सोमवार, 31 मई 2010

शोपेनहावर के अनमोल विचार

• विश्वास और प्रेम में एक बात समान है; दोनों में से कोई भी जबरदस्ती पैदा नहीं किया जा सकता ।

• उपयोगी कलाओं की जननी है आवश्यकता, ललित कलाओं की जननी है विलासिता । पहली पैदा हुई बुद्धि से और दूसरी प्रतिभा से ।

• कोई भी अपने सिवाय किसी के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित नहीं कर सकता ।

• हमारा दूसरे लोगों के साथ जो संबंध होता है, प्राय: उसी से हमारे सभी शोक और दु:खों का जन्म होता है ।

• छोटी-छोटी बातें अनजाने रूप से हमें शुरु से ही किसी के अनुकूल या प्रतिकूल बना देती हैं ।

• जीवन के पहले चालीस वर्ष पाठ्य हैं और दूसरे तीस वर्ष इस पर व्याख्या ।

रविवार, 30 मई 2010

जिंदगी फ़िराक़ की नज़र से

मौत का भी इलाज हो शायद


जिंदगी का कोई इलाज नहीं

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न समझने की ये बातें हैं न समझाने की

जिंदगी उचटी हुई नींद है दीवाने की

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गुर जिंदगी के सीखे खिलती हुई कली से

लब पर है मुस्कराहट दिल खून रो रहा है

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हमें भी देख जो इस दर्द से कुछ होश में आए

अरे दीवाना हो जाना मुहब्बत में तो आसां है

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कोई समझे तो एक बात कहूँ

इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं

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शनिवार, 29 मई 2010

त्याग

आज ओशो के प्रवचन पथ की खोज से ली गई एक कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ , जो त्याग का सही अर्थ बताने में सहायक होगी ।

त्याग


एक फकीर था, अत्यंत अपरिग्रही और त्यागी । वह था और उसकी पत्नी थी । दोनों लकड़ियाँ काटते और उन्हें बेच कर अपनी आजीविका चलाते । संध्या जो पैसा बचता, उसे बाँट देते । एक बार चार छ: दिन लगातार पानी गिरा । वे लकड़ियाँ काटने नहीं जा सके । और उन्हें भूखा ही रहना पड़ा । भिक्षा वे मांगते नहीं थे । और संपत्ति उनके पास थी नहीं । उनने वे दिन उपवास और उपासना में बिताए । फिर जब पानी बंद हुआ , तो वे लकड़ियाँ काटने गए । जिस दिन वे लकड़ियाँ काटकर भूखे और थके वापिस लौट रहे थे, उस दिन एक घटना घटी । पति आगे था , पत्नी पीछे थी । पति ने राह के किनारे किसी राहगीर की स्वर्ण अशर्फियों से भरी थैली पड़ी देखी । उसने अपने मन में सोचा : मैंने तो स्वर्ण को जीत लिया है । मैं तो कांचन मुक्त हो गया हूँ । लेकिन मेरी पत्नी के मन में कहीं स्वर्ण देख प्रलोभन न आ जाए, - ऐसा विचारकर , ऐसे सोच से, ऐसी सदिच्छा से उसने उन स्वर्ण अशर्फियों को गड्ढ़े में ढकेल ऊपर से मिट्टी डाल दी ।


वह मिट्टी डाल ही रहा था कि उसकी पत्नी भी पहुँच गई । उसने पूछा, कि यह क्या करते हो ? उस साधु चरित्र व्यक्ति को बताना ही पड़ा, क्योंकि असत्य न बोलने का उसका व्रत था । उसने कहा : यहां बहुत सी स्वर्ण अशर्फियाँ पड़ी थी । मैं तो अपरिग्रही हूँ । स्वर्ण पर मेरा मन नहीं आता । मैंने तो जान लिया है कि स्वर्ण असार है , लेकिन तुम स्त्री हो, अनेक दिन की भूखी प्यासी हो, दुख और दरिद्रता के कारण कहीं उस स्वर्ण पर तुम्हारा मन न आ जाए, इसलिए मैंने उस पर मिट्टी डाल दी है । यह सुन पत्नी चुपचाप आगे बढ़ गई । उसने उत्तर में कुछ भी न कहा । उसके पति ने पूछा : तुम कुछ बोली नहीं ? तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं की ? यह सुन वह रोने लगी । और उसने कहा : मैं दुखी हूँ, कि तुम्हें अभी स्वर्ण दिखाई पड़ता है और मिट्टी पर मिट्टी डालते हुए देख मैं तुम्हारे लिए अति चिंता से भर गई हूँ ।


मैं भी इसमें चिंता के लिए कारण देखता हूँ । जो छोड़ा गया हो और जिसका त्याग न हुआ हो, उसका दीखना बंद नहीं होता है । विपरीत वह और भी प्रगट और प्रगाढ़ हो कर दिखने लगता है । वह तो घाव की भांति अनुभव होता है । सतत् उसकी प्रतीति बनी रहती है ।

शुक्रवार, 21 मई 2010

क्या दार्शनिक होना बुरा है ?

