शनिवार, 31 दिसंबर 2011

काम

तीसरा पुरुषार्थ काम है।इसका शाब्दिक अर्थ है-'इच्छा'। पुरुषार्थ के रूप में काम से अभिप्राय: मनुष्य की उन सभी शारीरिक,मानसिक,संवेगात्मक तथा कलात्मक इच्छाओं की पूर्ति से है जो उसके संपूर्ण विकास और जीवन के परम लक्ष्य(मोक्ष)को प्राप्त करने में सहायक हैं। इच्छा सभी कार्यों की प्रेरक शक्ति होती है। इस प्रकार हर कार्य के पीछे काम का होना एक अनिवार्य शर्त है। इस काम को भारतीय मनीषा ने तीन श्रेणियों में रखा है-सात्विक,राजसिक और तामसिक। सात्विक काम फल की प्रत्याशा के बिना स्वधर्मानुसार(विवेकानुसार)संपन्न किया जाता है। इस तरह का काम धर्मसम्मत होता है। इसीलिए श्री कृष्ण गीता के सातवें अध्याय के 11वें श्लोक में कहते हैं-
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोअस्मि भरतर्षभ॥
अर्थात मैं बलवानों का कामना और आसक्ति से रहित बल(अर्थात् सामर्थ्य) हूँ तथा सभी प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम हूँ। 
राजसिक काम विषय,वासना और इंद्रिय संयोग से पैदा होने वाला अहंकारयुक्त और फल की इच्छा से किया जाने वाला काम है। इस प्रकार का काम भोगते समय तो सुखकारी प्रतीत होता है,किंतु परिणाम दुखकारी होता है। तामसिक काम में मनुष्य मोहपाश में बंधा होता है,वह न तो वर्तमान का और न ही भविष्य का कोई विचार करता है। आलस्य,निद्रा और प्रमाद इस काम के जनक कहे गए हैं। इस प्रकार का काम न तो भोगते समय सुख देता है और न ही इसका परिणाम सुखकारी होता है। इन तीनों कामों में सात्विक काम श्रेष्ठ है,जो भोगते समय विषकारी प्रतीत हो सकता है,लेकिन परिणाम सदैव आनंददायी और मुक्तिकारक होता है। अन्य काम बंधन बनते हैं।

काम को संकुचित अर्थों में केवल इंद्रिय सुख और यौन प्रवृत्तियों की संतुष्टि तक सीमित कर दिया गया है। विस्तृत अर्थों में काम से अभिप्राय: मनुष्य की समस्त प्रवृत्तियों और इच्छाओं की विवेकसम्मत पूर्ति से है। मनुष्य में यौन संबंधी इच्छाएं होती हैं और वह इन इच्छाओं को संतुष्ट करना चाहता है। यह मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है। इस इच्छा को अनुचित रूप से दबाना हानिकारक होता है। इस इच्छा की पूर्ति न होने से मनुष्य विक्षिप्त हो सकता है। यही कारण है कि भारतीय मनीषा ने यह स्वीकार किया है कि यौन संबंधी इच्छाओं की तृप्ति जीवन का एक सहज,स्वाभाविक या मूल प्रवृत्यात्मक अंग है। इसकी संतुष्टि के लिए विवाह का विधान है। विवाह के लक्ष्य में धर्म तथा संतानोत्पति के साथ काम(रति) को भी एक उद्देश्य स्वीकार किया गया। गृहस्थ जीवन का सर्वोपरि उद्देश्य यौन संबंधी संतुष्टि प्राप्त करना है। काम से ही सृष्टि चलती है। इसे अवरुद्ध करना सृष्टि में बाधक है। विपरीत लिंग के प्रति प्रेम और आकर्षण काम के ही कारण है।'कामसूत्र' के रचयिता वात्स्यायन का कहना है कि काम को उच्छृंखल नहीं छोड़ना चाहिए। उस पर नियंत्रण बहुत जरूरी है। काम की शक्ति इतनी है कि वह आसानी से वश में नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां वात्स्यायन कामात्मक भावनाओं को कलाओं में लगाने का परामर्श देते हैं ताकि काम-ऊर्जा का उर्ध्वीकरण हो सके। जिससे एक ओर तो काम की सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति होती है दूसरी ओर नैतिक विकास भी।  यहीं से काम का दूसरा पक्ष स्पष्ट होता है। यह मनुष्य के संवेगात्मक,उद्वेगात्मक और सौंदर्यात्मक जीवन को प्रकट करता है। इसी को स्पष्ट करने के लिए वात्स्यायन कामसूत्र में 64 कलाओं का वर्णन करता है। कामसूत्र में वासनामय काम का ही वर्णन नहीं बल्कि उससे अधिक मानसिक और नैतिक विकास के साधनों और कलाओं पर भी विस्तृत रूप से विचार किया गया है। मनुष्य का काम ही सुंदर वस्तुओं के निर्माण में सहायक बनता है। मनुष्य आदिकाल से ही सौंदर्य का इच्छुक रहा है। वह मात्र सौंदर्य को देख कर ही खुश नहीं होता बल्कि स्वयं सौंदर्य की रचना भी करना चाहता है। इससे मनुष्य और पशु के बीच एक अंतर स्पष्ट होता है। मनुष्य कला का सृजन कर सकता है,लेकिन पशु ऐसा नहीं कर सकते। मनुष्य केवल खाने-पीने की सामग्री पाकर,पहनने के लिए अच्छे कपड़े पाकर और रहने के लिए अच्छे घर को पाकर ही खुश नहीं होता। रोटी,कपड़ा और मकान की प्राप्ति के बाद भी उसकी बहुत सी इच्छाएं होती हैं। वह स्वयं सर्जक बनना चाहता है। सौंदर्य में रमना चाहता है। वह जिस सौंदर्य को देखता है,उसे वैसा ही नहीं देखना चाहता बल्कि उसमें कुछ और जोड़ देना चाहता है। उसके इस प्रयास में ही अनेक कलाओं का विकास हुआ है। मनुष्य अपने तमाम संघर्षों और व्यस्तताओं के बावजूद इतना समय और अवसर निकाल ही लेता है कि वह खेल-कूद सके या संगीत,नृत्य,रंगमंच,लेखन और विभिन्न सृजनात्मक कलाओं आदि में स्वयं को डूबो सके। इस प्रकार के सृजनात्मक व सौंदर्य की अभिव्यक्तिपरक कामों से वह आनंदलोक में पहुंच जाता है और इन क्षणों में वह सर्वस्व विस्मरण कर देता है। उसका हृदय पक्ष सबल हो जाता है और मानवीय संवेदना शिखर पर पहुंच जाती है। स्पष्ट है कि मानव की सृजनात्मक प्रवृत्तियों को यदि अवसर न मिले तो उसका व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। जीवन का आनंद सृजनात्मक प्रवृत्तियों में ही है। काम की शक्ति ही सृजन में परिवर्तित होकर प्रशंशित होती है और जीवन को विकसित करती है। अत: मानव की इस मूल प्रवृत्ति को दबाना उचित नहीं बल्कि उसके समन्वित विकास के लिए उसे सृजन में लगाना मध्यम-मार्ग है,जो पुरुषार्थ का सिद्धांत प्रदर्शित करता है।

