रविवार, 30 मई 2010

जिंदगी फ़िराक़ की नज़र से

मौत का भी इलाज हो शायद


जिंदगी का कोई इलाज नहीं

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न समझने की ये बातें हैं न समझाने की

जिंदगी उचटी हुई नींद है दीवाने की

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गुर जिंदगी के सीखे खिलती हुई कली से

लब पर है मुस्कराहट दिल खून रो रहा है

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हमें भी देख जो इस दर्द से कुछ होश में आए

अरे दीवाना हो जाना मुहब्बत में तो आसां है

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कोई समझे तो एक बात कहूँ

इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं

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7 टिप्‍पणियां:

  1. एक से एक लाजवाब शेर लिखे हैं, जिंदगी का दुनो पहलू बयान करने वाला.. मुनव्वर राना साहब का एगो शेर खास इससे मेल खाता हुआः
    शगुफ़्ता लोग भी टूटे हुए होते हैं अंदर से
    बहुत रोतेहैंवो जिनको लतीफ़े याद होते हैं.
    (शगुफ्ताः मुस्कुराने वाले)

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  2. का बात है मनोज बाब, जब से हमरा परिचय सुने हैं एक दम रस्तवे भुला गए हैं...कोनो गलती होगा त छमा कीजिएगा...

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  3. गुर जिंदगी के सीखे खिलती हुई कली से
    लब पर है मुस्कराहट दिल खून रो रहा है॥
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

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  4. भई खूब कहा है! क्या बात है! मनोज भाई बहुत दिनों के बाद लौटे हैं.

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