क्या दार्शनिक होना बुरा है ? क्या ज्ञान के प्रति प्रेम होना स्वाभाविक नहीं है ? क्या ज्ञान के प्रति पागलपन की हद तक जुनून होना समाज के लिए घातक है ? क्या ज्ञान के प्रति जिज्ञासु होना बुरा है ? मैं जानता हूँ कि आप इस बहस में नहीं पड़ना चाहेंगे । फिर भी मैं आप से ये प्रश्न पूछ रहा हूँ , क्योंकि मैं जानता हूँ कि हर व्यक्ति के मन मस्तिष्क में ज्ञान के प्रति अनुराग रहता है, जब तक कि उसकी संवेदनशीलता मर नहीं जाती । आज की अति भौतिकतावादी संस्कृति में भोग ही मुख्य उद्देश्य हो गया है, जिसके चलते रुपए-पैसे की अहमीयत आदमी के लिए मुख्य और ज्ञान गौण हो गया है । शायद ज्ञान उसकी प्राथमिकताओं में रहा ही नहीं । मैं इस पोस्ट का अंत हिगेल के इस वचन से करना चाहूँगा कि बहुधा दार्शनिक अपने विचारों में खोये रहने के कारण चलते समय गड्डे में गिर जाते हैं, पर इसका कारण यह नहीं है कि उनके पास दृष्टि नहीं है, बल्कि उनकी दृष्टि भूमि के बजाए आकाश में जमी हुई है । उनकी यह मूर्खता उन व्यक्तियों से तो बेहतर ही है जो कभी आकाश की ओर देखने का साहस ही नहीं करते । मैं कहूँगा कि आप ज्ञान के लिए इतने पागल तो मत बने कि चलते समय गड्डे में गिर जाए, पर साथ ही यह भी कहूँगा कि अपने भीतर की उस संवेदना को न मरने दीजिए जो ज्ञान के लिए पिपासु है और जिसकी भूख और प्यास केवल धन,पद और प्रतिष्ठा से नहीं मिटती, बल्कि वह तो चीजों को उन्हें वैसे ही देखने से मिटती है, जैसी कि वे हैं । अपनी दृष्टि को स्वच्छ रखिए, उस पर किसी प्रकार के विश्वास और पूर्वाग्रह का बोझ न पड़ने दें ।

गुरुवार, 20 मई 2010

नास्तिक दर्शन

नास्तिक दर्शनों में चार्वाक, जैन और बौद्ध दर्शन आते हैं । ये वेदों के प्रमाण में विश्वास नहीं रखते, इसलिए नास्तिक दर्शन के अंतर्गत रखे गए हैं ।

चार्वाक दर्शन के प्रणेता बृहस्पति माने जाते हैं । बार्हस्पत्य सूत्र इनका ग्रंथ माना जाता है, जो अप्राप्य है । सर्व दर्शन संग्रह के पहले अध्याय में चार्वाक मत के सिद्धांतों का सार मिलता है । इसे लोकायत दर्शन के नाम से भी जाना जाता है । प्रबोध चंद्रोदय नाटक में इस नाम का उल्लेख आया है । भूमि, जल, अग्नि,वायु जिनका प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है, इनके अतिरिक्त संसार में कुछ भी नहीं है । इन चार तत्वों के समिश्रण से ही चेतना शक्ति और बुद्धि का प्रादुर्भाव होता है । इनके अनुसार ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत, अर्थात ऋण लेकर भी घी का भोग करना चाहिए । इस लोक के अलावा और कोई दूसरा लोक नहीं है । इसलिए इस लोक का भरपूर आनंद लेना चाहिए, खूब ऐश-आराम करना चाहिए । शरीर के एक बार भस्म हो जाने पर वह पुन: वापिस लौट कर नहीं  आता ।

