मंगलवार, 24 जनवरी 2012

पुस्तकें

पुस्तकें आप की अक्षय जीवन संगिनी हैं।यदि आपके पास पुस्तकें हैं तो आपके पास बुद्धिमता,हर्ष,विद्वता,चतुरता,विवेक,ज्ञान और तत्त्वज्ञान का झरना है।इनके द्वारा आप शताब्दियों के सर्वोत्तम विचारकों का सत्संग कर सकते हैं और जब भी आपकी इच्छा हो इनसे लाभ उठा सकते हैं। पुस्तकें मन को आलोकित करती हैं,प्राण को सबल बनाती हैं,क्लांत शरीर को उठाती हैं और जीवन भर साथ बनी रहती हैं।-टी.पी.डून्न

रविवार, 8 जनवरी 2012

मोक्ष

धर्म के मार्ग पर चलते हुए काम और अर्थ की पूर्ति करते हुए जीवन के परम ध्येय को पा लेने का नाम है-मोक्ष। यही वह लक्ष्य है जिसकी प्राप्ति भारतीय चिंतन का आधार है। चार्वाक दर्शन को छोड़कर सभी भारतीय दर्शन मोक्ष को जीवन का नि:श्रेयस मानते हैं। पुरुषार्थ के रूप में मोक्ष का आशय किसी दूसरे लोक या स्वर्ग लोक को पाना नहीं है,बल्कि सद्ज्ञान से सांसारिक बंधनों से छूट कर आत्मा अथवा स्वयं के वास्तविक स्वरूप को पहचानना और उस स्वरूप में स्थित होकर ब्रह्मानंद की अनुभूति प्राप्त करना है। इसे बुद्ध निर्वाण कहते हैं और महावीर कैवल्य।

शिव गीता(शिव-सूत्र) में मोक्ष की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि मोक्ष किसी स्थान पर रखी गई वस्तु नहीं जिसे पाना है और न ही गांव-गांव घूमकर ही इसे प्राप्त किया जा सकता है। वस्तुत: जब हृदय की अज्ञान ग्रंथि का नाश हो जाता है,तब प्राप्त हुई स्थिति मोक्ष है।

अद्वैतवादियों(वेदांत) के अनुसार मोक्ष का अर्थ ब्रह्म के आनंद की (ब्रह्मानंद) प्राप्ति से है। मुक्ति न तो उत्पन्न होती है और न ही पहले से अप्राप्त है। यह तो प्राप्त की ही प्राप्ति है। मुक्ति शाश्वत सत्य का अनुभव है, उसका साक्षात अनुभव ही मुक्ति है। मोक्ष की प्राप्ति की उपमा वेदांती इस प्रकार देते हैं कि जैसे किसी के गले में पहले से ही हार है,परंतु वह इस बात को भूलकर इधर-उधर ढ़ूंढ़ता फिरता है, लेकिन अंतत: जब उसकी दृष्टि अपनी ओर जाती है तो हार मिल जाता है। हार का साक्षात अनुभव उसे होता है, उसी तरह मुमुक्षु को मोक्ष प्राप्ति के लिए स्वयं की ओर,स्वयं के अंतर में देखना होता है। इस प्रकार स्वयं से अज्ञान का आवरण दूर कर देना ही मोक्ष है।

मुण्डकोपनिषद के अनुसार पूर्ण आत्म-ज्ञान जब तथा जिस स्थान पर होगा,उसी स्थान पर,उसी समय मोक्ष समझना चाहिए। मोक्ष आत्मा की मूल शुद्ध दशा है। गीता में उल्लेख है कि बाह्य सुख-दुखों से ऊपर उठकर जो अंतर्मुखी हो अंत:करण में स्थित हो जाए,जो अपने ही में विश्राम पाने लगे और ऐसे ही जिसे अंत:प्रकाश मिल जाए वह योगी ब्रह्म रूप हो जाता है,इस ब्रह्म मिलन में ही मोक्ष है।