गीता में इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए काम को तृप्त करने के लिए कहा गया है। गीता के दूसरे अध्याय के 62वें और 63वें श्लोक में कहा गया है कि विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की इन विषयों के साथ आसक्ति हो जाती है;आसक्ति से काम पैदा होता है और काम की तृप्ति न होने से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से मोह पैदा होता है, मोह से स्मृति-भंग,अविवेक पैदा होता है। अविवेक से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि नष्ट हो जाने से मनुष्य नष्ट हो जाता है अर्थात् पुरुषार्थ के योग्य नहीं रहता।

स्पष्ट है कि नियंत्रित और विवेकसम्मत तथा कलाओं में लगाया गया काम जीवन को सुखी और आनंदमय बना देता है। किंतु वासनामय काम मनुष्य को नीचे गिरा देता है। काम साधन है,साध्य नहीं। यह धर्म का साधन है न कि स्वयं साध्य और वहीं तक उचित है जहां तक कि उसका उपयोग संयमित और धर्मानुकूल है। काम सृजनात्मक होकर ही सार्थक और मुक्ति का मार्ग बनता है।

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

अर्थ

हिंदू जीवन दर्शन में 'अर्थ' को दूसरा पुरुषार्थ कहा गया है। अर्थ का शाब्दिक अर्थ 'वस्तु' या 'पदार्थ' है। इसमें वे सभी भौतिक वस्तुएं आती हैं जिन्हें जीवन यापन के लिए मनुष्य अपने अधिकार-क्षेत्र में रखना चाहता है।अर्थ से ही मनुष्य अपने उदर की पूर्ति करता है।कर्त्तव्य-निर्वहण में अर्थ की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अर्थ में केवल धन या मुद्रा ही नहीं बल्कि वे सभी चीजें शामिल हैं जिनसे भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। भारत में कभी भी अर्थ को उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखा गया। बल्कि इसे धर्म का साधन कहा गया है। संस्कृत में एक श्लोक है-'धनाद् धर्म' अर्थात् धन से धर्म की सिद्धि होती है। भारतीय धर्मशास्त्रों में धर्म-संबंधी ही चर्चा नहीं है,बल्कि उनमें अर्थनीति,राजनीति,दंडनीति आदि विषयों पर भी चर्चा हुई है। समाज व्यवस्था में अर्थ का नियोजन बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।कौटिल्य ने अपने 'अर्थशास्त्र' में बहुत से विषयों जैसे राजकुमारों की शिक्षा-दीक्षा,मंत्री-मंडल,जासूस,राजदूत,निवास,शासन-व्यवस्था,दुष्टों की रोकथाम,कानून,वस्तुओं में मिलावट,मूल्य-नियंत्रण,झूठे नाप-तौल को रोकने के उपाय,कूटनीति,युद्ध-संचालन,गुप्त-विद्या आदि बहुत से विषयों पर सुलझे हुए विचार दिए हैं; जो उसके अर्थशास्त्र से जुड़े हुए हैं। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी ये विचार न केवल व्यवहारिक बल्कि समीचीन भी हैं।वात्स्यायन ने अपने 'कामसूत्र' में अर्थशास्त्र के अंतर्गत पशु,अनाज,सोना,चांदी,मित्र,शिक्षा आदि की उन्नति को सम्मिलित किया है। इन सब शास्त्रों में अर्थ पर विचार करते हुए इस बात का उल्लेख हुआ है कि अर्थ का इस्तेमाल धर्म के साधन रूप में किया जाए, न कि साध्य के रूप में। इस प्रकार भारतीय संस्कृति में भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति मनुष्य का लक्ष्य है।अर्थ मनुष्य की उन्नति के लिए है,उसके पतन के लिए नहीं। इसलिए यह अन्य पुरुषार्थों का साधन है न कि स्वयं साध्य। 

मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएं रोटी,कपड़ा और मकान अर्थ से ही पूरी होती हैं।शिक्षा,स्वास्थ्य और सुविधा भी अर्थ से ही पूरी होती हैं। इसी लिए भारतीय धर्मशास्त्रों में मनुष्य की दूसरी अवस्था (गृहस्थ आश्रम) में धन कमाना मनुष्य का लक्ष्य कहा गया है। एक श्लोक में कहा गया है कि जिस मनुष्य ने अपनी पहली अवस्था(ब्रह्मचर्य आश्रम) में विद्या नहीं ग्रहण की, दूसरी अवस्था (गृहस्थ आश्रम) में धन नहीं अर्जित किया, तीसरी अवस्था (वानप्रस्थ आश्रम)में तप नहीं किया, वह चौथी अवस्था(संन्यास आश्रम) में क्या कर सकेगा अर्थात् उसका जन्म व्यर्थ है -
आद्ये वयसि नाद्योतं द्वितीये नार्जिते धनम्।
तृतीय न तपस्तप्तं चतुर्थे किं करिष्यति ॥
द्वितीय अवस्था में धन कमाना इसलिए जरुरी है क्योंकि इस अवस्था में व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है। उसका परिवार बनता है। परिवार की आवश्यकताओं के लिए धन का होना जरुरी है। इस तरह से धर्म(कर्त्तव्य) और काम की पूर्ति का साधन अर्थ है।धर्म समाज को धारण करता है और काम समाज में प्रवाह बनाए रखता है।

अर्थ को भारतीय संस्कृति में वहीं तक महत्व प्राप्त है,जहां तक वह मनुष्य को शिष्ट और सभ्य बनाए अर्थात उसके विवेक में सहायक हो। मनुष्य के जीवन के लिए अर्थ है,मनुष्य स्वयं अर्थ के लिए नहीं।इसलिए भारतीय संस्कृति में धन के एकत्रीकरण को महत्त्व नहीं दिया गया है।धन को साध्य मान लेने पर समाज का स्वाभाविक पतन होने लगता है।किसी ने सही कहा है- Where wealth accumulates man degenerates.इसलिए संभवत: हिंदू-दर्शन में दान की परम्परा है। ताकि किसी के पास जरूरत से अधिक धन का संचय न हो। धर्म,अर्थ और काम में सबसे ऊँचा धर्म है क्योंकि धर्म ही अर्थ और काम के सही उपयोग का पथ-प्रदर्शक है।पंचतंत्र और हितोपदेश के बहुत से नीति-श्लोकों में इस बात को समझाया गया है। 

आधुनिक संदर्भ में देखें तो अर्थ में सभी आर्थिक-क्रियाएं समाहित हैं।संपत्ति का उत्पादन,उपभोग,विनिमय,वितरण आदि।हमारी सरकार को अर्थ का नियोजन-विनियोजन इस प्रकार से करना चाहिए कि धन का प्रवाह बना रहे।वह कुछ लोगों के पास एकत्रित न हो। जिससे कि समाज के सभी वर्गों तक धन पहुंचे और उसे अपनी समाज-व्यवस्था और आर्थिक नीतियां इस रूप में तैयार करनी चाहिए जिससे कि सभी का समुचित उन्नयन हो,सभी को मूलभुत सुविधाएं मिलें। अर्थ के दुरुपयोग से समाज में अपराध बढ़तें हैं लोगों में असुरक्षा का भाव आता है और लोग अपने कर्त्तव्य से च्युत होते हैं।