जैन दर्शन के प्रणेता वर्धमान हैं । जो जिन् कहलाए और महावीर के नाम से जाने जाते हैं । जिन का अर्थ है जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया अर्थात स्वयं का साक्षात्कार कर लिया । जैनों में महावीर चौबीसवें तीर्थंकर हैं । पहले तीर्थंकर ऋषभदेव हैं और तेइसवें पार्श्वनाथ हैं । इनके बारे में आगे हम फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे ।

बुद्ध दर्शन के प्रणेता गौतम बुद्ध हैं । बुद्ध दर्शन में चार आर्य सत्य हैं । 1. दुख है । 2. दुख का कारण है 3.दुख निरोध का उपाय है । 4.दुख निरोध का उपाय प्रतीत्यसमुत्पाद है । इस दर्शन का मुख्य मंतव्य है कि संसार दुख है । दुखों का कारण इच्छाएँ हैं । इच्छाओं से मुक्त हुआ जा सकता है । क्षणिकवाद बुद्ध की देशना है । आत्मा के संबंध में गौतम बुद्ध ने मौन धारण करना ही उचित जाना । उनके मतानुसार व्यक्तित्व परिवर्तनशील है । इस दर्शन के बारे में भी हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे ।

मंगलवार, 18 मई 2010

षट्दर्शन

भारत का आस्तिक दर्शन न्याय, वैशेषिक, साख्य, योग, पूर्व मीमांसा और उत्तरमीमांसा (वेदांत)  में बाँटा गया है । इतिहास वेत्ता मानते हैं कि ई.पू. पाँचवीं शताब्दी से लेकर ई.पू. पहली शताब्दी तक इन दर्शनों का विकास हुआ और इन्होंने व्यवस्थित रूप प्राप्त कर लिया । ये दर्शन आस्तिक इन अर्थों में नहीं हैं कि ये ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, बल्कि इन अर्थों में आस्तिक हैं कि ये वेदों के प्रमाण में आस्था रखते हैं । पूर्व मीमांसा और उत्तर-मीमांसा तो वैदिक ग्रंथों पर आधारित हैं, जबकि न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग स्वतंत्र आधार रखते हैं ।

1. न्याय दर्शन :: इस दर्शन के प्रणेता गौतम ऋषि माने जाते हैं । जिन्होंने न्याय सूत्रों में इस दर्शन के सिद्धांतों का विवेचन किया है । इस दर्शन में बुद्धि को सर्वोच्च स्थान पर रखा गया । इस दर्शन का अभिमत है कि बुद्धि के द्वारा सब कुछ जाना जा सकता है । 

2. वैशेषिक दर्शन :: कणाद इस दर्शन के प्रणेता हैं । परमाणुवाद वैशेषिक दर्शन की विशेषता है । परमाणु जगत के उपादान कारण माने जाते हैं । परमाणु एकत्रित व पृथक होते रहते हैं । यह कार्य अनंत काल से चला अआ रहा है । अग्नि व पृथ्वी के परमाणुओं द्वारा ईश्वर के ध्यान-मात्र से ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो जाता है । 

3. सांख्य :: इस दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि हैं । इस दर्शन में पच्चीस तत्व माने गए हैं , जिनमें पुरुष व प्रकृति मुख्य हैं । जब तक पुरुष प्रकृति से अपना पृथकत्व नहीं जान लेता तब तक संसार का नाटक चला करता है । 

4. योग :: इस दर्शन के प्रणेता पतंजलि मुनि माने जाते हैं । योग में चित्त-वृत्तियों के निरोध पर बल है । चित्त वृत्ति के निरोध के लिए अष्टांग योग की साधना आवश्यक है ।

5. पूर्व मींमासा :: इसके प्रणेता जैमिनि मुनि हैं । इसे कर्म मीमांसा भी कहते हैं, क्योंकि इसका संबंध कर्मकांड से है । इसके अनुसार नित्य यज्ञादि करने से ही सच्ची मुक्ति प्राप्त हो सकती है । 

6. उत्तर मीमांसा (वेदांत) :: इसके प्रणेता बादरायण या व्यास मुनि माने जाते हैं । इस दर्शन के अनुसार प्रमाण दो हैं : श्रुति (प्रत्यक्ष) व स्मृति (अनुमान) । इस जगत् में ब्रह्म ही सत्य है । पुरुष व प्रकृति उसी के दो परिवर्तित स्वरूप हैं । यह संसार ब्रह्म के संकल्प का परिणाम है ।  यह उसकी लीला है ।  