सांख्य दर्शन के अनुसार,प्रकृति की माया के प्रभाव से मुक्त होना तथा कैवल्यता(बंधनों से मुक्ति) को प्राप्त करना ही मोक्ष है।

लोकमान्य तिलक के अनुसार, ...इससे यह समझना चाहिए कि जैसे सांख्यवादी त्रिगुणातीत पद से प्रकृति और पुरुष दोनों को स्वतंत्र मानकर पुरुष के अकेलेपन,केवलपन या कैवल्य को मोक्ष मानते हैं,वैसा ही मोक्ष गीता को भी मान्य है। गीता के अनुसार अध्यात्मशास्त्र में कही गयी ब्रह्म अवस्था 'अहं ब्रह्मास्मि' 'मैं ही ब्रह्म हूं', कभी तो भक्ति मार्ग से,कभी चित्तवृत्ति निरोध रूप पातंजलि योग से और कभी गुणावगुण विवेचन रूप सांख्य मार्ग से भी प्राप्त होती।....साधन कुछ भी हो,इतनी बात तो निर्विवाद है कि ब्रह्मात्मैक्य का अर्थात सच्चे परमेश्वर का ज्ञान होना,सब प्राणियों में एक ही आत्मा को पहचानना और उसी भाव के अनुसार बर्ताव करना ही अध्यात्म ज्ञान की परम विधि है। यह अवस्था जिसे प्राप्त हो जाए,वही पुरुष धन्य तथा कृत्य होता है। वास्तव में यही अवस्था मोक्ष है।


स्पष्टत: मोक्ष एक ऐसी स्थिति है जहां तीनों प्रकार के दुखों-आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक से छुटकारा हो जाता है। मोक्ष एक ऐसी अवस्था है,जहां दुखों का पूर्ण अभाव रहता है।जहां न दुख रहता और न सुख बल्कि इनसे परे केवल आनंद होता है- विशुद्ध आनंद।


कुछ दर्शनों ने मोक्ष को इसी जीवन में साध्य माना है और इसकी प्राप्ति को जीवनमुक्ति कहा है। जबकि अन्य  इसे मृत्यु के बाद की स्थिति कहते हुए इसे विदेहमुक्ति कहते हैं।

 मोक्ष के विषय में श्रुति कहती है कि-
न मोक्षो नभस: पृष्ठे न पाताले न भूतले।
सर्वाशासंक्षये चेत: क्षयो मोक्षा इति श्रुति॥
अर्थात मोक्ष न आकाश में है न पाताल में और न पृथ्वी पर बल्कि सब प्रकार की इच्छाओं से छुटकारा ही मोक्ष है। 

जैन,बौद्ध,सांख्य तथा वेदांत के अनुरूप हमारा स्पष्ट मत है कि व्यक्ति इसी जीवन में ,शरीर में रहते हुए मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। ओशो भी इसे स्वीकार करते हैं। 

आधुनिक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप से भटक गया है। वह काम और अर्थ की अंधी दौड़ में धर्म से च्युत हुआ है। वह माया को ही सत्य समझ बैठा है। यदि व्यक्ति धर्म को पहचाने और अर्थ और काम को उसके अनुरूप दिशा दे तो जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को यहीं,इसी जीवन में प्राप्त कर सकता है। आज व्यक्ति के कर्म सिर्फ बंधन बन रहे हैं,वह बंधन से मुक्त होना चाहता है,जो उसकी आदिम वृत्ति है। लेकिन उसे रास्ता नहीं सूझ रहा है। इस भटकाव के बाद शायद उसकी दृष्टि स्वयं की ओर उठे और वह स्वयं की खोज के लिए अपने में ही विश्राम पाने के लिए अंत:करण में झांके तो निश्चित ही वह आत्म-स्वरूप को पा लेगा। मोक्ष में ही मनुष्य की समस्त प्रवृत्तियों और निवृत्तियों का शमन है। वही समस्त नदियों का मिलन स्थल है...वही परम विश्राम है।