्ण पर तुम्हारा मन न आ जाए, इसलिए मैंने उस पर मिट्टी डाल दी है । यह सुन पत्नी चुपचाप आगे बढ़ गई । उसने उत्तर में कुछ भी न कहा । उसके पति ने पूछा : तुम कुछ बोली नहीं ? तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं की ? यह सुन वह रोने लगी । और उसने कहा : मैं दुखी हूँ, कि तुम्हें अभी स्वर्ण दिखाई पड़ता है और मिट्टी पर मिट्टी डालते हुए देख मैं तुम्हारे लिए अति चिंता से भर गई हूँ ।


मैं भी इसमें चिंता के लिए कारण देखता हूँ । जो छोड़ा गया हो और जिसका त्याग न हुआ हो, उसका दीखना बंद नहीं होता है । विपरीत वह और भी प्रगट और प्रगाढ़ हो कर दिखने लगता है । वह तो घाव की भांति अनुभव होता है । सतत् उसकी प्रतीति बनी रहती है ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे नए ब्‍लोग पर मेरी नई कविता शरीर के उभार पर तेरी आंख http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html और पोस्‍ट पर दीजिए सर, अपनी प्रतिक्रिया।

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  2. एक लम्बे अंतराल के बाद आपका आगमन एक सुखद अनुभव है हमारे लिए... आज की इस पोस्ट के लिए सबसे अच्छी प्रतिक्रिया यही होगी कि हम अपनी आँखें मूँद लें और इस पोस्ट के भव को अपने अंतस में उतारने का प्रयास करें..

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  3. अच्छा लगा सदविचार पढ़कर. आभार.

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