सोमवार, 17 मई 2010

स्मृति -ग्रंथ

भारत के इतिहास और संस्कृति में पाँच स्मृति-ग्रंथ प्रसिद्ध हैं :
  1. मनु - स्मृति
  2. याज्ञवल्क्य स्मृति
  3. पराशर स्मृति
  4. नारद स्मृति
  5. शंख स्मृति

रविवार, 16 मई 2010

भारतीय संस्कृति के आधार

भारतीय संस्कृति का इतिहास बहुत पुराना है । लगभग पांच हजार वर्ष पुराना इसका इतिहास है । इसके ज्ञान का आधारभूत चार वेदों में समाहित है । ये चार वेद हैं :
  1. ऋग्वेद
  2. यजुर्वेद
  3. सामवेद
  4. अथर्ववेद
इन चारों वेदों के चार उपवेद हैं :
  1. ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद
  2. यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद
  3. सामवेद का उपवेद गांधर्ववेद
  4. अथर्वेद का उपवेद स्थापत्य वेद
वेद के छ: अंग कहे गए हैं, जिन्हें वेदांग कहा जाता है :
  1. शिक्षा
  2. कल्प
  3. व्याकरण
  4. निरुक्त
  5. छंद
  6. ज्योतिष

रविवार, 2 मई 2010

पेड़ और सड़कें

देश की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है । देश में भीड़ बढ़ रही है । लोगों का एक जगह से दूसरी जगह आना-जाना बढ़ रहा है । यातायात के साधन बढ़ रहे हैं । सड़कों पर गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है । शहरों में गाड़ी खड़ी करने के लिए जगह कम पड़ रही है । एक शहर को दूसरे शहर से जोड़ने वाली सड़कों की चौड़ाई उन पर दौड़ती गाड़ियों की संख्या के हिसाब से कम पड़ने लगी है । ऐसे में विभिन्न हाई-वे को चौड़ा करने का काम शुरु है । सड़कों को चौड़ा करते समय या सड़कों पर फ्लाई-ओवर बनाने के लिए सड़कों के किनारे खड़े वृक्षों को अपने जीवन की आहुति देनी पड़ती है । बहुत सी सड़कों के दोनों ओर यदि पर्याप्त दूरी से पेड़ नहीं लगाए गए थे, तो सड़क चौड़ी करते समय मीलों लम्बी सड़कों के किनारे खड़े हजारों वृक्षों को अपने जीवन से हाथ  धोना पड़ता है । अभी पिछले सालों में चंडीगढ़ दिल्ली हाई वे को चौड़ा किया गया और भीड़ वाली जगहों पर फ्लाई ओवर बनाए गए । प्रशासन या लोक निर्माण विभाग या वन विभाग अथवा किसी भी सरकार ने सड़क चौड़ी करते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा कि सड़क चौड़ी किए जाने और फ्लाई-ओवर निर्माण के लिए सड़क के दोनों ओर से जो पेड़ काटे गए, उनकी जगह नए वृक्ष लगाए जाएँ । सड़क चौड़ी किए जाने की योजना बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि जितने पेड़ काटे जाएँ उससे दुगुने पेड़ लगाए भी जाएँ । और इन पेड़ों में उन पेड़ों की जातियाँ-प्रजातियाँ अधिक लगाई जानी चाहिए, जो जल्दी तैयार हो जाती हैं और जिनसे घनी छाया मिलती है । वर्ष 2005 में चंडीगढ़ -दिल्ली हाई-वे पर से जो वृक्ष काटे गए थे, उनके विकल्प के रूप में अभी तक कोई पेड़ नहीं लगाए गए हैं । जहां पहले यह मार्ग विशालकाय सफेदे, किकर और शिशम, अर्जुन जैसे वृक्षों से भरा रहता था, वहीं अब यह मार्ग वृक्ष और उनकी छाया से महरुम हो चुका है । गर्मियों के दिनों में इस मार्ग पर यात्रा करते समय ठंडी हवा और छाया का आनंद यात्रियों को मिलता था, उससे यात्री अब वंचित हैं ।
 क्या विकास के नाम पर हम जीवन का बहुत कुछ खो नहीं रहे, जो बहुत बहुमूल्य है .... विकास से कहीं ज्यादा ??? आइए वृक्ष लगाएँ और धरा बचाएँ ।